VRINDAVN_DAS_THKR
03-05-2024
ISKCON Dehradun

हरे कृष्ण! हरे कृष्ण! धन्यवाद! 

धन्यवाद, किसलिए?  यह हरे कृष्ण आंदोलन ज्वॉइन करने के लिए भी धन्यवाद और फिर आज की उपस्थिति के लिए भी, हरि हरि! धन्यवाद मान ही लेता हूं, कहता ही हूं धन्यवाद! ऐसा तो मैं सोच रहा था कि उपस्थित रहकर हम किसी पर मेहरबानी तो नहीं करते? तो भी आप गौर भक्त वृन्दों का पुनः पुन स्वागत! अभिनंदन और धन्यवाद भी। आप सभी को, मुझे भी चैतन्य महाप्रभु भाग्यवान बनाए हैं, जिसके कारण हम लोग यहां उपस्थित भी है। तो वैसे “थैंक गॉड!थैंक गॉड!”  सबसे पहले तो आभार  गौरांग महाप्रभु का मानना चाहिए या गौरांग और नित्यानंद प्रभु के आभार मानना चाहिए और कहना चाहिए,

श्रील प्रभुपाद की जय |

“यदि प्रभुपाद ना होइते ताबे कि होइते?”,  ऐसे गीत भी लिखे हैं जयपताका स्वामी महाराज-”यदि प्रभुपाद ना होइते तो कि होइते? तो क्या यह इस्कॉन देहरादून होता? इस्कॉन देहरादून भी नहीं होता, फिर आप भी यहाँ नहीं पहुँचते, मैं तो पहुंचता ही नहीं और आज की भागवत कक्षा होने वाली नहीं थी। यह सब गुरु और गौरांग;  गुरु है श्रील प्रभुपाद: इस्कॉन संस्थापक आचार्य और गौरांग गौरांग हैं। यह उन्हीं की कृपा का यह फल है या उनकी कृपा से हम यहां पहुंचे हैं। और  तो कोई विशेष घटना वगैरह आज तो नहीं घटी है, न तो घट रही है,न तो कोई जानता भी होता कि आज के दिन क्या हुआ था 501 वर्ष पूर्व? वृंदावन दास ठाकुर आविर्भाव तिथि महोत्सव की जय! तिरोभाव नहीं आविर्भाव, वैसे इट डजेंट  मेक मच डिफरेंस। तिरोभाव आविर्भाव से अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। भगवान का आविर्भाव या जन्म महत्त्वपूर्ण होता है किंतु आचार्यों के तिरोभाव या डिसप्पियरेंस डे अधिक पूर्ण होते हैं। भगवान का तो डिसपियरेंस डे होता ही नहीं, ये आप जानते हो। वृंदावन दास ठाकुर के बारे में और अधिक कहने के पहले इतना तो कहते ही है कि उन्होंने  सारी दुनिया को, सारे संसार को, हमको चैतन्य भागवत नामक ग्रंथ दिया और इस ग्रंथ के प्रारंभ में ही , द वेरी फर्स्ट वर्स। ओह ये क्या लेके बैठा हूँ?  ये चैतन्य चरितामृत था, संपूर्ण चैतन्य चरितामृत और ये चैतन्य भागवत की जय! चैतन्य भागवत के प्रारंभ में, ये पहला भाग “आदि खंड” है। चैतन्य चरितामृत का पहला विभाग “आदि लीला” कहलाता है। ये वृंदावन दास ठाकुर की रचना है तो उसके पहले भाग को “आदि खंड” कहते हैं, वहां लीला चलती है यहाँ खंड चलते हैं। आदि लीला, मध्य लीला, अंत्य लीला;  आदि खण्ड,मध्य खण्ड,  अंत्य खण्ड । टेक नोट्स, सम डिफरेंस है। इसके प्रथम अध्याय का जो पहला ही श्लोक है, या वृन्दावनदास ठाकुर का वचन है उसको, हम जैसे भागवत की कक्षा में हम एक श्लोक लेते हैं और फिर आगे चर्चा होती है ,तो कम से कम इस श्लोक का हम पाठ तो करते हैं। इज इट ओके? पाठ मतलब उच्चारण करते हैं। मेरे पीछे कहिए – 

“आजानुलंबित भुजौ कनकावदातौ

 संकीर्तनेक पितरौ कमलायताक्षौ

पदौ युगधर्म…..”

 हम समझते तो नहीं इस कलयुग में, गौरव गाथा वे गा रहे हैं यहां। वैसे हम जब इसको सुनते हैं तो लगता है कि एक ही व्यक्ति का शायद वर्णन यहाँ होता है या हुआ होगा। किंतु आजानु लंबित भुजौ कनकावदातौ – इससे पता चलता है कि दो व्यक्ति का उल्लेख हुआ होगा, नहीं तो ये दातौ नहीं होगा, संकीर्तनैक पितरौ नहीं होता, कमलायताक्षौ नहीं होता। 

रामः रामौ रामाः 

रामः मतलब – एक राम, रामौ मतलब- दो राम। रामौ से दो राम,वैसे दो राम तो नहीं होते ,होते भी है कोई कह सकता है। एक बलराम है एक श्री राम है या परशुराम है,  तो जैसे रामौ मतलब दो राम, तो यहां संकीर्तनेक पितरौ मतलब दो पिता, संकीर्तन के दो पिता, युगधर्म पालौ मतलब युगधर्म का पालन करने वाले दो व्यक्तित्व हैं। और वे है  गौरांग! गौरंग! और दूसरे  हैं, नित्यानंद! नित्यानंद! इन दोनों की गौरव गाथा वे गा रहे हैं। वैसे भी वे सदैव साथ में रहते हैं। त्रेता युग में भी वे साथ में प्रकट हुए थे: राम और लक्ष्मण और द्वापर युग के अंत में भी वे साथ में प्रकट हुए थे: श्रीकृष्ण बलराम की जय!  और वही कृष्ण बलराम,

“बलराम होईल निताई 

नंदनंदन जेई शचीसुत होईल सेई” 

 सही तो नंदनंदन बन जाते हैं शचीनंदन और बलराम बन जाते हैं नित्यानंद। तो वो तो इस ग्रंथ में और इस श्लोक में  जिसका हम श्रवण और उच्चारण किए, इसमें गौरांग और नित्यानंद प्रभु की  जय! उनकी गौरव गाथा है  – ‘ अजानुलंबित भुजौ ‘ कैसे है यह गौरांग और नित्यानंद? संकीर्तनैक  पितरौ, हरि हरि! कमलायताक्षौ , हल्का सा उनके सौंदर्य का वर्णन व उल्लेख भी हो रहा है। व्यक्ति के सौंदर्य की पहचान उनकी आंखों से भी होती है, कुछ कमल-लोचनी होते, तो कोई मर्कट-लोचनी भी। मर्कट माने बंदर, तो कोई मृगनयनी होते। गौरांग और नित्यानंद प्रभु हैं कमलायताक्षौ। विश्वाम्बरौ वैसे चैतन्य महाप्रभु को नाम ही दिया था जब नामकरण हुआ था।  नीलांबर चक्रवर्ती नामकरण किए तो नाम क्या हुआ?  इस बालक का नाम होगा: विश्वंभर । लेकिन यहां तो विश्वंभरौ कहा है तो दोनों भी पालक हैं, पालन-पोषण ये दोनों करते हैं, सारे संसार का /सृष्टि का, तो विश्वमभरौ दोनों को कहा है।  द्विजवरौ: वर  मतलब श्रेष्ठ, ब्राह्मणों  में श्रेष्ठ। दोनों भी- एक हड़ाई पंडित जो स्वयं ही द्विज ब्राह्मण थे उनके पुत्र रहे नित्यानंद प्रभु और चैतन्य महाप्रभु के पिताश्री जगन्नाथ मिश्र भी श्रेष्ठ ब्राह्मण थे। ऐसे श्रेष्ठ ब्राह्मणों के पुत्र रहे दोनों भी, गौरांग नित्यानंद प्रभु भी, द्विजवरौ रहे। युगधर्म पालौ: इन दोनों ने भी युगधर्म का पालन किया। युग कौन सा है? कलयुग है। कलयुग का धर्म है नाम संकीर्तन। आपको पता चल रहा है, यह देहरादून तक समाचार पहुंच गया है। अधिकतर दुनिया नहीं जानती है, हिंदू धर्म.. हिंदू धर्म ऐसा कुछ कहती रहतो हैं। कलयुग का धर्म स्पेसिफिकली; यह तो जनरल नाम हैं – भागवत धर्म, सनातन धर्म- यह तो नाम हैं ही धर्म के, किंतु कलयुग का भागवत धर्म/ कलयुग का सनातन धर्म है “नाम संकीर्तन”। “कलौ तद हरि कीर्तनात”

