
Srimad Bhagavatam
06.03.31
11-03-2025
ISKCON Kolkata
सो टेंपल फुल, यह हर्ष का विषय है, क्या? टेंपल फुल होना। पहले तो सिनेमा घर फुल होते थे, हाउस फुल। जमाना बदल गया, गुरु और गौरांग ने , गौरांग महाप्रभु और श्रील प्रभुपाद ने कुछ संसार में परिवर्तन लाया है, सम रेवोल्यूशन इन कॉन्शसनेस, भावों की/ विचारों की क्रांति का अनुभव ही हम यहां कर रहे हैं। जब देखते हैं इतनी संख्या में भक्त, भागवत कक्षा में, ड्यूरिंग मॉर्निंग आवर्स में पहुंच चुके हैं।
राधा गोविंद देव की जय! निश्चित ही श्रील प्रभुपाद भी प्रसन्न है आप सबको देखके इतनी बड़ी संख्या। हरि हरि!
“नित्यं भागवत सेवया” के अंतर्गत, ये सेवा भी हम सभी को, पूरे संसार को करनी है। श्रील प्रभुपाद ने केवल हमको भागवत ही नहीं दिया, सारे संसार को भागवत दिया। प्रभुपाद जब विदेश जा रहे थे, तो किसी ने पूछा कि” स्वामी जी! स्वामी जी! यू आर गोइंग टू द वेस्ट? तुम अमेरिका जा रहे हो?” तो उस समय प्रभुपाद कहे थे,”नो! नो! नॉट मी, श्रीमद्भागवतम जा रहा है विदेश,मैं तो पीछे-पीछे जा रहा हूं, साथ में जा रहा हूं।” ऐसे प्रभुपाद के भाव और विचार भी थे। भक्त स्वयं तो सेवा करते ही है और साथ ही साथ महाभागवत श्रील प्रभुपाद के भी सेवा करते हैं। उनके वाणी का, उनके आदेशों का पालन करते हैं, उसी के साथ उनकी भी सेवा हो जाती है। वैसे भी देरी हो चुकी है तो मंगलाचरण और यह सब,” जय राधा माधव” इतना लंबा खींचा तो कथा कितनी लंबी -चौड़ी होगी? शायद आप सोचते होंगे, ओ बाप रे बाप! कैसे होगा? क्या हाल होगा हमारा? संभावना है क्या ऐसे सोचते होंगे। वैसे आई एम रीडिंग योर माइंड, ओके, लेट्स क्विकली स्टार्ट। तो यह ग्रंथराज श्रीमद् भागवत का छठवां स्कंध, तृतीय अध्याय – इस अध्याय का नाम “यमराज द्वारा अपने दूतों को आदेश”। पीछे कहिए
“तस्मात् सङ्कीर्तनं विष्णोर्जगन्मङ्गलमंहसाम् ।
महतामपि कौरव्य विद्ध्यैकान्तिकनिष्कृतम्”॥ ३१ ॥
शब्दार्थ और तात्पर्य श्रील प्रभुपाद द्वारा- श्रील प्रभुपाद की जय।
शब्दार्थ-
तस्मात् — अतः ; संकीर्तनम् — भगवान विष्णु के पवित्र नाम का सामूहिक जप ; विष्णुः — भगवान विष्णु का ; जगत – मंगलम् — इस भौतिक संसार में सबसे शुभ कर्म ; अन्हा साम् — पाप कर्मों के लिए ; महताम् अपि — चाहे वे कितने भी बड़े हों ; कौरव्य — हे कुरु वंश के वंशज ; विद्धि — समझो ; ऐकान्तिका — परम ; निष्कृतम् — प्रायश्चित।
भाषांतर और तात्पर्य श्रील प्रभुपाद द्वारा,
श्रील प्रभुपाद की जय!
