PAAPMOCHINI_EKADASHI
26-03-2025
ISKCON Pandharpur

 

हरि हरि! पंढरपुर धाम की जय!

“सुंदर ते ध्यान उभे विटेवरी ।

कर कटावरी ठेवूनियां ॥

तुळसी हार गळां कासे पीतांबर ।

आवडे निरंतर हेचि ध्यान ॥

मकरकुंडले तळपती श्रवणी ।

कंठी कौस्तुभमणि विराजित ॥

तुका म्हणे माझे हेचि सर्व सुख ।

पाहीन श्रीमुख आवडीनें”॥

पापमोचनी एकादशी महोत्सव की जय!

यहां पंढरपुर में कई सारे महोत्सव, कई सारे उत्सव मनाए जाते ही है, यहां तो हर एकादशी को महोत्सव होता है, अन्य उत्सवों के अलावा। पंढरपुर में एकादशी को मनाना इसकी बड़ी महिमा है। एक समय शची माता एकादशी नहीं मनाती थीं मायापुर में। ऐसी कोई परिपाटी या ट्रेडिशन थी बंगाल में कि स्त्रियां एकादशी को नहीं मनाएगी, ये पुरुषों का धर्म है। किंतु चैतन्य महाप्रभु छोटे ही थे,अभी निमाई ही थे तो उन्होंने मां से निवेदन किया। “मम्मी मम्मी” या “शची माता या माई” वैसे महाराष्ट्र में मां को “आई” कहते तो बंगाल में भी ये “आई, आई” चलता है। तो चैतन्य महाप्रभु ने भी आई आई कहे होंगे। एक मेरा विशेष निवेदन है मैया (अगर वे कृष्ण के मूड में हैं तो यशोदा मैया को शची मैया) माता बोली, “ हां, बेटा क्या है? क्या निवेदन है? या क्या चाहते हो? महाप्रभु बोले कि मैं चाहता हूं कि तुम एकादशी के उपवास को मनाया करो, एकादशी का पालन करो। तो मैया तैयार हो गई,”तथास्तु बेटा, मैं आज से एकादशी का पालन करूंगी”। यहां पर भी अगर कोई ऐसा है, जो सुनने वालों में माताएं है, जो एकादशी का व्रत नहीं करती होगी, तो वे जरूर सुनें। स्वयं भगवान, गौर भगवान, श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु का यह निवेदन है/ प्रस्ताव है/ सिफारिश है/ स्ट्रांग रिकमेंडेशन है कि एकादशी के व्रत का जरूर पालन करना चाहिए। पापमोचनी पाप से बचाती है। आज के दिन सारा पाप अन्न का आश्रय लेता है,अन्न /ग्रेंस इसीलिए हम अन्न ग्रहण नहीं करते/ अन्न नहीं खाते। वैसे हम केवल पाप से विमोचन हो जाए ऐसा नहीं सोचना है क्योंकि हम वैष्णव है और हमें पाप से मुक्त होने की कोई चिंता तो नहीं है। नामाभास से ही हम लोग मुक्त हो जाते हैं, जप करते-करते और अपराधों से बचते-बचते जब हम कीर्तन भी करते हैं,

“अपराध शून्य हय लहो कृष्ण नाम”

 जैसे अजामिल की नामाभास से ही मुक्ति हुई। “बड़ पापी छीलो” याने अजामिल बड़े नामी पापी थे। किंतु केवल नारायण कहा,वे भगवान नारायण का तो नहीं सोच रहे थे। नारायण मतलब नर से शब्द बनता है नार और अयन मतलब आश्रय। जीवों के आश्रय जो भगवान है इसलिए उनका एक नाम या बड़ा मुख्य नाम/ प्रमुख नाम नारायण है,

“बद्री- नारायण नारायण नारायण नारायण”

