
Srimad Bhagavatam
06.07.14
10-02-2024
ISKCON NVCC
हरि बोल! हरि भावना में हरि बोल!
साउंडस लाइक हरिभाऊ। वो भी ठीक है हरिभाऊ, मतलब गॉड ब्रदर। हरि हरि!
भाऊ भाऊ, हिंदी चीनी भाई भाई! आप सभी का स्वागत है राधा वृंदावन चंद्र के दरबार में, राधा वृंदावन चंद्र की जय! उनके महल में कहो या उनके धाम में कहो, ये सारे नाम हो सकते हैं या घर में कहो, मंदिर भगवान का घर होता है। “हे विश्वजी माझे घर आय”, ये विश्व ही मेरा घर है। “उठो माझा लेकुर वाडा संगी गोपाल आंसा मेला”, एक समय भूलेभटके हम सब, पुनः लौट आ रहे हैं, घर वापसी हो रही है। उत्तर भारत में कहते हैं घर वापसी। उसी को “जाऊ देवाचिया गावा” भी कहते हैं या “माहेरी माहेर पंढरपुर” हरि हरि ! अभी आए हो तो रहो-
“यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम”। ऐसे धाम में भी हम भगवान की अहैतुकी कृपा से, कैसी कृपा से? अहैतुकी मतलब कि वी डू नॉट इवन डिजर्व, इसके हम पात्र नहीं होते हुए भी भगवान हमें वापस ला रहे हैं, उनके घर ला रहे हैं। उनका घर ही किसका घर है? हमारा घर है। हरि हरि! ऐसे आते रहिए,आते रहिए फिर जाओगे भी आप। आओ-जाओ आओ-जाओ आओ-जाओ फिर आओ और फिर मत जाओ, ऐसी तैयारी करनी है हमें। यही साधना है। जाए तो जाए कहाँ? कहाँ जा सकते हैं। हरि हरि! उसी साधना या अभ्यास के अंतर्गत श्रील प्रभुपाद ने,” नित्यं भागवत सेवया” दिए हैं, नित्यं भागवत सेवया, भागवत की सेवा दी है। भागवत की सेवा कैसी होती है?श्रवण से होती है। हरि हरि ! फिर ये श्रवण है, इस श्रवण के साथ क्या होता है? फिर “नष्टः प्रायेषु अभद्रेषु” जो भी अभद्र / अमंगल है इसका क्या होता है? नष्ट, नष्ट प्रायेषु अभद्रेषु। यह कैसे होता है? नित्यं भागवत सेवया। सेवा द्वारा कहना है तो सेवया कहना पड़ता है संस्कृत में। सेवा तो सेवा हुई, सेवा के द्वारा या सेवा से कहना है तो सेवया, इसलिए नित्यं भागवत सेवया। सेव वो खाने की चीज नहीं। हरि हरि! नित्यं भागवत सेवया। फिर क्या होता है? “भगवत्युत्तमश्लोके भक्तिर्भवति नैष्ठिकी” भक्तिर्भवति इस भागवत की नित्य सेवा से मतलब श्रवण से भक्तिर्भवति। भव मतलब होना, भक्ति होगी। किन में भक्ति? भगवत्युत्तमश्लोके – उत्तम श्लोक में। उत्तम श्लोक मतलब भगवान का एक नाम ही है उत्तम श्लोक, भगवान का एक नाम है उत्तम श्लोक। उत्तम-उत्तम श्लोकों से उनकी कीर्ति का गान हुआ है। उत्तम श्लोक उत + तम, मतलब तम से परे। इसलिए शब्द क्या है? कहो उत्तम,उत्तम, उत्तम; उत् मतलब परे/ बियोंड। तम मतलब तमोगुण या फिर अंधेरा भी कहो, “तमसो मा ज्योतिर्गमय” नित्यं भागवत सेवया करने से ज्योति की ओर जाएंगे या जो ज्योति के स्रोत है उनकी ओर जाएंगे। ब्रह्मज्योति की ओर हम नहीं जाते। ज्योति के जो स्रोत है जिनसे ज्योति निश्रित होती है उनकी ओर हम जाते हैं। उनके चरणों में भगवत्युत्तमश्लोके भक्तिर्भवति, इतना ही नहीं कहा फिर आगे कहा, भक्तिर्भवति नैष्ठिकी। एक विशेष्य और विशेषण विशेष होता है। तो विशेष्य है भक्ति और विशेषण है नैष्ठिकी। कैसी भक्ति? नैष्ठिकी। नैष्ठिकी भक्ति मतलब निष्ठावान। “इरिवर्सिबल” प्रभुपाद अंग्रेजी में कहते हैं,वहां से हम फिर पीछे नहीं हटेंगे”, वहाँ से यूटर्न नहीं होंगे। वहां से आया-राम गया-राम, राम आया भी और गया भी, कुछ पता नहीं चला कब आया कब गया? हरि हरि! मन के चांचल्य के कारण ये जो अस्थिरता होती है तो उसमें स्थैर्य को व्यक्ति/ भक्त/ साधक प्राप्त करता है स्थिरता। ही बीकम्स फिक्सड अप, जिसको निष्ठा कहते हैं। शुरुआत होती है श्रद्धा से – “आदौ श्रद्धा”, फिर साधु संग, भजन क्रिया, फिर अनर्थ निवृत्ति से होती है निष्ठा। नाउ यू आर सेफ, काइंड ऑफ सेफ। “नष्टः प्रायेषु” ऑलमोस्ट/ प्रायः शब्द का उपयोग हुआ। नष्टः प्रायेषु कुछ कसर रह जाती है वैसे श्रद्धा से को पहुंचना तो है कहां? प्रेम तक पहुंचना है,ऐसी सोपान /सीढ़ी है। श्रद्धा से प्रेम तक, तो बीच में यह निष्ठा है, निष्ठा का सोपान या स्तर/ लेवल। तो उससे भी आगे बढ़ना है। निष्ठावान बनेंगे, नैष्ठिकी भक्ति को प्राप्त करेंगे। क्या करने से? “नित्यम भागवत सेवया” आज सेवा करेंगे भागवत की। स्कंध छठवां, श्लोक संख्या 14
“नायमर्हति वैकुंठपादमूलोपसर्पणम्।
सम्भावनामति:स्तब्ध:साधुभि:पर्युपासितम् ॥ 14॥
न – नहीं ; अयम – यह व्यक्ति ; अर्हति – योग्य है ; बैकुंठ – पाद – मूल – उपसर्पणम् – भगवान विष्णु के चरण कमलों की शरण में आने का ; संभावित – मतिः – स्वयं को अत्यधिक सम्मानित समझने वाला ; स्तब्धः – धृष्ट ; साधुभिः – महान संत जनों द्वारा ; परयुपासितम् – पूजित ।
अनुवाद और तात्पर्य श्रील प्रभुपाद द्वारा,श्रील प्रभुपाद की जय!