श्री शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा:- हे राजन! भगवान के पवित्र नाम का कीर्तन बड़े से बड़े पाप के फल को भी उन्मीलित करने में सक्षम है। अतः संकीर्तन आंदोलन का जप करना समस्त ब्रह्मांड में सबसे शुभ कर्म है। कृपया इसे समझें ताकि अन्य लोग भी इसे गंभीरता पूर्वक ग्रहण कर सकें।
तात्पर्य- ध्यान से सुनिए
हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि यद्यपि अजामिल ने नारायण नाम का अपूर्ण रूप से जप किया था, फिर भी वे सभी पाप कर्मों से मुक्त हो गए थे। पवित्र नाम का जप इतना शुभ है कि यह सभी को पाप कर्मों के फल से मुक्त कर सकता है। यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि हरे कृष्ण का जप करके कर्म कर्मों के फल को निष्प्रभावी करने का प्रयास किया जाए। बल्कि, सभी पापों से मुक्त रहने के लिए अत्यंत सावधान रहना चाहिए और कभी भी हरे कृष्ण मंत्र का जप करके पाप कर्मों का प्रतिकार करने का विचार नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह एक और अपराध है। यदि कोई भक्त अनजाने में कोई पाप कर्म कर बैठता है, तो भगवान उसे क्षमा कर देंगे, लेकिन जानबूझकर पाप कर्म नहीं करने चाहिए।
हरि हरि! “अंह्साम” यह शब्द भी महत्वपूर्ण है,अंह्साम का अर्थ है- पाप कर्मों के लिए, हमें क्या नहीं करना चाहिए? निष्कृतम – दो शब्द है। हरि नाम का उपयोग-
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे,
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे,
इसका प्रायश्चित के लिए उपयोग नहीं करना चाहिए। ये एक नाम अपराध भी है- हरिनाम के बल पर क्या करना? पाप करना, पर वैसे लोग करते रहते हैं। हरिनाम में इतना बल है, ऐसे ही चलता रहता है वैसे या गंगा मैया में इतनी शक्ति/ सामर्थ्य है हमारे सारे पापों को साफ-सुथरा कर देगी, ऐसे कई सारे कार्य भी है जिसको कर्मकांड कहा जाता है। प्रायश्चित के कर्म कर्मकांड भी कहलाते हैं। प्रायश्चित पाप करो और पश्चाताप करो। पश्चाताप आप सुने ये शब्द? पश्चात ताप, बाद में थोड़ा शोक करते हैं, कष्ट होता तो कहते ओह क्यों किया? क्यों किया पाप? अभी तो कुंभ आने ही वाला है, मैं क्या करूंगा? संगम पर जाऊंगा, डुबकी लगाऊंगा और मेरे पाप धुल जाएंगे या पाप का फल धुल जाएगा। फिर बैक टू नॉर्मल बिजनेस एज यूजुअल, जिसको कहते हैं।
हरि हरि! हरे कृष्ण!
राजा परीक्षित ने (या संक्षेप में आपको बैकग्राउंड बताते हैं कि यहां तक यह कथा कैसे पहुंच गई) संक्षेप में/ ब्रीफेली। पांचवे स्कंध के अंत में, शुकदेव गोस्वामी ने अलग-अलग नरको का वर्णन किया, 28 नरक है और ये सचमुच है और वहां यातना यभोगनी पड़ती है, पाप का फल भोगना पड़ता है। किस प्रकार के यातना वहां होती है इसको जब राजा परीक्षित सुने तो या यदि और कोई भी सुने, तो रोंगटे खड़े हो जाएंगे- रियली सो मच सफरिंग। राजा परीक्षित को आई दया, वे दयालु है ही ,ये नहीं कि दया नहीं थी फिर आ गई दया,ऐसा नहीं। वे दयालु है, कृपालु है ही।
‘साधव: साधुभूषणा: तितिक्षव: कारुणिका: सुहृद: सर्वदेहिनाम्”
’ऐसे साधु राजा परीक्षित भी थे, वे सोच रहे थे कि क्या करना चाहिए था कि लोगों को नरक में जाने की आवश्यकता ही नहीं हो, जाना ही ना पड़े । नरक की यात्रा , नरक में कोई जाना चाहता है कोई? कोई जाना नहीं चाहता तो कैसे बचा जाए? …….
