Srimad Bhagavatam 09.05.06
12-07-2024
ISKCON Vrindavan

आज की प्रातःकालीन कक्षा में आप सभी का हार्दिक स्वागत, अभिनंदन, आभार भी आपकी उपस्थिति के लिए। ग्रंथराज श्रीमद् भागवतम का नौवा स्कंध, पांचवा अध्याय, श्लोक संख्या छः। पीछे कहिए- 

 “नम: सुनाभाखिल धर्म सेतवे ह्य धर्मशीला पर धूम केतवे ।

त्रैलोक्य गोपाय विशुद्ध वर्चसे मनोजवायाद्भ‍ुतकर्मणे गृणे ॥” 

नमः- आपको सादर नमस्कार है; सुनाभा – शुभ नाभि वाले; अखिल धर्म सेतवे – जिसके आगे समस्त ब्रह्माण्ड के सेतु समान हैं ; हि – निस्संदेह; अधर्मशील – अधार्मिक ; असुर – असुरों के लिए ; धूम केतवे- जो अग्नि या अशुभ पुच्छल तारे के समान है, उनको त्रैलोक्य – तीनों संसारों का ; गोपाय – पालक को; विशुद्ध – दिव्य; वर्चसे – जिसका तेज; मन:- ज्वाय- मन के समान गति वाला; अद्भुत – विचित्र; कर्मणे- इतना सक्रिय; ग्रणए – मैं बोलता हूं।

अनुवाद और तात्पर्य श्रील प्रभुपाद द्वारा:- 

“श्रील प्रभुपाद की जय!” अम्बरीष महाराज की ये प्रार्थना है,वे सुदर्शन को प्रार्थना कर रहे हैं, “ हे सुदर्शन आपकी नाभि अत्यंत शुभ है, अतएव आप धर्म की रक्षा करने वाले हैं। आप अधार्मिक असुरों के लिए अशुभ पुच्छल तारे के समान हैं। निस्संदेह आप ही तीनों लोकों के पालक हैं। आप दिव्य तेज से पूर्ण हैं। आप मन के समान तीव्रगामी है और अद्भुत कर्म करने वाले हैं। मैं केवल नमः शब्द कह कर आपको सादर नमस्कार करता हूं।

तात्पर्य –

श्रीभगवान का चक्र सुदर्शन कहलाता है क्योंकि यह उच्च और निम्न अपराधियों या असुरों में भेदभाव नहीं करता। दुर्वासा मुनि निश्चय ही शक्तिशाली ब्राह्मण थे किन्तु उनके कार्यकलाप शुद्ध भक्त अम्बरीष के प्रति असुरों जैसे थे। शास्त्रों का वचन है – “धर्मम् तु साक्षात् भगवत प्रणीतम”, धर्म का अर्थ है पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान द्वारा दिए गए आदेश या नियम। भगवान की शरण ग्रहण करना है। अतएव वास्तविक धर्म का अर्थ है भगवान की भक्ति, इसीलिए सुदर्शन चक्र को यहां धर्मसेतवे अर्थात् का रक्षक कहा गया है। महाराज अम्बरीष सचमुच एक धार्मिक व्यक्ति थे अतएव उनकी रक्षा करने हेतु सुदर्शन चक्र दुर्वासा मुनि जैसे कठोर ब्राह्मण को भी दंड देने को उद्यत था क्योंकि उन्होंने असुर जैसा व्यवहार किया था। ब्राह्मण के रूप में भी असुर मिलते हैं। अतएव सुदर्शन चक्र ब्राह्मण असुर और शूद्र असुर में कोई भेद नहीं बरतता । जो कोई भी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान या उनके भक्तों के विरुद्ध होता है वह असुर कहलाता है। शास्त्रों में ऐसे अनेक ब्राह्मण या क्षत्रिय असुरों की तरह कर्म करते पाए गए हैं, अतएव उनका वर्णन असुरों की भांति हुआ है। शास्त्रों के निर्णय के अनुसार किसी की पहचान उसके लक्षणों के अनुसार ही की जाती है। यदि कोई ब्राह्मण पिता से उत्पन्न है किन्तु उसके लक्षण असुरों जैसे हैं तो वह असुर माना जाता है। सुदर्शन चक्र सदैव असुरों का ध्वंस करने के लिए है अतएव उसे “अधर्मशील असुर धूमकेतवे” के रूप में वर्णन किया गया है । जो भक्त नहीं हैं वे अधर्मशील कहलाते हैं। सुदर्शन चक्र ऐसे समस्त असुरों के लिए अशुभ पुच्छल तारे की भांति है।

