
गोकुळीच्या सुखा…गोकुळीच्या सुखा
वृंदावन धाम की जय! क्या हुआ? आपने जय कहा कि नहीं,
गोकुल धाम की जय!
कृष्ण का जन्म तो मथुरा में होता है, कृष्ण जन्मस्थान मथुरा धाम की जय! वहां से कृष्ण रातों-रात गोकुल पहुंचते हैं। वहां पहुंचते ही नेक्स्ट मॉर्निंग/प्रातः काल में श्रीकृष्ण जयंती महोत्सव संपन्न होता है , नवमी को। जन्म तो श्रीकृष्ण अष्टमी की मध्य रात्रि को हुआ था किंतु उत्सव नवमी के दिन और वह भी गोकुल में सम्पन्न होता है। वृंदावन, गोकुल की लीलाओं का भी हम संक्षिप्त संस्मरण करने वाले हैं, इसलिए भी –
“गोकुळीच्या सुखा…” तुकाराम महाराज की जय!
यह गीत/ अभंग तुकाराम महाराज द्वारा गाया जाता रहा है। हम उन्ही का गीत उनकी ही प्रसन्नता के लिए उनको समर्पित करते हैं,आप भी गाइए कि कैसे कैसे श्रीकृष्ण जन्माष्टमी उत्सव संपन्न हुआ। ये मराठी में है,आपकी आती है मराठी?
गोकुळीच्या सुखा…
स्क्रीन पर भी डिस्प्ले हो रहा है। ये कथा ऑडियो एंड विजुअल चल रही है। जो हम कहते हैं उसको ऑडियो कहिए,फिर उसको हम दर्शाते भी हैं। कल तो दो स्क्रीन थे आज चार हो गये आपकी सुविधा के लिए । यदि आपके सामने ही है तो सीधे देखिए प्रत्यक्ष देखिए,नहीं तो तिरछी नजर से थोड़ा देखते रहिए।
श्रवणम और फिर दर्शनम् भी, ऑडियो एंड विज़ुअल। आपकी अधिक इंद्रियां
“ऋषिकेण ऋषिकेश सेवनम भक्तिरुच्यते”
हमारी इंद्रियों का या वैसे सभी इन्द्रियों का भगवान, जो इन इंद्रियों के स्वामी हैं ऋषिकेश–ऋषिक+ईश, उनकी सेवा में लगाना है हमारी इंद्रियों को – ज्ञान इन्द्रियों को, कर्म इंद्रियों को, कर्ण इंद्रियों को, नेत्रों को दर्शन के लिए जिस इंद्रिय को हम उपयोग करते हैं। ओके,
“गोकुळीच्या सुखा, अंतपार नाही लेखा “ ।।१।। (गायन)
गोकुल वासी आनंद लूट रहे हैं और उस आनंद की कोई सीमा ही नहीं है अंतपार नाही लेखा। आपको भी कुछ हर्ष हो रहा है? कृष्ण जन्म के दिन या उस से संबंधित जो गीत हम गा रहे हैं जिसकी रचना तुकाराम महाराज की जय! ने की हुई है।
“बालकृष्ण नंदा घरी। आनंदल्या नरनारी ।।२।।
गोकुळीच्या सुखा।।
गुढीया तोरणे।। करिती कथा गाती गाणे।।३।।
तुका म्हणे छन्दे। येणे वेधिले गोविन्दे ।।४।।
गोकुळीच्या सुखा।।” (अभंग)
गोकुल धाम की जय!
कृष्ण कन्हैया लाल की जय!
“ऊठी ऊठी गोपाला, ऊठी ऊठी गोपाला।। (भजन)
नन्द के लाला, यशोदा दुलाल।।”
आप भी उठिए और गोपाल को भी जगाइए, प्रेम से जगाना होता है। यशोदा ही जानती हैं वैसे कि कैसे जगाना होता है? यशोदा का वात्सल्य प्रेम ही कन्हैयालाल को जगाता है। हम भी वैसा ही अभ्यास कर सकते हैं ताकि हम में भी कन्हैया के लिए प्रेम जगे।
“ऊठी ऊठी गोपाला…
ऊठी ऊठी गोपाला, अरुणोदय झाला”
कन्हैया कह सकते हैं क्यों जगा रही हो मैया? क्यों उठना चाहिए मुझे?
यशोदा मैया कहती है अरुणोदय/ सूर्योदय हो चुका है लाला, इसलिए उठो,
अरुणोदय झाला, अरुणोदय झाला,
ऊठी ऊठी गोपाला, अरुणोदय झाला।।
कृष्ण कन्हैया लाल की जय!
“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।”…..
