
Srimad Bhagavatam
HADAPSAR_25_31_2023_D3
27-12-2023
ISKCON Pune
“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे”
“नमो महा वदान्याय कृष्णप्रेम प्रदायते
कृष्णाय कृष्ण चैतन्य नामने गौरत्विषे नमः”
श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु की जय! हरि हरि!
द्वापर युग के अंत में श्रीकृष्ण कन्हैया लाल की जय! इन दोनों से भी याने राम से और कृष्ण से तो सभी परिचित हैं किन्तु वही राम वही कृष्ण कलियुग के प्रारंभ में श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु के रूप में प्रकट हुए, इस बात को बहुत कम जीव जानते हैं। हरि हरि!
“नमो महा वदान्याय…”
भगवान यदि दयालु नहीं हैं तो कैसे भगवान?
“हे कृष्ण करुणा सिंधु!” कृष्ण करुणा सिंधु हैं और साथ में अच्छी बात है भगवान करुणासिन्धु हैं,करुणा के सागर हैं। किंतु साथ में वे “दीनबंधु जगत्पते” – साथ ही में जो करुणा सिंधु हैं वो दीनबंधु भी हैं। हम दीन हैं और वो हम दीनों के बंधु भगवान बन जाते हैं,
“सुहृदं सर्व भूतानाम् ज्ञात्मा मां शांतिरिच्यति”
कृष्ण कहे कि यदि कोई जानता है हरि हरि! और भी बातें कहीं उन्होंने लेकिन उसमें से कृष्ण कैसे हैं ? सुहृदं, द बेस्ट फ्रेंड। ठीक है लेकिन किन्तु जो श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु हैं, भगवान तो दयालु होते हैं पर श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु अति दयालु बने।
“नमो महा वदान्याय”, या
“नाना अवतार अकरोद भुवनेषु किंतु
रामादिल् मूर्तिषु कला नियमेन तिष्ठन”
भगवान समय-समय पर “सम्भवामि युगे युगे” प्रकट होते ही रहते हैं।
“परित्राणाय साधुनाम” हमारी रक्षा के लिए, हमारे उद्धार के लिए, हम सभी को अपने घर ले जाने के लिए या अपने साथ ले जाने के लिए या वहां आने के लिए आमंत्रण-निमंत्रण देने हेतु भगवान प्रकट होते हैं। तो दयालु भगवान अति दयालु बनते हैं । ऐसे श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु की जय!
“श्रीकृष्ण चैतन्य प्रभु दया करो मोरे
तुम बिनु के दयालु जगत संसारे”
आप जैसा और कौन है? जीव तो हो ही नहीं सकता दयालु भगवान जितने दयालु हैं। इतना ही नहीं अपने सभी अवतारों में आप नंबर वन के दयालु हो। तुम बिन के दयालु जगत संसारे?
“पतित पावन हेतु तव अवतार”
और आपका अवतार होता ही पतित जीवों का उद्धार करने के लिए है। तो ये भी एक गीत है, नरोत्तम दास ठाकुर इसकी रचना किए हैं ,वे चैतन्य महाप्रभु के परम भक्त हैं। हरि हरि! वे कहते हैं “मो सम पतित प्रभु ना पाइब आर” आप पतितों का उद्धार करने के लिए ही प्रकट हुए हो, आप जैसा और कोई दयालु अवतार हुआ ही नहीं। जहां तक मेरी बात है – मोर सम पतित प्रभु ना पाइब आर, मेरे जैसा पतित शायद आपको ढूंढ कर भी नहीं मिलेगा, इतना पतित मैं हूं। हरि हरि!
हम सभी पतित हैं या यूं कहे कि कलयुग युग में और अधिक पतित हो जाते हैं। इसलिए भगवान को अधिक दयालु बनना पड़ता है। दयालु, अधिक दयालु होकर प्रकट होते हैं भगवान। और वो प्राकट्य है श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु की जय! हरि हरि!
भारतवर्ष में भारत माता की जय! अभी सुन रहे थे हम, जिसको आजकल इंडिया कहते हैं। इंडिया में भी लोग पतित तो हैं ही, कलियुग है और फिर पाश्चात्य देश का तो क्या कहना? हरि हरि! श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु सभी पतित जीवों का, चाहे वो भारत में हैं या पाकिस्तान में है, इस स्थान में उस स्थान में, अमेरिकन स्थान या चाइना स्थान, अफ्रीकी स्थान, दूरबन, आदि तो सभी स्थानो के पतित जीवों के उद्धार के लिए श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु प्रकट हुए और उन्होंने भविष्यवाणी की-
“पृथ्वीते आछे नगरादि ग्राम सर्वत्र प्रचार होइबे मोर नाम”
मेरे नाम का प्रचार इस पृथ्वी पर जितने नगर है, जितने ग्राम है, उन सारे नगरों में /सारे ग्रामों में मेरे नाम का प्रचार होगा, यह श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु की भविष्यवाणी है। भविष्यवाणी या घोषणा तो खूब होती रहती है, प्रॉमिसेस कई सारी होती रहती है, अच्छे दिन आएंगे…फलाना। हरि हरि! किंतु यह भविष्यवाणी “मेरे नाम का प्रचार सर्वत्र होगा” ये भविष्यवाणी साक्षात भगवान की है जो कहते हैं –
“मयाध्यक्षेण प्रकृति सूयते सचराचरम्”
मेरी अध्यक्षता के अनुसार सारी सृष्टि चलायमान है, नॉट ईविन ए ब्लेड ऑफ ग्रास, भगवान के आज्ञा के बिना एक तिनका भी नहीं हिलता है,न एक स्थान से दूसरे स्थान जा सकता है। उनकी भविष्यवाणी है, ऐसे भगवान की, “ऐसे श्रीभगवान को मेरे बारंबार प्रणाम है” भगवान ने अपनी दया का विस्तार करके, एनीवे हम जो बद्धजीव है हमारी सोच छोटी होती है/ संकीर्ण होती है, हमारे विचार नीच भी हो हो सकते हैं, होते ही है। किंतु भगवान तो उच्च विचार के है। उच्च विचार
“सर्वे सुखिनः भवंतु सर्वे संतु निरामया
सर्वाणी भद्राणि पश्यंतु न कश्चित् दुख भाग भवेत”
सभी का कल्याण हो,सभी सुखी हो। हरि हरि! यह विचार भगवान का है, ये हाई थिंकिंग है। “सिंपल लिविंग हाई थिंकिंग” है। यह हाई थिंकिंग है सर्वे सुखिनः भवंतु। सर्वे मतलब सर्वे, जितने भी है। भगवान ऐसा क्यों नहीं सोचेंगे? क्योंकि उन्होंने कहा भी है और हकीकत भी है,
“सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो”
मैं सभी के हृदय प्रांगण में हूं, सभी के हृदय प्रांगण में मैं ही हूं फिर वो व्यक्ति कहीं का भी हो सकता है, भारत का हो सकता है चाइना का हो सकता है, पाकिस्तान… यह स्थान वह स्थान ऑस्ट्रेलिया… सभी जीवों के हृदय प्रांगण में कृष्ण कन्हैया लाल की जय!
“प्रेमंजना-चछुरित-भक्ति- विलोचनेन
संतः सदायव हृदयेषु विलोकयन्ति
यम श्यामा-सुंदरम अचिन्त्य-गुण-स्वरूपम्
गोविंदम आदि-पुरुषम तम अहं भजामि”
यहां पर भी स्वयं ब्रह्मा कह रहे हैं, हमारे हृदय प्रांगण में भगवान विराजमान है सभी जीवों के हृदय प्रांगण में और सभी जीव भगवान के है। सभी जीवों के भगवान कौन है? माता है पिता है।
“विठु माझा लेकुरवाडा संगे गोपालांचा मेढा” हरि! भगवान हमारी मां है,बाप है, विठोबा विठोबा विठोबा! इसलिए भगवान का हम सभी से प्रेम है, केवल हम ही प्रेम नहीं करते भगवान से, भगवान भी हमसे प्रेम करते ही है। अगर कंपटीशन हो कि कौन, हम भगवान से प्रेम अधिक करते कि भगवान हमसे अधिक प्रेम करते हैं? तो हम परास्त हो जाएंगे भगवान हमसे अधिक प्रेम करते हैं। हम जो उनसे प्रेम करते हैं कभी-कभी हम भूल भी जाएंगे भगवान को, किसने देखा है भगवान? आई डोंट केयर, आई डोंट नीड भगवान। तो भी भगवान हमको नहीं भूलते, नहीं भूल सकते। कोई पुत्र या पुत्री उम्र में बड़े हो गए, यह हो गया, शिक्षा हुई फिर मां-बाप से परिवार से अलग भी हो सकते हैं, मां-बाप को भूल सकते हैं। भूलते हैं कि नहीं? आपने अभी अनुभव किया होगा किंतु आप जो मां और बाप हो, मातोश्री पिताश्री आप कभी भूलते हो अपने अपत्य को? अपने मुलाने प कदी विसरत का? यदि आप इस संसार के छोटे- मोटे छोटे-मोटे मां बाप यदि अपने अपत्य पुत्र-पुत्री को भूल नहीं सकते, भूलते नहीं तो इस संसार के, हम सभी के परम पिता जो परमेश्वर कृष्ण है, पांडुरंग पांडुरंग पांडुरंग पांडुरंग! जो है वे हमें कभी भूलेंगे? यदि भूलते तो फिर जहां वे रहते सदा के लिए अपने धाम में वही में रह जाते। किंतु हमारी यादें उनको सताती है, इसीलिए भगवान इस संसार में पुनः- पुनः पुनः-पुनः
“गोलोकम च परित्यज्य लोकानाम त्राण कारणात”
“जे का रांजले- गांजले त्यासी मने जो आपले”
संत महात्मा भी उनको अपना मान ही लेते हैं, लेकिन महात्माओं के पहले भगवान नोट करते हैं कि उनके जीव कितने परेशान है इस जगत में। इसलिए भगवान को रहा नहीं जाता और वे फिर पुनः-पुनः आते हैं। द लेटेस्ट अराइवल या अवतार जो हुआ है भगवान का, वे है श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु और वे महावदान्य बनके, अति दयालु बनके प्रकट हुए इसलिए उन्होंने योजना भी बनाई ताकि भगवान सभी जीवों के पास पहुंच सकते हैं। सभी के पास कैसे पहुंचेंगे? वैसे कई प्रकार से पहुंच सकते हैं। अपना जो गीता का संदेश है वो सभी के पास यदि पहुंचेगा तो भगवान पहुंच गए। हरि हरि! यह भागवत कथा पहुंच गई जिन जीवों के पास तो यहां भगवान पहुंच गए। ये भगवान की वांग्मय मूर्ति है भागवत। भगवद् गीता तो स्वयं भगवान है ही।
“या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्म विनिसृत:”
ऐसे कुछ रूपों में/ स्वरूपों में भगवान सभी जीवों के पास पहुंच सकते हैं/ पहुंचते हैं। कलयुग में भगवान श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु ने जो स्ट्रेटजी कहो या जो योजना बनाई कि मैं कैसे पहुंच सभी जीवों के पास?