नम: सुनाभाखिल धर्म सेतवे ह्य धर्मशीला पर धूम केतवे ।

त्रैलोक्य गोपाय विशुद्ध वर्चसे मनोजवायाद्भ‍ुतकर्मणे गृणे ॥

हे सुदर्शन! आपकी नाभि अत्यंत शुभ है अतएव आप धर्म की रक्षा करने वाले हैं आप अधार्मिक असुरों के लिए अशुभ पुच्छल तारे के समान हैं निस्संदेह आप ही तीनों लोकों के पालक हैं। आप दिव्य तेज से पूर्ण हैं आप मन के समान तीव्र गामी हैं और अद्भुत कर्म करने वाले हैं। मैं केवल नमः शब्द कह कर आपको सादर प्रणाम करता हूं। हरि हरि! इस प्रकार दुर्वासा मुनि को जीवनदान मिलता है, यह इस अध्याय का शीर्षक भी है।

“परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् |

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे” ।।

ये हैं भगवान, या ऐसे होते हैं भगवान। क्या है पहचान भगवान की? “परित्राणाय साधूनां”- साधुओं का रक्षण, पालन- पोषण करना,ये भी पहचान है। मैं लगभग कहने जा रहा था कि यह भी धर्म है भगवान का। साधु संतों का, भक्तों का रक्षण करना भी भगवान का धर्म है। इस धर्म का पालन भी भगवान करते हैं। जैसे जैव धर्म है या जीवों का धर्म है,वैसे ही भगवान का भी अपना धर्म है।

“विनाशाय च दुष्कृताम” दुष्टों का संहार करना, या दुष्टता का संहार करना,विनाश करना। ऐसे करते हुए 