अजामिल जो नाम का उच्चारण किए, भगवान का स्मरण भी नहीं कर रहे थे, इसको नामाभास कहते हैं, लेकिन उससे भी ये मुक्त हो गए। “हे नारायण! नारायण!” ऐसे अजामिल तो अपने पुत्र को पुकार रहे थे। अजामिल ने जब देखा यमदूत आ रहे हैं, शायद प्रवेश किया होगा, द्वार से प्रवेश करके। यमदूत बड़े डरावने होते हैं। कईयों की तो धोती पीली हो जाती है। समझते हो? डरे हुए अजामिल ने “पुत्र पुत्र!” पुकारा। वैसे व्यासदेव भी ऐसे पुकार रहे थे शुकदेव गोस्वामी को, “पुत्र पुत्र”। यहां उसके अपने पुत्र का नाम नारायण था तो उसने पुकारा, ”नारायण”, याने पुत्र को पुकार रहा था। लेकिन ये पुकार वैसे विष्णु दूतों ने भी सुनी और उन्होंने तो समझ लिया कि मेरे हमारे प्रभु को कोई पुकार रहा है और भागे-दौड़े आए। यमदूत तो वहां बिजी/ व्यस्त तो थे ही, क्या कर रहे थे? उन्होंने अपना यम-फांस जिसको कहते हैं वो फेंका हुआ था और उसकी आत्मा को शरीर से अलग कर रहे थे, दे वर बिजी और अजामिल यम-यातना का अनुभव कर ही रहा था और हरि हरि! इसलिए पुकार रहा था, “नारायण! हे नारायण! पुत्र नारायण! पुत्र नारायण! बचाओ हेल्प! हेल्प! पुत्र नारायण नारायण। आपके नींद आ रही है तो नारायण बचाओ, जगाओ मुझे नारायण। तो विष्णु दूत आ गए फिर विष्णु दूत और यमदूत दोनों का संघर्ष हुआ, टकराए एक साथ, तो विष्णु दूतों ने अजामिल को मुक्त किया। वो केवल मुक्त ही हो सकता था क्योंकि जिस प्रकार से/ जिस भाव से कहो उसने नारायण नाम का उच्चारण किया था। नारायण का स्मरण करते हुए, इत्यादि वो नारायण को नहीं पुकार रहा था, इसी को नामाभास कहते हैं। नामाभास कुछ संकेत ही था या कभी-कभी अवहेलना ही होती है हरि नाम के उच्चारण में या कभी उसको एंटरटेनमेंट जैसा ही मनोरंजन या कार्यक्रम ही समझते हैं। कुछ लोग कीर्तन हो रहा है/ कीर्तन मेला हो रहा है लेकिन उसमें कोई सिनेमा ट्यून वगैरह भी बज रही है और क्या-क्या लोग अपनी कलाकारी का प्रदर्शन करना चाहते हैं।

 

वह भी हुआ ही,नारद मुनि भी एक समय कीर्तन कर रहे थे स्वर्ग में, कई सारी महिलाएं/यंग लेडीज वर आल्सो देअर, वहां उपस्थित थीं। वैसे कीर्तन कर रहे थे उन महिलाओं को प्रभावित करने के लिए, सब शो चल रहा था और ऐसे भी कुछ हो रहा था कि वो प्रभु के गुण गाने के बजाय, परमेश्वर के गुण गाने के बजाय, कुछ देवताओं के गुण भी गा रहे थे। ये दूसरा जो नाम अपराध है कि देवताओं के नाम को भगवान के नाम के बराबर या स्वतंत्र समझना। वह भी अपराध कर ही रहे थे तो उसके फलस्वरूप हुआ क्या? नारद मुनि को जन्म मिला एक पतित परिवार में कहो या एक शूद्राणि के पुत्र बने। 

“शुचीनां श्रीमतां गेहे” ऐसा होता है अगर हम पुण्यात्मा है, कुछ पुण्य कार्य किया लेकिन उसे पूरा भी नहीं किया, अधूरा ही छूट गया तो ऐसे व्यक्ति को भगवान कहते है,“मैं जन्म देता हूं उनको, कहां? किसी ब्राह्मण के घर में या किसी श्रीमान/ श्रीमंत के घरों में”। लेकिन वैसा नारद मुनि को जन्म प्राप्त नहीं हुआ क्योंकि अपराध चल रहे थे। कीर्तन तो हो रहा था लेकिन अपराध भी हो रहा है। 

“अपराध-शून्य होये बोलो कृष्ण”

ये नियम है जैसे हम सुनते तो है कि द्वितीय शिक्षाष्टक में क्या कहा गया है? 