फिर छठवें स्कंध के प्रारंभ में, यह प्रारंभ ही है, तीसरे अध्याय में हम पहुंचे है। इस स्कंध के प्रथम अध्याय में जब राजा परीक्षित ने पूछा कि क्या किया जा सकता है ताकि ये यम यातना, यमपुरी के जो कष्ट है इनसे बचा जाए? तो शुकदेव गोस्वामी थोड़ा परीक्षा लेना चाहते थे कहो तो उन्होंने कहा,”प्रायश्चित किया जाए”, पाप किया तो उसके बाद प्रायश्चित करो। फिर उस पाप का फल भोगना नहीं होगा, किंतु वैसे राजा परीक्षित परीक्षा पास हो गए, वैसे भी उन्होंने परीक्षा पास की ही थी जब वे जन्मे थे इसलिए उनका नाम परीक्षित पड़ा था।
‘न मे भक्तः प्रणश्यति’
भगवान ने अपना वचन सत्य किया। ये सारा इतिहास और सब लीलाएं तो हैं। राजा परीक्षित के लिए भगवान बन गए सहोदर, उदर में साथ में आ गए/ पहुंच गए। वहां राजा परीक्षित तो थे ही पर भगवान भी वहां आ गए राजा परीक्षित की रक्षा के लिए और सहोदर कहलाये। भगवान अपना कार्य सफल किए, रक्षा की राजा परीक्षित की और अंतर्ध्यान हुए। फिर जब जन्म होता है राजा परीक्षित का, ये दूसरी कथा शुरू हुई है। वे हर व्यक्ति की ओर जब वह देखते थे तो कहते थे, क्या ये वो ही है जिनको मैंने गर्भ में देखा था? “नेति नेति” न इति। न इति को साथ में कहने से नेति-नेति होता है अर्थात यह भी नहीं है, यह भी नहीं है। हाँ, ये हैं भगवान शायद उन्होंने भगवान की तस्वीर देखी होगी । फिर भगवान को वे मिलते भी है। तो परीक्षा पास किए थे और उत्तीर्ण हुए थे, यह परीक्षा भी पास किए जब उनको कहा गया था कि प्रायश्चित करना चाहिए। तो राजा परीक्षित ने कहा
“मन्ये कुंजर शौच वत” यह प्रायश्चित की बात आप जो प्रस्तुत कर रहे हो मुझे लगता है यह कुंजरवत शौच वत है। कुंजर मतलब हाथी और शौचवत यानि हाथी के स्नान जैसी बात है। प्रायश्चित करना मतलब क्या है? हाथी के स्नान जैसी बात है। क्या बात है? हाथी जब स्नान करता है तो साफ-सुथरा हो जाता हैं। हम जब पदयात्रा कर रहे थे तो हमारे साथ एक हाथी भी था और एक ऊंट भी था। हथिनी थी उसका नाम लक्ष्मी था। हाथी आता है, नदी-तालाब के किनारे आता है और क्या करता हैं? वहां की सारी धूल उठाता हैं सूंड से और अपने आपको गंदा कर लेता। पहले जितना गंदा था पुनः और गंदा हो गया। वह शायद सोचता होगा कि पुनः मुझे स्नान करना ही है, पुनः स्नान करूंगा, दोबारा स्नान करता है और फिर पुनः क्या करता है? किनारे आकर धूल फेंकता है। प्रायश्चित करने वालों की यह बात होती है, पाप करते हैं फिर पाप के फल से मुक्त होने के लिए कुछ प्रायश्चित करते हैं, कई सारे प्रायश्चित भरे पड़े हैं। प्रायश्चित के कई सारे प्रकार हैं कर्मकांड में। इसलिए गौडीय वैष्णव तो कहते हैं
“ज्ञान कांड, कर्मकांड केवल विषयेर भांड”
यह कर्मकांड-ज्ञानकांड तो विष का प्याला है। राजा परीक्षित को यह बात मंजूर नहीं थी प्रायश्चित की बात। पाप करने के बाद फल तो चखना पड़ेगा ही तो उससे कैसे बचा जाए? तो प्रायश्चित करने शुकदेव गोस्वामी कहे थे लेकिन राजा ने कहा यह तो कुंजर शौचवत स्नान हो गया। इसलिए भी शुकदेव गोस्वामी राजा परीक्षित को यह सारा अजामिल उपाख्यान समझाए तीन अध्यायों में, जिसमें जैसे यहां पर आज के श्लोक में भी तस्मात् कंक्लुजन चल रहा है। यह उपाख्यान वैसे तीन अध्याय में पूरा होने वाला है। पहला, दूसरा और फिर यह तृतीय अध्याय है छठवें स्कंध का और स्कंध के अंत में वैसे शुकदेव गोस्वामी कंक्लुजन कह रहे हैं, नॉट प्रायश्चित । प्रायश्चित उपाय नहीं है, तो उपाय क्या है?
“तस्मात् सर्वेषु कालेषु माम् अनुस्मर युद्ध च””
क्या करना चाहिए? कीर्तन करना चाहिए।” तस्मात् संकीर्तनं विष्णु:” संकीर्तन करना चाहिए। वैसे संकीर्तन करने से उसमें प्रायश्चित भी हो ही जाता है अनायास या अलग से कोई अनुष्ठान प्रायश्चित का करने की आवश्यकता नहीं है। हरिनाम पूर्ण है इसलिए चैतन्य महाप्रभु तो कह ही रहे हैं,
“हरेर नाम एवं केवलं”
हरिनाम करोगे तो क्या होगा?