हर समय जब कलयुग आता है, तो आंखें बंद करके आप क्या कर सकते हो? कीर्तन करना प्रारंभ करो। अब हो गए धार्मिक हो गए। ऐसा सारा निर्धारित है कि किस युग में कौनसा धर्म होगा या कौन से धर्म की विधि का पालन होगा? इट्स ऑल प्री प्रोग्राम्ड/ प्रिप्लैंड। कलयुग के धर्म नाम संकीर्तन के पालक- युगधर्म पालौ गौर नित्यानंद प्रभु रहे। “वंदे जगत प्रियकरो”  पूरे संसार का प्रिय करने वाले हितैषी गौरांग और नित्यानंद प्रभु रहे। वेक अप, गौरांग इज कॉलिंग,जीव जागो! “करुणा अवतारौ” करुणा के अवतार, कारून्य मूर्ति  गौरांग और नित्यानंद प्रभु। “नमो महावदान्याय” – मोस्ट मैगनैनीमस, गौरांग और नित्यानंद प्रभु भी, इनकी जय हो!  वृंदावनदास ठाकुर, आई थिंक नोटेड, उनका आविर्भाव नहीं है, तो भी आविर्भाव की चर्चा तो हो सकती है। आविर्भाव की भी चर्चा फिर उनके चरित्र की चर्चा! ये वृंदावन दास ठाकुर  श्रीकृष्ण लीला में वेद व्यास थे। हरि हरि! श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी लिखते हैं –

“कृष्ण लीला भागवत कहे वेदव्यास ,

चैतन्य लीलारे व्यास वृंदावन दास।”

कौन लिखे? कृष्णदास कविराज गोस्वामी जो चैतन्य चरितामृत के लेखक या रचयिता हैं,  वे अपने ग्रंथ में लिखते हैं, कृष्ण लीला का वर्णन करने वाले वेदव्यास ही पुनः प्रकट होते हैं और चैतन्य भागवत के व्यास  वृंदावन दास। चैतन्य लीलार व्यास वृंदावन दास ठाकुर की जय! हरि हरि!  कवि कर्णपूर नाम के, आपके लिए शायद ये थोड़ी बातें नई है या तो आप थोड़े नए हो, हमारा इस्कॉन देहरादून एक साल पुराना है, राइट? इट्स वन ईयर ओल्ड? सो यू आर सेवन इयर ओल्ड। तो अभी रिलेटिवली नए ही होगे आप। कवि कर्णपूर, ये भी एक लेखक रहे, जो चैतन्य महाप्रभु के पार्षद और परिकर भी थे। उन्होंने एक ग्रंथ की रचना की है, वो क्या है? गौर गणोदेश दीपिका -इस ग्रंथ में वे लिखते हैं कृष्ण लीला के कौन-कौन से व्यक्तित्व चैतन्य महाप्रभु की लीला में  वे कौन-कौन बन जाते हैं? कौन सी भूमिका निभाते? हंड्रेड्स एंड हंड्रेडस  -सैकड़ों नामों का उल्लेख करते हैं।  चैतन्य लीला में इंक्लूडिंग,” नंदनंदन जेई शचीसुत होईलो सेई “ वहां से शुरुआत होती है। जो कृष्ण लीला में नंद नंदन थे वे बन जाते शची नंदन, चैतन्य महाप्रभु की जय! यशोदा माता बन जाती हैं शची और नंदबाबा बन जाते जगन्नाथ मिश्र। ऑन एंड ऑन एंड ऑन, बहुत बड़ा विस्तार से वे वर्णन सुनाते हैं कि कौन कौन हुआ?  हु इज हु? वे भी उल्लेख करते हैं कृष्ण के समय कृष्ण के ही  शक्त्यावेश अवतार श्रील व्यास देव, चैतन्य महाप्रभु के समय वे वृंदावन दास ठाकुर बनते हैं। श्रील वृंदावन दास ठाकुर की माताश्री नारायणी रहीं, जो पुनः कृष्ण लीला में नर्स कहो या स्तनधात्री, कृष्ण को स्तनपान कराने वाली एक खिलाम्बिका  जो नारायणी के रूप में जन्म लेती हैं। कहां होता है जन्म उनका? वैसे मायापुर में ही होता है। वृंदावन दास ठाकुर की माता नारायणी का जन्म श्रीवास बाडी में होता है- श्रीवास आंगन में होता है। श्रीवास का नाम सुने हो? 

श्रीकृष्ण चैतन्य प्रभु नित्यानंद श्रीअद्वैत
गदाधर श्रीवास आदि गौर भक्त वृन्द।

श्रीवास स्वयं नारायण  नारायण कहने वाले नारद मुनि ही थे। श्रीवास के बड़े भाई की पुत्री बन जाती है नारायणी, जो कृष्ण लीला में एक खिलाम्बिका नामक नर्स थी। यह नारायणी श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु की कृपापात्रा थीं। चैतन्य महाप्रभु बहुत लाड़-प्यार किया करते थे इस नारायणी के ऊपर,नारायणी केलिए। चैतन्य महाप्रभु का कृपा प्रसाद अवशिष्ट भोजन भी वो ग्रहण किया करती थीं, कभी कभी तो चैतन्य महाप्रभु के चरण के अंगूठे को चूसती थीं, लिक द टोज़ ऑफ गौरांग महाप्रभु। जब ये बहुत छोटी ही थी नारायणी की महिमा आप सुनोगे तो फिर… ऐसी नारायणी का पुत्र भी विशेष होना चाहिए,आप समझ ही जाओगे। ये नारायणी जब चार साल की थीं तो चैतन्य महाप्रभु ने अपनी महाप्रकाश लीला प्रकाशित की, महाप्रकाश नामक एक विशेष लीला का प्रदर्शन हुआ जो इक्कीस घंटों तक चल रही थी, सप्त प्रहर लीला। उस लीला के अन्तर्गत चैतन्य महाप्रभु ने ऐसी विशेष शक्ति-भक्ति प्रदान की थी नारायणी को।

और फिर उसने अपनी भक्ति का प्रदर्शन कहो, दिखावा तो नहीं, नेचरली प्रदर्शन जो हुआ, उसके हाव-भाव/ उसका भाव विभोर होना/ रोमांचित होना। वह बस 4 साल की बच्ची थी और लोट रही थी लोटांगन, आंसू बहा रही थी। ऐसी नारायणी ने वृंदावनदास ठाकुर को जन्म दिया। हरि हरि! यह सारी हिस्ट्री है, कनेक्शन नोट करोगे, नोट किया है,आशा है आपने किया होगा। ये वृंदावन दास ठाकुर जन्म वैसे नवदीप में एक द्वीप है- मोदद्रुम द्वीप नामक; जैसे गोद्रुम द्वीप, अन्य द्वीप, मध्य द्वीप,कोल द्वीप, इत्यादि इत्यादि जो अन्य नाइन आयरलैंड हैं उसमें से मोदद्रुम नामक द्वीप में  एक मामगाछी नामक स्थान है। हम जब नवद्वीप मंडल परिक्रमा में जाते हैं वहां जरूर जाते हैं, जहां जन्म हुआ वृंदावन दास ठाकुर का और वहीं पर लालन-पालन हुआ वृंदावन दास ठाकुर का।  जिस स्थान पर आज भी वृंदावन दास ठाकुर द्वारा सेवित गौर निताई के विग्रह वहां विद्यमान हैं , जिनकी सेवा-पूजा वृंदावन दास ठाकुर किया करते थे। हरि हरि!