“नाम्नांकारी बहुधा निज सर्वशक्ति”

उसके स्मरण का कोई काल नहीं, मतलब कभी भी कर सकते हैं और ऐसा कहा ही है,

“खायिते शुयिते लहो क्रिश्न नाम”

खाते-सोते नाम लेंगे लेकिन थोड़ा सावधान रहना चाहिए ताकि हमसे अपराध नहीं हो। खाते-सोते नाम लो, वैसे ये हमको प्रोत्साहित करने के लिए है या फिर जिनको न्यूओफाइट्स कहते हैं, जो नए होते हैं उनको सारे नियम बताए जाएंगे, “ऐ! यू हैव टू फॉलो फॉर रेगुलेटिव प्रिंसिपल्स, दस नाम अपराध भी है, उसमें वैष्णव अपराध है, यह सब चलेगा नहीं, तैयार हो? तैयार हो तो फिर जप करो। तो बेचारा डर जाएगा और कहेगा, नहीं नहीं, थैंक यू आप अपनी जॉब ऑफर रखिए, हम जैसे भी हैं रहने दो। तो वैसे प्रभुपाद भी शुरुआत में अमेरिका में/ शुरुआत में तो हमें

“परं दृष्ट्वा निवर्तते” कहते थे। हम लोग जो आसक्त रहते हैं संसार में, लोग आसक्त तो रहते ही हैं इसलिए

“तेशां प्रमत्त निधनं” मतलब हम इतने आसक्त होते हैं, कई बात सुनाने पर/ समझाने पर/ दिखाने पर दिखती नहीं है, उसको भागवत कहता है,” पश्यन अपि न पश्यति”। तो प्रारंभिक दिनों में ठीक है “खयिते शुयिते नाम लय” उनको कहना है कि कोई कठिन नियम नहीं है या कोई नियम है नहीं, बस जप करो। तो प्रभुपाद भी वैसा ही अमेरिका में कर रहे थे, प्रभुपाद के सत्संग में 26 सेकंड एवेन्यू नाम का किराए का जो स्थान प्रभुपाद ने लिया था उसका प्रसिद्ध नाम हुआ “मैचलेस गिफ्ट शॉप” ये न्यू यॉर्क में था। दुकान थी तो दुकानदार ने दुकान को शिफ्ट किया तो प्रभुपाद वहां किराएदार बन गए, प्रभुपाद ने उसको ले लिया।

 कुछ समय के उपरांत वैसे प्रभुपाद के अनुयायी ने कहा, “स्वामी जी! स्वामी जी।” उस समय प्रभुपाद नहीं कहते थे स्वामी जी स्वामी जी! कहते थे । “वहां एक साइन बोर्ड है उसको उतार दे?” प्रभुपाद ने पूछा,” क्या लिखा है?” मैचलेस गिफ्ट,जिस गिफ्ट की कोई मैच नहीं है, अतुलनीय/अनुपम/अतुलनीय है। जिसकी कोई तुलना नहीं हो सकती यहां के गिफ्ट की। तो प्रभुपाद ने जब सुना कि मैचलेस गिफ्ट ऐसा साइन बोर्ड है तो उन्होंने कहा,” रहने दो रहने दो। मैं जो यहां आया हूं क्या करने आया हूं? मैचलेस गिफ्ट देने के लिए आया हूं। कृष्ण की तुलना और किसी व्यक्तित्व के साथ हो सकती है क्या?