यह व्यक्ति ऐसा सोचकर…पार्वती ऐसा कह रही है,
पार्वती उवाच: अभी अभी शुरू हुआ है और चित्रकेतु को संबोधित करती हुई पार्वती माता कह रही हैं।
ये व्यक्ति ऐसा सोचकर अपनी सफलता से फूला हुआ है कि “मैं ही सर्वश्रेष्ठ हूँ।” वह भगवान विष्णु के उन चरण कमलों के निकट, जिनकी उपासना सभी साधु पुरुष करते हैं, जाने के योग्य नहीं है क्योंकि यह अपने को अत्यंत महत्वपूर्ण समझकर घमंडी बन गया है।
तात्पर्य:-
यदि कोई भक्त अपने आप को भक्ति में सिद्ध मान बैठता है तो लोग उसे घमंडी तथा भगवान के चरण कमलों के आश्रय के नीचे बैठने केलिए अयोग्य मानये है। यही नहीं भगवान चैतन्य का यह उपदेश भी लागू होता है:
“तृणाद अपि सुनीचेन तरूर अपि सहिष्णु
अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः”।।
इसी का भाषान्तर है:
“मनुष्य को चाहिए कि अपने आप को तिनके से भी तुच्छ मानकर विनीत भाव से भगवान का कीर्तन करना चाहिए; उसे वृक्ष से भी अधिक सहिष्णु, अहंकार से रहित तथा अन्यों सहनशील होना चाहिए तथा अन्यों का आदर करने केलिए तत्पर रहना चाहिए। अनुवाद पूर्ण हुआ। ऐसी ही मानसिक स्थिति में वह निरंतर भगवान के पवित्र नाम का जप कर सकता है। जब तक मनुष्य विनम्र नहीं होता,वह भगवान के चरण कमलों के निकट बैठने का अधिकारी नहीं होता। आप समझ गए या समझ गए तो फिर महाप्रसादे गोविन्दे हो जाए। या समझे भी तो, ”करते पन वढ़त नहीं” या “पश्यन अपि न पश्यति”। दिखाने पर भी दिखता नहीं है या देखते हुए भी दिखता नहीं है। हरि हरि! जब तक मनुष्य विनम्र नहीं होता वह भगवान के चरण कमल के निकट बैठने का अधिकारी नहीं होता। हरि हरि! मतलब भगवान के पास जो रहते हैं वे भक्त कैसे होंगे? कैसे होंगे? विनम्र होंगे। वैसे विनम्रता हमारे स्वभाव में है, स्वभाव से हम कैसे हैं? कहो कैसे हैं? विनम्र हैं। हमारी जो कॉन्स्टिट्यूशनल पोजीशन है, कॉन्स्टिट्यूशनल पोजीशन मतलब जैसे हमें बनाए हैं भगवान। बनाए हैं ऐसा कह तो दिया किंतु ऐसा कोई समय था क्या जिस दिन हमको बनाया? हम तो शाश्वत है,
“ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन: ।
मन:षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति” ॥
ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन,आप समझ रहे हैं? ममैवांशो जीवलोके संसार में जो जीव हैं; इस संसार मैंने कहा तो और भी संसार है, जहां भी जीव हैं, भगवान के आध्यात्मिक जगत में या इस जगत में जो भूले-भटके, भूल गए भगवान को इसलिए भटक रहे हैं इसलिए क्या कहते है? भूले-भटके। पहले भूले फिर भटक रहे हैं। तो सभी जीव भगवान के अंश है और भगवान के ही अंश है, मम+एव मैं ऐसे रिमाइंडर देते रहता हूं। भगवान ने कहा लेकिन हम इतनी सूक्ष्म दृष्टि से विचार नहीं करते। मम एव अंशः,संसार के सभी जीव इसका उल्लेख तो किया ही, वहाँ के/ यहाँ के/जहाँ तहां के जीव। जीव कैसे हैं? अंश हैं। फिर अंश कहा तो भगवान अंशी है। ऐसे एक शब्द का उपयोग होता है भगवान कैसे हैं? अंशी हैं और उस अंशी के हम अंश है। वे भगवान है इसलिए भी वे अंश है,
“ऐश्वर्यस्य समग्रस्य वीर्यस्य यशस् श्रियः”
षड ऐश्वर्य पूर्ण भगवान, हरि हरि! हम उन्हीं के अंश है, भगवान कहे,”मम एव अंश”, और किसी के नहीं हो अंश तुम। चंद्र ,इंद्र,गणेश, दुर्गा इत्यादि-इत्यादि जो देवता है लेकिन आप मेरे अंश हो। भगवान, मैं ऐसे सोच रहा हूं,कुछ अभिमान के साथ कहे कि आप सब मेरे अंश हो और उसमें आत्मीयता भी है भगवान की। हमको कौन मान रहे हैं भगवान? तुम सब मेरे हो। यू बिलॉन्ग टू मी एंड मी ओनली, ऐसा भगवान का कहने का आशय है, भगवान का क्लेम है। तो जब हम भगवत गीता पढ़ते-सुनते हैं तो यह भी बात समझ में आनी चाहिए कि हम हम किनके हैं? भगवान के है। भगवान कौन है?
ऐसा भी भगवान का कहने का आशय है, “ममैवांशों” ऐसा भगवान का क्लेम है। तो जब हम भगवद गीता पढ़ते-सुनते हैं तो यह बात समझ में आनी चाहिए कि हम किनके हैं? भगवान के हैं। भगवान कौन है?