“कलिकाले नामरूपे कृष्ण अवतार”
चलो मैं अवतार लेता हूं, कौन सा अवतार? “कलिकाले नामरूपे कृष्ण अवतार” कलयुग में नाम के रूप में भगवान अवतरित होते हैं।
“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे”
ये भगवान का अवतार है। भागवत कथा भी भगवान की कथा है, चैतन्य महाप्रभु भगवान है तो उनकी कथा भी भागवत कथा ही है। कुछ ही क्षणों में मुड़ते हैं भागवत कथा की ओर, हमारी यहां आज के दिन होने वाली भागवत कथा की ओर मुड़ते ही है। चैतन्य महाप्रभु उस सायंकाल को,गौर पूर्णिमा फाल्गुन पूर्णिमा के दिन, वैसे सायंकाल को, चंद्रोदय के समय (सूर्यास्त और चंद्र उदय के समय) उनको प्रकट होना था और हुए भी किंतु दिन में भगवान प्रकट हुए नाम के रूप में प्रकट हुए और पूरे नवदीप मायापुर में सर्वत्र,
“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे”
का कीर्तन और नृत्य हो रहा था।
“महाप्रभु कीर्तन-नृत्य-गीता वदित्र-माद्यन-मानसो रसेना”
इस प्रकार उस फाल्गुन पूर्णिमा या गौर पूर्णिमा के दिन दो अवतार हुए, एक हरिनाम के रूप में
“कलि काले नाम रूपे कृष्ण अवतार”और दूसरा अवतार वे शचिनंदन बने जो
“नंद-नंदन जई सचीसुत होईलो सई”
जो नंद-नंदन थे वे शचीसुत/शचीनंदन बने। वो एक अवतार और दिन में महामंत्र के रूप में चैतन्य महाप्रभु प्रकट हुए और फिर जब उन्होंने भविष्यवाणी की “मेरे नाम का प्रचार सर्वत्र होगा। पृथ्वी पर जितने नगर है, जितने जितने ग्राम है वहां मेरे नाम का प्रचार होगा। इसी हरे कृष्ण महामंत्र का प्रचार होगा और इस नाम के रूप में मैं सभी जीवों को प्राप्त होऊंगा”। इस प्रकार जीवात्मा जो हम है, इस संसार के बद्ध जीव और भगवान अपने नाम के रूप में इनका मिलन होता है।
“नाम नाचे जीव नाचे, नाचे प्रेम धन”
नाम नाचे, नाम नाचे- नाम नाचता है मतलब भगवान का नाम भी भगवान का रूप है वह भी नाचता है, उसके साथ जीव भी नाचता है जीव नाचता है, नाचे प्रेम धन। फिर “नाम से धाम तक” ये भगवान का नाम जो भगवान ही है, तो उस जीव को अपने धाम लेकर लौटता है। नाम हमें धाम ले जाता है और ये हम देख रहे हैं इस पृथ्वी पर संसार में जहां-जहां अब हरिनाम पहुंचा हुआ है, श्रील प्रभुपाद की जय! श्रील भक्तिवेदांत स्वामी श्रील प्रभुपाद ये नाम को पहुंचाए. संसार के कोने कोने में या उनके आदेश अनुसार उनके शिष्यों ने भी इस हरिनाम को असंख्य स्थानों पर पहुंचाया है। हरि हरि! जिनको हरिनाम प्राप्त हो रहा है वे सब हरिनाम लेते-लेते ही कहो,
“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे”
कहते हुए वे सब दौड़ रहे हैं।
मायापुर धाम की जय! वृंदावन धाम की जय!
जगन्नाथ पुरी धाम की जय! पंढरपुर धाम की जय!
सारे संसार के जीव आ रहे हैं, फ्रॉम ऑल ओवर द वर्ल्ड और अंततोगत्वा
“परः तस्मात्तु भावो अन्य” भगवान का धाम है, इस व्यक्त और अव्यक्त जगत के परे ,वैकुंठ।
“आम्ही जातो आमचा गावा आमचा राम राम ध्यावा”
जहां तुकाराम महाराज गए और जहां कई सारे जीव जाते ही रहते हैं, वो धाम जहां हमको भी जाना है । आप ऐसा कुछ सोचते रहते हैं कि जाना है? कौन-कौन सोचते हैं या जाना चाहते है? “आई वुड लाइक टू गो, आई वुड लव टू गो, भगवत धाम मैं जाना चाहता हूं”। अधिकतर जाना चाहते हैं, कुछ लोग सोच रहे हैं कि जाना चाहिए कि नहीं? येस, नो? हु नोज़। यह कथा का आयोजन भी भगवान के द्वारा ही आयोजन हुआ है, होता रहता है और ऐसे भागवत कथा में हम तैयारी करते हैं। हरि हरि! एक तो कृष्ण अर्जन करते हैं, कृष्ण को प्राप्त करते हैं। अधिक-अधिक कृष्ण को ग्रहण करते हैं श्रवण के माध्यम से, अधिक-अधिक कृष्णभावनाभावित/ कृष्ण कॉन्शियस होते हैं, अधिक-अधिक कृष्ण प्रेम को जगाते हैं । उसी के साथ
“वैराग्य विद्या निज भक्तियोगं:” या
“अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृहयते”
इस संसार में वैराग्य, “संसार च वीट”। भगवान का हम सभी से जो प्रेम है उसी का प्रदर्शन भगवान ही कर रहे हैं, इस भागवत कथा का आयोजन करके,हम सबको यहां एकत्रित करके भगवान का प्रेम का ही दर्शन या प्रदर्शन यहां हो रहा है।
श्रीश्री विठ्ठल रुक्मिणी की जय!
राधा वृंदावनचंद्र की जय!
मैं आप सभी भक्तों का / कथा प्रेमियों का मतलब कृष्ण प्रेमियों का स्वागत करता हूं। करते ही है, यदि वगैरह नहीं,करते ही है। और आप कृष्ण प्रेमी हो या बन ही रहे हो यदि आपसे भगवान प्रेम करते हैं तो मैं भी आप सभी से प्रेम करता हूँ। आई आई लव यू ऑल ,भाषा तो अच्छी नहीं। हरि हरि!
“राधा कृष्ण प्राण मोर जुगल किशोर” (भजन गायन)
ये गीत एक मेडिटेशन कहो या ये एक ध्यान है। नरोत्तम दास ठाकुर अपनी अभिलाषा या महत्वाकांक्षा व्यक्त कर रहे हैं। एक तो वे कह रहे हैं कि राधा और कृष्ण मेरे प्राणधन हैं। ये वृंदावन का दृश्य है जमुना के तट पर कदंब वृक्ष की छत्रछाया में, किशोर और किशोरी एक बेदी या सिंहासन पर विराजमान हैं। तो वहां मैं पहुंचकर
“श्याम गौरी अंगे दिबो चंदनेर गंध…..”