“मत्त: परतरं नान्यत” और महामंत्र की तुलना में है कोई मंत्र, महामंत्र जैसा? इसलिए कहा गया

“हरेर नामेव केवलम” 

तो हरिनाम जैसा कौन है? हरिनाम ही महामंत्र है। 

गीता जैसा ग्रंथ है कोई? इसलिए कहा गया है,

“एकं शास्त्रं देवकीपुत्र गीतम्” और क्या?

“एको देवो देवकीपुत्र एव ” 

एक ही देव है, आदिदेव जो देवकी के पुत्र हैं और

“मंत्रमपि एकम” एक ही नाम जो भगवान का नाम है,

“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे

 हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे”

और “कर्माप्येकं”, कर्म भी एक/ एक ही काम है

“तस्य देवस्य सेवा”। 

तो ये सब गीता, कृष्ण आदि, प्रभुपाद वाज़ स्पेशलाइजड इन कृष्ण, द सुप्रीम पर्सनैलिटी का गौडहेड और भगवान की सेवा “कर्माप्येकं तस्य देवस्य सेवा” यह सारी भेंट प्रभुपाद ने संसार को, बिगनिंग विद अमेरिका कहो, जो भेंट दी‌‌ वो कैसी थी? -मैचलेस गिफ्ट। प्रभुपाद गिफ्ट देते रहे, देते रहे। शुरुआत में हमको यह नियम का पालन, वह नियम का पालन ये सब तो बाद में हुआ। हरि हरि! प्रभुपाद के सत्संग में आनेवाले लोग अपनी गर्लफ्रेंड को लेकर, हिप्पीज़/ नंगे बाबा या कुंभ मेले में जैसे आते हैं, कौन? नागा बाबा। तो अमेरिकन नागा बाबा भी थे हिप्पीज में, अमेरिकन बॉयज एंड गर्ल्स,

“दम मारो दम मिट जाए गम”

उनका चल रहा था और प्रभुपाद को पूछते,” स्वामी जी! आप भारत से आए हैं तो कुछ लाए हो? कुछ गांजा या कुछ ऐसी नशीली वस्तु? तो प्रभुपाद ने कहा, “एस आई हैव ए ड्रग, आई हैव ए ड्रग। इसका सेवन करने से वन स्टेज हाई फॉरएवर।” तुम्हारे दूसरे जो ड्रग है उसका नशा उतरता है और फिर दुबारा बड़ा डोज लेना पड़ता है तब व्यक्ति और भी ऊपर चढ़ता है, पहुंचता है, सोचता है कि मैं बहुत ऊंचा हूं, बहुत ऊंचा पहुंचा हूं। लेकिन वह गिर जाता है, नशा उतर जाता है तो पहले जितना नीचे गिरा था, गहराई तक पहुंचा था उससे भी और अधिक गहराई तक पहुंचता है। नेक्स्ट टाइम वो और डोज लेता है, डबल कर देता है,ट्रिपल कर देता है तो उतना ही ऊंचा पहुंचता है। कुछ लेविटेशन या ऐसा उनका कुछ उनका एक्सपीरियंस होता है, मुझे नहीं पूछना था ये,आई हैव नो एक्सपीरियंस। लेकिन हल्का-फुल्का हुए हैं वो ऐसा महसूस करते हैं, चिंता मुक्त होते हैं। एक भ्रम उत्पन्न होता है, इल्यूजन होता है लेकिन ऐसे सब बबल्स फूट भी सकते हैं। तो प्रभुपाद ने कहा,”

आई हैव ए ड्रग” ….