 वृंदावन दास ठाकुर नित्यानंद प्रभु का संग सानिध्य प्राप्त हुआ, उससे वे लाभान्वित हुए। चैतन्य महाप्रभु से वे कभी नहीं मिले थे। महाप्रभु ने संन्यास लिया और नवद्वीप से प्रस्थान किए,  पूरे भारत का भ्रमण किए और फिर जगन्नाथ पुरी में वे रहे। चैतन्य महाप्रभु जब जगन्नाथ पुरी में रह रहे थे तब उन्होंने नित्यानंद प्रभु को बंगाल भेजा था,” जाओ! बंगाल में प्रचार करो”। नित्यानंद प्रभु बंगाल में प्रचार कर रहे थे। उस समय वृंदावन दास ठाकुर अभी-अभी जन्मे थे और उनकी उम्र बढ़ रही थी तब उन दिनों में वे नित्यानंद प्रभु के संपर्क में आते हैं और नित्यानंद प्रभु के,

 “नित्यानंद कृपापात्र वृंदावनदास

 चैतन्य लीला रति हैन आदिव्यास” 

नित्यानंद प्रभु के कृपापात्र थे वृंदावन दास। वे शिष्य भी बन गए, हैं तो वे श्रील व्यास देव जो सारे संसार के वैसे एक प्रकार से शिक्षा गुरु है,जो सारे वैदिक वांग्मय की रचना करने वाले, वेदांतकृत थे। “मैंने वेदों की रचना की है”।  वेद,पुराण, हरि हरि! महाभारत इत्यादि सारे ग्रंथो की रचना करने वाले श्रील व्यास देव अब बने हैं वृंदावन दास । वे बन जाते हैं शिष्य, किनके? नित्यानंद प्रभु के। क्यों नहीं बनेंगे? श्रील व्यास देव को होने दो सही शिक्षा गुरु, विद्वान, किंतु आदिगुरु तो बलराम जी हैं, जहां तक बलराम तत्व है और बलराम ही बन गए हैं नित्यानंद। 

“ बलराम होईलो निताई” नित्यानंद प्रभु आदिगुरु है, तो वृंदावन दास नित्यानंद प्रभु का शिष्यत्व स्वीकार करते हैं। 

“वृंदावन दास कैला चैतन्य मंगल

 जहांर श्रवणे नाशे सर्व अमंगल “

कृष्णदास कविराज गोस्वामी अपने चैतन्य चरित्रामृत में उल्लेख करते हैं कि वृंदावन दास ठाकुर ने चैतन्य मंगल नामक ग्रंथ की रचना की। उसको टाइटल भी दिया चैतन्य मंगल, किंतु यह पता चला कि चैतन्य मंगल नामक ग्रंथ की रचना या ये शीर्षक लोचन दास ठाकुर ऐसा एक चैतन्य चरित्र लिख थे। तो वृंदावन ठाकुर को पता चला,” अरे चैतन्य मंगल नामक और एक ग्रंथ है”,  तो अपने ग्रंथ के नाम का परिवर्तन करके, चैतन्य मंगल के स्थान पर क्या नाम रखा? चैतन्य भागवत जिसके श्रवण से नाशे सर्व अमंगल। जैसे भागवत के संबंध में भी कहा गया,

“नष्ट: प्रायेषु अभद्रेषु नित्यम भागवत सेवया” 

ऐसे ग्रंथराज श्रीमद्भागवत के श्रवण से, नष्ट:प्रायेशु अभद्रेशु, जो जो अभद्र है/अमंगल है वो दूर होते हैं।

 “पुण्य श्रवण कीर्तनं” 

“हृदयंतस्त हि अभद्राणी विधुनोति सुहृतस्ताम” 

हमारे हृदय प्रांगण में, हरि हरि!गौरांग! हरि बोल! सीधे बैठिए।

सिट लाइक योगी, नॉट लाइक भोगी।

हमारे हृदय प्रांगण में जहां-जहां अभद्र/अमंगल चिपका हुआ है वहां वहां ये भागवत के वचन, चैतन्य भागवत के वचन, पहुंचकर उसकी सफाई कर देते हैं। जिसको चैतन्य महाप्रभु कहे, “चेतोदर्पण मार्जनं” हमारी चेतना के दर्पण का मार्जन हरिनाम भी करता है, नाम भी करता है और उनकी कथा भी करती है। इसलिए हमें सदैव,” नित्यं भागवत सेवया” और फिर “कीर्तनीय सदा हरि”,  कब-कब कीर्तन करना चाहिए? सदा हरि।  भागवत की सेवा और श्रवण कब करना चाहिए? नित्यम भागवत सेवया। हरिनाम भी भगवान है और भागवत/ चैतन्य भागवत भी भगवान ही है, भगवान से अभिन्न है। भगवान परम पवित्र है तो उनका नाम भी पवित्र है, उनसे संबंधित ग्रंथ भी पवित्र है। तो फिर “पतितानाम  पावनेभ्यो वैष्णवेभ्यो नमो नमः” यह ग्रंथ भी बन जाता है डिजायर ट्री, यह ग्रंथ भी क्या है?  “वांछा कल्पतरु”, वांछा मतलब इच्छा, कल्पतरु मतलब डिजायर ट्री। श्रीमद्भागवत भी क्या है? डिजायर ट्री। हरिनाम भी डिजायर ट्री है। भागवतम भी वांछा कल्पतरु है, चैतन्य मंगल भी वांछा कल्पतरु” है। फिर पतितानाम पावनेभ्यो तो जो मंगल है “जहांर श्रवने नाशे सर्व अमंगल” आगे है

“मनुष्य रचिते नारे एछे ग्रन्थ धन्य”  

कृष्णदास कविराज गोस्वामी चैतन्य चरितामृत में पुनः लिखते हैं, यह जो चैतन्य भागवत ग्रंथ है साधारण मनुष्य ऐसे ग्रंथ की रचना नहीं कर सकता। ऐसे हम तो यहां कह तो रहे हैं, वृंदावन दास ठाकुर इसकी रचना किए, कृष्णदास कविराज गोस्वामी कह रहे हैं,  “वृंदावन दास मुखे वक्ता श्रीचैतन्य”

 तो वृंदावन दास को निमित्त मात्र, निमित्त बनाया है, लेकिन इसको लिखने वाले वैसे चैतन्य महाप्रभु ही है या उनके मुख से जो भी वचन निकल रहे हैं मानो चैतन्य प्रभु उनको बुलवा रहे हैं।  जैसे राय रामानंद चैतन्य महाप्रभु के संवाद में भी ऐसे रामानंद राय कहते हैं। ऐसे ही कुछ प्रश्न-उत्तर भी चल रहा है, मोस्ट कॉन्फिडेंशियल चर्चा हो रही है, “गुह्यं आख्याति प्रीच्छति”  राय रामानंद उन प्रश्नों के उत्तर देने में सक्षम भी नहीं हैं ऐसा समझ रहे हैं। तो भी वह कहते हैं वैसे,” आप ही मेरे मुखारविंद से बुलवा रहे हो, आप ही बोल रहे हो मुझे माध्यम बनाकर।” यहां कोई वाद्य है? स्ट्रिंग इंस्ट्रूमेंट।  तो वाद्य मैं हूं और उसका वादक आप हो। ये हारमोनियम है, वाद्य अपने आप नहीं बजता है, कोई बजाता है उसको।  चैतन्य भागवत के सारे वचन है वृंदावन दास ठाकुर के मुखारविंद से। चैतन्य महाप्रभु ही मानो कह रहे हैं/ बोल रहे हैं,  “वृंदावन दास पदे कोटि नमस्कार” 

कृष्णदास कविराज गोस्वामी कितने नमस्कार करना चाहते हैं? कोटि-कोटि। वैसे हम भी कभी-कभी लिखते हैं कोटि-कोटि दंडवत, लेकिन करते एक भी नहीं है दंडवत।हरि हरि! कृष्ण दास कविराज गोस्वामी महाराज जैसे व्यक्तित्व वैसे जो भी कहते हैं, बड़े विनम्र भाव के साथ कहते हैं। या नतमस्तक जिसमें सिर झुका हुआ, हाथ नहीं जोड़ ऐसे दिखता तो होगा, लेकिन जो भी कह रहे हैं उसी विनम्र भाव से वे कहते हैं। कहते रहते हैं या लिखते रहते हैं मानो नमस्कार करते हुए कोटि-कोटि पुनः पुनः।