“चेतो दर्पण मार्जनम”
अपनी चेतना के दर्पण का मार्जन करेगा यह हरिनाम।
“भव महदावाग्नि निर्वापनम”
दावाग्नि, संसार में जो आग लगी है,उसको बुझाएगा कौन? अंत में कहने वाले हैं भगवान वैसे
“परं विजयते श्रीकृष्ण संकीर्तनम्”
इसे प्रथम शिक्षाष्टक के अंत में कहा है ‘परं विजयते श्रीकृष्ण संकीर्तनम्। तो उससे पहले इसी शिक्षाष्टक में सात बातें या सात उसके विशेषण बताएं हैं,हरिनाम का विशेषण। विशेष्य है संकीर्तन, हरिनाम का विशेषण या वैशिष्ठय/ महिमा या महात्म्य कहो तो सात अलग-अलग माहात्म्य समझाए हैं। स्वयं भगवान ही, गौरांग समझा रहे हैं।
“कलेर दोष निधे राजन अस्ति एको महान गुण: कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसंगः परम व्रजे”
शुकदेव गोस्वामी भी कहे। अभी तो छठे स्कंध में पहुंचे हैं जब वह भागवत के अंत में, बारहवें स्कंध के भी अंत में पहुंचेंगे तो वह कहने वाले हैं, एक तो कलि के लक्षण भी वह कहेंगे पूरा अध्याय ही है और फिर कहेंगे कलेर दोष निधे राजन। कलि तो दोष का भंडार है, इट्स अ बिग गोडाउन, दोष ही दोष हैं इस कलयुग में या कलि के सारे अवगुण ही अवगुण है किंतु एक महान गुण है। इस कलि का एक महान गुण है वह क्या है?
कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसंगः परम व्रजे कीर्तन से, केवल कीर्तन से ही नहीं, मुक्त संग् परम ब्रजेत। थोड़ा और ध्यान देंगे तो शुकदेव गोस्वामी कह रहे हैं, “कीर्तनात एव” तो एव क्या होता है संस्कृत में? ओनली/ केवल। जैसे हरेर नामेव केवलम कहा है, तो शुकदेव गोस्वामी भी कह रहे हैं कीर्तनात एव, एव कहे बिना भी बात बन सकती थी लेकिन उनको जोर देना है केवलम। कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसंगः व्यक्ति मुक्त होगा और आगे भक्त भी होगा। वैसे भागवत में शुक्राचार्य भी वामन भगवान को कह रहे हैं आपका जो कीर्तन है,कीर्तन की महिमा वो भी सुना रहे हैं या कीर्तन करते समय हमसे कुछ त्रुटि रह जाती है, मंत्रतः या जो भी धार्मिक अनुष्ठान होते रहते हैं,
मन्त्रतस्तन्त्रतश्छिद्रं देशकालार्हवस्तुतः ।
सर्वं करोति निश्छिद्रं नामसंकीर्तनं तव ॥
शुक्राचार्य कह रहे हैं जब हम कोई भी अनुष्ठान करते हैं कई सारे अनुष्ठान/ धार्मिक अनुष्ठान कार्यकलाप होते रहते हैं, विधि-विधान को हम अपनाते रहते हैं, किंतु यदि इस विधि-विधान में कोई त्रुटि रह गई, तो मंत्रत: मंत्र की दृष्टि से या मंत्र का उच्चारण ही नहीं हुआ, या मंत्र के साथ तंत्र भी जुड़े होते हैं, सिस्टम या प्रोसिजर होते है उसमें भी कोई दोष रहा,
“मन्त्रतस्तन्त्रतश्छिद्रं देशकालार्हवस्तुतः” और कौन-कौन से आइटमों में छिद्रम? देश-काल-अर्ह (पात्रता)- वस्तुतः (जो पैराफिनलिया है) प्योर घी की जगह डालडा ही हमने डाल दिया। तो हर बात में सावधानी बरतनी चाहिए किंतु कोई त्रुटि रह गई जैसे शुक्राचार्य कह रहे हैं “सर्वं करोति निश्छिद्रं” कोई छिद्र रह गया था कुछ लूपहोल/ कुछ फ्लॉज़/ कोई कमी या कोई त्रुटि, मंत्र की दृष्टि से, तंत्र की दृष्टि से, सामग्री की दृष्टि से, मुहूर्त भी गलत रहा और स्थान भी कुछ ऐसा ही ऊटपटांग रहा, तो यह सब को सुधार देता है, क्या? इन छिद्रों को निश्छिद्रं बनाता है कौन? नाम संकीर्तन तव अनुसंकीर्तनम तव। प्रभु आपका जो नाम है यह सभी को निश्छिद्रं कर देता है।
तो पाप करने वाले जो जन होते हैं और संसार के लोग तो
‘दीन हीन यत छिलो, हरिनाम उद्धारिलो, तार साक्षी जगाइ मधाई”
उन्होने कौनसा पाप नहीं किया था? वैसे वो पापियों में नामी थे/ पापियों में नामी पापी थे, नामी मतलब पाप करने में उनका नाम है। गौर नित्यानंद ने दर्शाया, एक प्रकार से डिमांस्ट्रेशन दिया, देखो देखो अब हरिनाम का परिणाम देखो। तो आन द स्पॉट ऐसे उनका उद्धार किये गौरांग और नित्यानंद प्रभु।