 

“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, 

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे”

तो ये लोग तो नाम भी ले रहे थे और कई सारे नियमों का उल्लंघन भी कर रहे थे पर शुरुआत में प्रभुपाद ने सहन किया है, उनको कुछ कह नहीं रहे थे। शुरुआत में सारे कड़े नियम बताते तो फिर मुश्किल होती। वैसे भी और एक भारत से अमेरिका पहुंचे हुए तथाकथित महात्मा कहो/ हिंदू धर्म के प्रचारक, उन्होंने प्रभुपाद को सुझाव या फ्री एडवाइस देना तो प्रारंभ किया ही था, वो कहे, “स्वामी जी, इस देश में/ अमेरिका में इन लोगों को वेजिटेरियन बनो, ऐसा उपदेश नहीं करना और यहां के लोगों को अपनी वर्दी/ अपनी वेशभूषा बदलो/ बी इंडियन बाय इंडियन/ भारत जैसी वेशभूषा पहनो, यह भी नहीं कहना।” वे ऐसे कुछ एडवाइस दे रहे थे और स्वयं भी उस वक्त सारे बूट-सूट-कोट पहने थे, हाथ में छड़ी भी थी, स्टिक इन द हैंड। जब वे गए थे तो धोती में गए सब लेकिन वहां के कल्चर ने उनको ओवरपावर किया, ही वाज़ टेकन ओवर एंड सब भूल गए, अमेरिकी बन गए, अमेरिकी जीवन शैली इत्यादि अपना ली। वे कहे स्वामी जी मैं आपसे बहुत पहले यहां आया हूं, मेरा एक्सपीरियंस आपके साथ शेयर करता हूं। यू विल बेनिफिट, आपका फायदा होगा सुनो, मुझे कुछ कहना है आपसे। तो वे यह सब बातें कह रहे थे तो प्रभुपाद ने कहा कि अमेरिकन अगर मैं जो चाहता हूं वैसा वे नहीं करते हैं तो मैं तो वापस जाना पसंद करूंगा लेकिन मैं इस प्रकार का अप-प्रचार करने वाला नहीं हूं या अप-सिद्धांत फैलाने वाला नहीं हूं। मैं तो 

“पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति”

केवल उनको वेजिटेरियन बनो ही नहीं कहूंगा, मैं उनको तो कृष्णटेरियन बनो कहूँगा। जब वेजिटेरियन या सात्विक भोजन आहार का हम भगवान को भोग लगाते हैं तो वेजिटेरियन क्या बन जाता है? कृष्णटेरियन बनता है तो मैं कृष्णटेरियन बनाऊंगा इनको। लेकिन प्रभुपाद “स्टेप बाय स्टेप” जा रहे थे।

“आदौ श्रद्धा साधु संग” फिर भजन क्रिया। साधु प्रभुपाद भजन क्रिया दे रहे थे और भजन क्रिया के अवलंबन से क्या होता है नेचुरली? ऐसा होना चाहिए, क्या? 

“अनर्थ निवृत्ति”, अनर्थों से निवृत्ति। तो व्यक्ति को जब स्वाद आएगा तब चस्का लगेगा। चस्का लगना कृष्ण का, कृष्ण नाम का, कीर्तन का, गीता भागवत के अध्ययन का, प्रसाद का चस्का तो पहले ही अटेम्प्ट में लग ही जाता है। तो वो भी प्रभुपाद ने किया, सभी उपाय प्रभुपाद के पास थे। संडे फेस्टिवल शुरू किया प्रभुपाद ने, तो फिर कुछ समय के उपरांत जब उनका हुआ,

“परम दृष्टवा निवर्तते”

ऊंचा स्वाद, हायर टेस्ट डेवलप होना अनिवार्य है। तो शुरुआत में सभी के सभी नियमों का पालन ऑन द स्पॉट या पहले दिन से ये संभव नहीं हो पाता सभी के लिए। लेकिन यदि वे अवलंबन करते हैं/ फॉलो करते हैं यह भजन। भजन मतलब केवल गाने का भजन ही भजन नहीं कहे, सारी आध्यात्मिक जीवन शैली जो है,सारे विधि विधान जो है ये सब भजन ही है।

श्रील प्रभुपाद की जय!