“कृष्ण जिनका नाम है, गोकुल जिनका धाम है 

ऐसे श्री भगवान को मेरे बारंबार प्रणाम है”

विनम्र भाव में, विनम्र बनके हम कुछ कहते हैं/करते हैं तो नमस्कार हो रहे हैं। नमस्कार के साथ

“ऐसे ग्रंथ करिते होय तरेला संसार”  ऐसे ग्रंथ की रचना करके, चैतन्य भागवत की जय! सारे संसार का उद्धार किया है। लेकिन हमारा उद्धार तब होगा जब हम क्या करेंगे? इस चैतन्य भागवत को पढ़ेंगे, तभी तो उद्धार होगा ना। हरि हरि! “नित्यम भागवत सेवा”  मतलब भगवान से संबंधित जो भी बातें हैं उसे भागवत या भगवत या प्राकृत कहें। एक शब्द है भगवत और भगवत से भागवत होता है। एक तदधित नामक व्याकरण का एक प्रकार है,जैसे वसुदेव से वासुदेव होता है; दीन से दैन्य होता है,ऐसे करके शब्द बनते हैं। तो भगवत से बन जाता है भागवत। रिलेटेड विथ भगवान, भगवान से संबंधित जो भी है उसको भागवत कहते हैं। केवल ग्रंथ ही भागवत नहीं होता, महाभागवत भक्त भी भागवत होते हैं, प्रसाद भी भागवत होता है। कई विद्यापीठों के नाम भी भागवत विद्यापीठ हैं। जिसका-जिसका जिन बातों का, व्यक्ति का, स्थान का, भगवान के साथ संबंध होता है उसको भागवत कहते है।  “नित्यम भागवत सेवा” वैसे सारे ग्रंथ भागवत की है, उसके टाइटल अलग-अलग हो सकते हैं जैसे यहां ‘ चैतन्य मंगल’ कहा है तो एक ‘ चेतन भागवत’ भी है। लोचन दास ठाकुर जो ग्रंथ लिखे हैं वो ‘ चैतन्य मंगल’ , फिर कृष्णदास कविराज गोस्वामी जो ग्रंथ लिखे वो ‘चैतन्य चरितामृत’ कहलाता है और यह वृंदावन दास ठाकुर जी ग्रंथ को लिखे हैं उसका नाम है ‘चैतन्य भागवत’।  लेकिन एक दृष्टि से/ एक समझ के साथ यह सारे क्या है? क्या है? भागवत ही है, ये चैतन्य भागवत ही है। वो श्रीमद् भागवत है, ये चैतन्य भागवत है। और भी कई सारे ग्रंथ हैं चैतन्य चरित नामक ग्रंथ है, लाइक दैट मैनी स्क्रिप्चर्स जिसमें चैतन्य महाप्रभु की लीला/ शिक्षा का वर्णन आता है। इन सब का अध्ययन हमें करना है। हरि हरि!  वैसे पहले रचना हुई थी चैतन्य भागवत की जिसको वृंदावन दास ठाकुर किए, जो मायापुर नवदीप में किए और बहुत समय के उपरांत कृष्णदास कविराज गोस्वामी वृंदावन में राधा कुंड के तट पर चैतन्य चरितामृत लिखे। वे वृद्धावस्था में लिख रहे थे, ही वाज़ वेरी ओल्ड, उनके हाथ कांप रहे थे, आंखों से दिखना कुछ कम हो रहा था, ऐसा स्वयं वे लिखते हैं। वे सोचते मेरे पास ज्यादा समय नहीं है तो जो भी लिख पाऊंगा, तो वे लिख रहे थे लेकिन जो साइज ऑफ द बुक है,उसको बड़ा/ विशाल नहीं करना चाहते थे, ब्रॉड बेस नहीं रखना चाहते थे क्योंकि उसको पूरा करना, सीमित समय में,उनको पता नहीं था कितने साल या कितने महीने बचे हैं मेरे? लेकिन मुझे लिखना है पूरा, मुझे लिखना है इसलिए कृष्णदास कविराज गोस्वामी उन्हीं लीलाओं का वर्णन करते हैं, जिन लीलाओं का वर्णन वृंदावनदास ठाकुर चैतन्य भागवत में नहीं किए हैं। ही डजेंट लाइक टू रिपीट। वैसे भी वो सोचते ये सही नहीं है क्योंकि वृंदावन दास लिखे ही हैं तो मैं कैसे लिख सकता हूं पुनः? एक प्रकार से ऐसा कॉपी करना ये अपराध हो सकता है ,तो ऐसा भी सोच रहे थे और समय भी सीमित था। इन दोनों ग्रंथों को तुलनात्मक दृष्टि से देखेंगे तो यह समझ में आता है कि कृष्णदास कविराज गोस्वामी चैतन्य महाप्रभु की मायापुर नवदीप लीला का वर्णन बड़ा संक्षिप्त में करते हैं क्योंकि वृंदावनदास ठाकुर उसका विस्तार से वर्णन किए हैं। चैतन्य महाप्रभु के 24 वर्ष संन्यास, निमाई संन्यास के समय तक जो 24 वर्ष पूरे हुए, तो चैतन्य महाप्रभु का विस्तार से वर्णन वृंदावन दास ठाकुर करते हैं ,बड़े डिटेल से। सब लीला को वो कवर कर ही देते हैं वृंदावन दास ठाकुर। इसलिए चैतन्य चरितामृत में वैसे चैतन्य महाप्रभु की मायापुर नवदीप लीला तो बड़ी संक्षेप में है। वैसे आदि लीला के शायद 17 चैप्टर है, तो उसमें से पहले कई सारे अध्याय तो तत्व/पंचतत्व, फिर चैतन्य तत्व, फिर नित्यानंद तत्व, अद्वैत तत्व, इसका भी वर्णन किए हैं। और अंतिम कुछ चार-पांच अध्यायों में चैतन्य लीला का वर्णन कृष्णदास कविराज गोस्वामी करते हैं, संक्षिप्त वर्णन। आदि लीला के अंत में ,आदि लीला नामक विभाग, उसका टाइटल आदि लीला , इसमें संक्षिप्त में चैतन्य महाप्रभु की नवदीप मायापुर लीला का वर्णन करते हैं। किंतु वृंदावन दास ठाकुर आदि खंड/ मध्य खंड, ऐसे दो खंडों में चैतन्य महाप्रभु की नवद्वीप लीला का वर्णन करते है।

दो खंडों में चैतन्य महाप्रभु इन मायापुर,इन नवद्वीप का वर्णन किए और कृष्णदास कविराज गोस्वामी केवल आदि लीला जो एक खंड है उसके भी कुछ अध्यायों में चैतन्य महाप्रभु की मायापुर नवद्वीप लीला का वर्णन करते हैं। गौरांग! फिर चैतन्य महाप्रभु संन्यास लिए, जगन्नाथ पुरी धाम की जय! जगन्नाथ पूरी धाम जाते है, उस समय तो चैतन्य महाप्रभु दो मास ही रहे जगन्नाथ पुरी में। सार्वभौम भट्टाचार्य को उन्होंने भक्त बनाया, वे मायावादी थे तर्कज्ञ थे, क्या क्या थे? तुरंत दो मास महीनों के उपरांत चैतन्य महाप्रभु ने बिग टूर ऑफ इंडिया किया, छ:वर्षों तक जो यात्रा चलती रही। वैसे छ:सालों में वैसे तीन बार तो ‘चैतन्य महाप्रभु, पुन:लौटे जगन्नाथ पुरी, तो उसका विस्तार से वर्णन कृष्णदास कविराज गोस्वामी करते। चैतन्य महाप्रभु की जय! नो नो! चैतन्य महाप्रभु की लीला मैं कहने जा रहा था। ऐनीवे जय का भी स्वागत है। जय हो! आपके जय की जय हो! चैतन्य महाप्रभु २४ वर्ष मायापुर /नवदीप में, छ:वर्ष अराउंड इंडिया, ऑल ओवर इंडिया, पैन इंडिया कहो, देहरादून नहीं आए वैसे, अभी उनके भक्तों को भेजे है चैतन्य महाप्रभु। फिर १८ वर्ष जो महाप्रभु  जगन्नाथ पुरी में रहने वाले हैं और अपनी अंतिम लीला, अंतिम लीला मतलब यहां अंतिम संस्कार का स्मरण नहीं करना चाहिए, कभी कभी ऐसा सोच लेते हैं। अंतिम लीला मतलब अंत के १८ वर्ष की लीला, अंत्य लीला नामक ऐसा शीर्षक देके वर्णन किए कृष्णदास कविराज गोस्वामी और बड़े  विस्तार से जगन्नाथ रथ यात्रा, धिस वन, दैट वन स्पेशियली चैतन्य महाप्रभु जिस उद्देश्य से प्रकट हुए थे, उनका पर्सनल/ प्राइवेट रीजन जो था। प्राकट्य का जनरल रीज़न तो 