वहां पर मैं पहुंचकर श्याम और गौरी, किशोर किशोरी के अंग पर चंदन का लेपन मैं करूंगा और चमार ढुलाऊंगा। हरि हरि! और क्या-क्या करना चाहता हूं मैं? ऐसा स्वप्न या इच्छा है , ऐसी तीव्र मनोकामना है। मन की और जो वासना/ कामना उसको ठुकराकर, गेट आउट। जैसे स्त्री-पुरुष मैं मिलूंगा, फिर यह करूंगा, फिर यह होगा, फिर वो होगा। जो बद्धजीव, कामी यह सोचते ही रहते हैं, लेकिन यह सोच उनके बिल्कुल विपरीत है। इस संसार के बद्ध जीवों की मनः स्थिति काम वासना से भरी होती है, कामवश कई सारे गलत-सलत कार्य/ पाप करते रहते हैं। किंतु यहां मैं और स्त्री या मैं और पुरुष नहीं,
“मैं और कृष्ण”, “मैं और राधा- कृष्ण”, मैं राधा-कृष्ण की सेवा इस प्रकार से करना चाहता हूं।
“गाथिया मालतीर माला दीव दोहार गले
अधरे तुलिया दिबो कर्पूर तांम्बुले”
उनके लिए मैं मालती माला या वैजयंती माला या कई प्रकार की पद्ममाला मैं बनाऊंगा और जाकर उनको पहनाऊंगा, उनको तांबूल मसाला खिलाऊंगा।
“ललिता विशाखा आदि जत सखी वृंद
आज्ञया करीबो सेवा चरणारविंद,
राधा कृष्ण प्राण मोर जुगल किशोर
राधा कृष्ण प्राण मोर जुगल किशोर”
तो मैं जब वहां पहुंचुंगा जहां किशोर-किशोरी विराजमान है तो वहां ललिता और विशाखा भी रहेगी। तो मैं पहुंचते ही वैसे उनकी आज्ञा से, उनकी अनुमति से मैं अलग-अलग सेवाएं करूंगा और उस प्रकार से मैं सेवा का अधिकारी बनूंगा।
“श्रीकृष्ण चैतन्य प्रभु दासेर अनुदास
श्री कृष्ण चैतन्य प्रभु दासेर अनुदास,
सेवा अभिलाष करे नरोत्तम दास
सेवा अभिलाष करे नरोत्तम दास।
“राधा कृष्ण प्राण मोर जुगल किशोर”
“राधा कृष्ण प्राण मोर युगल किशोर” (वैष्णव गीत)
“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे” ( कीर्तन)
“जय जय विट्ठल रुकमाई!”( भजन)
मंगलाचरण…
“ओम नमो भगवते वासुदेवाय!”
रणछोड़! जरासंध ने कहा, ”रणछोड़!रणछोड़! डरपोक कही का…”
कृष्ण और बलराम अब द्वारका की तरफ प्रस्थान कर रहे थे। जरासंध ने तो, जैसे असुर-प्रवृत्ति के जन ऐसा कुछ कहते ही रहते हैं। भगवान को समझते नहीं, उन्हें भक्त होना होगा।
“भक्तोऽसि मे सखा च इति तद हि रहस्य उत्तमम”
अर्जुन तुम्हें मैं यह रहस्यमयी बातें,मेरे संबंध का रहस्य समझा रहा हूं और तुम यह समझोगे भी, क्योंकि तुम “ भक्तः असि” तुम मेरे भक्त हो, “ सखा: च” और तुम मेरे सखा हो,। यू आर माय फ्रेंड एंड यू आर माय डिवोटी। इसलिए भगवान हमें साक्षात्कार कराते हैं, आत्म-साक्षात्कार के साथ भागवत-साक्षात्कार भी। जरासंध को जो भी कहना था,कहने दो वो जो भी बक रहा था। किंतु जैसे ही कृष्ण-बलराम पहुंच जाते हैं, द्वारका धाम की जय! उनका स्वागत हुआ है,” सुस्वागतम रणछोड़!” अच्छा हुआ आपने रण छोड़ा, तभी तो आज आपके साथ हमारा मिलन हो रहा है। आपका स्वागत है! द्वारका में पहुंचते ही, नॉट द सेम डे। प्रारंभ में जो लीलाऐं हुई है, जैसे बलराम जो दाऊजी है,
“दाऊजी का भैया, कृष्ण कन्हैया!
दाऊजी का भैया, कृष्ण कन्हैया!”
कन्हैया के जो दाऊजी है, बड़े भैया/ दादा बलराम जी जो है उनका विवाह हो जाता है क्योंकि कृष्णा स्वयं ही विवाह करना चाहते हैं, विवाहित होना चाहते हैं। किंतु जब तक बड़े भैया का विवाह नहीं होता है तो अनुज का कैसे होगा? अनुज-अग्रज, तो बलराम है अग्रज और कृष्ण है अनुज। ‘ज’ मतलब जन्मे हुए, ‘अग्र’ मतलब पहले जन्मे हुए और ‘अनु’ मतलब बाद में जन्मे हुए। बलराम सातवें पुत्र, कृष्ण आठवें पुत्र तो पहले विवाह बलराम का होना चाहिए। रैवत नाम के राजा अपनी पुत्री के लिए, जिनका नाम था रेवती, उसके लिए उन्हें पति ढूंढना था मैच-मेकिंग के लिए। इस उद्देश्य से ब्रह्मा के पास पहुंचते हैं, यह सारी लीलाएं विस्तार से भी तो होती है,उसके कई सारे डीटेल्स होते हैं। यह सारा इतिहास है किंतु हम संक्षेप में ही कह सकते हैं या कहते हैं। ब्रह्मा ने कहा,
”गच्छ! जाओ, जाओ!” हे रैवत राजा, द्वारका में जाओ। आनर्त देश या उस प्रदेश में जाओ जहां द्वारका भी है।
“देव देवांश बलदेव महाबल:”
वहां पहुंचे हैं देव-देवांश बलदेव। कैसे हैं बलदेव? महाबल:। उनको बलदेव क्यों कहते हैं? क्योंकि बलवान है,बलवान जो है।
“कन्या रत्न इदम राजन नर रत्नाय दे भो:”
तुम्हारी पुत्री जो कन्या रतन है, बलराम को दे दो क्योंकि वे नर रत्न है, नरों में रत्न बलराम और तुम्हारी पुत्री है कन्या रत्न। नर-रत्न , कन्या-रत्न श्री श्री बलदेव-रेवती जी की जय हो! उनका विवाह संपन्न होते ही अब रुक्मिणी-स्वयंवर या रुक्मिणी हरण-लीला प्रारंभ होती है। रुक्मिणी ने जन्म लिया हुआ है कौंडिण्यपुर धाम की जय! शायद आपको पता न हो, यह थोड़ा दुर्दैव की बात भी हो सकती है। इसका विचार बाद में किया जा सकता है। हम जो महाराष्ट्र के महाराष्ट्रीयन है, हमको भी पता नहीं है कि रुक्मिणी ने कहां जन्म लिया? यदि पूछा जाए तो आप में से कितने भक्त, लोग तो नहीं कहूंगा, आप भक्त हो। कौन-कौन जानते हैं कि रुक्मिणी का जन्म कहां हुआ था? दक्षिण भारत में, कि हिमाचल प्रदेश में, कि आसाम में? ओके मेरी अपेक्षा से अधिक हाथ ऊपर है,मैं प्रसन्न हूं आप में से कई भक्तजन जानते हैं कि रुक्मिणी का जन्म कहां हुआ था? कौंडिण्यपुर धाम की जय! शायद आपने नाम तो सुना होगा लेकिन कौंडिण्यपुर कहां है? हम दिखा तो रहे हैं, आप स्क्रीन पर देख रहे हैं, यह नागपुर से ज्यादा दूर नहीं है। वैसे अमरावती और वर्धा के बीच में एक वरदायनी या वर्धा नदी कहते हैं, उसके तट पर रुक्मिणी का जन्म स्थान है। यह विदर्भ है और रुक्मिणी का जन्म विदर्भ में हुआ, इसलिए रुक्मिणी का एक नाम है वैदर्भि है। वहां की जन्मी ये भीष्मक-नंदिनी। राजा भीष्मक वहां राज्य किया करते थे तो उनका कैपिटल/ राजधानी ये कौंडिण्यपुर रहा और वहां की जन्मी ये वैदर्भी या रुक्मिणी । हरि हरि! जो वृंदावन में पहले जन्मी थी, वहीं यहां पर रुक्मिणी के रूप में प्रकट हो रही है। राजा भीष्मक धार्मिक थे, उनके दरबार में कई सारे ऋषि-मुनि,संत-महात्मा आया करते थे और ऐसी सभाओ में,धर्म- सभाओं में वहां पहुंचे हुए महात्मा-साधु-संत कथा सुनाते। संभावना यह भी होती है कि वे द्वारका से आए हैं भगवान को मिलाकर या उनके दर्शन करके। तो यहां आकर वे द्वारकाधीश की कथा-लीला, उनके रूप-गुण- वीर का वर्णन करते और सभा में रुक्मिणी जरूर वहां बैठकर ध्यान-पूर्वक प्रेम-पूर्वक सारी लीला-कथा सुना करती थी। हरि हरि! वह भगवान से कभी मिली तो नहीं थी, न तो देखा था किंतु यह लीला के श्रवण या भगवान के नाम-रूप-गुण-लीला- धाम का भी वर्णन सुन-सुनकर,
“तम एने सदृशं पतिम“
मेरे यही पति होंगे, मैं विवाह करूंगी तो बस इन्हीं के साथ। हरि हरि! श्रवण से हमारा जो प्रेम है भगवान से, वह जागृत होता है। यहां हम देख रहे हैं कि हम जो कथा का श्रवण यहां पर कर रहे हैं, रुक्मिणी- द्वारकाधीश की कथा कहो या रुक्मिणी-हरण की कथा या जो भी कथाएं हम सुनेंगे आज जैसे द्वारका में द्वारकाधीश भगवान, उनकी लीला-कथा, आदि। रुक्मिणी द्वारा लीला कथा कौंडिण्यपुर में सुनकर, उसका प्रेम कृष्ण से जागृत हुआ और उसने मन बना लिया,” मेरे पति होंगे, होंगे ही कोई ना कोई, लेकिन वह होंगे
कृष्ण कन्हैया लाल की जय!