चार छ: महीने के बाद, आई डोंट एक्सएक्टली कई महीने बीते हुए थे प्रभुपाद को अमेरिका, न्यूयॉर्क पहुंचकर। फिर प्रभुपाद जो कुछ सीरियस थे, करीं डेढ़-दो सौ लोग आते थे प्रभुपाद के सत्संग में, तो उसमें से कुछ चुन लिए, गिने-चुने। थोड़े पक्के जो बन रहे थे उनको एकत्रित करके प्रभुपाद ने पूछा,” आप मेरी सहायता करना चाहते हो? मैंने तो इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्ण कांशसनेस, अंतरराष्ट्रीय श्रीकृष्ण भावनामृत संघ का रजिस्ट्रेशन वगैरह कर चुका हूं। सोसाइटी का नाम क्या है? इंटरनेशनल/ ग्लोबल सोसाइटी लेकिन ग्लोबल सोसाइटी का ये देखो, 26 सेकंड एवेन्यू, ये जो किराए की दुकान है यही है इंटरनेशनल सोसाइटी। लेकिन अक्षरक्ष: उसको मैं लिटरली आई वांट टू मेक दिस सोसाइटी इंटरनेशनल सोसाइटी, केवल नाम के वास्ते ही नहीं, केवल नाम ही नहीं। जैसे कई सारे जगत गुरु तो कहलाते हैं लेकिन अपनी कुटिया को कभी छोड़े नहीं कई जगतगुरु महामंडलेश्वर। तो आप मेरी सहायता कर सकते हो आप फुलटाइम भक्त बन सकते हो तो आपको चार नियमों का पालन करना होगा। सो फॉर फर्स्ट टाइम, द फॉर्मल वे कहते हैं या औपचारिक दृष्टि से प्रभुपाद ने यह प्रस्ताव रखा और फिर प्रभुपाद कहे, “नो मीट ईटिंग, नो इंटॉक्सिकेशन, नो इलिसिट सेक्स, नो गैंबलिंग” इसका पालन करने के लिए आप तैयार हो? केशव प्रभु तैयार हैं। ऐसा न्यूयॉर्क में पूछा जा रहा था तो कितने तैयार हो गए? जितने भी वहां उपस्थित थे दे ऑल रेज्ड देयर हैंड्स। इसको उनैनिमस कहते हैं। वोट कैसा रहा? उनैनिमस। सभी उपस्थित यंग बॉयज एंड गर्ल्स तैयार है इन चार नियमों का,

“तत्र अर्पिता नियमित: स्मरणे न काल:”

कोई नियम नहीं, देयर इज़ नो हार्ड एंड फास्ट रूल्स, लेकिन फिर प्रभुपाद ने कह ही दिया, ये नियम है, दीज आर द रूल्स टू फॉलो। वे भी रूल्स है, एक बार और प्रभुपाद कह रहे थे,” वी फॉलो फोर रेगुलेटिव प्रिंसिपल्स”, प्रभुपाद कह रहे थे हम चार नियमों का पालन करते हैं। तो जो उपस्थित भक्त थे तो उन्होंने सोचा कि प्रभुपाद अब कहने वाले हैं, नो मी ईटिंग, मांस भक्षण नहीं, नशापान, परस्त्री/ पुरुष गमन नहीं करना, लेकिन प्रभुपाद ने वहां और एक लिस्ट कही कि हम चार नियमों का पालन करते हैं। प्रभुपाद ने आगे कहा, क्या? 

“ मन्मना” मेरा स्मरण करो पहला नियम, 

“भव मद्भक्तो” दूसरा नियम,

 तीसरा नियम “मद्याजी” मेरी आराधना करो, 

“मां नमस्कुरु” चौथा नियम, 

तो इसको भी एक समय प्रभुपाद कहे दीज आर द फोर प्रिंसिपल्स वी फॉलो, जो कृष्ण गीता में कहे हैं। यह एकादशी का दिन है तो अधिक साधना, अधिक श्रवण, कीर्तन या अधिकाधिक नियमों का भी पालन करने का दिन है या कुछ भक्तों का एकादशी मतलब 11 है, तो 11 इंद्रिय-नियंत्रण करने का दिन है, जिसको “शम:, दम:, तप: शौचं” कहे हैं।

कृष्ण कन्हैया लाल की जय!