“परित्राणाय साधुनाम विनाशाय च दुष्कृताम् 

धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे “

इस उद्देश्य से भगवान इस संसार में प्रकट होते है, हरि हरि! यहां सुदर्शन का भी उल्लेख हुआ है, सुदर्शन के मदद से ही भगवान अम्बरीश महाराज की रक्षा और दुर्वासा की दुष्टता का विनाश यहां कर रहे है। सुदर्शन वैसे ये दिखने में भी सुंदर होता हैं इसलिए भी इसको सुदर्शन कहा है। श्रील प्रभुपाद लिखते हैं , भगवान का चक्र सुदर्शन कहलाता क्योंकि यह उच्च तथा निम्न अपराधियों का, या अपराधी और असुर में भेदभाव नहीं करता, समदृष्टि है सुदर्शन चक्र की। भगवान पद्म, शंख, गदा, चक्र ऐसे चार “ नीलांचले शंख चक्र गदा पदम धर” इसमें से दो चिन्ह कमल और शंख भक्तों के लिए है, भक्तों को प्रेरित करने के लिए,भक्तों को प्रोत्साहित करने के लिए,उनका हौसला बढ़ाने के लिए हैं। मैं यह भी सोच रहा था भगवान से वृंदावन में मुरली बजाते हैं, गायों के लिए एक मुरली की नाद होती है,तो गोपियों के लिए और होती हैं। भगवान बता रहे, ए मुरली की नाद, भगवान विष्णु के चरणों में अपराध कितने सारे किए? कितने किए?100। भगवान भी सहनशील है, 99.9 उन्होंने सहन तो कर लिए। वैसे पहले ही ये व्यवस्था भी हुई थी कि पहले के 99 सहन किए जाएंगे,फिर और एक बार यदि वो अपराध करके बैठता है तो। बड़ी संख्या में वहां उपस्थित थे सब राजसभा में,तो भगवान ने अपने सुदर्शन चक्र को आदेश दिए कि जाओ,और लक्ष्य क्या है? शिशुपाल। जब सुदर्शन चक्र जा रहा था, आगे बढ़ रहा था तो शायद रास्ते में/ मार्ग में जो और लोग थे वो सोचे, ए ये मेरी ओर तो नहीं आ रहा न। लेकिन सभी को टालते हुए, अवॉइडिंग एवरीवन एल्स, सुदर्शन चक्र इंटेलीजेंट था, सुंदर चक्र भी सोचता है, ही कुड थिंक। सुंदर चक्र भगवान है, भगवान से अभिन्न है। और फिर उसने काम बना ही लिया, विनाशाय च दुष्कृताम। शिशुपाल का संहार किया। जब जगाई-मधाई ने अपराध किया नित्यानंद प्रभु के चरणों में ,इस बात का जब चैतन्य महाप्रभु को पता लगा।कैसे पता लगा,किसी ने कुछ एस एम एस किया? ये तो है भगवान,भगवान सर्वज्ञ हैं। भगवान सर्वत्र भी है इसलिए भगवान सर्वज्ञ भी है। हम जहां पर होते हमें वहां का पता चलता है, हम सर्वत्र नहीं होते इसलिए हमें सब बातों का पता नहीं चलता, लेकिन भगवान सर्वत्र होते हैं। “अंडान तरस्त परमाणु च यांतरस्त” कण कण में भगवान, केवल ये कहने की बात नहीं, भगवान अणु रेणु में हैं, इसलिए भगवान जहां है वहां का भी उनको पता चलता है, वे सर्वज्ञ हैं। चैतन्य महाप्रभु ये दुर्घटना जान गए थे, जगाई मधाई ने जो अपराध किया नित्यानंद प्रभु के प्रति, महाप्रभु दौड़ पड़े। भक्तों के चरणों में किया गया अपराध भगवान को असहनीय होता है,जैसे यहां हम देख रहे हैं अम्बरीष महाराज के चरणों में किया हुआ अपराध। 

“साध्वों हृदयम मह्यम साधुनाम् हृदयम त्वहम” 

साधु के हृदय में भगवान विराजमान होते हैं, होते तो वैसे सभी के हृदय में विराजमान,

“सर्वस्य चाहम हृदि सन्निविष्टो” 

लेकिन सभी ये अनुभव नहीं करते कि भगवान मेरे हृदय में हैं,मेरे पास में हैं। 

“प्रेमांजने छुरित भक्ति विलोचनेंन 

संतः सदैव हृदयेशु विलोकयन्ति

यम श्याम सुंदरम अचिंत्य गुणस्वरुपम” 

(हरि हरि! ये सुदर्शन चक्र चालू है, मैने कुछ अपराध किया होगा इसलिए मुझे टारगेट बना रही हैं ये मक्खियां) 

श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु जब उस घटना स्थली की ओर जा रहा रहें थे तो वे क्या कहते हुए जा रहे थे? “सुदर्शन..” ऐसा कहते ही सुदर्शन प्रकट हुआ था। दुष्टों/ अपराधियों का, जगाई मधाई, दीन हीन पापी, महा पापी, पापियन में नामी थे, ऐसे पापियों के संहार के लिए सुदर्शन का आवाहन किया तो सुदर्शन प्रगट हुआ। किंतु वहां पर नित्यानंद प्रभु ने कहा, “नहीं नहीं! ये तो कलयुग है, प्रभु आप हर पापी/अपराधी को अपने हथियार से उसका वध करना चाहोगे तो कोई बच जाएगा इस पृथ्वी पर इस कलयुग में? “कलेर दोष निधि राजन” सर्वत्र क्या है? दोष ही दोष हैं, अपराध ही अपराध हैं और वैष्णव अपराध ही है सर्वत्र ,तो किसको बचाओगे और किसका वध करोगे? नहीं, इस कलयुग में इस हथियार का उपयोग आपको नहीं करना है। हथियार का उपयोग करना है लेकिन सुदर्शन चक्र या कुल्हाड़ी ( जैसे परशुराम ने किया) या जयश्री राम धनुष बाण का उपयोग करते थे या वराह भगवान ने गदा का उपयोग किया, ऐसे शस्त्रों-अस्त्रों का उपयोग इस कलयुग में नहीं करना है प्रभु। तो फिर कैसे अस्त्रों का प्रयोग होगा?