‘हरिनाम उद्धारिलो, तार साक्षी, इसका कोई सबूत भी है? हां हां है कौन है? जगाई मधाई। अब यह कलयुग आ गया प्रभु! प्रभु या पिताश्री, नारद जी कह रहे ब्रह्मा जी को, अब कौन सा उपाय अपनाना चाहिए? मैं तो प्रचारक हूं। आई एम द प्रीचर, मैं कंट्री टू कंट्री, नहीं प्लेनेट टू प्लेनेट, इंटरप्लेनेटरी ट्रेवल मेरा चलता रहता है और मैं सर्वत्र इस भारतवर्ष का/ दैट इज नॉट ओनली दिस प्लेनेट भारतवर्ष, भारतवर्ष भी तो सप्त वर्ष है। तो यहां का मैं प्रीस्ट, चीफ प्रीस्ट या पुरोहित हूँ। तो मुझे बताइए क्या करना चाहिए इस कलयुग में जिसे मैं बताऊं सबको? आप मुझे बताइए मैं सबको बताऊंगा। तो ब्रह्मा जी कहे थे, वह संवाद है ये कलिसंतरण उपनिषद में –
“ओम
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण
हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे
इति षोडशकम् नाम्नाम् कलि कल्मष नाशनम्:
नातः परतरोपायः सर्व वेदेषु दृश्यते:॥”
यह जो 16 शब्द 32 अक्षर वाला जो नाम मंत्र है, यह क्या करता है? कलि कल्मषनाशनम्, कलि के कल्मष का नाश करता है। फिर आगे ब्रह्मा जी आगे कह रहे हैं,
“नातः परत: न अतः” नहीं है अतः मतलब इससे बढ़िया या परतर;/ बैटर/ (परत तर तम चलता रहता है) न अतः परतरो उपाय/ दूसरा कोई उपाय नहीं है। आप कौन है ऐसा कहने वाले?
‘सर्ववेदेषु दृश्यते:’ मैं ही तो पहला व्यक्ति था जिसको भगवान ने ‘तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये’ , मैं आदि कवि कहलाता हूं,ऐसा कहा है भागवत में तो ऐसा व्यक्ति मैं कह रहा हूं ये हरिनाम के अलावा और कोई उपाय नहीं है।हरि हरि बोल!
सर्ववेदेषु दृश्यते:” सर्ववेदेषु- सभी वेदों में न दृश्यते- नहीं है/ है नहीं तो कैसे दिखाई देग हरि हरि! तो ये प्रायश्चित को भूल जाओ और क्या करो? हरिनाम करो।/,”हरि नाम करो रे” ।
हम प्रायश्चित करते हैं फिर पाप करते हैं फिर प्रायश्चित करते, पाप करते, प्रायश्चित करते तो होता क्या है?
“विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः”
हम लोग थोड़े दूर रह जाते हैं, प्रयास तो करते हैं इंद्रियों के जो विषय है, इंद्रियों के जो विषय है शरीर में तो इंद्रियां है, शरीर इज़ इक्विपड विथ द सेंसेस, ज्ञानेन्द्रियां और सारा संसार भरा पड़ा है किनसे? इंद्रियों के विषयों से, देट्स ऑल। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध यह विषय है। ये मॉल बन रहा है, हर जगह देखते हैं कुछ लोग बिक्री-विक्री खरीदी चलती रहती है, रास्ते में देख रहे थे। एवरी टाइम एवरी प्लेस लोग अपने घर भी दुकान बना रहे हैं और क्या रास्ते में दुकान हैं। पहले छोटे-छोटे दुकान हुआ करते थे अभी मोटे-मोटे हो गए। तो क्या इस से लोग अधिक सुखी हो गए क्या? आई वाज़ इन चाइना, कुछ साल पहले। तो मॉल के सामने लिखा था, “आफ्टर एंड ऑफ द डे, स्पेंड टाइम विथ अस” मॉल वाले कह रहे थे। दिन-भर धन कमाओ और शाम को आ जाओ शॉपिंग के लिए या धन गंवाओ। कमाओ और फिर गंवाओ, स्पेंड टाइम विद अस। दुनिया तो पागल है, इट्स अ मैड मैड मैड वर्ल्ड, बैड बैड बैड वर्ल्ड। प्रयास तो होता है जो धार्मिक लोग है कुछ तपस्या इत्यादि करते रहते हैं, कुछ धार्मिक कृत्यों को अपनाते हैं, कुछ शम:, दम:, तप:, चलता रहता है। शम: सेंस कंट्रोल, दम: माइंड कंट्रोल, तप: तपस्या, इससे थोड़ा दूर तो रह जाते हैं, विषयों से दूर रहने का प्रयास तो होता है। किंतु ‘रसवर्जं रसोऽप्यस्य’ किंतु उनका इन विषयों के प्रति जो आकर्षण है/ प्रीति है वह अभी तक समाप्त नहीं हुई है। जो चाह है, चाय नहीं चाह। दिल मांगता है, मांगता रहता है।
“रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते”
हायर टेस्ट, ऊंचा स्वाद, एक सिगरेट की कंपनी दे आर एडवरटाइजिंग, हम ऊंचा स्वाद देते है। हमारा जो ब्रांड है सिगरेट का उसको जब हम फूंकते हैं तो एक विशेष स्वाद ऊंचा स्वाद मिलता है। कुंभ मेले में गए तो वहां लिखा था “अमृत तुल्य चाय”, वहां लोग जा रहे थे कुंभ मेले का जो संगम में अमृत है वो प्राप्ति के लिए, रास्ते में “अमृत तुल्य” नो नो यू डोंट गो देअर, वहां जाने की जरूरत नहीं। अमृत तुल्य चाय यहां है। यह सब चलता ही रहता है। हम बद्रिकाश्रम गए तो वहां भी चाय पहुंच गई व एक स्थान पर लिखा था “भारत की चाय की आखिरी दुकान”। यू बैटर ड्रिंक द टी, इसको क्रॉस करके आगे हू नोज़ क्या होगा? यह जंगल है यह पहाड़ है, तो
हरि हरि!