(हरिनाम संकीर्तन)
“ॐ अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
श्री चैतन्यमनोऽभीष्टं स्थापितं येन भूतले।
स्वयं रूपः कदा मह्यं ददाति स्वपदान्तिकम।।”
“जयतां सुरतौ पंगोर् मम मंद-मतेर् गती
मत्सर्वस्व पदांभोजौ राधा-मदन-मोहनौ।।”
“दिव्यद-वृन्दारण्य-कल्प-द्रुमदः
श्रीमद्-रत्नगारा-सिंहासन-स्थौ
श्रीमद्-राधा-श्रील-गोविन्द-देवौ
प्रेष्ठालिभिः सेव्यमानौ स्मरामि।।”
“श्रीमान् रास-रसारम्भी वंशी-वट-तट स्थितः।
कर्षण वेणु-स्वने गोपी, गोपीनाथः श्रियं अस्तु नः ॥”
“वांछा कल्पतरुभ्यश्च कृपा-सिन्धुभ्य एव च।
पतितानां पावनेभ्यो वैष्णवेभ्यो नमो नमः।।”
“सुंदर ते ध्यान उभे विटेवरी। कर कटावरी ठेवूनियां ॥१॥
तुळसी हार गळां कासे पीतांबर। आवडे निरंतर हेंचि ध्यान ॥ध्रु.॥
मकरकुंडले तळपती श्रवणी। कंठी कौस्तुभमणि विराजित ॥२॥
तुका म्हणे माझे हेचि सर्व सुख।
पाहीन श्रीमुख आवडीनें।”
“आनंद लीलामय विग्रहाय हेमाव दिव्य छबि सुंदराय
तस्मै महा प्रेम रस प्रदाय चैतन्य चंद्राय नमो नमस्ते।।”
“आराध्यो भगवान् ब्रजेश तनय: तद्धाम वृन्दावनं
रम्य काचिद उपासना व्रज-वधु वर्गेण या कल्पिता
श्रीमद् भागवतम प्रमाणमलम प्रेम पुमार्थो महान
श्री चैतन्य महाप्रभोर मतम इदं तत्र आदरो न: पर:।।”
“श्रीकृष्ण चैतन्य प्रभु नित्यानंद
श्रीअद्वैत गदाधर श्रीवास आदि गौर भक्तवृंद”
“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे”।।
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय!”
“श्रीमद् भागवत कथा की जय!”
((उद्धव प्रभु द्वारा सभी अतिथियों का स्वागत))
हे नाथ नारायण वासुदेव!
“कृष्णाय वासुदेवाय देवकी नन्दनाय च
नंदगोप कुमाराय गोविंदाय नमो नमः “
हरि हरि! मैं आप सभी कथा प्रेमियों का…और कथा प्रेमी का मतलब ही होता है कृष्ण प्रेमी, तो मैं सबका स्वागत करता हूं। आपकी उपस्थिति के लिए मैं आपका आभारी भी हूं और आप सबका मैं अभिनंदन करता हूं। यह कथा कुछ विलंब से ही प्रारंभ हो रही है आज और बहुत सारी कथा आपको सुनानी भी थी और सुनानी है भी। कथा को वृंदावन से प्रारंभ करते हुए फिर मथुरा की कथा से हमें द्वारका तक पहुंचना है।
वृंदावन धाम की जय! मथुरा धाम की जय!
द्वारका धाम की जय!
वैसे यह तीनों धामों में ही भगवान की लीलाएं संपन्न हुई है। जब तक वृंदावन में थे तो वृंदावन में ही रहे, वृंदावन से कहीं आते-जाते नहीं वृंदावन के कृष्ण, “एकम पदम न गच्छती” वृंदावन के कृष्ण एक पग भी वृंदावन के बाहर नहीं रखते किन्तु जब वे मथुरा जाते हैं तो वहां से उनका थोड़ा आना-जाना होता है। उज्जैन जाते हैं, अवंतिपुर जिसका नाम भागवत में कहा है। हस्तिनापुर जाते हैं और पुनः लौटते हैं। फिर वे द्वारका पहुंचते हैं जहां भगवान ने अधिक समय बिताया है, अधिकतर समय। वृंदावन में तो भगवान 11 वर्षों तक रहे, मथुरा में 18 वर्ष तक, 11 और 18 आप कोई वर्कआउट कीजिए। बचे हुए 125 वर्षों में, 20 या 17, 18 एंड 11 के अलावा, बाकी सब समय भगवान द्वारका में रहे हैं। हरि हरि!
द्वारका में इतना सारा समय भगवान ने बताया जो द्वारका गुजरात में है और वैसे है भी नहीं। यह धाम किसी देश में है, किसी राज्य में है, ऐसा कहना/ऐसी समझ ये अपराध है क्योंकि यह अज्ञान भी है। क्योंकि ये सारे धाम, उनका अपना ही स्थान है। वे इस जगत में होते हुए भी इस जगत में नहीं है। इन धामों का वैसे यह संसार/ यह सृष्टि के उत्पत्ति/स्थिति और प्रलय से कोई संबंध नहीं है। उत्पत्ति के पहले भी यह सारे धाम थे और प्रलय के उपरांत भी सारे धाम बने रहेंगे, इसलिए भी इन धामों को सनातन धाम भी कहते हैं। ये धाम सनातन है कहा तो ये धाम नित्य भी है यह समझना होगा। क्योंकि यहां भगवान की लीलाएं संपन्न होती ही रहती है सदा के लिए या नित्य लीला। लीला के भी दो प्रकार है कहिए – एक को कहते प्रकट लीला, भगवान समय-समय पर प्रकट होते हैं।
“संभवमी युगे युगे”
श्रीरामचंद्र भगवान की जय!