कुछ लोगों को ये भी नहीं पता, रजनीश भगवान। “कभी श्याम बनके, कभी राम बनके,कभी साईबाबा बनके “ यह भी चलता रहता है और फिर इसीसे हम लोग हिंदू बन जाते हैं। है तो हम सनातन धर्म के सनातनी हैं, भागवत धर्म के हैं किंतु ये पता नहीं चलता, कई सारी बातें पता नहीं चलती। या फिर भगवान कौन है? यह पता नहीं चला। हम किसके हैं? कृष्ण यहां कहे हैं,
“ममैवांशो जीवलोके जीवभूत सनातन:”
और तुम सनातन भी हो। अंशी के गुण अंश में होते हैं। अंशी महान है और अंश लहान है। अंश हैं, शूद्र जीव, नगण्य हैं, यह समझ के साथ वैसे भी जीव को क्या होना चाहिए? विनम्र होना चाहिए। भगवान महान है जो अंशी है और हम उनके अंश है,जस्ट लिटिल पार्ट एंड पार्सल। और कितने लहान हैं फिर? “केशाग्र शतभागस्य” केश के अग्रभाग को ले लो फिर उसके १०० टुकड़े करो, फिर उसमें से एक उठाओ और उसके भी १०० टुकड़े करो, उसमें से एक उठाओ यह तुम्हारी साइज है। दिस इस योर साइज़ , हम इतने लहान है/हम इतने छोटे हैं, यह जब समझेंगे तो फिर विनम्र होना ही पड़ेगा न। हरि हरि! भगवान महान है कि उनके कितने सारे अंश है? असंख्य अंश है, यह भगवान की महानता है।
“चैतनस्य चेतनानाम नित्यो नित्यानाम” भगवान भी नित्य है और जीव भी नित्य है, नित्यों में भगवान नित्य है। हमारी भी चेतन है, चेतना वाले जो जीव है उनमें फिर प्रमुख तो भगवान है और हम कई सारे/असंख्य हैं। हरि हरि! थोड़ी-सी चर्चा होती है, ये आत्म-साक्षात्कार और फिर भगवत- साक्षात्कार भी। जो जीव को,आत्मा को आत्म-साक्षात्कार होगा और केवल आत्म-साक्षात्कार से ही काम नहीं बनने वाला है। साथ ही साथ और कौन से साक्षात्कार की आवश्यकता है? भगवत साक्षात्कार। हरि हरि! जिनको भगवान का साक्षात्कार नहीं होता है,या साक्षात्कार करने की जीवों के व्यक्तियों के जो प्रयास होते हैं, इसका परिणाम यह निकलता है कि,
“अहम् ब्रह्मास्मि”, मैं कौन हूं? मैं ब्रह्म हूं। “अहम” इसमें अहम भी आ रहा है न, अहम। मैं कौन हूं? मैं ब्रह्म हूं। तो यह अहंकार असीम अहंकार है, “लास्ट लेयर ऑफ माया” प्रभुपाद ऐसा कहते थे। हमारा इतना ज्ञान कि हम क्या मान रहे हैं? मैं ब्रह्म हूं। किंतु ये लोग यह नहीं जानते कि,”अहम परमब्रह न अस्मि”। ओके तुम ब्रह्म हो,ये भी एक हद तक ठीक है,लेकिन जो ब्रह्म कह रहे हो वो ब्रह्म भी परब्रह्म का अंश है। ब्रह्म को अंश कहना होगा और परमब्रह्म हैं अंशी। तो परमब्रह्म अंशी के तुम ब्रह्म या अंश हो। माया का वर्णन वैसे दो छोटे शब्दों में हुआ है, दो शब्द एक है ‘अहम’ और दूसरा है ‘मम’। “अहम ममेंति” – अहम+मम+ इति । इति मतलब धिस मच,इतना। जब रुकना होता है कुछ कहके तो इति का उपयोग होता है। “अहम ममेंति” हमारी माया का इन दो शब्दों में वर्णन हुआ है: अहम + मम। हमें इससे मुक्त होना है, अहम से/ अहंकार से। हरि हरि!
और ‘मम’ से या ममता से।
“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे”
“जय श्री राम! हो गया काम” ये सब जो भी हम कह रहे हैं उसका भी कोई अंत नहीं है, ये अनंत बातें हैं। ऑफ कोर्स ये सिद्धांत की बातें है, ये सीखना-समझना अनिवार्य तो है ही। तो भी इसको हम सीखने-समझते हैं जब हम, इसलिए कहा है, “हरेर नाम एव केवलं “ जब हम हरिकीर्तन करते हैं। हरि हरि! मैं ही सब कुछ हूं,मैं घमंडी बनता हूं। यहां उल्लेख हुआ है कि अहंकार की कोई सीमा ही नहीं है। ऐसा व्यक्ति कई सारे अपराध भी करके बैठा रहता है।
“वैकुंठ पाद मूलोंप सर्पणम” वैकुंठ वैसे भक्तों को वैकुंठ कहा गया है।
“तत्त्रापी दुर्लभम मन्ये वैकुंठ प्रियदर्शनम” और भी कुछ बातें दुर्लभ है, “दुर्लभ मानव” ये मनुष्य जीवन दुर्लभ है। उससे भी दुर्लभ है क्या? वैकुंठ प्रियदर्शनम। वैकुंठ भगवान का भी नाम है, तो उनको प्रिय है वैष्णव/ साधु। उनका दर्शन और उनका संग सानिध्य प्राप्त होना और भी दुर्लभ है। क्योंकि भक्ति जो सुदर्लभ: है। भक्ति के लक्षण है, एक है कि भक्ति दुर्लभ है। भगवान और कुछ दे देंगे हमको बड़ी आसानी से लेकिन भक्ति नहीं देंगे आसानी से, भक्ति नहीं देंगे। भक्ति अगर हमें दे दी भगवान ने या भक्ति प्राप्त हुई तो फिर भगवान भी प्राप्त होंगे। भक्ति कैसी है? कृष्ण आकर्षिनी, भक्ति कृष्ण को आकर्षित करती है। कृष्ण के प्रति ये भक्ति या भक्ति प्राप्त होना फिर भगवान प्राप्त होंगे। भक्ति प्राप्त होती है हमें गुरुजनों से/ संतों से/ साधुओं से। “आदौ श्रद्धा” फिर क्या? “साधु संग”, साधु संग में क्या होता है? भजन क्रिया। भजन की क्रिया , भक्ति के विधि-विधान समझाते हैं संत लोग, फिर हमें भगवत की प्राप्ति होती है। “साधु सावधान” हमें रहना चाहिए जब हमें यह दुर्लभ मनुष्य जीवन भी प्राप्त हुआ है, फिर दुर्लभ साधुसंग भी प्राप्त हुआ है, तो संतों का/ भक्तों का हमें सम्मान करना चाहिए।
“तृणादपि सुनिचेन तरोरपी सहिष्णुना
अमानिना मानदेन कीर्तनिय सदा हरि:”
हम कीर्तन या भक्त सदा, अखंड या सदैव करते रहेंगे। शर्तें क्या हैं? व्हाट आर द कंडीशंस यू हैव टू फुलफिल?