द्वारकाधीश की जय!
वैसे हमारे पति भी, हम जो जीव है, जीव प्रकृति है/ सजीव या दिव्य प्रकृति है और पुरुष है भगवान। भगवान है पुरुष और उस पुरुष की ही हम प्रकृति है। पुरुष भगवान के संबंध में हम सब स्त्रियां है/ प्रकृति है, तो हम सभी के पुरुष भी भगवान ही है। हरि हरि! यदि हम धीरे-धीरे मन बना ले कि हमारे पति/ हमारे स्वामी वे कौन है इसका पता हमें लगे और वही होंगे हमारे स्वामी/ पति/ हमारे भगवान, ऐसे यदि कुछ विचार उठते हैं/ जागृत होते हैं/ उदित होते हैं हमारे हृदय-प्रांगण/ हमारी चेतना/ हमारी भावना में, इसी को कृष्ण कॉन्शियनेस/भावना कहते हैं। कृष्ण की भावना जागती है तो हमें समझना चाहिए कि कृष्ण की कृपा हम पर भी हो रही है इस कथा के माध्यम से। ये कथा भी भगवान ही है। उसने तो मन बना लिया है मेरे पति होंगे द्वारकाधीश की जय! किंतु रुक्मणी के पांच भाई थे, बड़े भाई का नाम रुक्मी था,रुक्मी की बहन रुक्मिणी। उसने तो और ही कुछ विचार करके रखा था कि मेरे बहन का विवाह शिशुपाल के साथ होगा और सब तैयारी हो रही है, विवाह मंडप बन रहा है, मैरिज-पार्टी बारात आ रही है कौंडिण्यपुर की ओर। शिशुपाल आ रहे हैं, जरासंध और उनकी चांडाल चौकड़ी आ रही है, सेना लेकर आ रही है। उनको यह शंका है कि यहां कृष्ण के पहुंचने की संभावना है तो बारात/ मैरिज-पार्टी सैन्य के साथ वहां पहुंच रही है। उस समय रुक्मिणी ने विचार किया और हेल्प हेल्प! मुझे मदद चाहिए! और कौन? “मेरी डोरी तेरे हाथ”। उसने एक पत्र लिखा, आप यहां पर देख रहे हो कि प्रेम पत्र लिखा द्वारकाधीश को। इस पत्र में सात पैराग्राफ है, पहले पैराग्राफ में लिखा है,
“श्रुत्वा गुणान भुवन सुंदर श्रृंवताम ते…”
हे द्वारकाधीश! हे कृष्ण! जब से मैं सुन रही हूं, हे भुवन सुंदर कृष्ण! आपके गुणों का वर्णन मैं सुन रही हूं और यह गुणावली ने मेरे करणों में प्रवेश करके, मेरे हृदयप्रांगण में पहुंचकर, मेरे हृदय को या हृदय में जो मैं रहती हूं आत्मा, उसको स्पर्श किया हुआ है या मैने आलिंगन किया हुआ है उस लीला-कथा-गुण का, वह आप ही तो हो। उसी के साथ,
“हरतो अंग तापम” मेरे अंग का ताप या विरह की व्यथा कुछ शांत हुई है।
“तव कथा अमृतम तप्त जीवनम”
जैसे गोपिया गोपीगीत में कही थी कि आप की कथा क्या करती है? हमारे तपे हुए जीवन की आग को बुझाती है/ शांत करती है। रुक्मिणी कह रही है आपकी कथा का श्रवण करके हरतो अंग तपम, इत्यादि इत्यादि बातें उन्होंने लिखी है और विशेष निवेदन किया है कि प्रभु आइए, तुरंत आइए, मेरा विवाह में बस कुछ ही दिनों की अवधि बाकी है, उसके पहले आप आइए और मुझे यहां से ले जाइए। यह पत्र एक ब्राह्मण को दिया है और ब्राह्मण पहुंचे हैं पत्र लेकर द्वारका और यह पत्र प्रस्तुत किया है, द्वारकाधीश पढ़ते हैं रुक्मिणी का प्रेम पत्र/ लव लेटर। तो जैसे रुक्मिणी ने अपना मन बना लिया था कि मेरा विवाह होगा, होगा ही और वो होगा द्वारकाधीश के साथ। वैसे द्वारकाधीश ने भी अपना मन वैसे पहले बना लिया था ही, इसीलिए तो 18वीं बार मथुरा में युद्ध नहीं खेले कि,” आई हैव मोर इंपॉर्टेंट बिजनेस टू डू, रुक्मिणी मेरी प्रतीक्षा कर रही है”। यह सोचकर भगवान युद्ध भी नहीं खेले, सीधे द्वारका आए थे और द्वारका वे भी सुना करते थे रुक्मिणी के नाम- रूप- गुण – लीला का वर्णन। दोनों ने मन बना लिया था,
“समुद्बोधुम मनो दधे”
मेरी भार्या कौन होगी? रुक्मिणी होगी। ऐसा मन द्वारकाधीश ने भी बनाया था ही। तो कृष्ण तैयार होते हैं,रथ में आरूढ़ होते हैं, ब्राह्मण को बिठाते हैं और सायंकाल को प्रस्थान होता है। पूरी रात तूफान की तरह,वैसे एक ट्रेन का नाम ही है तूफान। भगवान का रथ तूफान की तरह दौड़ता हुआ प्रातःकाल के समय, सूर्योदय के समय द्वारका से कौंडिण्यपुर (सेंट्रल इंडिया) पहुंच जाता है। अगली सुबह जब बलराम उठते हैं, सभी लोग भी उठते हैं तो कृष्ण से मिलने गए होंगे हर प्रातःकाल की भांति। जाते हैं तो देखते कि कहां है कृष्ण? वेयर इज़ कृष्ण? वैसे किसी को पता नहीं था लेकिन बलराम ने थोड़ा विचार किया,”हां जरूर वहां गए होंगे, कौंडिण्यपुर गए होंगे”। बलराम ने यह देखा कि कृष्ण तो अकेले गए हैं, वहां तो युद्ध होने की संभावना है। तो बलराम छोटी-सी सेना लेकर के पीछे से जाते हैं और वे भी पहुंच जाते हैं, कौंडिण्यपुर धाम की जय! वहां वैसे दोनों, कृष्ण और बलराम का स्वागत, विशेष स्वागत होता है। वहां सारे विदर्भवासी इस महा महोत्सव, रुक्मिणी के विवाह उत्सव केलिए उपस्थिति है। उन सबको कृष्ण-बलराम का दर्शन हो रहा है। ये कथा शुकदेव गोस्वामी सुना रहे हैं न वहां, गंगा के तट पर, तो वह लिखते हैं कि कैसे विदर्भ वासी अपनी आंखों का प्याला बनाकर, आंख के थोड़ा अंदर जो एक गड्ढा होता है तो उसका प्याला बनाए हैं सभी विदर्भ वासी और कृष्ण-बलराम के सौंदर्य का पान करने हेतु प्याले भर-भर के पी रहे हैं, सौंदर्य का पान कर रहे हैं। कृष्ण बलराम की जय!