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे 

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे “

इस शस्त्र का उपयोग होगा, वैसे जब नाम आचार्य हरिदास ठाकुर को कितने बाजार में? 22 बाजारों में चांद काजी के लोग पीट रहे थे, तब भी भगवान ने सुदर्शन चक्र को वहां भेजा था कि जाओ। किंतु हरिदास ठाकुर ने नोट किया कि सुदर्शन चक्र पहुंच गया है और वह अब क्या करेगा? जो भी परेशान कर रहे हैं, उनको पीट रहे है, उनके चरणों में अपराध कर रहे है ,उसका नाश/ विनाश करने के लिए/ उनका कत्ल/वध करने के लिए, जान लेने के लिए सुदर्शन चक्र पहुंच हुआ है। पता है मेरे जैसा कोई होता तो क्या कहता, ”थैंक्यू लॉर्ड, आपने मेरी पुकार सुनी, आपने मुझे समझा कि मैं किस परिस्थिति में फंसा हूं और आप ही आए हो या आपने ही भेजा है चक्र को, थैंक यू मैं आपका आभारी हूं”। किन्तु हरिदास ठाकुर प्रार्थना कर रहे है जैसे अम्बरीष महाराज भी प्रार्थना कर रहे है सुदर्शन चक्र को। हरिदास ठाकुर क्या प्रार्थना कर रहे है? “ कृपया आप लौटे प्रभु, इनकी जान नहीं लेना आप, उनको बचाओ, उन पर दया करो। हरि हरि!

 

चैतन्य महाप्रभु प्रकट होते हैं – “कृष्णवर्णं त्विषाकृष्णं साङ्गोपाङ्गास्त्रपार्षदम् “

कलियुग में भगवान प्रकट होते हैं और बन जाते हैं, श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु की जय! कृष्ण वर्णम, मतलब कृष्ण का वर्णन करते हैं –

“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे

 हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे”

अब केवल श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु ही प्रकट नहीं होते, और कौन प्रकट होते हैं?” साङ्गोपाङ्गास्त्रपार्षदम्” उनके परिकर-अंग-उपांग, श्रीकृष्ण चैतन्य, प्रभु नित्यानंद, श्री अद्वैत, गदाधर, श्रीवास आदि गौर भक्त वृंद। ये सब वैसे सांगोपांगास्त्र, अस्त्र-शस्त्र बन जाते हैं। भगवान के परिकर, भगवान के संगी साथी, भगवान के हाथ का एक हथियार ही मानो, जिसके रूप में वे कार्य करते हैं और वे बचाते हैं, रक्षा करते हैं या दया करते हैं। आज वैसे तिरोभाव तिथि महोत्सव वक्रेश्वर पंडित का है। तो ये अपराध की बातें चल ही रही है, दुर्वासा मुनि ने अपराध किया अम्बरीष महाराज के चरणों में। तो देवानंद नाम के पंडित थे, वे एक अच्छे कथाकार थे किन्तु वे मायावाद का प्रचार भी किया करते थे, शुद्ध भक्त नहीं थे। उनकी कथा हो रही थी तो उस कथा में श्रीवास ठाकुर भी पहुंचे, शायद बगल से जा रहे होंगे तो कथा हो रही थी तो उन्होंने सोचा मैं भी कथा सुनना चाहता हूं। जब कथा सुनना प्रारंभ किए तो कुछ प्रसंग को सुनकर उनमें भाव का आवेश हुआ और जमीन पर भी लोटने लगे,थोड़ी हलचल मच गई वहां। तो देवानंद पण्डित के अनुयायी, जो वहाँ कथा सुन रहे थे ,उन्होंने समझा नहीं श्रीवास ठाकुर को,उन्होंने उन्हें उठा कर वहां से हटा दिया, बाहर कहीं पटक दिया। इस बात का जब चैतन्य महाप्रभु को पता चला, तब उन्होंने सोचा मेरे भक्त के चरणों में अपराध कर बैठा ये देवानंद पंडित। तो देवानंद पण्डित से जब भविष्य में किसी समय चैतन्य महाप्रभु मिले तो वे उनको डॉट रहे थे, फटकार रहे थे। उन्होंने स्वयं तो अपराध किया नहीं था,लेकिन उनके जो अनुयायी थे उन्होंने किया था अपराध श्रीवास ठाकुर के चरणों में। लेकिन डांट- फटकार से वे कुछ सुधरे नहीं, उनकी प्रवृत्ति में/विचारों में कोई अंतर नहीं आया, जैसे थे वैसे ही रह गए। समस्या ये थी कि चैतन्य महाप्रभु की भगवत्ता को देवानंद पंडित नहीं जानते थे।