तृणादपि सुनिचेन, तृण/घास का तिनका, उससे भी निम्न, लोअर दैन द स्ट्रा इन द स्ट्रीट। केवल नीचेन नहीं, हमको नीच नहीं बनना है, वह दूसरी बात है। वो नीचता तो भौतिक है लेकिन यहां नीच का मतलब है विनम्रता। सहिष्णुना याने सहनशीलता कैसी? वृक्ष जैसी। घास का तिनका भी वृक्ष का है, वनस्पति का होता है। वृक्ष का ही नाम आया है तृणादपि सुनिचेन में, नम्रता की बात है तो वृक्ष का उल्लेख हुआ और सहनशीलता की बात है तो भी पुनः वृक्ष का उल्लेख हुआ। फिर मैं सोच रहा था,
“पत्रम पुष्पम फलम तोयम” भी है लेकिन यह भी सब वृक्ष का, वनस्पति का उल्लेख हो रहा है। पुष्पम-फलम, वृक्ष योनि की जय! उसका आदर्श हमारे समक्ष होना चाहिए। चैतन्य महाप्रभु स्वयं कह रहे हैं कि तुम इन वृक्षों से सीखो, वृक्षों को अपना गुरु बनाओ। और फिर “अमानिना मानदेन” अमानी ना,मानदे ना। वैसे शब्द तो है अमानी, अ मानी। अमानी और फिर मानद, स्वयं के सम्मान की उसको चिंता नहीं है। वो सदैव चिंतन करता रहता है कि कैसे मैं मानद बनूं? मान दूं। मान लेने की, सम्मान लेने की उसकी चिंता नहीं होती। वो सदैव सोचता रहता है कि मैं कैसे सम्मान सत्कार करूं औरों का? हरि हरि! ऐसे करने वाले क्या करेंगे? ”कीर्तनीय सदा हरि:”।
“अहौतुकी अप्रतिहता यायात्मा सुप्रसिदती” अखंड भक्ति करेंगे, कीर्तनीय सदा हरि, या
“तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते।।”
भगवान की भक्ति कैसी करनी चाहिए? एक तो सतत होनी चाहिए और सतत युक्तानाम प्रीतिपूर्वकम, वही अहौतुकी अप्रतिहता कहा। “नित्यम भागवत सेवाया” या “सततम कीर्तयन्तो मां” ऐसी भक्ति को हम प्राप्त करना चाहते हैं तो चैतन्य महाप्रभु कहे “तृणादपि सुनिचेन। वैसे मान सम्मान की अपेक्षा नहीं करना चाहिए। रूप गोस्वामी कहे,
“गुह्यमाख्याति पृच्छति”, और “भुङ्क्ते भोजयते चैव” और बीच में रह गया “ददाति प्रतिगृह्णाति” षड्विधं प्रीतिलक्षणम्।
इस प्रकार की छह प्रकार की प्रीति के लक्षणों का प्रदर्शन हमें करना चाहिए। ददाति प्रतिगृह्णाति, भेंट दो और भेंट लो। और क्या करो? गुह्यमाख्याति पृच्छति, दिल को चुभने वाली कोई बात हो सकती है, दिल को प्रसन्न करने वाली कोई बात हो सकती है,या दुर्घटना भी हो सकती है तो कॉन्फिडेंशियली शेयर् दैट औरों के साथ/ भक्तों के साथ/ संतों के साथ। हरि हरि! भुङ्क्ते भोजयते चैव, प्रसाद खिलाओ और प्रसाद खाओ। केवल खाओ ही नहीं क्या करो? खिलाओ भी। इस प्रकार का लेनदेन यह सब चलता रहता है वैकुंठ में/ वृंदावन में।
यह सब करते समय हमको कॉरपोरेशन लेना है,देना है। या मैं सोच रहा था जैसे हमलोग जब कीर्तन होता है, चैटिंग-डांसिंग मृदंग करताल के साथ तो हमारे साथ टीम एफर्ट रहता है और उसका सक्सेस टीम का सक्सेस। उसमें जब हम टीम बन जाते हैं जब संकीर्तन होता है। हर व्यक्ति अपना-अपना रोल निभाता है, कोई गा रहा है तो कोई सुन रहा है, कोई नृत्य कर रहा है, कोई मृदंग बज रहा है,कोई करताल बजा रहा है और हो सकता है कोई फोटोग्राफ ही खींच रहा है। इट्स आल्सों अ पार्ट। जितने हम कीर्तन के समय कृष्ण कॉन्शांइस होते हैं कृष्ण भावना भावित होते हैं और जितना को-ऑपरेट भी करते हैं, योगदान भी होता है या वह समर्पण भी होता है। एक प्रकार से हम आहुति चढ़ाते हैं, स्वयं को समर्पित करते हैं, आत्मनिवेदन भी होता है। इसलिए उसको संकीर्तन यज्ञ भी कहा है। तो जितना संकीर्तन आंदोलन में हम जितने कृष्ण कांशियस होते हैं शायद ही और किसी समय होते होंगे।
तो फिर उस कीर्तन को जो यश है/ सक्सेस है और सक्सेस मिलेगा ही ऐसा चैतन्य महाप्रभु ने कहा है।
“परम विजयते श्रीकृष्ण संकीर्तनम” संकीर्तन आंदोलन की विक्ट्री इज़ गैरंटीड, हम संकीर्तन आंदोलन से जुड़े है और संकीर्तन के लगे हुए हैं। जैसे हम कीर्तन के समय लगे रहते है फुल्ली फोकस्ड , तो उस समय और कोई विचार आता हैं क्या? फॉरगेट इट , वी आर टोटली ऑबलिवियस टू द सराउंडिंग , इस दिन मुझे यह करना,वो करना, यह है, आदि कि चिंता वगैरह नहीं रहती। कोई चिंतित है तो वह कीर्तन ही नहीं करेगा। हरि हरि! तो करना क्या होता है? चिंता नहीं करनी होती। क्या करना होता है? चिंतन करना होगा। चिंता और चिता यह दो शब्द, चिता और चिंता, इसमें क्या भेद हैं? एक बिंदी या अनुस्वार का ही भेद है। एक में चिता है, दूसरे में चिंता है। ये एक भेद हैं और क्या है? मोटा भेद तो यह है कि चिता तो एक ही बार जलाती है, पर चिंता तो सब समय जलाती रहती हैं। जब-जब हम चिंता कर रहे तो जल रहे है। उसीसे लोग क्षय रोग जैसे रोग में स्वास्थ्य को भी खो बैठते है, चिंता करते है। करना तो है पर लक्ष्य क्या है ? चिंतन करना। संकीर्तन जब हम करते मृदंग करताल से तो उस समय जैसे हम पूरा कोऑपरेशन और पूरे समर्पित रहते है। वैसे ही हम और जो इस्कॉन की गतिविधियां है, एक्टिविटीज है, वह सब अलग-अलग एक्टिविटीज़, अलग-अलग सेवाएं उसी भाव के साथ, उसी लगन के साथ, उसी समर्पण के साथ, उसी योगदान के स्पिरिट के साथ यदि हम लगे रहेंगे, तो जो कहा है- “परम विजयते श्रीकृष्ण संकीर्तनम “ तो यहां संकीर्तन कहा है, वो केवल