विवाह के दिन,अभी विवाह का दिन ही था। जब रुक्मिणी ने जब पत्र लिखा था तो यह भी लिखा था (बड़ी होशियार थी) कि आप जब आओगे (उसका विश्वास था कि कृष्ण जरूर आएंगे)
“अवश्य रक्षिबे कृष्ण”
यह शरणागगति का लक्षण भी है, जो शरणागत भक्त होते हैं वह इस बात को जानते हैं, अवश्य रक्षिबे कृष्ण। तो कृष्ण जरूर आएंगे, तो आप जब आओगे तो कहां मिलोगे? उस दिन मैं अंबिका के दर्शन के लिए जाऊंगी, दर्शन करके मैं जब लौटूंगी तो आप वहां आ जाना, वह हमारा मीटिंग पॉइंट होगा। ऐसा रुक्मिणी ने उसे पत्र में लिखा ही था। तो रुक्मिणी जा रही है अंबिका के दर्शन के लिए, तो पुनः शुकदेव गोस्वामी लिखते हैं, रुक्मिणी पैदल जा रही है, अपने पैरों से चलती हुई अंबिका के चरणों को और जा रही थी। तब वह सोच रही थी, चिंतन कर रही थी कृष्ण के चरण कमलों का। तीन चरण कमलों की बात लिखी है, रुक्मिणी अपने चरण कमलों से जा रही है अंबिका के चरण कमलों की ओर,तब वह सोच रही/ चिंतन कर रही है कृष्ण के/ द्वारकाधीश के चरणों का। वहां पहुंचने पर
“हे अंबिके! नंदगोप सुतम देहि पतिं में कुरुते नमः”
जो प्रार्थना वैसे गोपियों ने वृंदावन में की हुई थी।
वही प्रार्थना को यहाँ रिपीट कर रही है रुक्मिणी, अंबिका को प्रार्थना कर रही है। बाहर आती है तो सारे राजा वहां खड़े हैं अपने-अपने रथों में विराजमान या घोड़े पर सवार होकर या हाथी के पीठ पर बैठे हैं ऑन बोथ साइड्स और रुक्मिणी मध्य में से अपनी कई सारी सहेलियों के साथ, पुरोहित भी मंत्रों का उच्चारण कर रहे हैं, जा रही है। रुक्मिणी के सौंदर्य ने सभी का ध्यान आकृष्ट किया हुआ है और वे भूल गए हैं कि और भी कोई या कृष्ण भी यहां आ सकते हैं या आए हैं/ नहीं आए हैं। इस बात को सारे भूले हैं बस केवल रुक्मिणी का दर्शन कर रहे हैं। हरि हरि! ऑफ कोर्स उनके मन में / उनके विचार में कुछ विकार भी है, प्रेम नहीं है। काम ही है, उपभोग की इच्छा भी है, क्योंकि असुर जो है ये सब मंडली। शिशुपाल है, जरासन्ध है और कई सारे वहां पहुंचे हुए हैं। इतने में कृष्ण पहुंच जाते हैं। हरि हरि! और रुक्मिणी भी उसी रथ की ओर आगे बढ़ती है। रुक्मिणी वैसे प्रतीक्षा कर रही थी,वो समय बीत गया जिस क्रम से हम आगे बढ़ रहे हैं। वो ब्राह्मण आए हैं और ब्राह्मण पहुंचे हैं मतलब कृष्ण भी पहुंचे ही होंगे। ये कौंडिण्यपुर में जो अंबिका है उसका दर्शन कीजिएगा और यहां पर ये कृष्ण का रथ देखिए और रुक्मिणी वहां पहुंच गई है। कृष्ण की थोड़ी सहायता के साथ रुक्मिणी भी आरूढ़ हो चुकी है उस रथ में और उसी के साथ वहां से कृष्ण प्रस्थान कर चुके हैं, बड़े तीव्र गति से वहां से बाहर निकल गए। ये सभी जो शिशुपाल एंड कंपनी पीछा कर रहे हैं इंक्लूडिंग रुक्मी, रुक्मिणी का भाई भी पीछा कर रहा है और युद्ध भी होता है। कृष्ण रुक्मी को दंडित भी करते हैं, अपनी तलवार से उसका मुंडन करते हैं, उसी प्रकार से उसको अपमानित करते हैं। वही तो विघ्न बन चुका था, वह नहीं चाहता था कि रुक्मिणी का विवाह द्वारकाधीश के साथ हो। उसी ने तो प्रस्ताव रखा था कि शिशुपाल के साथ होना चाहिए। ऐसे रुकमी को दंडित भी किए हैं, लकिली उसकी जान नहीं लिए/ वध नहीं हुआ है, केवल मुंडन। हरि हरि! अब कृष्ण रुक्मिणी को लेकर, साथ में बलराम जी भी है, द्वारका धाम की जय! द्वारका में लौटे हैं और वहां,
”विधिवत उपयेमें, शुभ मंगल सावधान”, वैसे केवल मंगल ही है, सावधान की बात नहीं। आपके विवाह में मैं कहने वाला था, हमारे विवाह कहता भी तो उसमें मैं भी आगया होता, लेकिन आई एम ए सन्यासी, न तो विवाह हुआ मेरा। आपके या संसार में जो विवाह होते हैं तो “शुभ मंगल” और क्या आगे? ”सावधान” और यह बात जब रामदास स्वामी ने सुनी थी तो सावध हो गए /सावधान। एक दिन का राजा घोड़े पर सवार वगैरह भी होते हैं और फिर जीवन भर का गुलाम ऐसा भी कहते है। “एक दिन का राजा जीवन भर का गुलाम” और कई सारे विघ्न तो आते ही रहते हैं वैसे भी संसार में। यह दुखालय है और कई सारी विपदा आती हैं।
“विपदा-संपदा”,विपदें-संपदे इसलिए सावधान भी रहना चाहिए सावधान! ‘बी केयरफुल,बी कॉन्शस’ सावधान! दोनों बातें होती है शुभ मंगल भी है सावधान भी। लेकिन इस केस में रुक्मिणी-द्वारकाधीश का जो विवाह हो रहा है, बस शुभ मंगल व मंगल ही मंगल है।
“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे,
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे”
यह जो कौंडन्यपुर धाम है यहां पर भी इस्कॉन पहुंचा हुआ है या मैं ही पहुंच गया कहो, इस्कॉन का एक प्रकल्प कौंडिण्यपुर में भी स्थापित हो रहा है। कौंडिण्यपुर में हमने पांच एकड़ भूमि प्राप्त की हुई है। वहाँ देख रहे हो कि हमने एक गोवर्धन मंदिर भी बनाया है। वैसे तो वह रुक्मिणी-द्वारकाधीश का मंदिर होगा और रुक्मिणी की वैभव/ लीला/ कथा का प्रचार-प्रसार होगा। वहां कौंडिण्यपुर में अंबिका की अधिक पूजा या जो भी होता है, रुक्मिणी तो लगभग याद नहीं आती वहाँ के तीर्थयात्रियों को। रुक्मिणी का जन्म स्थान तो है लेकिन कब हुआ था रुक्मिणी का जन्म? रुक्मिणी के जन्म का उत्सव इत्यादि हम लोग अभी वहां मनाना प्रारंभ किए हैं और हमारा एक रुक्मिणी-रथ भी गांव-गांव जा रहा है और रुक्मिणी की लीला कथा का प्रचार- प्रसार हम कर रहे हैं। इस प्रकार यह जीर्णोधार या पुनर्निर्माण का कार्य इस्कॉन कर रहा है। वहां के रुक्मिणी-द्वारकानाथ की जय ! ये छोटे से विग्रह है और अभी विशाल मंदिर की योजना है। कई सारी गौशाला है, वह गुरुकुल है,वहां वैदर्भी-वाटिका है, बहुत बड़ा अन्नक्षेत्र हम वहां चलाते हैं। यह को वैशिष्ट्य है, ये जो वृक्ष है ‘कदंब के वृक्ष’ ये इस्कॉन की प्रॉपर्टी पर ही है और यह प्रॉपर्टी वैसे जहां राजा भीष्म का महल और अंबिका मंदिर के मध्य में हमारी प्रॉपर्टी है। हमारा यह कहना या हम दावा कर रहे हैं कि रुक्मिणी-हरण जो हुआ, इस्कॉन प्रॉपर्टी के ऊपर ही हुआ। और कोई वैसा स्कोप है ही नहीं क्योंकि जब रुक्मिणी लौट ही रही थी अंबिका के दर्शन से अपने महल की ओर तो वहीं पर इस्कॉन प्रॉपर्टी है और यह जो वृक्ष आप देख रहे हो कदंब का वृक्ष, पूरे विदर्भ में शायद ढूंढके भी आपको कदम का वृक्ष नहीं मिलेगा। हमें तो कही दिखाई नहीं दिया/ नहीं मिला । केवल यहां पर कदंब का वृक्ष है, यह कदंब का वृक्ष कहां से आया? कृष्ण जब वहां पहुंचे थे द्वारकाधीश तो उनके गले में जो कदम के फूलों की माला थी, उसमें से कुछ फूल वहां गिरे होंगे और उसी फूलों से ये वहां के वृक्ष उगे हुए हैं और वहाँ कदम के वृक्ष की धीरे-धीरे से वाटिका बन रही है, कई सारे वृक्ष उग रहे है वहां। आप कभी कौंडिण्यपुर भी जाइए दर्शन के लिए और वहाँ रहिए बस भजन कीजिए। अभी बहुत कुछ आपको हमें सुनाना है/ दिखाना है द्वारका लीला क्योंकि विचार तो यह है कि आज हम द्वारका लीला करें। कभी पूरी तो हो ही नहीं सकती किंतु जो भी संक्षिप्त वर्णन है द्वारका लीला का उसका समापन करेंगे यदि आज तो कल हम फिर द्वारकाधीश को और रुक्मिणी को पंढरपुर ले जाएंगे और फिर
पंढरपुर धाम की जय!
विठ्ठल-रुक्मिणी की जय!
फिर वहाँ की लीलाएं- कथाएं संपन्न हो सकती।
(उद्धव प्रभु द्वारा सभी को आगामी प्रोग्राम केलिए सूचित करना)
हरि हरि!
हम सबको भी भगवान ने याद किया,हम कह ही रहे थे कि हम भूल सकते हैं किंतु भगवान हमको नहीं भूलते। ऐसा ही कुछ अनुभव कर रहे हैं। हरि हरि! राम ने हमको याद किया और कलश यहां पहुंच गया और आप हम सभी सादर आमंत्रित हो रहे हैं अयोध्या के लाला के दर्शन के लिए और वो भी नए मंदिर में। इस्कॉन की पदयात्रा जा रही है,वैसे मैं पदयात्रा को संभालता हूं, विश्व भर में पदयात्रा, “दिंडी चला आपण दंता”, एक पदयात्रा जा रही दिल्ली और वृंदावन से अयोध्या जा रही है, राइट नाउ। हरि बोल! और उस पदयात्रा का नाम ही रखा है “ राम पदयात्रा”। इस्कॉन का कैंप एक महीने के लिए वहां होगा। ऐसा ही महान/ विशाल होगा, कथा/प्रसाद/ नगर कीर्तन के लिए। इस्कॉन के भक्त विश्व भर से/ भारत भर से और मैं भी जा रहा हूं। मैं भी कुंभ मेले का एक महंत हूं इस्कॉन की ओर से, इसलिए मैं भी वहां रहूंगा ही। जय श्री राम!