“श्रीकृष्ण चैतन्य राधा कृष्ण नाहीं अन्य”

“कृष्णवर्णं त्विषाकृष्णं साङ्गोपाङ्गास्त्रपार्षदम्”

कृष्ण कलयुग में प्रकट होते हैं, श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु के रूप में वे स्वयं भगवान हैं। ये भगवत्ता का ज्ञान उनको नहीं था, जैसे सार्वभौम भट्टाचार्य को भी जगन्नाथ पुरी में चैतन्य महाप्रभु की भगवत्ता का ज्ञान नहीं था। आज जिनकी तिरोभाव तिथि हम लोग मना रहे हैं कृष्ण पंडित, वे जब इस देवानंद पंडित से मिले तो उन्होंने भाषण ठोका, या यूं कहो जबरदस्त प्रचार किया। एक तो चैतन्य महाप्रभु स्वयं भगवान हैं, उनकी भगवत्ता की महिमा सुनाई और साथ ही साथ जो उन्होंने,स्वयं तो नहीं किया पर जो उनके अनुयायियों ने वैष्णव अपराध किया था,उसका भी स्मरण दिलाया। उसी के साथ ये देवानंद पंडित उस अपराध की प्रवृत्ति से/ विचारों से मुक्त हो गए। इस प्रकार- 

“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, 

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे”

साङ्गोपाङ्गास्त्रपार्षदम्” , भगवान के भक्त भी अस्त्र जैसा कार्य करते हैं, वक्रेश्वर पंडित अस्त्र बने, उनको वाक् बाण कहते हैं। वाचा से भी हम कभी कभी बाण चलाते हैं,हमारी वाणी कभी कभी तीक्ष्ण हो जाती है। वैष्णव की शुद्ध वाणी, शुद्ध वचन ये भी फिर अस्त्र-शस्त्र जैसा कार्य करते हैं, जैसा सुदर्शन चक्र का भी कार्य होता है। ये सारा संसार अपराधियों से/पापियों से/ जगाई-मधाईयों से भरा पड़ा था, तो श्रील प्रभुपाद स्वयं भी गए। वृन्दावन में तो रह ही रहे थे,”श्री राधा दामोदर की जय”! बढ़िया से चल रहा था उनका, लेकिन ऐसी व्यवस्था भी तो है कि चैतन्य महाप्रभु चाहते थे कि उनकी भविष्यवाणी सच हो और भगवान का नाम सर्वत्र पहुंचे और फैले। वैसे हरिनाम भी तो अस्त्र है/ शस्त्र है, हमारी दुष्टता का विनाश करने वाला। भगवान है या भगवान का सुदर्शन चक्र है, भगवान् के भक्त हैं/परिकर हैं और फिर स्वयं भगवान का नाम ही है। 