वे भी प्रकट हुए और जय श्री राम!
“दश सहस्त्र दश शतानी च” दस सहस्त्र मतलब 10,000 और दस शतानी मतलब 1,000 साल। तो दस हजार और एक हजार हुए 11,000 मतलब 11,000 वर्षों तक श्रीराम अपनी प्रगट लीला का दर्शन करा रहे थे, इसको प्रकट लीला कहते हैं,ये त्रेता युग की बात है। फिर द्वापर युग में कृष्ण प्रकट होते हैं और वह 125 वर्षों तक अपनी लीला खेलते हैं, प्रकट लीला और फिर अंतर्ध्यान होते हैं; राम भी 11,000 वर्षों के बाद अंतर्ध्यान होते हैं। फिर कलयुग के प्रारंभ में श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु की जय! रामचंद्र, फिर कृष्णचंद्र, फिर श्रीचैतन्य चंद्र प्रकट होते हैं और वे 48 वर्षों तक अपनी लीला का प्रदर्शन करते हैं, फिर वे अंतर्ध्यान होते हैं। अंतर्धान होने के उपरांत उन्हीं धामों में फिर वो अयोध्या है या वृंदावन, मथुरा,द्वारका या पंढरपुर धाम की जय! श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु मायापुर नवद्वीप में प्रकट हुए, फिर जगन्नाथ पुरी धाम में भी उनकी लीलाएं संपन्न हुई। ये 11,000 वर्ष, 125 वर्ष, 48 वर्ष, इतने वर्षों तक उनकी प्रकट लीला थी,किंतु उन्हीं धामों में, उन्हीं अवतारों में भगवान राम/कृष्ण/ चैतन्य/ और भी अवतार ऑफ कोर्स…
“नाना अवतारम अकरोद भुवनेशु किंतु” तो अवतार लेने के पहले भी भगवान की लीला उन्हीं धामों में प्रकट होती रहती है और फिर अंतर्ध्यान होने के उपरान्त भी लीला जारी रहती है, उस लीला को नित्य लीला कहते हैं। नित्य लीला और फिर नैमित्तिक लीला, प्रासंगिक लीला कोई कारण बनता है तो भगवान प्रगट होते हैं और फिर अंतर्ध्यान होते हैं। लेकिन वे वैसे कहीं आते-जाते नहीं,ऐसी एक समझ तो है। वैसे ये धाम चाहे वृंदावन है या द्वारका है या अयोध्या है या वैकुंठ है ,ये व्योम/ स्पिरिचुअल स्काई/ आध्यात्मिक जगत जिसको कहा है, वहां पर ये सारे धाम है ही और फिर इस संसार में भी उसी का एक्सटेंशन काउंटर जैसे ये धाम है,
“गोलोंकेर वैभव लीला प्रकाश करीला”
गोलोक की लीलाऐं, वृंदावन धाम,
“परस तस्मात् तु भाव अन्य व्यक्तों व्यक्ता सनातनः “
कृष्ण ने गीता में कहा, यह संसार/यह सृष्टि तो कभी व्यक्त होती है कभी अव्यक्त होती है। सृष्टि होती है इस संसार की फिर प्रलय होता है। किंतु सृष्टि और प्रलय, ये व्यक्त और अव्यक्त के परे ही है भगवत धाम या वो धाम है ऊपर वाला या इस ब्रह्मांड में जो धाम है। हरि हरि! हम सभी भी भगवान के हैं,
“ममैवांशो जीवलोके जीवभूत सनातन:”
कृष्णा ने कहा है,अर्जुन से कहा है, मतलब हम सभी से उन्होंने कहा है, यह संसार के जितने भी जीव है, मम एव अंशः, हम भगवान के ही अंश है, हम भगवान के ही है और हम भगवान के साथ ही एक समय थे। किंतु हमसे बहुत भारी भूल हुई, भूल-चूक हो गया और हम विमुख हो गए। एक समय हम सम्मुख थे, भगवान के साथ थे/ सामने थे/ आमने-सामने हुआ करते थे। किंतु सम्मुख से हम विमुख हो गए हैं और विमुख होते ही हमें इस संसार में/ ब्रह्मांड में, जिसको कारागार की तुलना भी दी गई है, इस कारागार में हमको भर्ती किया जाता है। कारागार में कैदी के पहुंचते ही उसको वहां की वर्दी पहना दी जाती है। वर्दी याने वहां का वस्त्र/यूनिफॉर्म। इस कारागार में 84 लाख प्रकार की वर्दियां है जिसको योनि हम कहते हैं और फिर एक वर्दी के बाद,दूसरी वर्दी..।
“वासांसि जीर्णानि यथाविहाय”