“राम बिना मुझे चैन पड़े ना, सोड़ुनी गेला राम”
ऐसे अयोध्यावासी कह रहे थे,सोच रहे थे ऐसा ही जब राम सीता लक्ष्मण वनवास के लिए प्रस्थान किए थे।
“सोड़ुनी गेला राम” (मराठी में कुछ वचन)
हरि हरि!
“य रमती रमयति च इति रामः”
जो स्वयं भी रमते हैं और औरों को रमाते हैं, उनको कहते हैं राम।
“राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे”
शिवजी भी कहते हैं, रमा को कहते हैं, रमा यानी पार्वती को कहते हैं। हे रमे! अहम रमे, मैं रमता हूं। किस में रमते हो? रामे में। “अहम रमे रामे हे मनोरमे! “ राम राम रामेति- राम में।
“जय जय राम कृष्ण हरि!” ( कीर्तन)
मेरा जन्म मंगलवार के दिन हुआ था, १९४९ की बात है। मंगलवार के दिन मेरा जन्म हुआ था और मंगलवार वही दिन है जिस दिन राम जन्मे थे। हरि बोल! इसलिए घरवालों ने मेरा नाम रखा रघुनाथ, ऐसे ही कुछ था, हरि हरि! रघुनाथ को श्रील प्रभुपाद लोकनाथ बनाए। रघुनाथ लोकनाथ सेम थिंग।
श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु ने अपने भक्त को जगन्नाथ पुरी में षट्भुज दर्शन दिखाया ,छह भुजा वाला। जिन दो भुजाओं में मुरली धारण की थी वे थे कृष्ण कन्हैया लाल की जय!
दूसरे दो हाथों में चैतन्य महाप्रभु ने धनुष और बाण धारण किया था, जय श्री राम! तीसरा दो हाथों का जो सेट है उसमें दंड और कमण्डलु धारण किए थे श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु की जय! आप देख रहे हो।
रामचंद्र ,कृष्ण चंद्र, चैतन्य चंद्र – अभिन्न, एक ही हैं।
“नटो नाट्य धरों यथा” – कुंती महारानी ने कहा। नटो नाट्य धरों यथा, जैसे नट एक ही व्यक्ति होता है लेकिन अलग-अलग नाटिकाओं में या मूवीज़ में कहो, अलग-अलग दिखता भी है या अलग-अलग वस्त्र या बहुत कुछ अलग-अलग होता है। व्यक्ति एक ही होता है लेकिन अलग-अलग बन जाता है, अलग-अलग भूमिका निभाता है, अलग-अलग प्रकार का वह दिखता है, होता तो एक ही है। कुंती महारानी का रही है वही भगवान हैं। हमारे अनेक भगवान नहीं है,“ मामेकम”।
मोनोथेसिजम एंड पॉलीथििज्म – ऐसे पाश्चात्य देश में खूब चलता है। भगवान एक होने चाहिए, आपके तो कई भगवान है। वैसे भगवान तो एक ही है।
“कभी राम बनके कभी श्याम बनके आ जाना,
कभी राम बनके कभी श्याम बनके”
हरि हरि ! द्वारकाधीश की जय!
वही कृष्ण वृंदावन में, ये परकीया भाव की लीला संपन्न करने वाले, कृष्ण जब द्वारका में पहुंचते हैं तो।स्वकीय भाव होता है। गोपियों के साथ परकीया भाव, द्वारका की रानियां के साथ स्वकीय भाव। अपनी उनकी लीगली मैरिड कहो, औपचारिक दृष्टि से जिनके साथ विवाह हुआ है, वह स्वकीय भाव। रुक्मणी के साथ विवाह हुआ था, देट वाज़ नंबरवन। इस प्रकार रुक्मणी भगवान की पटरानी क्वीन नंबर वन बनी।
रुक्मिणी मैया की जय!
नग्नजीती के साथ, तो उसमें भी आठ,१६१०८ जो रानियां उनमें से आठ विशेष रानियां है। बिगनिंग विद रुक्मिणी, रुक्मणी से, रुक्मणी पहली हुई और फिर १६१०० और का एक सेट है। तो संक्षिप्त में नग्नजीती:- जो कौशल देश की थी, उनके साथ विवाह भगवान का होता है। उसके लिए भी भगवान ने अपना एक विशेष पराक्रम दिखाया है। उन बैलों को उन्होंने परास्त किया है, इनका दमन किया हुआ है। ऐसी शर्त थी नग्नजीत के पिता श्री की।
कालिंदी:- के साथ भगवान का विवाह होता है। यमुना का दूसरा नाम कालिंदी है। भगवान हस्तिनापुर जाते हैं द्वारका से और साथ में अर्जुन को लेते हैं और यमुना के तट पर जाते हैं तो वहां.. ये नदियां वैसे व्यक्तियां भी होती हैं, दे आर पर्सन्स आल्सो, केवल जल बह रहा है द्रवीभूत होके, वह भी है लेकिन यह सब नदियां,वे अलग-अलग व्यक्तित्व है, दे आर पर्सनैलिटीज़।
“गङ्गे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती।
नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु॥”
यह सब, तो उसमें से जो यमुना है कालिंदी उसका नाम,”कालिंद तन्य”,उसके पिता श्री भी है, कलिंद नाम के पर्वत से वह निकलती है/ उत्पन्न होती है इसलिए इसका नाम कालिंदी है। कालिंदी के साथ विवाह, कालिंदी को लेकर भगवान द्वारका लौटते हैं और कालिंदी के साथ विवाह।
नेक्स्ट, मित्रविंदा:-
अवंतिपुर या उज्जैन भगवान जाते हैं और वहां से मित्रविंदा नामक रानी को उसका अपहरण करके आते हैं पुनः द्वारका। शुभ मंगल और एक विवाह।
भद्रा:- रानी कैकई जहां की थी, केकय प्रदेश की भद्रा के साथ, ये सब दिखा रहे है ना? ओके, आप दर्शन भी कर रहे हो।
लक्ष्मणा:- के साथ मद्र मतलब मद्रास, एक समय का मद्रास अब मद्रास नहीं रहा। तो वहां की लक्ष्मणा के साथ भगवान का विवाह होता हैं।
इस प्रकार ये आठ अलग-अलग रानियों के साथ, पटरानियों के साथ भगवान के विवाह होने के उपरांत भगवान आगे बढ़ते हैं। देवताओं की मां/ मातेश्वरी अदिति के कान के कुंडल और छत्र भस्मासुर नॉट भस्मासुर, भौमासुर ने चोरी किए थे। तो देवता पहुंचे “मदद चाहिए, मदद चाहिए”। तो कृष्ण आगे बढ़े साथ में सत्यभामा को लेकर, प्राग्ज्योतिषपुर नाम का स्थान, असम की ओर पहुंचते हैं। ये भस्मासुर के बॉडीगार्ड मुरारी, मुर उसका नाम है। तो हत्या किए भगवान बॉडीगार्ड की तो भगवान बन गये मुरारी!कृष्ण मुरारी! यह मुरारी नाम काफी प्रसिद्ध है। ये मुर के अरि बने भगवान और उसका वध किया, फिर भस्मासुर का भी वध किये और प्राप्त किए कुंडल और छत्र, अदिति के। तब उनको स्वर्ग जाना था इनको हटाने के लिए, तो उस समय उनको यह पता चला कि १६,१०० राजकुमारी को बंदी बनाया भस्मासुर ने। भगवान कारागार में जाते हैं सब रानियों को, अभी रानियां नहीं बनी हैं वो कुमारियां ही हैं ,उनको दर्शन देते हैं। अब हमें कौन स्वीकार करेगा? प्रभु हमें स्वीकार कीजिए आप। तथास्तु! वैसे ही हो। भगवान ने इन सभी को स्वीकार किया है और इन सबको भेजते हैं भगवान पालकियों में वगैरह बिठाकर द्वारका के लिए और स्वयं भगवान स्वर्ग जाते हैं, लौटते हैं अदिति के कुंडल और छत्र। फिर लौटते-लौटते वहां का पारिजात वृक्ष, जो सत्यभामा को बहुत पसंद था, रुक्मिणी के महल के इर्द-गिर्द तो वह वृक्ष था लेकिन अपने महल में नहीं था। तो स्वयं के लिए वह चाहती थी तो स्वर्ग से लौटते-लौटते भगवान उस वृक्ष को भी लेकर द्वारका पहुंच जाते हैं। तब भगवान के १६,१०८ महलों में एक ही साथ विवाह हो जाते हैं। एक मंडप में नहीं, हर महल में मंडप (जैसे आप देख रहे हो) हर महल में एक-एक मंडप और विवाह यज्ञ संपन्न हो रहा है, हर महल में भगवान हैं। हरि हरि! तो १६,१०८ द्वारकाधीश बने हैं इतना ही नहीं, ये भगवान ही कर सकते हैं। वसुदेव और देवकी कृष्ण के माता-पिता वे भी हर महल में है। ऐसा विवाह संपन्न हुआ है इसका समाचार नारद मुनि को भी लगता है तो वह बड़े उत्कंठित थे, भगवान को द्वारका में और फिर हर महल में वह देखना चाहते थे। तो आगे नारायण! नारायण! स्पेस वेज़ नॉट एयरवेज या एयर इंडिया और दिस दैट । स्पेसमैन नारद मुनि, उनका शरीर ही विमान बनता है या एयरक्राफ्ट बनता है और अपनी इच्छा के अनुसार जहां चाहे वहां पहुंच सकते हैं, पहुंचते रहते हैं। स्वर्ग में जाते है, यहां तक की वैकुंठ या वृंदावन में जाकर उनकी शटल सर्विस चलती रहती है। तब वे जब यहां आते हैं द्वारका में, भगवान उनका “अतिथि देवो भवः” अतिथियों का ऋषि-मुनियों का बहुत सत्कार करने वाले भगवान और अब गृहस्थ भी बने हैं तो गृहस्थ धर्म में की अतिथियों का स्वागत/ सम्मान/ सत्कार/ उनकी सेवा ये गृहस्थों का धर्म है। अतः श्रीकृष्ण ऐसा आदर्श रखे हैं सारे संसार के समक्ष।