“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे

 हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे”

 या फ़िर भागवत ग्रंथ है, भागवत कथा है, भागवत कथा के श्रवण से भी, 

“नष्टप्रायेष्वभद्रेषु नित्यं भागवतसेवया ।

भगवत्युत्तमश्लोके भक्तिर्भवति नैष्ठिकी ॥” 

इस संसार के पापी,तापी, अपराधी यदि वे सुनते हैं भागवत कथा का श्रवण करते हैं तो नित्यमभागवत सेवया भक्तिर्भवति नैष्ठिकी। निष्ठावान भक्त बनते हैं क्या करने से, भागवत के श्रवण से,भागवत कथा सुनने से – “कलेर्दोषनिधे राजन्नस्ति ह्येको महान् गुण” ये कलियुग तो भरा पड़ा है, दोषों से, पाप की बुद्धि से, विचारों से, तो फिर उपाय क्या है? दो प्रकार के लोग होते हैं प्रभुपाद यहां लिखें भी हैं: एक दानव होते हैं और दूसरे मानव होते हैं। या एक एक वैष्णव होते हैं और कुछ वैष्णव अपराधी भी होते हैं। कुछ ब्राह्मण होते हैं, तो कुछ शूद्र और म्लेच्छ होते हैं। और क्या क्या नहीं होते, ये जो ब्राह्मण हैं/वैष्णव हैं/भक्त हैं ये सहायता करते हैं ताकि जो दूसरे जो जन हैं वे भी परिवर्तित हो जाएं, वे भी भक्त / वैष्णव बनें, या वे भी अपने पाप और अपराध के विचारों से मुक्त हो, तो उसके लिए भगवान भी प्रकट होते हैं ग्रन्थराज श्रीमद् भागवत के रूप में,हरिनाम के रूप में। श्रील प्रभुपाद विशेष रूप से ये दो आइटम लेकर विदेश में गए। प्रभुपाद जा ही रहे थे विदेश कि किसी ने पूछा,”ओ आप अमेरिका जा रहे हो?” प्रभुपाद ने कहा – “नो नो नो, मैं नहीं जा रहा हूँ, भागवतम् जा रहा है और भागवत के साथ पीछे-पीछे मैं भी जा रहा हूँ।” हम लोग कहते तो है कि प्रभुपाद सिंगल हैंडेडली अकेले थे, विद नो मनी, कोई धन नहीं था लेकिन वैसे एक तो प्रभुपाद अकेले थे नहीं , कौन थे साथ में? भगवान साथ में थे और भगवान का ग्रंथ भागवतम भी साथ में था। और क्या निर्धन थे क्या प्रभुपाद? नहीं सबसे अधिक धनवान तो प्रभुपाद ही थे क्योंकि,

“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे 

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे” 