“परम दृष्टवा निवर्तते” इसकी जरूरत है ऐसे कृष्ण कहे हैं, परम याने हायर टेस्ट, ऊंचा स्वाद। हरिनाम का स्वाद या भगवान का स्वाद, भगवान मधुर है,भगवान कैसे हैं?
“मधुराधिपते अखिलम मधुरम,
मधुराधिपते अखिलम मधुरम्”
हरि हरि! भगवान के संबंध की हर बात मधुर है, स्पेशली कृष्ण अपने माधुर्य के लिए प्रसिद्ध है। वृंदावन का माधुर्य या वृंदावन धाम को ही माधुर्य धाम कहते हैं। कृष्ण का वेणु माधुर्य, कृष्ण स्पेशली, कृष्ण में ऐसे कुछ चार गुण है जो और किसी अवतार में नहीं, राम में भी नहीं, नरसिंह में भी नही, विष्णु में भी नहीं है। चार एडिशनल क्वालिटी, 60 क्वालिटीज तो सभी में है सभी अवतार में, लेकिन चार क्वालिटीज़ भक्तिरसामृतसिंधु में रूप गोस्वामी बताए हैं। भक्तिरसामृतसिंधु : द साइंस ऑफ भक्ति योग/ भक्ति योग का शास्त्र जिसमें कहते हैं कृष्ण का वेणु माधुर्य, शब्द भी कितना अच्छा है माधुर्य,वैसे मधुरता भी कहते हैं बट आई लाइक माधुर्य । दोनों शब्द एक ही है मधुरता और माधुर्य, माधुर्य हाउ डज़ इट साउंड? अच्छा लगता है आपको? माधुर्य। तो भगवान का वेणु माधुर्य और कृष्ण का क्या? पहले रूप को लेते हैं भगवान का रूप माधुर्य, भगवान का सौंदर्य, ही इज़ द मास्टर पीस ऑफ ब्यूटी। जब उनको स्वयं के लिए ही रूप बनाना था, यह नहीं कि नहीं था बन गए एक दिन मे , तो उन्होंने अपनी सारी कलाकारी इन्वेस्ट की हुई है, उस रूप के निर्माण या बनाने में और ऐसा रूप/ ऐसा स्वरूप मधुर रूप बनाए “यः कर्षति सः कृष्ण”। वैसे और भी कहने चाहिए थे। तो वेणु माधुर्य, रूप माधुर्य और क्या? लीला माधुर्य, लीला फिर बाल लीला भी है, माखन चोरी लीला कुछ कम मधुर है क्या? या सख्य रस के लीलाएं हैं, वात्सल्य रस की मधुर लीलाएं हैं और इन सभी में माधुर्य रस की
“परकीया भाव जहा ब्रजे ते प्रचार”
परकीया भाव का जो प्रचार वृंदावन में होता है और कई नहीं होता, द्वारका में भी नहीं होता, वैकुंठ में तो भूल ही जाओ और फिर क्या बच गया? फोर्थ वन चौथा जो विशेष गुण है भगवान का प्रेम माधुर्य…….।
इस भगवान की शरण में आओ, इस भगवान की शरण में आओ। वैसे व्यक्ति यदि सुनेगा, समझेगा, अनुभव करेगा कृष्ण को, तो वे मान जाएगा। जहां चमत्कार वहां क्या होता है? नमस्कार। कृष्ण के माधुर्य -वेणु माधुर्य, लीला माधुर्य,,रूप माधुर्य, प्रेम माधुर्य बड़ा अद्भुत है/ चमत्कृत है। इसको जो समझेगा इसका आस्वादन जो करेगा, वो फिनिश्ड,ही इज़ फिनिश्ड विद दिस वर्ल्ड। परं दृष्ट्वा क्या? परं दृष्ट्वा निवर्तते। परम दृष्टवा या परम आनंद कहो या परम स्वाद कहो, परम स्वाद का अनुभव जो करेंगे फिर परं दृष्ट्वा निवर्तते, फिर हम सदा के लिए मुक्त होंगे। पुनः हम,पुनर मुश्क: भवः , पुन:चूहा नहीं बनेंगे या पुनः पुनः हम,
“पुनरपि जननं पुनरपि मरणं, पुनरपि जननी जठरे शयनम्”,
इह संसारे बहुदुस्तारे, कृपयाऽपारे पाहि मुरारे”॥
यह भी नहीं होगा और पुनः पाप नहीं करेंगे। पाप किया प्रायश्चित किया, पाप किया प्रायश्चित किया। हरि हरि! यह सब को वंस एंड फॉर ऑल रोका जा सकता है।
“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे”
लेकिन कैसे करना होगा यह नाम जप यह नाम कीर्तन?