 “परित्राणाय साधुनाम  विनाशाय च दुष्कृताम

 धर्म संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे 

यह तो चलता रहता है,हर अवतार यह करते रहते है। हर अवतार में संभवामि युगे युगे तो चलता है। धर्म स्थापना का कार्य तो चैतन्य महाप्रभु किए ,छ:वर्षों तक कर रहे थे।धर्म की स्थापना का कार्य। इसके पहले भी, बाद में भी, लेकिन अधिकतर उनका फोकस रहा “धर्म स्थापन” पर, छः वर्षों की मध्य लीला के अंतर्गत। 

“श्री राधार भावे एबे गोरा अवतार

 हरे कृष्ण नाम गौर करीला प्रचार”

चैतन्य महाप्रभु ने हरे कृष्ण नाम का सर्वत्र प्रचार किए, जिसकी भविष्यवाणी किये थे कि मेरे नाम का प्रचार, “सर्वत्र होईबे मोर नाम” । चैतन्य महापुरुष स्वयं ही अपनी भविष्यवाणी को सच करके दिखाएं, ऐट लीस्ट विदिन इंडिया और फिर बचे हुए १८ वर्ष चैतन्य महाप्रभु, १८ वर्षों में भी वैसे अंतिम १२ वर्ष/ द्वादश वर्ष चैतन्य महाप्रभु कॉन्सेंट्रेट करते हैं, 

“राधाया प्रणय महिमा केदृशौ”

राधा की प्रणय महिमा किस प्रकार की है?

और मैं कृष्ण जो मीठा हूं, मधुर हूं,( मैं नहीं,लोकनाथ स्वामी नहीं) बल्कि भगवान,

“मधुराधिपते अखिलम मधुरम” भगवान की हर बात मधुर है।

“भुक्तम मधुरम सूक्तम मधुरम“ भगवान कुछ खाते हैं तो मधुर है,उनका सोना भी मधुर है, हर बात मधुर है। वे जानना चाहते थे कि मैं कितना मधुर हूं?  उनको ये पता नहीं है,पर दुनिया तो कहती आप मधुर हो, मधुर हो, मधुर हो। तो जैसे चीनी को/ शक्कर को पता नहीं होता है कि वह  कितनी मीठी है या नहीं है? लेकिन चींटी जानती हैं। तो अपने माधुर्य की महिमा समझने के लिए, चैतन्य महाप्रभु राधा रानी बन जाते है या साथ में राधा को ले आते है। “श्रीकृष्ण चैतन्य,राधा कृष्ण नहीं अनन्य” तो राधा भाव में चैतन्य महाप्रभु अपने माधुर्य को समझना चाहते हैं। ये उनके प्राकट्य का व्यक्तिगत/ प्राइवेट/ पर्सनल रीजन था, ऐसा कृष्णदास कविराज गोस्वामी लिखे हैं। मेरा माधुर्य कैसा है? और जब उसका कोई आस्वादन करता है तो कितनी मिठास हैउसमें ? कितना सुख/आनंद अनुभव होता है? यह भी कृष्ण को पता नहीं था। ‘चैतन्य मंगल’ में लोचन दास ठाकुर प्रारंभ में लिखते है, कृष्ण के लीला में, यहां द्वारका लीला हो रही हैं और उनके लीला का लगभग समापन ही होना है। एक दिन की बात है द्वारका में रुक्मणी कहे,” हे प्रभु! द्वारकाधीश प्रभु!’ अपने पतिदेव को संबोधित कर रहीं हैं, “प्रभु प्रभु  कुछ ऐसे बातें हैं आप नहीं जानते हो। बांके बिहारी की जय! कृष्ण कहे,’ अरे बाबा क्या-क्या कह रहे हो कि मैं, और कुछ बातों को नहीं जानता हूं? तुमने भागवत का पहला श्लोक भी नहीं पढ़ा है क्या?” इस श्लोक में क्या कहा है? अभिज्ञ स्वराट,मैं कैसा हूं? मैं अभिज्ञ हूं, आई ऐम द ऑल नोअर और  मैं स्वराट / स्वतंत्र हूं। पर रुक्मिणी कहें कि ,”नहीं नहीं आप नहीं जानते, ऐसी कुछ बातें आप नहीं जानते। एक तो राधा रानी जानती हैं और मैं जानती हूं। लेकिन मुझसे अधिक तो राधा रानी ही जानती है जो विरह की व्यथा है और फिर विरह की व्यथा में एक आनंद भी होता हैं, तो उसको आप नहीं जानते हो। एक मिलन का आनंद होता है और फिर विरह की व्यथा, जिसको आनंद भी कहा है। विप्रलम्भ और संभोग,मतलब मिलन में जो आनंद है वो संभोग और विप्रलम्भ यानी सेपरेशन में जो व्यथा और आनंद है। कृष्ण ने जब सुना कि ऐसी कुछ बातें आप नहीं जानते हो, तो भगवान उसी समय संकल्प लेते है।  नेक्स्ट टाइम जब अवतार लूंगा तो मैं राधा बनूंगा,या राधा के भाव में प्रकट होऊंगा ताकि मैं ये जो रुक्मिणी कह रही है कि आप नहीं जानते हो,तो उसको मैं जानना चाहता हूं, मैं समझना चाहता हूं। केवल ५००० वर्ष पूर्व तो भगवान अभी-अभी लीला खेल के गए थे, १२५ वर्ष पृथ्वी पर थे।  लेकिन कुछ साढ़े चार हजार वर्षों के उपरांत वे पुनः आ गए । पुन: आ गए श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु के रूप में और इस लीला का एक उद्देश्य या प्राकट्य का एक उद्देश्य क्या था? “आप नहीं जानते हो, आप नहीं जानते हो”।  ओके फिर मैं राधा ही बन जाता हूं,

“श्रीकृष्ण चैतन्य राधाकृष्ण नही अन्य” 

“राधा भाव द्युति सुवलितम नवमी कृष्ण स्वरूपम”

ऐसा रूप मैं धारण करूंगा, इस रूप में क्या होगा? 

राधा का भाव और राधा की कांति/ रंग भी होगा। राधा का रंग और राधा का भाव, अंदर से राधा का भाव और बाहर से उनका रंग,

“अंतः कृष्ण“ जैसे चैतन्य भागवत में उल्लेख आता है। “अंतः कृष्ण बहीर गौरा”

कृष्णा पीछे या अंदर छिपे हैं और बाहर से राधा है। इसीलिए गौरांग है वे, गौरांग!  गौरांगी का जो रंग है हेमांगी, गौरांगी तो वही रंग धारण किए हैं। बाहर से और अंदर राधा का भाव है।और उसके अंदर फिर कृष्ण भी छिपे हुए हैं, तो राधा को आगे-आगे करते हुए कृष्ण जानना चाहते हैं, स्वयं को जानना चाहते हैं, जानना तो कृष्ण को ही है। राधा के दृष्टि से /राधा के समझ के जो भगवान है और राधा जितना कृष्ण को जानती हैं और कोई होता नहीं जानता, गोपियां भी नहीं जानती उतना, नंदबाबा-यशोदा भी नहीं जानते, न तो उनके ग्वालबाल उतना जानते है। सबसे अधिक ज्ञान या संपूर्ण ज्ञान तो राधा रानी को ही है कृष्ण का। क्योंकि 

“ये यथा माम प्रपद्यंते तानतथैव भजाम्यहम”