कृष्ण ने कहा वासांसि जीर्णानि मतलब वस्त्र जो पुराने होते हैं, फटे-पुराने या एक्सीडेंट या कुछ समथिंग कुछ होता है तो हम उसको त्यागते हैं और नवाणी नए वस्त्र धारण करते हैं। बद्धजीव वैसे संसार में पहुंचे हुए या पहुंचाए गए हुए, उनको अलग-अलग वस्त्र पहनाए जाते हैं और जब वह अलग-अलग वस्त्र पहनता है जीव, तो वो सोचता है मैं यह हूं मैं वह हूं, आई एम अ कैट, आई एम ए डॉग, हरि हरि! हम तो उसमें से कुछ भी नहीं होते, हम तो जीव सदा के लिए जीवात्मा ही रहते हैं और वैसे उस जीव का अपना रूप है/ स्वरूप है।
“अन्यथा रूपम् स्वरुपेण व्यवस्थिति:”
हमें पुनः अपने स्वरूप में आ जाना है या अपने स्वरूप का हमें अनुभव या साक्षात्कार करना जिसको आत्म-साक्षात्कार या सेल्फ रियलाइजेशन कहते हैं और उसी के साथ ऑफ कोर्स हम,
“माया मुग्धेर जीवे नही स्वतः कृष्ण ज्ञान
जीवेर कैला कृष्ण वेद पुराण”
जैसे हम इस संसार में आते हैं तो मोह-माया-ममता हमको भुला देती है। हम असलियत में है कौन? हम भगवान के हैं और हमारा स्वरूप है ,हमारा धर्म है। इन बातों को हम भूल जाते हैं तो फिर काइंडली कृष्ण, कृपा करके
“परित्राणाय साधुनाम विनाशाय च दुष्कृताम
धर्म संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे”
कारागार में जिन कैदियों को भर्ती किया जाता है तो उनके रिफॉर्म के लिए,उनके सुधार के लिए जैसे सरकार की प्रिज़न मिनिस्ट्री भी होती है,उसके मिनिस्टर कई सारे सुधार के प्रयास करते रहते हैं, हाउ टू रिफॉर्म्? कैदियों का कैसे सुधार हो सकता है? वे कैसे नॉर्मल चरित्रवान नागरिक बन सकते हैं? इसके लिए सरकार के प्रयास चलते रहते हैं, सरकार तो चाहती हैं कि ये सारे नागरिक स्वतंत्र हो, सज्जन हो और औरों के साथ विचरण करें/ रहें, अपना जीवन यापन करें। वैसे ही ऑफ कोर्स इन थिस केस, कृष्ण अपने कई सारे अवतारों में हम जीवों को मिलने के लिए कहो/ हमको संबोधित करने के लिए कहो/ हमको सुधारने के लिए कहो, आ जाते हैं। राम आते हैं,
“रामादि मूर्तिशु कला नियमेंन तिष्ठन्
नाना अवतारमकरोद भुवनेशु किंतु”
राम,नर्सिंग, वराह इत्यादि श्रीमद् भागवत में कई सारे या दस दशावतार, फिर दत्तात्रेय भगवान की जय! वह भी अवतार लेते हैं आज के दिन उनका अवतार का दिन है और इन सबके प्रयास होते हैं, हमको सुधारने के प्रयास होते है और ये सब हमको सुधार कर पुनः ,
“आमि ज़ातो आमचा गावां आमचा राम राम घ्यावा” तुकाराम महाराज की जय!
जैसे तुकाराम महाराज गए भगवत धाम, भगवान उनको लेकर गए, विमान भेजा। हमको कोई अलग से व्यवस्था नहीं करनी पड़ती है, भगवान सारे अरेंजमेंट करते हैं। “न हाथी है ना घोड़ा है, और कैसे जाना है?वहां पैदल ही जाना है, ऐसा भी कहा गया है। किंतु क्या करो? “सजन रे झूठ मत बोलो” तो भगवान की कृपा से या भगवान की अहैतुकी कृपा से,मतलब न जाने क्यों भगवान हम पर कृपा कर रहे हैं? ऐसा ही कहना होगा। यह भागवत कथा का भी जो आयोजन यहां हुआ है वह भी भगवत कृपा से ही होता है, हुआ है और हम सभी को भगवान उनके संपर्क में ला रहे हैं कहो, उनके संपर्क में ला रहे हैं। इस भागवत कथा में फिर हमारा संपर्क या संबंध भगवान के नाम के साथ,भगवान के रूप के साथ,भगवान के गुणों के साथ, भगवान की लीला के साथ, भगवान के धामों के साथ, भगवान के अनन्य शुद्ध भक्तों के संपर्क में भगवान हमको ला रहे हैं। इस भागवत कथा के माध्यम से भी हमें सुना रहे हैं भगवान अपनी कथा।
“नष्टः प्रायेषु अभद्रेषु नित्यम भागवत सेवया
भगवती उत्तम श्लोके भक्तिर्भवति नैष्ठिकी”