इस नाम धन का खजाना लेकर साथ में प्रभुपाद गए और फिर वहां पहुंचकर उन्होंने प्रचार किया। तो भगवान ही हथियार बन जाते हैं, यह ग्रंथराज श्रीमद्भागवत हथियार है। हम लोग कहते हैं प्रभुपाद के ग्रंथ कैसे हैं? दे आर टाइम बॉब्स। बॉम्ब को जब कहीं स्थापित किया जाता है तो ऐसे भी कुछ बाॅम्स होते हैं जो जब चाहे या इन ड्यू कोर्स ऑफ टाइम, समय के दौरान उसका विस्फोट होगा। प्रभुपाद के ग्रंथ आर लाइक टाइम बम, तो यह हत्यार ही था।भगवान ग्रन्थराज श्रीमद् भागवत के रूप में हथियार बनके गए और उसका वितरण भी किया। “डिस्ट्रीब्यूट माय बुक्स” मतलब डिस्ट्रीब्यूट माय इंस्ट्रूमेंट्स या इस हथियार या बॉम्ब का वितरण करो ताकि विस्फोट हो जाए। लेकिन यह बम थोड़े भिन्न है,क्योंकि बाकी और बॉम्ब का विस्फोट होता है तो विनाश वह होता है। लेकिन यहां पर तो विकास होता है/ उद्धार होता है। हरि नाम की कृपा बरस रही है। प्रभुपाद जी वहां गए टॉमकिंस स्क्वेयर पार्क में, हरे कृष्ण का कीर्तन प्रारंभ हुआ तो अनायास ही जो पापी थे/ जगाई माधई थे/ हिप्पी थे वे हो गए हैप्पी। श्रील प्रभुपाद जी स्वयं भी हथियार बने हैं भगवान के, इंस्ट्रूमेंट इन द लॉर्डस हैंड। भगवान के हाथ का एक हथियार बने हैं श्रील प्रभुपाद और फिर उन्होंने भगवान को भी हथियार बनाया है। उनके भागवत को हथियार बनाया, हरिनाम को हथियार बनाया और कृष्ण प्रसाद को हथियार बनाया। उसको भी इस्कॉन में क्या कहते हैं? इस्कॉन बुलेट्स। हम गाली या गोली नहीं खिलाते, हम क्या खिलाते हैं? गुलाब जामुन। वह दिखाते भी है बुलेट जैसे उसका रंग कहो। यह गुलाब जामुन या कृष्ण प्रसाद खाकर कितने लोग जो असुर के सुर बन गए या दानव के मानव बन गए। कितने अच्छे सज्जन मानव बने या बनाया श्रील प्रभुपाद ने। जो गो भक्षक थे उनको रक्षक बनाया।

“नमो ब्राह्मण देवाय गो ब्राह्मण हिताय च

 जगत हिताय कृष्णाय गोविंदाय नमो नमः”

वे प्रार्थना करने लग गए गाय को, गाय के सेवक बन गए। श्रील प्रभुपाद ने कई सारे उत्सव दे दिए, यह उत्सव भी बन जाते हैं हथियार। उत्सव क्या करते हैं? “परित्राणाय साधुनाम” भी करते हैं और “विनाशाय च दुष्कृताम्” भी करते हैं। जगन्नाथ रथ यात्रा उत्सव की जय! श्रील प्रभुपाद जी ने पूरे संसार को जगन्नाथ दियें।

“रथे आरूढ़म वामानम दृष्टवा पुनर्जन्म न विद्यते” ऐसा एक वचन है कि जो भी व्यक्ति देखता है जगन्नाथ स्वामी को रथ में आरूढ़ होते हुए और साथ ही साथ रथ को खींचता है, तो पुनर्जन्म न विद्यते । इस रथ यात्रा में सम्मिलित होना, जगन्नाथ का दर्शन करना, रथ को खींचना, साथ में हरे कृष्ण कीर्तन को सुनना, उसके साथ नृत्य करना और अंत में कृष्ण प्रसाद ग्रहण करना, कोई असुर बच जाएगा क्या? इन सबके साथ क्या होना है? “ परित्रणाय साधुनाम” होना है, “विनाशाय च दुष्कृताम” होना है या 