जो जितना शरण लेता है उतना ही भगवान उनको प्रकट होते हैं।

“नाहम प्रकाशास्य सर्वस्य योगमाया समावृतः “

मैं सबको प्रकट नहीं होता, मै स्वयं को ढक लेता हूं योगमाया से। सबसे अधिक कृष्णज्ञ ल, कृष्ण को जानने वाली तो राधा ही है। भगवान राधा बनकर प्रकट हुए थे। अब जगन्नाथ पूरी में, “धर्म संस्थापनार्था”  इत्यादि हो गया है, स्वयं ही सर्वत्र भ्रमण करके, “सर्वत्र प्रचार हुईबे मोर नाम”

“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, 

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे”

वह ड्यूटी भी उन्होंने, आउट ऑफ द वे,उसको निभाया और अब अपना जो पर्सनल/प्राइवेट रीजन/उद्देश्य था प्राकट्य का उसके लिए चैतन्य महाप्रभु अब जगन्नाथ पूरी में १२ वर्ष इसी में लगे या तल्लीन रहेंगे। उन लीलाओं का विस्तार से वर्णन कौन करते हैं? कृष्णदास कविराज गोस्वामी करते हैं।  मध्यलीला छः वर्षों की और अंत लीला कितने वर्षों की? 18 वर्षों। ये दोनों लीलाओं का वर्णन कृष्णदास कविराज मध्य लीला और अन्त्य लीला के कई सारे अध्यायों में विस्तार से वर्णन करते है। जिसका वर्णन ये वृंदावन दास ठाकुर, केवल अन्त्य खंड या अन्त्य लीला में कुछ अध्याय में उसको संक्षिप्त में लिखते हैं। आप डिफरेंस समझ रहे हो? तो वैसे चैतन्य महाप्रभु की सारी लीलाओं का पता लगवाना है/ सुनना है/समझना है  तो फिर हम दोनों ग्रंथों का अध्ययन करना होगा- चैतन्य चरितामृत और चैतन्य भागवत।  इस प्रकार यह दोनों ग्रन्थ दे कॉम्प्लीमेंट इच अदर या एक दूसरे के पूरक  ग्रन्थ बन जाते है। केवल चैतन्य चरितामृत पढ़ लिया तो कई सारी बातें छूटने वाली है। आदि लीला मायापुर/ नवदीप की लीलाएं है और केवल चैतन्य भागवत ही पढ़ा तो मध्यलीला और अंतिम लीला का जो विस्तार से वर्णन है चैतन्य चरितामृत में वो बातें छूटने वाली है। चैतन्य भागवत में आप उसका वर्ण वहां नहीं प्राप्त करोगे। हरि हरि!

 फिर आज के दिन तिरोभाव है, ही वाज़ 82 इयर्स ओल्ड, 82 वर्ष के थे वृंदावन दास ठाकुर। इतने वर्ष उतने वर्ष तो भूल जाओ लेकिन लौकिक दृष्टि से वे इतने वर्ष के थे, लेकिन हैं तो वे व्यास देव, व्यासदेव शाश्वत हैं। भगवान के  शक्त्यावेश  अवतार हैं। इन वर्षों से उनका कोई लेनादेना नहीं हैं, ही इज़ इटरनल, इटरनल ज्ञान दिया है ताकि संसार धन्य बन जाए, धनी बन जाए। सूर्य का अंत होता है क्या? वेट  फॉर ट्वेल्व आवर्स, १२ घंटे रुक जाओ तो पुन:पुन: वही सूर्य प्रकट होता हैं और वो १२ घंटे भी कहीं न कहीं और होता ही है। इस दृष्टि से भी ये अपीयरेंस / डिसअपीयरेंस इस दृष्टि से तो भ्रम पैदा करते हैं लेकिन वैसे यह सब चरित्र शाश्वत है/ इंटरनल है। हम सब ऋण सब ऋण है आज के दिन डेटेड हम ऋण है किसके ऋण है?कहेंगे ठाकुर के ऋण है। से मुक्त हो जाए कैसे मुक्त हो जाए कैसे हो सकते है? कठिन है।  प्रभुपाद के टाइम भी कुछ शिष्य कह रहे थे।हमे आपके ऋण है ऐसे कहने के उपरांत शिष्य ने पूछा हम प्रचार आपके ऋण से कैसे मुक्त हो सकते है। क्या हो सकेंगे हम प्रभुपाद जी ऐसा कुछ माता ने कहा ।प्रभुपाद जी कहे नॉन केन बे फ्रॉम सच डेट ऐसे से मुक्त नहीं ही सकते कहे प्रभुपाद। कैसे मुक्त हो सकते है । थोड़े समय के उपरांत वन थिंग यू कैन डू। व्हाट क्या क्या? तो प्रभुपाद कहे यू डू एस ई डिड यह वचन प्रभुपाद के बहुत प्रसिद्ध हुए। यू डू एस ई डिड तुम वैसे ही करो। जैसे मै कर रहा था।शुरुआत की इस हरे कृष्ण आंदोलन की आई फाउंडर आचार्य थिस हरे कृष्णा मूवमेंट की जो मैंने शुरू किया।प्रचार प्रसार किया है। १०८ टेम्पल्स की स्थापना की हुई है तो यू डू एस ई डिड इसी कार्य को करो आगे बढ़ाओ मैने भी कुछ मंदिर बनवाए आप भी मंदिर बनाओ कहे प्रभुपाद , तो ऋण से कुछ मुक्त होंगे 

प्रभुपाद ने सारी दुनिया पर उपकार किया है । कृपा की है अपने ग्रंथों की रचना कर के ग्रन्थ दे के ,कैसे मुक्त हो सकते हैं?  ग्रन्थ को पढ़ो भी और साथ ही साथ इसका वितरण करो ई मेड सो मेनी डिस्ट्रीब्यूट प्रभुपाद कहे।

५००० शिष्य रहे सो य मेक मोरे ड्यूटी एंड  डिसाइपल ‘जय पताका महाराज,कहते कि प्रभुपाद ने किसी समय उनको कहा था यू मेक ५० डिसिपल तुम ५०० शिष्य बनाओ तो है पताका महाराज ने ६००० शिष्य बनाए उनके आदेश का पालन और यू डू एस ई डिड मैने कितने भक्त बनाए शिष्य बनाए तुम भी बनाओ प्रसाद वितरण करो। प्रभुपाद फूड फॉर लाइफ नामक कार्यक्रम शुरू किया मायापुर में प्रभुपाद ,ने कहा नॉन सोल्ड गो हंगरी इन रेडियस ऑफ और किलोमीटर कोई भूखा नहीं रहना चाहिए। तो प्रसाद वितरण करो तो हम उस ऋण से मुक्त होंगे। प्रभुपाद भी कई सारे नगर मे ग्रामों तक हरि नाम को पहुंचाए तो फिर प्रभुपाद ने एक नई योजना का सोचे फिर मुझे कहे पद यात्रा में जाओ।