भागवत में सूत गोस्वामी कहते हैं, नष्टः प्रायेषु अभद्रेषु, जब हम भागवत कथा का श्रवण करते हैं तो, और वैसे भी भागवत श्रवण को कहा है, “पुण्य श्रवण कीर्तन;” यह बहुत बड़ी पुण्यायी को हम कमाते हैं, हम पुण्य आत्मा बनते हैं जब हम भागवत कथा का श्रवण करते हैं।
“हृदयन तस्तो ही अभद्राणी विधुनोति सुहृत सताम् “
और हमारे हृदय प्रांगण में जो मल है, धूल है, कामवासना है, काम है/ क्रोध है/ लोभ है/ मद है/ मोह है/ मात्सर्य है, यह सारा प्रदूषण जो है, इसको हटाती है/ मिटाती है भागवत कथा। हृदय में जहां-जहां ये मल है, कलंक है, दाग है वहां-वहां कथा के रूप में भगवान पहुंचते हैं, उसको साफ बनाते हैं, वहां के अंधेरे को मिटाते हैं।
“कृष्ण सूर्यसम माया है अंधकार”
कृष्ण अपने नाम रूप गुण लीला के रूप में, हमारे हृदय में प्रवेश करते हैं और हमारे अंतःकरण में भावना में/ विचारों में जहां-जहां गंदगी है/ मल है/ प्रदूषण है उसको नष्ट करती है यह कथा, नाम या धाम की कथा कहो या संतो के चरित्र की कथा कहो और हम भी चरित्रवान बनते हैं। ये भागवत में सूत गोस्वामी कह रहे हैं,
“नित्यं भागवत सेवया भगवती उत्तम श्लोके भक्तिर्भवति नैष्ठिकी”
भागवत श्रवण से हम धीरे-धीरे, पुनः पुनः हम भक्त बन जाते हैं। पहले तो थे भगवत धाम में जब भगवान के साथ लेकिन हम भक्त के फिर अभक्त हुए। हम योगी थे तो यहां आके हम भोगी बन गए,फिर रोगी भी बन गए। यह भागवत कथा हमको भक्ति देती है, भक्ति को जगाती है यह भागवत कथा। “सदा सेव्या सदा सेव्या” इसलिए कहा है पुनः पुनः भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए। हरि हरि! इसी श्रवण से ही हम जीवों की जो भगवान के प्रति भक्ति है, जो अभी आच्छादित है, ढकी हुई है,वो पुनः प्रकट होती है। हरि हरि! तो यह उद्देश्य है इस कथा श्रवण के पीछे का,
“नित्य सिद्ध कृष्ण प्रेम साध्य कभु नोए
श्रवणादि शुद्ध चित्ते करहु उदय “
जीव का भगवान से प्रेम है लेकिन वह ढका हुआ है काम से लेकिन इस श्रवण से पुनः प्रेम जागृत होगा और भगवान से प्रेम करना प्रारंभ करेंगे। “आई लव यू कृष्ण” फिर हम इस संसार का जो “आई लव यू” है जो चलता रहता है जो लव नहीं होता है वैसे। लव दिव्य होता है, अलौकिक होता है। राधा कृष्ण के मध्य का जो लव है
“राधा कृष्ण प्रणय विकृति आल्हादिनी शक्ति अस्मात्’
राधा कृष्ण का जो व्यवहार है, लेनदेन है वो प्रेमपूर्ण है, दैट इज़ लव वह दिव्य है, उसको प्रेम कहते हैं। यह संसार में तो उसकी छाया है या प्रतिबिंब है, रिफ्लेक्शन है। वो प्रेम की बिल्कुल उल्टी बात है, उस उल्टी को सुलटा करना है हमको और काम करने की बजाय प्रेम करना है। जब कथा में आ जाइए,कहता में आइए कहते तो लोग कहते,”मैं काम में हूं,काम में हूं”। काम में हूं मतलब कामवासना हम को प्रेरित करती है, कामवश हमको धकेल रही है, काम में फंसा रही है, इसलिए कहते हैं कि काम में हूं,काम में हूं।
हरि हरि! हम तो कथा में आइए मतलब प्रेम सीखिए, कृष्ण से प्रेम कीजिए, यह कहने के लिए या यह करने के लिए हम बुलाते हैं,या केशव प्रभु तथा और सभी बुलाते हैं ताकि हम पुनः कृष्ण प्रेमी बन जाए इस संसार में,
“त्यक्तवा देहं पुनर्जन्म नैति मामेंति सो अर्जुनः “
हे अर्जुन फिर हमको इस संसार में,
“पुनरपि जननम पुनरपि मरणं
पुनरपि जननी जठरे शयनम्
इह संसारे खलु दुस्तारे कृपया पाहि पारे मुरारे”
शंकराचार्य ये प्रार्थना कर रहे हैं या प्रार्थना करके दिखा रहे हैं सिखा रहे हैं हम सबको कि कैसे प्रार्थना करना चाहिए? पुनरपि जननं…. हे मुरारी! बचाओ! हेल्प हेल्प हेल्प!