“नमो ब्रह्मण्य देवाय गो-ब्राह्मण हिताय च”
ब्राह्मण और गाय, कृष्णाय नमो नमः। नारद मुनि घर-घर जाते हैं, हर महल में जाते हैं, हर महल में उनका स्वागत होता है, हर महल में जाकर पूछताछ करते हैं कि कोई शिकायत तो नहीं है किसी भार्या या भगवान की पत्नियों की? तो १६,१०८ रानियों को संभाल रहे हैं, उनके भर्ता बन चुके हैं और वैसे हर परिवार में भगवान के 10-10 पुत्र भी थे। यह नहीं कि हम दो और हमारे कितने? हम दो हमारे दो । पहले हुआ करता था अष्ट
पुत्र सौभाग्यवती, नाउ दैट इस नॉट अलाउड। भगवान के तो हर परिवार में हर महल में १०-१० पुत्र थे। भगवान पालक बनके सभी को संभालते थे, सभी को प्रसन्न रखते थे। यह सब देखा नारद मुनि ने, इसका पूरा अध्याय ही है। भगवान कैसे प्रातः काल में उठते थे, मुर्गे हुआ करते थे नॉट अलार्म क्लॉक, “कुकडुकु…” । आपको क्या लगा कोई मुर्गा आ गया? इसको सुनते ही भगवान अपने पलंग से छलांग मार कर तैयार होते हैं और यहां तक की कई महलों में देखा नारद जी ने भगवान गायों का दान दे रहे हैं ब्राह्मणों को, कहीं पूजा- पाठ कर रहे हैं, ध्यान कर रहे हैं। भगवान के हर महल से एक-एक रथ निकलता है, उस रथ में १६,१०८ द्वारकाधीश उतने ही रथों में विराजमान होते हैं और वहां से प्रस्थान करते संसद भवन के लिए, फॉर द पार्लियामेंट। ही इज़ द्वारकाधीश, भगवान राजा बने हैं। द्वारका में जो द्वारकाधीश का मंदिर अब है, मंदिर जहां है जहां दर्शन करने के लिए जाते हैं यह संसद भवन/ पार्लियामेंट में हम वहां जाते थे। समुद्र में सब महल थे या समुद्र से घिरा हुआ था तो वहां से भगवान प्रतिदिन आते हैं संसद भवन, सभी रथों से उतरते हैं। जब संसद भवन में प्रवेश करना है तो १६,१०८ के एक द्वारकाधीश बनते हैं और दिनभर आके कार्यकलाप, कई सारी योजनाएं बनती है और सायंकाल को पुनः एक के फिर पुनः अनेक बनके भगवान १६,१०८ रथों विराजमान होकर जाते हैं। हर भगवान के रूप एक द्वारकाधीश रुक्मिणी का स्मरण कर रहे हैं, दूसरे सत्यभामा का स्मरण कर रहे हैं, तीसरे कालिंदी का स्मरण कर रहे हैं, सत्यभामा का स्मरण कर रहे हैं। उस महल में जो उनके पुत्र है १०-१० उनका स्मरण कर रहे हैं, लाइक दैट कृष्ण इज़ वेरी पर्सनल। हरि हरि!
एक समय सुदामा आ जाते है । पोरबंदर, अभी उसका नाम पोरबंदर हुआ है पर उस समय सुदामापुरी कहते थे। द्वारका के दक्षिण में सुदामा पुरी है वहां से आ गए सुदामा, रुक्मिणी और द्वारकाधीश जिस महल में निवास करते थे, उसी महल के समक्ष भगवान ने जब देखा है सुदामा को, भगवान दौड़ पड़े उनको मिलने के लिए। सुदामा को आलिंगन दे रहे हैं और दोनों आंसू बहा रहे हैं, प्रेम अश्रु । इस नंग-धड़ंग सुदामा को भगवान अपने महल में लेकर आते हैं और उसी आसन पर सुदामा को बिठाते हैं जिस आसन पर वे स्वयं रूक्मिणी के साथ विराजमान हुआ करते रहे। सुदामा के चरणों का पाद-प्रक्षालन करते हैं, वही जल अपने ऊपर छिड़कते हैं। हरि हरि! तुमने जरूर कोई भेंट लाई होगी? तो सुदामा ‘सुदामा चे पोहे’ लाये थे जो उसने थोड़ा छिपा के रखा था। उसने सोचा इस महल में कहां मैं निकालूं और दिखाऊं और दे दूं पोहे? चीप्ड राइस। तो भी भगवान ने उसको छीन के लिया ही, जैसे ही बस एक कण को ग्रहण किया तो रुक्मणी बोली,” बस! बस! डेट्स इनफ। ये बहुत मूल्यवान है और इसका बदला आप नहीं चुका सकते हो।” हरि हरि!
एक रात बिताए हैं सुदामा और उसी समय जब वे उज्जैन में थे अवंतीपुर में, एक ही गुरुकुल में दे वर स्कूलमेट्स/ फ्रेंड्स। वहां पर कल हम बता रहे थे कैसे ईंधन इकट्ठा करने के लिए कृष्ण के साथ सुदामा ही गए थे। उस रात्रि को बहुत देरी तक कृष्ण और सुदामा, बचपन की गुरुकुल के समय की कई सारी यादें एक दूसरे को सुना रहे थे। डू यू रिमेंबर? तुम को याद है? कृष्ण कहते हाउ कुड आई फर्गेट? मैं कैसे भूल सकता हूं? एक बात का स्मरण करते हुए उन्होंने बहुत सारा समय बिताया। हरि हरि! प्रातःकाल को सुदामा सुदामापुरी के लिए प्रस्थान करते हैं। रास्ते में उनको याद आती है, “ए क्या हुआ?” उनको उनकी पत्नी ने भेजा था जाओ तुम्हारे मित्र इतने धनवान है, तुम जाओगे तो जरूर कुछ धन देंगे या तुम ले आना धन/ फाइनेंशियल असिस्टेंस / मदद । तो रास्ते में जब वो लौट रहे थे तो उनको लगा, मैंने कुछ नहीं मांगा और भगवान ने मुझे दिया भी नहीं। स्पेशली मैंने कुछ नहीं मांगा इस बात से वो बड़े प्रसन्न थे। गुड बाय! तुमने कुछ भी नहीं मांगा, अच्छा हुआ। मैंने मांगा भी नहीं और दिया भी नहीं। सुदामा सोचते हैं कि भगवान ने जानबूझ कर मुझे कुछ धन वगैरह नहीं दिया, यह सोच कर कि यदि इसको मैं धनवान बनाऊंगा तो फिर ये मुझे भूल सकता है। ये शॉपिंग के लिए दुबई या इधर-उधर दौड़ सकता है। मेरी कथा वगैरह होगी हडपसर में तो कहेगा,”ओह! आई एम बिजी। मैं व्यस्त चल रहा हूं। नो टाइम, समय नहीं है। पुनः मिलेंगे।” ऐसा तो शायद मैं करूंगा धन प्राप्त होने से, तो भगवान ने मुझे बचाया। थैंक यू कृष्ण! थैंक यू! धन्यवाद! मुझे कुछ नहीं दिया। दिस इज़ सुदामा, यह है सुदामा। उनकी संपत्ति तो भगवान ही है। जब पहुंचे सुदामापुरी तो पहचान भी नहीं पाए कि कहां आ गया मैं? ये सुदामा पुरी है? इतने में उसने देखा सुदामा की धर्मपत्नी को जिसके पास पहले लगभग वस्त्र नहीं थे या फटे पुराने पहना करती थी। लेकिन अब उसने देखा यह तो बनारसी साड़ी पहने है, उसको पहचाना ही नहीं कि ये कौन है? हु इज दिस लेडी? फिर समझ गए कि ये उन्हीं की अपनी पत्नी है। भगवान ने जो वैभव द्वारका का था, वैसा ही वैभव से संपन्न सुदामा की सुदामा पुरी को किया। जो भी दिया था-
“पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति” |
भक्ति से दिया हुआ पत्रं पुष्पं फलं, कुछ किंचित सा, वह भगवान के लिए बहुत मूल्यवान होता है, भगवान उससे बहुत प्रसन्न होते है। जब सेतुबंधन / पुल को बनाया जा रहा था, रामेश्वरम से श्रीलंका, तो हनुमान एंड कंपनी बड़े-बड़े बोलर्डर्स या पहाड़ नीचे फेंक रहे थे जिस से पुल बन रहा था। उस समय एक गिलहरी भी अपनी भूमिका निभा रही थी, छोटी-सी रेती फ्रॉम द बीच कहो, उसमें जाती और लोट लेती/ लोटांगन अपने बालों में कुछ रेती के कण उठाती और बड़ी सावधानी से जाकर वह चट्टानों-पत्थरों के बीच में अपने शरीर को हिला के कुछ ५० ग्राम रेती को डाल देती। फील लाइक अ सीमेंट जैसा। इस बात को हनुमान ने देखा तो कहा,” क्या कर रही हो? गेट आउट। मरना है?” इस बात को जब राम देखे थे तो कहते हैं हनुमान कम हेयर, तो फिर हनुमान को समझाए-बुझाये थे श्री राम। गर्वाचे घर नेम इस खाली। उनके जो भी वचन थे, वह सोच रहे थे यह तो नगण्य गिलहरी क्या कर रही है? राम ने उसको जितनी शक्ति,सामर्थ्य, बुद्धि दी हुई है गिलहरी के शरीर में, उसका सारा समर्पण हो रहा है।
“मामेकं शरणं व्रज” या आत्मनिवेदनम सारा समर्पण, 100% सरेंडर/ शरणागति और समर्पण जैसा तुम्हारा भी है । तो राम के दृष्टि में ,आंखों में गिलहरी की सेवा और हनुमान की सेवा एक ही बराबर की है। भक्ति है तो सब कुछ है, भक्ति नहीं है तो सब जीरो या कुछ भी नहीं है। जय सुदामा! द्वारकाधीश की जय!
