
सुस्वागतम् आप सभी, का आप सुन रहे हो? सुस्वागतम्..स्वागत के साथ आपका आभार भी आपकी उपस्थिति के लिए। वैसे आप थक नहीं रहे हो,दो दिन की कथा हुई और आप थके नहीं। “ वयम तु न वित्तृप्याम स्वादु स्वादु पदे पदे”, नैमिषारण्य में जो ऋषिगण उनकी संख्या तो बहुत बड़ी थी 88,000। तो उन्होंने भी कहा “हमारी तृप्ति नहीं हो रही है, आप और सुनाइए” स्वादु स्वादु पदे पदे। तो वैसे भाव आप में भी उदित हो रहे हैं और आपका उत्साह आज तो क्या कहे? कमाल या धमाल किया आपने। इतने दिन से तो बैठे थे, आज तो आप सब उठके खड़े हुए, खड़े होकर आप तो नृत्य कर रहे थे। हरि बोल! वैसे यह कथा के श्रवण की सिद्धि या पूर्णता है। एक दिन बताए भी थे ‘भागवत महात्म्य’ के अंतर्गत चार कुमार कथा सुना रहे थे और भगवान प्रकट हुए कई सारे परि रों के साथ। फिर वहाँ महासंकीर्तन हुआ। कीर्तन के साथ सभी इंक्लूडिंग ज्ञान और वैराग्य भी नृत्य करने लगे। हम भी वैसे जब शुरुआत में आते हैं तो हम ज्ञान वैराग्य की स्थिति में होते हैं। किन्तु वे भी नाचने लगे। निश्चित भगवान भी यहाँ उपस्थित हैं अपने विग्रह के रूप में भी और “हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे” ये भी एक भगवान का रूप ही है, “ कलिकाले नामरुपे कृष्ण अवतार” ।कल अवतारों की चर्चा हो रही थी तो उसमें से एक अवतार कौन सा है? ‘कलिकाले नामरूपे’ कलियुग में ये नाम के रूप में भगवान प्रकट होते हैं। जब हम कहते “हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे” तो भगवान प्रकट होते हैं। “ नाम नाचे जीव नाचे, नाचे प्रेम धन” तो फिर नाम भी नाचने लगता है, मतलब भगवान भी नाचते है और जीव भी नाचता है और इसी के साथ सबको प्रेमधन की प्राप्ति होती है । “कृष्ण प्रेम प्रदायते” कृष्ण कन्हैया लाल की जय! द्वारकाधीश की जय! कन्हैया लाल तो वृन्दावन में थे और द्वारकाधीश द्वारिका में। थोड़ी सी या अधिक द्वारकाधीश की लीलाए-कथाएँ हम सुना रहे हैं।