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे,
आप हाथ ऊपर क्यों करते हो? हेल्प हेल्प हेल्प! बचाओ बचाओ! क्योंकि भगवान भी कहीं ऊपर है, ऊपर वाला ऊपर है तो उनको ओर ये संकेत है कि,” बचाओ बचाओ बचाओ बचाओ! हम आपकी शरण में आ रहे हैं।”
एक आर्मी की डिफीट/ पराजय होती है तो उस आर्मी के आर्मी मैन अपनी गन/बंदूक ऐसे उठाते हैं और चलते हैं, मतलब वी आर सरेंडर्ड टू यू। आप हमें निशान नहीं बनाओ, हम शरण में आ रहे हैं। हरि हरि! मैंने वैसे कहा की हम कथा थोड़ी प्रारंभ से शुरू कर रहे हैं और फिर यह कहते-कहते मैंने और भी देरी कर ही दी। हरी हरी! कृष्ण की वृंदावन लीलायें,आप देख रहे हो? देखने की चीज भी है यहां पर,ये जो स्क्रीन्स है,दे आर ऑन राईट? वृंदावन में कृष्ण के वात्सल्य रस भरी लीलाएं गोकुल में संपन्न होती है! वात्सल्य रस, वत्स मतलब बछड़ा। जैसे गाय का बछड़े से प्रेम होता है उसको ही वात्सल्य प्रेम कहते हैं। तो नंद बाबा यशोदा का ही नहीं वैसे वृंदावन के सभी बुजुर्ग बृजवासी, नर नारियां है उनका कृष्ण से जो प्रेम है, उसे प्रेम का नाम है वात्सल्य प्रेम या वात्सल्य रस।
कृष्ण और सुदामा से इतने प्रसन्न थे गुरु महाराज संदीपनी मुनि और जब गुरु प्रसन्न होते हैं तो फिर भगवान भी प्रसन्न होते हैं,
“यस्या प्रसादाद भगवद प्रसादो”।
ऐसी लीला कृष्ण-बलराम खेल रहे हैं। उनको क्या पढ़ना है? क्या सीखना है?
“वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो ,वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्”
उन्होंने गीता में कहा, ”वेद,यह मेरी रचना है,वेद मैं जानता हूं, वेद मुझे जानने के लिए है” । ऐसे वेद के रचयिता, वेदज्ञ और वेद के अध्ययन से जिनको हमें समझना है, उनका साक्षात्कार करना है, वे कृष्ण यहां वेद-अध्ययन इत्यादि के लिए पहुंचे हैं। इस प्रकार का आदर्श रख रहे हैं हम सभी के समक्ष कि हमें अपने पुत्रों को गुरुकुल में भेजना है। गुरुकुल, गुरुज़.. हरि हरि! एक समय हर स्कूल गुरुकुल स्कूल हुआ करता था, हर स्कूल गुरुकुल स्कूल, हरि हरि! जब मैं छोटा था पढ़ाई करता था तो जो टीचर थे हम उनको गुरुजी कहते तो सही। हम उनको गुरुजी कहते और फिर..गुरु जी कहते, “ए रघु! कभी रघु तो कभी ए रघया इकड़िये” ऐसा करके हमको बुलाते और कहते बीड़ी लेकर आओ। या फिर पूछते किसके घर में मुर्गी है? मुझे अंडे लाके दो…(मराठी…) हम उनको गुरुजी-गुरुजी कहते और गुरुजी हमको, बीड़ी लेकर आओ। हरि हरि! तो यह केवल नाम मात्र के गुरु रहे, दिस इज़ द एज ऑफ कली। हरि!
सुदामा को हम द्वारका लीला में मिलने वाले हैं। इसी मथुरा लीला के अंत में और भी कई सारी लीलाएं मथुरा में थी, 17वर्ष- 18 वर्ष रहे मथुरा में। वैसे भगवान की हर हरकत कहिए ,एवरी मूवमेंट लीला ही होती है, प्रतिक्षण-अनुक्षण भगवान की लीला होती ही रहती है। हम कल्पना भी नहीं कर सकते कितनी सारी लीलाएं, लीला का सागर…। मथुरा में भगवान का जो वास्तव्य रहा,उसके अंत में अब पहुंच रहे या कहो ओके होता ये था, यह कहकर वैसे हर वर्ष की बात भी हो सकती है। एक बात ने भगवान को, कृष्ण और बलराम को बिजी रखा 17 वर्षों तक और वह यह था कि जैसे ही कृष्ण पढ़ाई करके लौटते हैं अवंतिपुर या उज्जैन से तो जरासंध आता है। कंस का जब वध होता है तो कंस की दो पत्नियां थीं, अस्ति और प्राप्ति। अस्ति और प्राप्ति नाम की दो पत्नियां थीं और वे जरासंध की पुत्रियां थी। कंस के वध के उपरांत ये रोती हुई पिताश्री के पास पहुंच जाती है, जरासंध के पास पहुंच जाती है और फिर जरासंध ने यह समाचार जब सुना तो,’अब मैं इसका बदला लूंगा, आई विल किल कृष्ण और बलराम”। तो इस उद्देश्य से वह हर वर्ष बहुत बड़ी सेना लेकर मगध देश से आता रहा, कितनी सेना? २३ अक्षोहिणि डिवीजन सेना लेके वो आया करता था। फिर कृष्ण क्या करते थे? कृष्ण और बलराम सारी सेना की जान लेते, उनकी हत्या होती, उनको यमपुरी भेजते, केवल जरासंध को बचाते। जरासंध जब देखता, आई एम द ओनली वन, मैं तो अकेला रह गया, तो फिर वह पुनः अपनी कैपिटल जाकर अपने इष्ट मित्रों से एस.एम.एस या व्हाटेवर मिन्स ऑफ कम्युनिकेशन से संपर्क करके पुनः 23 अक्षोहिणि डिवीजन सेना लेकर वह वहां पहुंचता और पुनः कृष्ण केवल उसी को बचाते, पूरी सेना का वध होता। थर्ड टाइम,फोर्थ टाइम, इस प्रकार ये चल रहा था,सत्रह बार हुआ। क्विकली आप अगर नोट कर सकते हो, कुरुक्षेत्र के मैदान में केवल एक ही बार १८ अक्षोहिणि डिवीजन सेना आई थी,
“धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सव: ।
मामका: पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय” ॥
महाभारत के युद्ध में केवल १८ अक्षौहिणी डिवीजन सेना एक ही बार आई और युद्ध हुआ महायुद्ध/जागतिक युद्ध, लेकिन मथुरा में जो युद्ध हुआ वो १७ बार युद्ध हुआ और हर समय २३ अक्षौहिणी डिवीजन सेना लेकर जरासंध पहुंच जाता था और ये जो भी, कृष्ण-बलराम के साथ लड़ने के लिए और कृष्ण-बलराम की हत्या करने के उद्देश्य से आने वाले जरासंध एंड कंपनी, चांडाल चौकड़ी,ये सब असुर मंडली ही तो होगी। कृष्ण का प्राकट्य का क्या कारण है?