“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे”
कीर्तन और उसके साथ फिर उसी से सीमित नहीं है यह संकीर्तन, जब हम कहते संकीर्तन आंदोलन तो ये केवल कीर्तन ही नहीं है। वैसे है कीर्ति, भगवान की कीर्ति का गान कई प्रकार से। हम ग्रन्थ वितरण के लिए जाते है तो विदेश में वे कहते, “डिवोटीज़ कहां हैं? ओ दे हैव गॉन आउट फॉर संकीर्तन, या गॉन फिर बुक डिस्ट्रीब्यूशन तो उसको क्या कहते? संकीर्तन के लिए गए। हमारी हर एक्टिविटी संकीर्तन या फिर संकीर्तन यज्ञ कहो, तो हर एक्टिविटी वैसे यज्ञ है। उसी स्पिरिट के साथ, उसी भाव के साथ, उसी तल्लीनता और लग्न और समर्पण के साथ, जो कीर्तन और नृत्य के साथ जो होता है भाव, योगदान इत्यादि। और सारी गतिविधियों में उसका प्रदर्शन हो या उपयोग हम करेंगे तो फिर “परम विजयते श्री कृष्ण संकीर्तनम” और प्वाइंट यह भी है कि हमको अलग से इंडिविजुअली सक्सेसफुल नहीं होना है। वैसे होंगे या फिर अहंकार वगैरह के भी विचार आयेंगे, हम घमंडी होंगे,” वि डिड इट” , यह कार्य सफल किसने किया? हम सभी ने किया। सभी ने अपने-अपने रोल निभाए, भूमिकाऐं निभाई, हम सब मिलकर इस कार्य को सफल किए। यह भाव “वी डिड इट, आई डिड इट , आई ऐम द वन” उसमें मै-मैं या अहम-अहम अहम नहीं रहेगा जब हम सब मिलके करेंगे और उसी को कहा है संकीर्तन।
कांग्रेग्रेशनल चार्टिंग ही कांग्रीग्रेशनल नहीं है, एवरीथिंग टू बी डन कांग्रगेशनली,जैसे बुक डिस्ट्रीब्यूशन है या और क्या है? फेस्टिवल का ऑर्गेनाइजेशन है या डीटी वरशिप है या हम लोग,
“संसार दावानल….. वन्दे गुरु श्रीचरणारविंदम”, इसमें कीर्तन का उल्लेख है,
“महाप्रभु कीर्तन नृत्य गीत” इसमें हम लोग कीर्तन करते हैं, डेट्स वन थिंग,फिर तीसरा गुरुवाष्टक है,
“श्रीविग्रह आराधन नित्य नाना श्रृंगार तन मंदिर मार्जनादौ” तो कीर्तन हुआ और क्या हुआ? डीटी वरशिप हुई,
“चतुर्विद: श्री भगवत प्रसादौ, स्वादान्न तृप्तान हरिभक्त संघान” भक्त संघ भी है, प्रसाद की बात है,
“भुक्ते भोजयते च” फूड फॉर लाइफ प्रसाद वितरण।
और भी क्या है?
“महाप्रभु कीर्तन नृत्य गीत वादित्रमाद्यान मनसो रसेन” रोमांच…ओ वो हो गया।
“श्रीराधिका माधव योर अपार
माधुर्य लीला गुणरूप नामनां
प्रतिक्षण आस्वादन लोलुपस्य
वन्दे गुरु श्रीचरण चरणारविंदम”
यह क्या हुआ? नित्यम भागवत सेवया, “श्रवण कीर्तनम विष्णो स्मरणं” हुआ।
तो मोटा-मोटी ये चार एक्टिविटीज हैं और भी ऊंची बातें है। शुरुआत में कोई परिचय की बाते है संसार दावानल, फिर आगे कंक्लूडिंग बातें,
“यस्य प्रसादात भगवत प्रसादौ
यस्य अप्रसादान न गति कुतो अपि”
गुरुजन हमसे प्रसन्न होते है तो क्या होगा? भगवान प्रसन्न होंगे।
‘यस्य प्रसादात” जिनकी कृपा प्रसाद से हमें भगवत प्रसाद, भगवान का प्रसाद/ भगवान कृपा प्राप्त होना निश्चित है/ गारंटीड है। तो ये कीर्तन,ये विग्रह आराधना, ये प्रसाद ग्रहण करना या वितरण करना और ये कथा-कीर्तन यह सब हम मिलके मिलजुलके अपने पूरे योगदान के साथ करते रहेंगे तो फिर क्या होगा?
“परम विजयते श्रीकृष्ण संकीर्तनम”
संकीर्तन आंदोलन की जय हो! और संकीर्तन आंदोलन की जय- जयकार में हमारी भी जय का समावेश है, हमें अलग से यशस्वी नहीं होना है। कलेक्टिव विक्ट्री,पूरे आंदोलन के लिए विक्ट्री,हरि हरि!
श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु की जय! और नित्यानंद प्रभु की जय! इनकी यह देन है।
“संकीर्तनैक पितरौ कमलायताक्षौ विश्वंभरों द्विजवरौ
युगधर्म पालौ वंदे जगतप्रिय करौ करुणावतारौ”
तो ये करुणा अवतार हैं गौरांग-नित्यानंद।
गौरांग….नित्यानंद! नित्यानंद….गौरांग!
भगवान की योजना के अनुसार/इच्छा के अनुसार यह हरे कृष्ण आंदोलन की वैसे चैतन्य महाप्रभु व नित्यानंद प्रभु ने स्थापना की। और फिर आगे श्रील प्रभुपाद की जय! श्रील प्रभुपाद को गौरांग महाप्रभु, नित्यानंद प्रभु निमित्त बनाए और प्रभुपाद को फाउंडर आचार्य, इस्कॉन के संस्थापक आचार्य की पदवी दिए।
उनको श्रेय,”निमित्त मात्रम यशो लभस्व”
श्रील प्रभुपाद को यशस्वी देखना चाहते थे श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु। इसलिए हम जो संकीर्तन आंदोलन की सेना है, संकीर्तन की सेना के सेनापति श्रील प्रभुपाद की जय! यह बहुत बड़ी घटना घट रही हैं इस हरे कृष्ण आंदोलन के रूप में और यह भगवान की इच्छा है/भगवान की योजना है, योजना के अनुसार ही हो रहा है। हरि हरि! तो इस संसार में
“परित्राणाय साधुनाम विनाशाय च दुष्कृताम
धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे”
श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु इस उद्देश्य से, सभी प्रभुज़ या भगवान या अवतार प्रकट इसी उद्देश्य से प्रगट होते है। इस उद्देश्य के साफल्य केलिए,ये हरे कृष्ण आंदोलन की स्थापना हुई है और इस हरे कृष्ण आंदोलन की सफलता में ही ऐसे संसार का कल्याण है। ऐसा कार्य करो आप ऐसे भी चैतन्य महाप्रभु कहे,
“भारत भूमिते मनुष्य जन्म होईल ज़ार
जन्म सार्थक करि करो परोपकार”