“अपराध शून्य होइया लहो कृष्ण नाम”
अपराध शून्य होइया लहो कृष्ण नाम। तो नाम के बल पर पाप करना यह एक अपराध हुआ जिसकी चर्चा थोड़ी यहां हो रही है, नाम के बल पर पाप करना या किसी भी धार्मिक कृत्य के बल पर या किसी भी धार्मिक तदीय, हम चर्चा कर रहे हैं तदीय। भगवान के तदीय होते हैं। गंगा भी क्या है? तदीय है। तुलसी महारानी की जय! ये तदीय है। और क्या है? गौ माता की जय! हो गया? तो इनकी आराधना भी मदीय-तदीय की आराधना करके, उसमें वैसे भक्तों की भी आराधना करनी चाहिए। भक्तों के चरणों में अपराध है नंबर वन, नंबर वन है। अपराध कौन सा है जो करने में वी आर वैरी एक्सपर्ट? बड़े कुशल हैं हम लोग। बाएं हाथ का खेल है हमारे लिए, बाएं हाथ का खेल। बड़ी आसानी के साथ, दिस इस वेरी नेचुरल टू कमिट ऑफेंसेस एट दी फीट, ओर व्हाटेवर,चीक्स और..।
“भज गौरांग कहो गौरांग लहो गौरांगेर नाम रे”,
जे जना गौरांग भजे से आमार प्राण रे” बात इतनी-सी है। इतनी-सी मतलब छोटी नहीं, मोटी बात है। है तो इतनी-सी इतनी-सी लेकिन है बहुत मोटी बात है। जे जन गौरांग भजे वह कौन है? अमार प्राण रे। वह दिन कब आएंगे?
“सेइ दिन कबे हबे से दिन अमार।
अपराध घुचि हरिनामे रुचि,
अपराध घुचि हरिनामे रुचि
कबे हबे सेई दिन अमार?”
व्हेन वुड दोस डेज बी माइन? वह मेरे दिन कब आएंगे जब मैं निरपराध बनूंगा/ निरपराध सेवा करूंगा? और सेवा भी भगवान की और भगवान के भक्तों की करनी है, तदीयों की भी करनी है,भक्त भी तदीय है। या गंगा भी तदीय है, शिवजी भी तदीय है। यस!यस! हो सकता है हम शिव जी के चरणों में अपराध करते होंगे। दूसरा नाम अपराध है, समझते नहीं कम से कम,
“वैष्णवानां यथा शम्भुः निम्नगानां यथा गङ्गा”
हरि हरि! तो हमें स्वर्ग वगैरह नहीं जाना है। पाप करते हैं, पाप के बाद वैसे पुण्य करते हैं। पाप करते हैं और टू न्यूट्रलाइज पाप या पाप के रिएक्शन को फिर हम पुण्य करते हैं। पाप करते हैं पुण्य करते हैं पाप करते हैं पुण्य करते हैं पाप करते हैं। लेकिन हमें करना क्या है? हमें भक्ति करनी है।
“ज्ञानकर्म्माद्यनावृतम्”
ज्ञानकर्म्माद्यनावृतम् – ज्ञान और कर्म से परे पहुंचकर। कलयुग में नाम संकीर्तन है या धर्म ही कहो इसे जो नाम संकीर्तन है। तो भगवान ने यह धर्म दिया है हम सबको, हरि हरि! हमसे प्रभुपाद कहे, यू आर गोइंग टू गॉड हैड, भगवत धाम लौटना है, भगवत धाम लौटना है, यह बात नई तो नहीं है। लेकिन प्रभुपाद इसको इतना प्रकाशित किए, इतना जोर दिए, इतना स्मरण दिलाए सारे संसार को। हमें जाना कहां है? चलो कोलकाता चलो या क्या कौनसा मैदान है? या विधानसभा चलो, कोई यह कहे कि दिल्ली चलो। ऐसे कहीं-कहीं पर ले जाते हैं हमारे तथाकथित लीडर्स या नेता या अभिनेता। अभिनेता तो सिनेमा घर ले जाते हैं, चलो सिनेमा घर। लेकिन प्रभुपाद ने कहा, चलो कहां? वैकुण्ठ चलो, महावैकुण्ठ चलो। और उपाय भी दिया है चैतन्य महाप्रभु की ओर से और हमको पता भी चला है इस बात का हरि हरि! और प्रभुपाद