“चेतोदर्पण मार्जनं भव महादावाग्नि निर्वापनम श्रेय कैरवचंद्रिका वितरणम विद्या वधु जीवनम “ ये सब होना है और “परम विजयते श्रीकृष्ण संकीर्तनम“ ये सब रथ यात्रा फेस्टिवल में सम्मिलित होने से होगा। असुर के सुर, दानव के मानव, अभक्त के भक्त, यही तो विधि है। यह सारी योजना/व्यवस्था श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु की है, वैसे जगन्नाथ रथ यात्रा को भी प्रसिद्ध करने वाले चैतन्य महाप्रभु ही है। फिर भविष्य में हरि हरि! चैतन्य महाप्रभु उस रथ यात्रा में स्वयं तो सम्मिलित हो जाते ही थे और रथ यात्रा में सम्मिलित होने के लिए वैसे अपने गौर भक्त वृंदो को नवद्वीप से, मायापुर से, शांतिपुर से, श्रीखंड से, कई स्थानों से बुलाते थे। ये सारे चेतन महाप्रभु के परिकर, कृष्ण लीला के उनके सारे परिकर/ पार्षद/ सखियां/ मंजरियां/ गोपियां/ग्वाल बाल/ नंद बाबा और यशोदा, “ आ जाओ आ जाओ आ जाओ, आप सब कहां हो? जगन्नाथ पुरी आ जाओ।” जगन्नाथ पुरी आओ मतलब जहां जगन्नाथ रहते हैं वह द्वारका पुरी है या वो एक समय कुरुक्षेत्र भी बन जाता है। चलो आप सब आ जाओ ,हम कृष्ण को द्वारका से या कुरुक्षेत्र से कहां ले जाएंगे? वृंदावन ले जाएंगे।” चैतन्य महाप्रभु रथ यात्रा में स्वयं राधा रानी ही बन जाते हैं और जो सारे परिकर है उनकी मदद से पुनः वे कृष्ण को वृंदावन ले आते हैं। गुंडीचा पहुंच जाते हैं मतलब कहां पहुंचा दिया? वृंदावन पहुंचा दिया और आजकल कहां है कृष्ण? गुंडीचा धाम की जय! वृंदावन धाम की जय! और फिर वहां चैतन्य महाप्रभु अपने परिकरों के साथ, जिनको मायापुर, शांतिपुर आदि स्थान से बुलाए, वे सारे चैतन्य महाप्रभु के परिकर, गोलोक के/गोकुल के परिकर उनके साथ आजकल यही जगन्नाथ पुरी में गुंडिचा मंदिर में है। ये लीला भी हम सुनते हैं तो,

“श्रीराधिका माधव योर अपार माधुर्य लीला गुणरूप नामनां

प्रतिक्षणा स्वादन लोलुपस्य वन्दे गुरु श्री चरणारविन्दम्”

 हमारे गुरुजनों ने यह भगवान की लीला कथा भी सुनाई है और वे क्या-क्या करते हैं? 

“महाप्रभु कीर्तन नृत्य गीत” ये सारे हथियार बन जाते हैं, गुरुवाष्टक में हम लोग ये सब गाते हैं। चैतन्य महाप्रभु का कीर्तन होता है हरे कृष्ण आंदोलन में, “महाप्रभु कीर्तन नृत्यगीत वादित्य माध्यन मानसो रसेन”

फिर से क्या करते हैं इस्कॉन में? “श्रीविग्रह आराधना नित्य नाना श्रृंगार तन मंदिर मार्जन आदौ” विग्रह आराधना होती है इस्कॉन में, श्रील प्रभुपाद ने विग्रह आराधना दे दी। “चतुर्विध श्रीभगवत प्रसादो…हरि भक्त संघान “ कृष्ण प्रसाद होता है , “महाप्रसादे गोविंदे” होता है। और क्या होता है? 

“श्रीराधिका माधव योर अपार माधुर्य लीला गुणरूप नामनां” लाइक दैट मेन आइटम ये हैं,यह सब हथियार बनते हैं। कृष्ण कीर्तन, विग्रह आराधना है, कृष्ण प्रसाद है, हरि कथाएं, नित्यं भागवत सेवया है और यह सब जब मिला देते हैं तो “प्रिय मानव:” मानवों की ये कमजोरी है कि उन्हें उत्सव अच्छे लगते हैं। तो प्रभुपाद में हमें उत्सव दिये । ईवन हमारा मॉर्निंग प्रोग्राम उत्सव बन जाता है। हरि हरि! 

ग्रंथराज श्रीमद् भागवतम की जय! 

महाभागवत श्रील प्रभुपाद की जय!

जय जय जय! कितनी बार कहे जय जय जय! 

हम सबको एक समय के हम असुरों को, हम दानवों को, पुन: हरे कृष्ण आंदोलन ले जा रहा है। 

वृंदावन धाम की जय!