यह परोपकार का कार्य इसका प्रारंभ स्वयं भगवान ही किए। गौरांग नित्यानंद प्रभु, फिर श्रील प्रभुपाद इसकी फॉर्मेलिटी या औपचारिकता को पूरा करके अंतर्राष्ट्रीय श्रीकृष्ण भावनामृत संघ की स्थापना किए और इतना सारा यश भगवान दे रहे है इस हरे कृष्ण आंदोलन को। हरे कृष्ण आंदोलन ही यशस्वी होने वाला है। राम मंदिर का उद्घाटन हुआ, ”जय श्री राम” । अभी बहुत कुछ हो रहा है, वैसे इसका स्वागत है। एक नई चेतना, लहर फैली हुई है भारत वर्ष में या संसार भर में। लेकिन वैसे ये सारे प्रयासो में श्रील प्रभुपाद के प्रयास हैं ही। अभी-अभी कुछ लोग जग रहे है मोदी-राज योगी-राज तो स्वागत है। यहां तक की फाइनली रामराज की स्थापना हो रही है, नहीं तो रावण राज ही चल रहा था। तो उस दुष्टता का विनाश, विनाशाय च दुष्कृतां हो रहा हैं। “परित्राणाय साधूनां”, भक्तों रक्षा होनी तो चाहिए थी लेकिन अभी नहीं हो रही थी और धर्म की स्थापना भी नहीं हो रही थी। सेकुलरिज्म, सर्वधर्म समभाव, सम काइंड ऑफ ब्रॉड माइंडेडनेस। हरि हरि! गौरांग! गौरांग! लेकिन इस प्रयास में श्रील प्रभुपाद बहुत आगे रहे हैं । देश स्वतंत्र होते ही, वैसे पहले से भी प्रयास हुए। हमारे श्रीभक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर अभय बाबू से कहे थे, इंडिपेंडेंस इत्यादि नॉट इंपॉर्टेंट, प्रायोरिटी किसको देनी चाहिए? “धर्म संस्थापनार्थाय” धर्म की स्थापना के लिए हमें प्राधान्य देना चाहिए़। श्रील प्रभुपाद वाज़ कन्विंस्ड, नहीं तो वैसे श्रील प्रभुपाद भी बन रहे थे स्वतंत्रता सेनानी। जगदीश चंद्र बोस के प्रभुपाद भी एक एसोसिएट हो या उनकी सभा में भी जाया करते थे कोलकाता में। महात्मा गांधी के अनुयायी बन रहे थे,खादी वगैरह पहन रहे थे। “क्विट इंडिया” छोड़ो भारत इस आंदोलन में प्रभुपाद भी सम्मिलित हो रहे थे। किन्तु श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने कहा, दैर इज़ समथिंग मोर इंपॉर्टेंट, इसलिए जाओ विदेश जाओ और अंग्रेजी भाषा में प्रचार करो। मतलब चैतन्य महाप्रभु की जो भविष्यवाणी हुई है उसको सच करना है। हरि हरि! वैसे यह जो युग है, यह जो ज़माना है, यह चैतन्य महाप्रभु का ज़माना है। रामराज का स्वागत है, वाय नॉट? जय श्री राम! जय श्रीकृष्ण! वंडरफुल! लेकिन वैसे यह समय तो श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु की जय! वही राम,वही कृष्ण,इस कलयुग में श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु के रूप में प्रकट होते हैं। अपने षडभुज दर्शन में दिखाया चैतन्य महाप्रभु ने ये सिद्ध किया कि मैं ही हूं राम, मैं ही हूं श्रीकृष्ण। अब मैं चैतन्य महाप्रभु जो बना हूं।
“जई गौर सेई कृष्ण सेई जगन्नाथ” श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु करेंगे धर्म स्थापना इस युग में। उन्होंने अपनी स्ट्रेटजी व्यक्त की जब उन्होंने कहा,
“पृथ्वी तें आचे नगर आदि ग्राम
सर्वत्र प्रचार होइबे मोर नाम”
मेरे नाम का प्रचार कहां कहां तक पहुंचेगा? इस पृथ्वी पर। देखिए इट्स अ बिग थिंकिंग,श्रील प्रभुपाद वाज़ ऑलसो नोन फॉर बिग थिंकिंग। छोटा कभी प्रभुपाद सोच ही नहीं सकते थे। ये बिग थिंकिंग आया कहां से? चैतन्य महाप्रभु से। बिग थिंकिंग, हरि हरि! तो सारी पृथ्वी पर हरिनाम संकीर्तन फैलेगा, हर नगर हर ग्राम में नाम भी पहुंचेगा। ओके राम मंदिर का उद्घाटन हुआ अयोध्या में, रामलला की जय! हम भी थे उस उद्घाटन समारोह में, राधानाथ महाराज भी थे, इस्कॉन के और भी लीडर्स उपस्थित थे। लेकिन मैं सोच रहा था कि अभी-अभी कल अयोध्या में मंदिर राम मंदिर की स्थापना हो रही हैं, उद्घाटन हो रहा हैं। लेकिन प्रभुपाद तो विश्वभर में ५० वर्ष पूर्व, एक तो लंदन में राम मंदिर की ओपनिंग किए प्रभुपाद, इंग्लैंड की राजधानी में। जिन ब्रिटिशो का राज रहा भारत में और जिन्होंने भारतीयों को गुलाम बनाया, उनके देश में जाकर,” राम! जय श्री राम!” और वही ब्रिटिशर्स, नाउ दे आर सरेंडररिंग,
“सर्वधर्मान परित्यज्य मां एकं शरणम् व्रज” कर रहे थे। हरि हरि! यहां तक की श्रील प्रभुपाद के दास बन रहे थे। वैसे प्रभुपाद एक समय कहे कि कोई भारतीय व्यक्ति या उसका कोई सर्वेंट या सेवक विदेश का हो,फिर उस व्यक्ति का क्या कहना है? माय सर्वेंट, माय ड्राइवर, माय कुक इज़ फ्रॉम अमेरिका/ ऑस्ट्रेलिया, फ्रॉम यूरोप। इंडियन्स काफी ट्राय टू हैव सच असिस्टेंट/ सर्वेंट/ड्राइवर्स/कुक, बट वेरी रेयर, राइट? वैसे ही श्रील प्रभुपाद के , ही हैड ५००० सर्वेंट्स। 5000 फिर जो भी सेवा ड्राइविंग/ कुकिंग/ क्लीनिंग, धिस वन, दैट वन, ये सब अमेरिकन/यूरोपियन/ इंग्लिश मैन एंड ऑस्ट्रेलियंस कर रहे थे।