बुलॉक कार्ट ट्रैवलिंग। हम बढ़िया से वैसे, ऐनी वे लॉन्ग स्टोरी… जर्मन बसेज के साथ प्रचार कर रहे थे ऑल ओवर नॉर्थ इंडिया। लेकिन जर्मन की बसेज का भी कारणे या वीज़ा होता है जो एक्सपायर हो रहा था तो बेसेज अब वापस जाएंगी जर्मनी और हम लोग जो प्रचार कर रहे थे इन बसों में , वी विल बी लेफ्ट विथ नो मॉड ऑफ ट्रांसपोर्टेशन, अब ये नहीं होगा हमारे पास। तो प्रभुपाद उस समय राधा अष्टमी के दिन, राधा पार्थसारथी मंदिर इन न्यू दिल्ली में मुझे कहे,”अब उतर जाओ, बस से उतर जाओ, गैट डाउन” क्योंकि बसों को फिर जर्मनी भेजना है। बुलॉक कार्ट,बैल गाड़ी से प्रचार करो”।  हरि बोल! फिर अब वहां-वहां तक भी हरिनाम पहुंच रहा था, जहां इस्कॉन की सिटीज़ में टेम्पल्स थे, वे वहां पहुंच नहीं पा रहे थे। लेकिन हम बैलगाड़ी के साथ,बुलॉक कार्ट के साथ अधिकतर गाँव में भी जा रहे थे और नगरों में भी । बढ़िया चल रहा था बुलॉक कार्ट के साथ प्रचार भारतवर्ष में।  प्रभुपाद,उनकी सोच बहुत बड़ी होती रहती है, प्रभुपाद वाज़ अ बिग थिंकर,कभी छोटा सोचते ही नहीं थे प्रभुपाद। ही वाज़ अ बिग थिंककर, बिग थिंकिंग।  फिर प्रभुपाद ने, एक बैल गाड़ी चल रही थी बुलॉक कार्ट पार्टी,तो प्रभुपाद ने फिर लिखा,” वी कुड हैव मिलियंस ऑफ सच कार्टस ऑल ओवर द वर्ल्ड”। हरि बोल ! एक कार्ट नहीं हम ऐसी लाखों- करोड़ों बैलगाड़ियां सारे संसारभर में घुमा सकते हैं ताकि हरिनाम का प्रचार हो। जब हम श्रील प्रभुपाद की जन्म शताब्दी मना रहे थे, जन्म शताब्दी समझते हो? हंड्रेड्थ बर्थ एनिवर्सरी। उस समय हमने प्रभुपाद की प्रसन्नता के लिए १०० देशों में पदयात्रा की। हरि बोल! वन हंड्रेड कंट्रीज़, बियोंड इमैजिनेशन..कितने नगरों में, कितने ग्रामों में,  एवरी डे, एवरी डे और ये पदयात्री अब कुछ तीन लाख किलोमीटर, इस्कॉन के पदयात्री पदयात्रा कर चुके हैं,थ्री हंड्रेड थाउजेंड किलोमीटर पदयात्रा। यू डू एज आई डिड , वैसे प्रभुपाद स्वयं भी पदयात्रा किये ही थे एक समय, जब प्रभुपाद झांसी में थे तो वहां अपने, ओनली वन डिसाइपल प्रभुपाद के थे प्रभाकर मिश्र करके। वहां के विश्वविद्यालय के एक संस्कृत के प्रोफेसर थे वो प्रभाकर मिश्र जो प्रभुपाद के शिष्य बने थे। एक ही शिष्य  थे प्रभुपाद के तो उन शिष्य को लेके प्रभुपाद पदयात्रा में गयें। तो..यू डू एज़ आई डिड, मैंने पदयात्रा की है तुम भी करो। सो लाइक दैट, हरि हरि..यू डू एज़ आई डिड। आप वैसे ही करो जैसे मैंने किया है। ऐसे करोगे तो ऋण कुछ हल्का-सा, कुछ तो मुक्ति होगी ऋण से मुक्त होंगे। आप को भी क्या लगता है? आप, हम सब आप सब ऋणी हो प्रभुपाद  या हो सकता है उनके शिष्यों के भी ऋणी हों? यस ओर नो? तो फिर क्या करना चाहिए? वैसा ही करो जैसे प्रभुपाद किये या फिर वैसे भी कर सकते हो जैसे जैसे प्रभुपाद के शिष्य कर रहे थे। अब हम धीरे-धीरे प्रस्थान करने वाले हैं, कईयों ने प्रस्थान किया हुआ भी है, हम आगे बढ़ रहे हैं। ये पूरे हरेकृष्ण आंदोलन की जिम्मेदारी हम आपके कंधे पर ,लीला पुरुषोत्तम प्रभु के कंधे पर, फिर वे उसमें से कुछ बोझ आपके कंधे पर रखेंगे। इस प्रकार ही कुड शोल्डर द बर्डन, शोल्डर द बर्डन – कुछ बोझ अपने कंधे पर उठाओ। डू नॉट बर्डन द शोल्डर। दो प्रकार हैं इसमें– शोल्डर द बर्डन, बर्डन द शोल्डर। कुछ बोझ उठाके अपने कंधे पर, दैट इज़ शोल्डरिंग द बर्डेन। आपकी जिम्मेदारी/आपकी ड्यूटी है/ आपकी सेवा है, आप नहीं करोगे तो और किसी के कंधे पर वो बोझ पड़ जाएगा, दैट इज़ बर्डनिंग द शोल्डर। आप क्या करने चाहोगे? शोल्डरिंग द बर्डन या बर्डनिंग द शोल्डर? शोल्डरिंग द बर्डन। यहां की जो सारी जिम्मेदारियां हैं,सेवाएं हैं वो सब थोड़ा बांट- बांटके बाँट लो, अपने कंधे पर कुछ उठाओ। सब मिलके, “संघे शक्ति, कलौ युगे” ,कलयुग में संगठित होने में शक्ति का प्रदर्शन होता है। संगठित, एक्य में,एकता में।

“यूनाइटेड वी स्टैंड” और फिर क्या कहते हैं?

“डिवाइडेड वी फॉल”। हरि हरि! बंडल ऑफ स्टिक,

 प्रभुपाद वो भी एक उदाहरण बताए थे। एक कुछ लकड़ी है/एक डंडी है तो उसको आसानीं से कोई तोड़ सकता है। लेकिन दो है तो और कठिन होगा;  तीन है तो और भी कठिन होगा; पर अगर पूरा बंडल हैं टुगेदर, जैसे ऑल द डिवोटिज़ आर बंडल्ड टुगेदर,तो उसको कोई तोड़ पाएगा? अपनी शक्ति का प्रदर्शन कहो,संगठन में / यूनिटी में है तो बी ऑर्गेनाइज्ड वी ऑर्गेनाइज ऑर्गेनाइजेशन। 

ऑर्गेनाइजेशन मैने कहा तो,अगेन प्रभुपाद के लास्ट डेज में प्रभुपाद एक दिन गिरिराज,नाम सुने हो? अभी तो गिरिराज महाराज है वो,जो एक समय में टेम्पल प्रेसिडेंट थे, जब मैं ज्वाइन किया बंबई में । वृंदावन में प्रभुपाद गिरिराज प्रभु, वे ब्रह्मचारी ही थे तो उनको बुलाया और प्रभुपाद ने पूछा, “हाऊ डू यू थिंक धिस मूवमेंट विल गो ऑन आफ्टर आई ऐम गॉन? मैं जब यहां नहीं रहूंगा आपके मध्य में, तो ये आंदोलन कैसे आगे बढ़ेगा? तो गिरिराज प्रभु बोले,” प्रभुपाद, वी विल चैन्ट हरे कृष्ण। प्रभुपाद वी विल फॉलो फोर रेगुलेटिव प्रिंसिपल्स, प्रभुपाद वी विल डिस्ट्रीब्यूट बुक्स ऑफकोर्स,कंटिन्यू द डीटी वरशिप”। ये उत्तर सुनके प्रभुपाद कुछ हल्के से संतुष्ट तो थे ही बट नॉट फुली सैटिस्फाइड,पूरे प्रसन्न नहीं थे। स्वयं प्रभुपाद ही थोड़ा रुकके कहे, “ऑर्गेनाइजेशन, इंटेलीजेंस” , इंटेलिजेंटली ऑर्गेनाइज्ड। ऑर्गेनाइजेशन नाम तो है,अंतरराष्ट्रीय श्रीकृष्ण भावनामृत संघ, तुम संगठित रहोगे,ऑर्गेनाइज्ड रहोगे ऑर्गेनाइज्ड,एवरी थिंग हैज़ टू बी ऑर्गेनाइज्ड।” सो दिमाग का उपयोग करते हुए..हरि हरि! पुट योर हेड्स टुगेदर ये भी प्रभुपाद कहे। प्रभुपाद ने कोई एक को अपना सक्सेसर नही बनाया। प्रभुपाद का फेथ वैसे संगठन में था। “टू हेड्स आर बैटर दैन वन” लाइक दैट ,पुट योर हैंड्स टुगेदर। प्रभुपाद ने गवर्निंग बॉडी कमीशन बनाया, विद सो मैनी हेड्स बट दे पुट देयर हेड्स एंड हार्ट्स आल्सो टुगेदर एंड मेक द प्लान फॉर प्रोपेगेशन… प्रैक्टिसेज ऐंड प्रोपेगेशन। हरि हरि!  ऐसा कुछ करो या कर रहे हो, देयर इज़ सो मच टू डू।” माइल्स टू गो बिफोर वी स्लीप,वुड्स आर लवली डार्क एंड डीप” । ऐसे एक वेस्टर्न पोयट ने कहा था-माइल्स टू गो बिफोर वी स्लीप,स्लीप मतलब जिस स्लीप से कोई पुन: जगता ही नहीं,ऐसी स्लीप मतलब डेथ । माइल्स टू गो मतलब बहुत कुछ करना है बिफोर डेथ, इट्स लॉन्ग वे टू गो, किंतु दुर्दैव से ऐसी व्यवस्था भी है। द वुड्स आर लवली डार्क एंड डीप – ये जो संसार है,वुड्स/कंक्रीट के जंगल हैं, देहरादून कंक्रीट जंगल। एक तो हिमालय का जंगल है,वन है।