यह भी कहते थे, एक बार लिखे तो सही, बैक टू गॉड हैड पत्रिका के संबंध में जब प्रकाशन हो रहा था तो प्रभुपाद राष्ट्रपति को लिखे, डॉ राजेंद्र प्रसाद को पत्र लिखें। वह सहायता मांग रहे थे उनके बैक टू गॉड हैड पत्रिका के प्रकाशन और वितरण के लिए। उस पत्र में प्रभुपाद ने लिखा,” आई हैव गौट ए क्लू” मुझे कुछ संकेत मिला है। क्या है क्लू? जब इस शरीर को मैं त्यागूंगा, व्हेन आई लीव दिस बॉडी, आई विल गो बैक टू गॉड हेड। मैं भगवत धाम लौटने वाला हूं। ऐसा मुझे संकेत मिला है ऐसा पत्र में प्रभुवाद लिखते हैं राजेंद्र प्रसाद को पत्र लिखे और फिर वह आगे लिखते हैं किंतु भगवत धाम में अकेला नहीं जाना चाहता। मेरे जितने भी समकालीन/ कंटेंपरेरी फेलो ह्यूमन बीइंग है उनका साथ में मैं ले जाना चाहता हूं। हरि बोल! दिस इज कॉल्ड बिग थिंकिंग, प्रभुपाद जिसके लिए प्रसिद्ध थे, नेवर स्मॉल थिंकिंग। कैसा थिंकिंग? बिग थिंकिंग या हाई थिंकिंग –
“सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मां कश्चित दुख भाग भवेत् “
यह है ऊंचा विचार ,सर्वाणि भद्राणि पश्यन्तु। तो प्रभुपाद के यह विचार हैं। प्रभुपाद के भी ये विचार हैं,लेकिन ओरिजनली यह भगवान के विचार हैं। उच्च विचार किसके हैं? भगवान के हैं। भगवान की ओर से ही फिर आचार्य वृन्द भगवान के विचारों को व्यक्त करते हैं, कहते हैं। हरि हरि! अच्छा है मैं भी प्रसन्न हूं कि आप भी श्रील प्रभुपाद द्वारा स्थापित आंदोलन को ज्वाइन किए हो/ जुड़ गए हो। जुड़े हो कि नहीं? या केवल एक दिन के मेहमान हो आज, या हरे कृष्ण आंदोलन के सदस्य हो या अंग हो और इस्कॉन कोलकाता के अंग हो? इस्कॉन कोलकाता की जय! जो कोलकाता श्रील प्रभुपाद की जन्मभूमि है, कोलकाता धाम की जय! आपको कोई अचरज नहीं लगता? कोलकाता और धाम? कोलकाता धाम। हम तो आराम से कह सकते हैं कोलकाता श्रील प्रभुपाद की जन्मस्थली है और कटहल तला अब प्रकाशित हो रहा है धीरे धीरे। प्रभुपाद की लीला स्थलियाँ – उल्टाडांगा जंक्शन रोड वाला स्थान भी ले लिया और भक्तिभवन को भी, जो भक्तिविनोद ठाकुर ने जहां अपना भक्तिभवन का निर्माण किया था उसको भी इस्कॉन ने ले लिया है और उसका भी रिनोवेशन/ नवनिर्माण हो रहा है। आप ऐसे बहुत से स्थानों को जानते ही हो। प्रभुपाद का कॉलेज स्कॉटिश चर्च,एम जी रोड स्थित राधा गोविंद मंदिर जहां प्रभुपाद रहे, इसलिये भी प्रभुपाद ने यहाँ के विग्रह का नाम राधा गोविंद देव रखा। श्री श्री राधा गोविंद की जय! जब प्रभुपाद बालक थे तो राधा गोविंद के दर्शन के लिए जाते थे और केवल मिनटों तक नहीं, घंटों तक उनके दर्शन किया करते थे बालक जब थे तो। भविष्य में यहां की परिक्रमा हो सकती है, कोलकाता की परिक्रमा हो सकती है। एक स्थान से दूसरी और फिर दूसरी से तीसरी से लोग जा सकते हैं।
प्रभुपाद की जय! प्रभुपाद के गुन गाते हुए और
“हरे हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे”
करते हुए धन्यवाद! हरे कृष्ण!