तो उद्धव जी परामर्श दिया करते थे श्रीकृष्ण को,उनके परामर्श के अनुसार ही कृष्ण जाते हैं और जरासंध का वध करते हैं राजसूय यज्ञ के पहले और वहां जरासंध ने जिन राजाओं को बंदी बनाया था उनको मुक्त करते हैं भीम के माध्यम से। यहां आप देख रहे हो जरासंध,दो आधे शरीर को जॉइंट /संध किया था। ये भगवान ही जानते थे इसलिए दिखा रहे ये देखिए २८ दिनों तक यह मलयुद्ध चलता रहा भीम और जरासंध का। भगवान ने दिखाया कि ऐसे-ऐसे उसको चीर दो, अलग करो। तन भीम ने उसके दो टुकड़े किए हैं और फेंक दिए इधर और उधर, उसी के साथ जरासंध का वध और फिर वे पहुंच जाते हैं राजाओं का उद्धार। कृष्ण पहुंच जाते हैं हस्तिनापुर, वहां राजसूय यज्ञ हो रहा था। तो किसकी अग्र पूजा होनी चाहिए? ये युधिष्ठिर महाराज नारद मुनि से पूछ रहे हैं, उनकी सलाह ले रहे हैं। तो नारद मुनि कहे ऑफकोर्स, और कौन?
“गोविन्दम आदि पुरुषम तम् महम भजामि”
“ईश्वर: परम: कृष्ण: सच्चिदानंद विग्रह: ।
अनादिरादिर्गोविंद: सर्वकारणकारणम्” ।।
ऐसे कृष्ण की ही तो अग्र पूजा होनी चाहिए। पूजा जब प्रारंभ हुई तो कृष्ण को विशेष आसन पर बिठाया है। उस समय शिशुपाल बहुत कुछ कहने लगा, बकने लगा, अपराध के वचन कहने लगा। ओके! वन.. टू.. थ्री..फोर.. नाइंटी…नाइनटी फाइव । उसको विशेष कुछ वरदान था कि सौ बार माफ है। लेकिन सौ से वन मोर टाइम या और एक बार ऐसा कुछ दोषारोपण की बात कहेगा तो फिनिश। भगवान ने उसी समय सुदर्शन! सुदर्शन का आवाहन किया है, सुदर्शन पहुंचा है और उसको शिशुपाल की ओर उसको भेजा है और इसी के साथ शिशुपाल का वध होता है। शिशुपाल और दंतवक्र यह भाई-भाई भी थे और यही थे जय- विजय। जो जय-विजय सतयुग में हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप बने थे, वे त्रेता युग में राम के समय रावण और सोनेवाला कौन? कुम्भकर्ण बने थे। अब द्वापर युग में वही जय विजय, दंतवक्र और शिशुपाल बने। तो शिशुपाल का जब वध होता है तो दंतवक्र उन दिनों में मथुरा के पास एक दतिहा नाम का ग्राम है जहां उनका निवास था। तो जैसे समाचार पता चला किसी ने शिशुपाल की हत्या की है। कृष्ण ने हत्या की थी तो वह उसका बदला लेना चाहता है, वह कृष्ण की हत्या करने के लिए तैयार है और इतना क्रोधित हुआ कि क्रोधांध होकर उसको पता ही नहीं चल रहा था कि अब कहां है कृष्ण इस समय?
या द्वारका किस तरफ है? जहां मैं जाकर कृष्ण का वध करूँ। तो संभ्रमित दंतवक्र उसकी मदद के लिए नारायण!नारायण! नारद मुनि आए, मे आई हेल्प यू सर? मैं आपकी सहायता करूं? यस! यस! यू नो मैं कृष्ण के पास पहुंचकर उनकी हत्या करना चाहता हूं। तो नारद मुनि कहे कि मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूं,तुम्हे वहां जाने की आवश्यकता नहीं है। मैं द्वारकाधीश को ही यहां लेकर आऊंगा, फिर तुम वध कर सकते हो। तो वैसा ही किए नारद मुनि। वे भगवान को दतिहा ग्राम, मथुरा के पास ले आए, उसी के साथ दन्तवक्र का वध होता है। एट सम प्वाइंट उसी समय भगवान कई बार वैसे द्वारका से कई अलग-अलग स्थानों पर जाते हैं, अलग-अलग प्रसंग या परिस्थिति या कारण बन जाते हैं। तो कुरुक्षेत्र भगवान गए हैं।
“धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः:”
यहां वे पार्थ के सारथी, पार्थ सारथी बने हैं और वहीं पर भगवान ने एक अद्भुत लीला जो ..
“या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता”
श्रीभगवान उवाच,भगवान भगवद गीता का उपदेश सुनाएं हैं हम सब के कल्याण के लिए। भगवद गीता मानो एक प्रेम पत्र ही था, भगवान ने उनका जो हम सब जीवों से प्रेम है उसी को प्रकट किया है उस पत्र में और लिखा है। ये भी कृष्ण की विशेष कृपा हम सभी के ऊपर। पुनः कृष्ण द्वारका में लौटते हैं हस्तिनापुर होते हुए, द्वारका में भगवान का पुनः आगमन। इसी द्वारका से या द्वारकाधीश से ही जय जगन्नाथ! जगन्नाथ बन जाते हैं। द्वारकाधीश जगन्नाथ-बलदेव-सुभद्रा बन जाते हैं। कृष्ण- बलराम-सुभद्रा अब जगन्नाथ- बलदेव-सुभद्रा बन जाते हैं। जगन्नाथ पुरी धाम की जय!
डाकोर मा कौन छै? डाकोर मा कौन छै? डाकोर मा राजा रणछोड़ छै। गुजरात में प्रसिद्ध मंदिर डाकोर कहलाता है, वहां द्वारकाधीश ही पहुंच गए मूर्ति के रूप में। बुढ़ाना बाबा, उसको कहे थे नेक्स्ट टाइम तुम आओगे? यह सोच रहा था कि अब तो मैं बूढ़ा हो चुका हूं, कई बार आया दर्शन के लिए द्वारकाधीश के लेकिन अब नहीं आ पाऊंगा, वह बहुत दुखी था। अब क्या होगा दर्शन नहीं होगा मुझे भविष्य में? तो भगवान कहते थे नेक्स्ट टाइम और एक बार तुम आ ही जाओ, बैलगाड़ी लेकर आओ। पता नहीं क्यों बैलगाड़ी लेकर आओ कहा? तो वह बैलगाड़ी लेकर गया, भगवान का रात्रि के समय जब शयन हुआ, पुजारियों ने भगवान को विश्राम कराया, तो भगवान उस बैलगाड़ी में जाकर लेटे और बुढ़ाना चला रहा था उस बैलगाड़ी को। रास्ते में भगवान ने सोचा कि ये थका होगा तो बुढ़ाना बाबा को पीछे आकर विश्राम करने के लिए कहा, भगवान स्वयं ही बैलगाड़ी को चलाते रहे और चलाते-चलाते वे जहां डाकोर है वहां तक आए और फिर वहीं रह गए द्वारकाधीश, ये एक बहुत बड़ा धाम बन चुका है। फिर उडुपी के कृष्ण भी द्वारका से ही आए और माधवाचार्य ने वहां कृष्ण की स्थापना की और ये एक बहुत विशेष धाम है। उडुपी कृष्ण की जय!
और फिर द्वारका से ही भगवान द्वारकाधीश पंढरपुर जाते हैं। पहले रुक्मणी जाती है रूठ के, रूठी हुई मानिनी बनी हुई रुक्मिणी , पंढरपुर के चंद्रभागा के तट पर डिंडीर वन में जाकर रहने लगी। उसकी खोज में द्वारकाधीश गए और फिर आगे क्या-क्या हुआ, यह आने वाले कई दिनों में हम आपसे वार्तालाप करने वाले हैं।
पंढरपुर धाम की जय!
श्री श्री विट्ठल रुक्मिणी की जय!
राधा पंढरीनाथ की जय!
श्री राधा वृंदावनचंद्र की जय!
राधा कुंज बिहारी लाल की जय!
निताई गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल।