“स्थावराणाम हिमालय:” लाइक धिस.. आपको हिमालय का सानिध्य है यहां। याद रखिए भगवान ने कहा है “स्थावराणाम हिमालयः”, जो भी स्थावर है उन स्थावरों में मैं हिमालय हूँ”। और “प्रभास्मि शशि सूर्यायो”  एनीवे जस्ट रिमेंबरिंग। हम कई बार पदयात्रा के साथ भी बद्रिकाश्रम गये हैं। हम लोग चढ़ रहे थे, एक प्रयाग से देवप्रयाग से उस प्रयाग। वहां वैसे तीन बातों का अधिक प्राकट्य या दर्शन  होता है। एक तो सर्वत्र देखते हैं तो क्या दिखता है? हिमालय दिखता है। तो भगवान कहे “स्थावराणाम,वो हिमालय मैं हूं” और जो ऊपर देखते हैं तो सूर्य दिखता है। “सूर्य भी मैं हूं” भगवान कहते है “प्रभास्मि शशि सूर्यायो”। सूर्य और चंद्रमा का प्रकाश मैं हूं तो ये प्रकाश भगवान हैं। हरि हरि! तीसरी बात है जब नीचे देखते है,तो गंगा का दर्शन होता है और सभी नदियों में गंगा नदी मैं हूं- भगवान कहते हैं। इस प्रकार इस क्षेत्र में हिमालय,सूर्य और गंगा का सानिध्य और बद्रिकाश्रम धाम की जय! “नारायण नारायण नारायण”- कहने वाले नारद मुनि का वैसे हैडक्वाटर भी बद्रिकाश्रम है। भारतवर्ष,हर वर्ष के पुरोहित/मेन प्रीचर/प्रीस्ट भी होते हैं तो भारतवर्ष के पुरोहित हैं नारद मुनि और उनका हैडक्वाटर यही हैं, उनके आराध्य देव वैसे बद्रीनारायण हैं और वे बद्रिकाश्रम में रहते हैं। उस धाम की भी सन्निधि/सानिध्य उत्तराखंड के सभी निवासियों को भी प्राप्त है। हरि हरि! 

उत्तराखण्ड या उत्तर प्रदेश का एक समय नाम था धर्मप्रदेश, धर्म का इतना प्रधान्य था और इस उत्तर प्रदेश/ धर्मप्रदेश नॉर्थ इंडिया में भी वैसे ही मंदिर हुआ करते थे जैसे कहां हैं? साउथ इंडिया में। दक्षिण भारत में आप कभी गये हो? एवरी टाउन एवरी विलेज हेज़ अ टेम्पल। छोटे नहीं मोटे-मोटे,बिग ह्यूज टेम्पल्स। वैसे मंदिर उत्तर भारत में भी हुआ करते थे। जस्ट धिज़ इनवेडर्स या आक्रमण होते रहे। कुछ १०००-१२०० वर्ष पूर्व ऐसे आक्रमण यवनों के प्रारंभ हुए। ह्यूज टेम्पल्स/बिग टेम्पल्स जैसे दक्षिण भारत में हुआ करते थे उनको ध्वंस किया, तोड़ा-फोड़ा इंक्लूडिंग नालंदा यूनिवर्सिटी।  कोई खिलजी था, खिलजी क्या? बख्तियार खिलजी, उससे सहा नहीं जाता था, देयर वाज़ सो मच हैट्रिड,उनको देखा नहीं जाता था,जलते थे तो उसने क्या किया? नालंदा यूनिवर्सिटी को आग लगाई। जो आग ४-५ महीने तक वो यूनिवर्सिटी वाज़ ऑन फायर। आप कल्पना कर सकते हो, एंड देयर वर स्टूडेंट्स फ्रॉम ऑल ओवर द वर्ल्ड, हाइयर एजुकेशन के लिए सारा संसार इंडिया/भारत में आया करता था फॉर हाइयर एजुकेशन। अभी लोग विदेश जा रहे हैं, कहते तो हैं हाइयर एजुकेशन लेकिन वो हाइयर एजुकेशन नहीं होता ,वो कैसा होता है? लोअर एजुकेशन। जिसने उस नालंदा यूनिवर्सिटी को जलाया, उसी का नाम दिया, बगल में एक रेलवे स्टेशन है,आप कल्पना भी नहीं कर सकोगे लेकिन दिस इज अ फैक्ट। उस रेलवे स्टेशन का नाम आज भी ईवन टुडे ,क्या है? बख्तियार खिलजी के नाम से और ऐसे नाम पर भारतभर में। एनीवे बाय सम गुड फॉर्च्यून ओर समथिंग ऑफ दैट सॉर्ट, इसमें कुछ विचारों की क्रांति और रिवॉल्यूशन होने जा रही है। पुनः रामलला आयेंगे।

“राम आयेंगे, राम आयेंगे” राम आ गए और मंदिर वहीं बनाया। मंदिर वहीं बनाएंगे जहां कुछ ढाई हज़ार वर्ष पूर्व विक्रमादित्य ने जो राम मंदिर बनाया था और उसको तोड़फोड़ के उसी स्थान पे जो बाबरी मस्जिद बनाई थी और फिर राम सेवकों ने उसको ध्वस्त किया तो सही किंतु रामलला तो एक झोपड़ी में रहते थे। उनके रहने के लिए स्थान नहीं था। वनवासी थे, वनवासी जैसा उनका हाल चल रहा था। इट टुक सम थर्टी-फोर्टी ईयर्स बाबरी मस्जिद तोड़ने के उपरांत,राम को पुनः अपना मंदिर ,वैभवपूर्ण मंदिर मिला। फाइनली रामलला की पुनः स्थापना हो गई। अयोध्या धाम की जय!

तो ऐसे लॉट्स ऑफ विचार और ये सारा इतिहास को रिवाइज किया जा रहा है,संस्कृत अध्ययन पर जोर दिया जा रहा है और गीता-भागवत के ग्रन्थ भी अब सरकार पढ़ा रही है, पढ़ाना प्रारंभ कर रहे हैं। और ऐसी सरकार…ये कोई इलेक्शन कैंपेन नहीं कर रहा हूं मैं। ये योगी मोदी एक प्रकार के वे राजर्षि हैं ऐसा कहेंगे तो उचित ही होगा। जो राजा ऋषि-मुनियों की सलाह के साथ अपना कारोबार चलाते हैं उनको राजर्षि कहते हैं। तो ये काफी सारे परिवर्तन लाये गये हैं और सोचके रखें हैं कि काफी सारे परिवर्तन होने वाले हैं। बी रेडी, बी प्रिपेयर्ड। कृष्णभावना के साधन, साधना और प्रचार-प्रसार के लिए एक अनुकूल,वेरी फेवरेबल वातावरण माहौल बन रहा है। व्हाट डु यू थिंक? ऐसा कुछ हो रहा है कि नहीं? हां? हरि बोल! टेक नोट ऑफ दिस। “अनुकूल्यस्य संकल्प” – व्हाटेवर इज़ फेवरेबल, एक्सेप्ट/स्वीकार करो, अनुकूल बातों का, योजनाओं का ,विचारधारा का। प्रेजेंट सरकार इस्कॉन का पूरा समर्थन करते हैं, कई प्रकार से उनका सपोर्ट रहा है ,कर रहे हैं। इट्स टाइम तो बिकम इंस्पायर्ड, प्रोत्साहित होने का समय है। आप तैयार हो? हरि बोल! ओके,धन्यवाद, हरे कृष्ण!