“परित्राणाय साधूनां और विनाशय च दुष्कृताम”
तो भगवान का जो विनाशाय च दुष्कृताम, दुष्टों का संहार करने में जरासंध ने भगवान के साथ बड़ा योगदान दिया हुआ है। नहीं तो इन सारे असुरों का वध करने के लिए भगवान को डोर- टू-डोर, घर-घर हर नगर, हर ग्राम जाना पड़ता। वो थोड़ा रिटेल बिजनेस हो जाता। रिटेल याने एक-एक को, एक-एक के साथ डील करो। लेकिन यह जरासंध क्या करता था सारे असुरों को लेकर, ओके चलो और फिर कृष्ण “विनाशय च दुष्कृताम”, दुष्टों का संहार करते , होलसेल किलिंग, होलसेल बिजनेस,नो रिटेल। एनीवे हम थोड़ी देर में अपनी लीला को, लीला-कथन को विराम देते हैं थोड़ा इतना सोचा था। हरि हरि! तो अब अठारहवीं बार जरासंध आने ही वाला था कृष्ण जानते थे। हो सकता है उसका कोई सीजन होता होगा, यह महीना जरूर आएगा तो उसका रूटीन चल रहा था। तो जरासंध भी आने वाला था और इसी समय कालयवन नाम का एक असुर भी वहां पहुंच जाता है। हरि हरि! और वह बहुत बड़ी सेना लेकर आया है। तो कृष्ण-बलराम सोचते हैं,” दिस इस ऐन एमरजैंसी सिचुएशन, हमारे यादवों का क्या होगा?” तो कृष्ण बलराम क्या करते हैं? अपने सारे यदुवंशियों को या मथुरा वासियों को कहो, द्वारका पहुंचाते हैं और उनको पहुंचाने के पहले द्वारका में उनके निवासोंं की व्यवस्था करते हैं। उसके लिए समुद्र से जमीन उधार भी लेते हैं। जब तक कृष्ण बलराम रहेंगे द्वारका में तब तक ही वह जमीन का उपयोग कर सकते थे। जैसे ही लीला उनकी पूरी होगी और वहां वे नहीं रहेंगे, अपने धाम लौटेंगे तो पुनः जमीन समुद्र वापस लेने वाला है, लेने वाला था। तो इतने समय के लिए उधार ली हुई थी। उस लैंड पर कृष्ण-बलराम ने रातों-रात विश्वकर्मा की मदद से रहने की व्यवस्था की। कृष्ण बलराम लौटते हैं मथुरा तब कालयवन आता है,वैसे वो नारद मुनि के पास आता है, नारायण नारायण! और यह कालयवन कहता है, ए.. वैसे मानो वह नारद की हत्या करना चाहता था, वैसे उसका यह निवेदन था कि,” हे नारद जी! हमें ऐसे राजा या व्यक्ति का परिचय दो जो नामी हो/नामवंत हो, विख्यात हो और मैं उनका वध करूंगा। इसी के साथ मेरा नाम होगा सारे संसार में। तो कौन है वह व्यक्ति?” तो नारद मुनि बोले ओ आई नो, आई नो। ऐसे व्यक्ति तो कृष्ण ही है। तो कहां है वे ? कैसे दिखते हैं? तो नारद मुनि ने सब बता दिया, आई डी दे दी। तो यह कालयवन भागे- दौड़े मथुरा में पहुंचता है। उसी समय कृष्ण अपने भवन से निकल कर कहीं जा रहे थे तो कालयवन ने कृष्ण को देखा। “वसुदेवो ही यम इति”, तो कृष्ण को देखकर बोलता है, “ए.. नारद मुनि ने जैसे वर्णन किया था कृष्ण का, यही तो हो सकते हैं ,यही तो हो सकते हैं।”
“चतुर्भुजौ अरविंदाक्षौ वनमालय अति सुंदर:”
चतुर्भुज है ,अरविंदाक्ष, पदमलोचनी, वनमाला और परम सुंदर सौंदर्य है, तो यही तो होने चाहिए। लेकिन इसने देखा कृष्ण के पास हाथ में कोई हथियार नहीं है। ये मानो बड़ा सज्जन बनके या जैसे धर्म युद्ध में शत्रु के पास कोई हथियार नहीं हो तो फिर हथियार के साथ उनके साथ युद्ध नहीं करना होता है। तो उस नियम का पालन भी कालयवन कर रहा है। उसके हाथ में जो हथियार था वो उसने फेंक दिया और कृष्ण का पीछा करने लगा क्योंकि उसको कृष्ण का वध