इसको हम गुलामी वगैरह तो नहीं कहते लेकिन वे इस प्रकार की सेवा कर रहे थे। जो ब्रिटिशर्स भारतीयों के राज बने थे वो बन गये, भारतरत्न श्रील प्रभुपाद की जय! क्या कहा मैंने भारत रत्न श्रील प्रभुपाद के वे क्या बन गये? दास बन गये। दासानुदास बन रहे थे। दिस इटसेल्फ इज़ बिग विक्ट्री… हरि हरि! एनीवे इट्स अनादर टॉपिक। ओके! प्रभुपाद लंदन में राम मंदिर, इवन वाशिंगटन डीसी,अमेरिका के कैपिटल में राम मंदिर की स्थापना प्रभुपाद किए। और स्थानों पर,कृष्ण मंदिर,जगन्नाथ स्वामी की जय! गौर निताई मंदिर भी। जब वे जन्मे थे तो प्रभुपाद के संबंध में कुंडली में पढ़ाया गया था,सुनाया था कि ये बालक भविष्य में १०० मंदिरों की स्थापना करेगा। हरि बोल! प्रभुपाद १०० मंदिर अपने लाइफटाइम में ही स्थापित करके गये और अब तो उनकी संख्या लगभग १,००० तक पहुंच चुकी है और लक्ष्य क्या है? ये चैतन्य महाप्रभु का आंदोलन कितने मंदिरों का निर्माण और उद्घाटन करने वाला है? कोई कह सकता है? वैसे हर व्यक्ति कह तो सकता है। सम आइडिया? हां ? ओके! कुछ तो संकेत मिल रहा है। “नगर आदि ग्राम” हमारा लक्ष्य एक-दो मंदिर की ओपनिंग नहीं या सौ- दो सौ मंदिर की ओपनिंग नहीं है। इस पृथ्वी पर जितने नगर हैं, जितने ग्राम हैं, उतने नगरों में, उतने ग्रामों में पृथ्वी पर मंदिरों का निर्माण होना है। हरिबोल!…आपने हरि बोल तो कह दिया समझ के साथ, दिस हेज़ टू बी डन विद द अंडरस्टैंडिंग, ऐसे ही नहीं..क्योंकि यह चैतन्य महाप्रभु की भविष्यवाणी है ..किनकी भविष्यवाणी है ? चैतन्य महाप्रभु की तो ये सच होगी कि नहीं?हां? होगी ही,होके ही रहेगी। हरि बोल! उन सब नगरों में, ग्रामों में हरिनाम संकीर्तन होने वाला है और फिर वहां ग्रन्थ वितरण भी होने वाला है। श्रील प्रभुपाद के ग्रन्थ उतने नगरों में ग्रामों में पहुंचने वाले है और क्या होने वाला है? गायों की सेवा होने वाली है। वहां के गो-भक्षक गो-रक्षक बनने वाले हैं क्योंकि वहां चार नियमों का पालन भी होगा,जो इस्कॉन का वैशिष्ट्य है। ऐसा तो कोई करता भी नहीं, नशापान नहीं, मांस भक्षण नहीं,नो इलिसिट सेक्स, अवैध स्त्री-पुरुष संग नहीं, जुआ नहीं खेलना। वैसे जो भी ये चार महापाप करते हैं,वैसे वे लोग धार्मिक भी नहीं हैं। ये न तो हिंदू हैं, न तो ईसाई, न तो मुस्लिम है,दे डोंट बिलॉन्ग तो एनी रिलीज़न क्योंकि भागवत कहता है,
“द्यूतं पानं स्त्रिय: सूना यत्राधर्मश्चतुर्विध:”,
कली का वास वहां होगा। कली ने कहा,” कुछ तो स्थान दीजिए, कुछ तो स्थान दीजिए, कहां रह सकता हूं मैं? हे राजा परीक्षित!” कली ने भिक्षा मांगी मुझे कुछ तो स्थान दे दो। तो तुम चार स्थानों पर रह सकते हो – “द्यूतं”- द्युत क्रीड़ा जहां, “पानं”-जहां मद्यपान, इंक्लूडिंग चाय-पान, कॉफ़ी पान। कुछ लोग कहते..स्वामी जी चाय लीजिए, तो फिर हम कहते है चाय नहीं। तो फिर कॉफ़ी लीजिए, उनको लगता है चाय तो गरीबों के लिए होती है। ये साधु नामी-साधु होंगे, चाय पीने वाले नहीं, काफी पीने वाले। तो कलि ने ये चार स्थान, चार अड्डे दिए जहां, “यत्राधर्मश्चतुर्विध:”,जहां चार प्रकार के अधार्मिक कृत्य संपन्न होंगे। लोग कहेंगे कि मैं हिंदू,मैं धिस वन,दैट वन, बट यू डोंट बिलॉन्ग टू ऐनी रिलीजन। तुम ये चार महापाप कर रहे हो तो तुम किसी भी धर्म के नहीं हो, तुम विधर्मी हो। हरे कृष्ण आंदोलन श्रील प्रभुपाद की जय! ये क्रांति या रिवोल्यूशन इन कॉन्शियसनेस कहो या टर्न अराउंड था। प्रभुपाद का विदेश में,इन अमेरिका, पहला बैच था कुछ अमेरिकन बॉयज़ एंड गर्ल्स का,जो कुछ महीनों से प्रभुपाद के सत्संग में आते थे। २६ सेकंड एवेन्यू न्यूयॉर्क में प्रभुपाद ने स्थान किराए पर लिया था ,तो कुछ महीनों से आने वाले युवकों को इकट्ठा किए प्रभुपाद और कहे कि, “आप मेरी सहायता कर सकते हो इस हरे कृष्ण आंदोलन को वर्ल्ड वाइड पहुंचाने केलिए, संसार में पहुंचाने के लिए। बस आपको चार नियमों का कुछ पालन करना होगा।” तो फर्स्ट टाइम प्रभुपाद ने ये लिस्ट कही, नो मीट ईटिंग,नो इंटॉक्सिकेशन, नो इलिसिट सेक्स,नो गैंबलिंग। आप में से कोई तैयार है तो हाथ ऊपर करो। अच्छा केशव प्रभु तैयार हैं। आपसे नहीं पूछा जा रहा अभी, प्रभुपाद पूछ रहे थे न्यूयॉर्क में। तो वहां जो उपस्थित थे सभी ने यूनैनिमस्ली सभी तैयार थे। और पता है क्या हुआ उसी के साथ मैं अंग्रेजी में कहता हूं, “ धिस वाज़ द बिगनिंग ऑफ द ऐंड ऑफ द ऐज ऑफ कलि” हरि बोल! पूरा तो एंड नहीं हुआ लेकिन बिगनिंग ऑफ द ऐंड, ऐंड का बिगनिंग हुआ ऑफ द ऐज ऑफ कलि। कलयुग के अंत का प्रारंभ हुआ,इट वाज़ अ बिग टर्निंग प्वाइंट। इसी को रिवोल्यूशन इन कॉन्शियसनेस, विचारों की क्रांति या भावों में क्रांति कहते हैं। ऐसा कार्य और कोई नहीं किया है,प्रचारक तो कई विश्व भर में गए थे। वैसे ऐसी भाषा बोली जा तो रही है,भारत कैसा गुरु बनेगा? विश्वगुरु। प्रभुपाद थे विश्व गुरु, जगत गुरु श्रील प्रभुपाद की जय! भारत को विश्व गुरु होना चाहिए ऐसी बातें तो हो रही हैं लेकिन श्रील प्रभुपाद तो कब के बने हुए हैं विश्व गुरु एंड ऑफ कोर्स ये भारत का पोजिशन भी है और सदा के लिए है। कुछ समय केलिए थोड़ा सेट बैक्स आजाते हैं लेकिन भारत की यही पोजिशन है विश्व गुरुत्व की। एक-दो हजार वर्षों के लिए कुछ सेट बैक्स आए थे बट दैट्स नथिंग। हम कितने कालावधि की बात करते हैं? हम युगों की बात करते हैं, हम वर्षों की बात नहीं करते, ये जो काल गणना है, दिस इज़ नॉट नोन टू द वेस्टर्न वर्ल्ड। कई साले कलयुग के अनाड़ियों को पता नहीं है काल गणना। चार युग होते हैं.. आदि, दे हैव नो आइडिया,नो क्लू कि ये संसार कबसे है? गौरांग!
अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ या हरे कृष्ण आंदोलन की बहुत बड़ी भूमिका है और ये भगवान, दी पर्सनैलिटी ऑफ गॉड हैड , कोई मनघृणन्त बातें या विचार नहीं हैं। ये कोई कल्पना नहीं,इट्स डायरेक्टली कमिंग फ्रॉम द लॉर्ड। ये भगवान का विचार है, भगवान विचार कर सकते कि नहीं? भगवान सोच सकते कि नहीं? मायावादी कहेंगे नहीं क्योंकि सोचना मतलब माया। ऐनी एक्टिविटी मतलब माया। सोचना भी एक क्रिया है तो जस्ट टू बी इन शांति, “अहम ब्रह्मास्मि”। न हिलना न डुलना,नथिंग बस जस्ट भगवान। इतना सारा अज्ञान से भरा पड़ा है ये संसार,या ये विदेशी,दिस वन,दैट वन, क्रिश्चियनस ,मुस्लिम्स, वे तो अनाड़ी हैं ही। कुछ ज्ञान है कुछ अज्ञान है,और इंडियंस/ भारतीय भी, हिंदूज भी अज्ञान से भरे पड़े हैं। इसके मध्य में चैतन्य महाप्रभु के आंदोलन का बहुत बड़ा रोल है,इट्स अ बिग रॉल टू प्ले। समस्त संसार के कल्याण केलिए,
“सर्व सुखिनः भवन्तु सर्वेसंतु निरामया
सर्वाणि भद्राणि पश्यंतु मा कश्चित् दुखभाग भवेत्”
नोट दिस वर्ड – सर्वे, सर्वाणी भद्राणि पश्यंतु। सभी नो वन इज़ एक्सक्लूडेड, कोई आउट नहीं है। फिर उसी के साथ क्या है?
“वसुधैव कुटुंबकम् “ इसीलिए भी है “विट्ठू माज़ा लेकुड वाडा” तो उनकी कई भी लेकरें, इंग्लैड की लेकरें, आसर्ट्रेलिया की, अफ्रीका की, सभी जगह की उन्हीं की संताने हैं। वी आर बट वन फैमिली, वन वर्ल्ड,वन फैमिली। इसका जो विभाजन करता है , ये संसार के द्वंद्व विभाजित करते हैं। एक हिंदी दूसरा मुस्लिम ये द्वंद्व है। लेकिन कृष्ण कॉन्शियसनेस, कृष्ण भावना या जो मूल सनातन धर्म/ भागवत धर्म इज़ ट्रांसेंडेंटल, इस संसार के परे हैं सनातन धर्म/ भागवत धर्म या कृष्ण कॉन्शियसनेस इज़ बियोंड हिंदुइज्म एंड इस्लाम एंड क्रिश्चियेनिटी, इस द्वंद्व से परे हैं। और ये धर्म हैज़ नो एंड,आराम से सात दिन हमलोग ऐसे आगे बढ़ सकते हैं। कोई पराया नहीं है,नो वन इज़ आउट साइडर।
“ममेवंशों जीवलोके जीवभूत: सनातन:” दिस अप्लाइज टू एवरी सिंगल लिविंग एनटीटी, संसार में जितने भी जीव हैं,केवल मनुष्य ही नहीं। ८४ लाख योनियों में भ्रमण करने वाले भी जीव हैं और फिर मनुष्य योनि को भी प्राप्त जो जीव हैं वे सभी को संबोधित या लक्षित करते हुए भगवान कह रहे हैं,
“ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:” हर जीव मेरा ही अंश है,फिर वो कही भी हो, वो मानता हो मैं इस धर्म का हूं,मैं इस देश का हूं, डज़ नॉट मैटर, उस से कोई फर्क नहीं पड़ता। इस कृष्ण भावना के प्रचार-प्रसार के साथ श्रील प्रभुपाद के ग्रंथों के वितरण के साथ और
“हरे कृष्ण हरे हरे कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे “
के साथ सारी दुनिया बनने वाली है वन फैमिली,ये भी हम सुनते हैं प्रभुपाद बिल्ट अ हाउस, उसमें कौन-कौन रहेंगे? हिंदू रहेंगे, इंडियंस ओनली,नो ऑफ कोर्स नॉट; सारा जगत जिसमें रह सकता है। ये है विज़न ये है दृष्टिकोण या लक्ष्य कहो। आप सबका स्वागत है, यू आर वेलकम्ड। आप इस चैतन्य महाप्रभु के,श्रील प्रभुपाद के आंदोलन के सदस्य बने हो तो आपको थोड़ा होमवर्क पता चल रहा है क्या-क्या करना है? कहां-कहां पहुंचाना है? द स्पिरिट ऑफ कोऑपरेशन, ह्यूमिलिटी ऑफ कोर्स विनम्रता के साथ और सब मिलके हमको करना है संकीर्तन स्पिरिट के साथ। एंड विक्ट्री इज़ गारंटीड,
“परम विजयते श्रीकृष्ण संकीर्तनम् “ संकीर्तन आंदोलन की जय! आप सबकी जय! आप कहो या न कहो,होने ही वाली है आपकी जय। इस लाइन में सक्सेस मिलने वाला है। तो अधिकाधिक जीवों को ज़ोडो। तो उनकी भी जय! आपकी भी जय! जय जय जय!
निताई गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल!
जैसे हमने कहा,आई थिंक चैतन्य महाप्रभु और श्रील प्रभुपाद की तरफ से हमने जो कहा वैसे आप करो। वो देखके फिर हम भी ताली बजाएंगे। अभी आपकी बारी है,हमें भी मौका दो,हमें भी अवसर दो। आपके कार्य को देखके पूरी परंपरा के आचार्य ताली बजाएं। करताल ध्वनि से स्वागत करें, सराहना करें और श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु हम सबसे प्रसन्न हों।
गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल!
ओके! पोट भरला का?