करना है। कृष्ण जा रहे हैं और यह कल्यावन पीछे-पीछे आता रहा और कृष्ण उतने ही दूर रहते रहे। जैसे हो वह सोचता कि अभी मैं पकड़ने ही वाला हूं, लेकिन कृष्ण पकड़ में ही नहीं आते। कृष्ण तो आगे बढ़ते रहे और फाइनली कृष्ण एक गुफा में प्रवेश करते हैं । तो कृष्ण ने तो प्रवेश किया अंधेरी गुफा में और कालयवन भी पीछे से घुसा उस गुफा में लेकिन उसने अनुभव किया,यहां कोई व्यक्ति लेटा हुआ है क्या? उस गुफा में मुचकुंद महाराज लेटे हुए थे। उन्होंने देवताओं की युद्ध में बहुत बड़ी सहायता की हुई थी, देवताओं के पक्ष में वे लड़े थे। मुचकुंद महाराज ने कहा कि मुझे ऐसा आशीर्वाद दो ताकि मैं विश्राम कर सकूं,आई नीड ए गुड लॉन्ग रेस्ट। ओके! देवताओं ने ऐसा ही वरदान दिया कि,” हे मुचकुंद महाराज! आपकी निद्रा पूरी नहीं हुई हो और बीच में यदि आपको आकर कोई जगाता है, आपकी निद्रा को भंग करता है तो तुम्हारी आंखों से अग्नि उत्पन्न होगी और वह व्यक्ति राख बनेगा, जल जाएगा। तो वही अभी होने वाला है और हुआ भी, कालयवन ने जैसे ही गुफा में प्रवेश किया तो वहां मुचकुंद महाराज विश्राम कर रहे थे तो उनकी नींद खुल गई और इसी के साथ मुचकुंद महाराज द्वारा (स्क्रीन पर आप देख रहे हो कि) उसकी राख हो गई। हरि हरि! फिर मुचकुंद महाराज और कृष्ण का मिलन-संवाद होता है। मुचकुंद महाराज प्रार्थना भी करते हैं, सुंदर प्रार्थनाएं भागवत में प्राप्त है और भगवान उनको एक विशेष वरदान देते हैं ,”तुम्हारे भविष्य के जीवन में या भविष्य में, मैं तुम्हें दर्शन दूंगा”। तो यही मुचकुन्द पंढरपुर के पुंडलिक बने जो माता-पिता की सेवा में थे। ये लीला हम कहने वाले हैं।
कृष्ण द्वारका से वहां पहुंच जाते हैं, पहले रुक्मिणी को मिलते हैं और फिर मिलने जाते हैं पुंडलिक को l तो ऐसा उन्होंने वरदान दिया था पुंडलिक को जब वह मुचकुंद महाराज थे। हरि हरि! मुचकुंद को ऐसे वरदान देने के उपरांत अब कृष्ण और बलराम के पास आ जाता है जरासंध ,आ गया जरासंध आ गया, सेना लेकर आया है। यह समय कृष्ण, दिस इज़ ए रूटीन बिजनेस, हम हर साल तो युद्ध खेल ही रहे हैं, तो कृष्ण-बलराम ने इस समय युद्ध खेलने में कोई रुचि नहीं दिखाई और साथ ही साथ कृष्ण जानते थे कि कुण्डिनपुर महाराष्ट्र में रुक्मिणी मेरी प्रतीक्षा में है। मेरा विवाह उनके साथ होना है, इस उद्देश्य से भी कृष्ण और बलराम मथुरा से प्रस्थान करते हैं। यह देखकर जरासंध कहने लगा,” रणछोड़! रणछोड़! डरपोक कहीं का या डरपोक कहीं के कृष्ण और बलराम”। कृष्ण-बलराम ने ध्यान नहीं दिया और वे आगे बढ़े और जरासंध सेना लेकर पीछा कर रहा है। कृष्ण और बलराम एक पर्वत पर चढ़े वहां काफी जंगल था। जरासंध वहां जाकर खोजने का प्रयास करता है ,कृष्ण और बलराम वहां नहीं मिलते हैं। “आग लगाओ!” तो सारे पहाड़ को आग लगाई जाती है। कृष्ण और बलराम उस पहाड़ के उत्तम शिखर पर पहुंचे थे, ८८ माइल्स टॉल। वहां से कृष्ण-बलराम कूदते हैं, नीचे उतरते हैं और वहां से वे द्वारका के लिए प्रस्थान करते हैं। द्वारका धाम की जय! और वहां जब वे आते हैं तो, रणछोड़ राय की जय! …अच्छा हुआ, स्वागत है।
“दाऊजी का भैया कृष्ण कन्हैया!” ( कीर्तन)
हरे कृष्ण महामंत्र (कीर्तन)