कृष्ण कन्हैया लाल ये सब बातें नहीं कहते, ये तो द्वारकाधीश की जय! या वासुदेव कुरुक्षेत्र में कहे। 

एकादश मतलब एकादशी के दिन हमारे पास, हर एक के पास 11 इंद्रियां है। पांच ज्ञानेंद्रियां, पांच कर्मेइंद्रियां और “मनःषष्ठानीन्द्रियाणि” मन भी छठवीं इंद्रिय है। तो पांच और पांच और एक कितने? 11 हुए याने एकादश। तो इन एकादश इंद्रियों पर नियंत्रण, कुछ अंकुश लगाने का भी यह दिन है।

 हरि हरि! और ये अंकुश लगाना…..

 

नियंत्रित रखना, बॉर्डर क्रॉस होने नहीं देना। यह वैसे तब होगा जब हम ऊंचा स्वाद का अनुभव करेंगे। अधिक श्रवण कीर्तन या फिर दूसरे शब्दों में हमें हमारे आत्मा का ख्याल करना है। शरीर का थोड़ा आज खिलाना-पिलाना कम ही करना होता है, इसको उपवास कहते हैं। इससे तो समझ गए उपवास, उपवास/ फास्टिंग, आहार कम करना उसमें भी अन्न नहीं ग्रहण करना। लेकिन नहीं, हम समझते हैं कि मुख से कुछ आहार नहीं खाना तो हो गया उपवास, फास्टिंग हो गया। लेकिन भक्तिविनोद ठाकुर के शब्दों में, वैसे हर इंद्रिय का आहार होता है। जिव्हा का आहार जब भोजन करते हैं तो उसका आहार होता ही है लेकिन कान का भी अपना एक आहार है, वह है शब्द; नासिका का भी आहार है गंध; त्वचा का आहार है स्पर्श, लाइक दैट। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध। जिव्हा का भी रस है, यह रस का आस्वादन करती है। तो इन इंद्रियों को भी आज आहार नहीं खिलाना है या नियंत्रण रखना है। कई लोग तो मौन धारण करते हैं। वैसे बाहर से होठों का उपयोग नहीं करते लेकिन उनका मन तो बोलता ही रहता है। कभी-कभी वह स्लेट पर लिखते हैं तो मौन कहां रहा? कई सारे विचार तो आ ही रहे हैं /मन में उत्पन्न हो रहे हैं। केवल मुख से तो नहीं निकाल रहे मन में तो उसका उत्पादन हो चुका है। तो उपवास फिर फास्टिंग केवल भोजन ही नहीं खाना, लेकिन हर इंद्रिय का जो भोजन है वह भी नहीं खिलाना या सही प्रकार का खिलाना। शब्द सही प्रकार के हैं जैसे “ हरे कृष्ण हरे कृष्ण.. “ हरि हरि! भगवान वैसे सभी इंद्रियों का भोजन भगवान बन सकते हैं। वैसे भगवान दो मुख्य रूपों में तो प्रकाशित/प्रकट हुए ही हैं। एक है भगवान का विग्रह/उनका फॉर्म/ स्वरूप और दूसरा है साउंड। वी वर जस्ट रीडिंग चैतन्य चरितामृत के एक तात्पर्य में प्रभुपाद लिखते हैं- फॉर्म एंड साउंड; रूप और शब्द। इन दो रूपों में भगवान चैतन्य महाप्रभु की जय! गौर पूर्णिमा की शाम को जो प्रगट हुए एक निमाई रुप में प्रकट हुए और दिन में शब्दों के रूप में प्रकट हुए। हम अभी मेलकोटे गए थे तो वहां एक मंदिर के दर्शन के लिए भी गए, आदि रंगनाथ के दर्शन के लिए हम गए थे। तो दर्शन के लिए हम मंदिर पहुंचे तो दर्शन तो करना था, इतने में कोई नारियल पानी लेकर आया/कोकोनट वाटर। तो जाना तो था दर्शन के लिए, आंखों से दर्शन करेंगे, नेत्रों से लेकिन जब हम जलपान कर रहे थे/ वहां का विशेष नारियल पान कर रहे थे तो मुझे याद आया पीते समय, अभी नहीं वहीं पर मुझे याद आया कि यह तो भगवान है,” रसोऽहमप्सु कौन्तेय” । हे कौन्तेय!अर्जुन! रस मैं हूं, किसका रस? अप्सु; अप मतलब क्या? अप मतलब पानी, संस्कृत में अप मतलब पानी होता है। अप्सु मतलब जल में, मतलब जल में जो रस होता है वह मैं हूं। उसी प्रकार “पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च” पृथ्वी में जो पुण्य गंध होता है, वह क्या है? वह भगवान हैं। पृथ्वी का ही गंध वैसे कहां पहुंच जाता है? फूलों में आ जाता है, पृथ्वी का गंध फूलों में आता है और ऐसे फूल और भी गंध, धूप जब हम भगवान को अर्पित करते हैं महाप्रसाद हुआ, तो उसका हम आह! आह!.. जो होता है ना आह! आह! … वह अनुभव क्या है? वह भगवान का ही अनुभव करता है। कोई अगर डाउन है स्पिरिट में कुछ तो उसको थोड़ा वह सूंघ सकता है। सूंघेगा तो क्या? भगवान प्रवेश करेंगे। तो हर इंद्रिय के लिए 

“ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते” वह भी होता है। तो इंद्रियों के विषयों को विषय नहीं बनाना- भगवान की इंद्रियों को विषय बनाओ। भगवान को ही आज एकादशी के दिन, प्रतिदिन लेकिन आज एकादशी है,सेंस कंट्रोल माइंड कंट्रोल, शमः दमः का भी दिन है। उपवास तो करते हैं खाते तो नहीं लेकिन बाकी सब तो इंद्रियां तो भक्षण कर रही है। इंद्रियां जो कान है, नासिका है, वो अभक्ष भक्षण, जो नहीं खाना चाहिए वो कर रही हैं। नाक को जो आहार को ग्रहण नहीं करना चाहिए वह हम खिलाते रहते हैं। तो हर दिन गौड़ीय वैष्णव और सभी साधकों को सावधान रहना चाहिए और ताकि इंद्रियों का आस्वादन करेंगे,इंद्रियतृप्ति होती जाएगी तो उसका परिणाम क्या होता है? “ प्रणश्यति “। हरि हरि!

“ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते: 

सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते:”

क्रोधात,कामात, मतलब इससे यह, इससे वह, उत्पन्न होता है। ऐसा, पंचमी उसको कहते हैं पंचमी- 

“वृक्षात पतति पुष्पाणि” वृक्ष से गिरते हैं पुष्प। तो कामात, काम से क्रोधात, अंत में क्या होता है? “स्मृतिभ्रंशात”, पुनः आ गया भ्रंश में। विनश्यति, तो हम विनाश नहीं चाहते। हम क्या चाहते हैं? विकास । हम विकास चाहते हैं तो फिर क्या करना होगा? इस प्रोसेस को बस रिवर्स करना है या जो विषय जो है, मायावी विषयों के अलावा/ माया को विषय नहीं बनाना, कृष्ण को ही विषय बना दो। इसी को कहा है,

“आत्मेन्द्रिय प्रीति वांछा तार बली काम”

आत्मेंद्रिय प्रीति, अपनी इंद्रियों का ग्रैटीफिकेशन/, आत्मरंजन/ मनोरंजन तो उसको कहते हैं काम और “कृष्णेंद्रिय-प्रीति धरे ‘प्रेम’ नाम।” 

यदि हमारी इंद्रियां कृष्ण की इंद्रियों की सेवा में है तो फिर उसका नाम प्रेम है या प्रेम उत्पन्न होगा। और वहां पर नरक जा रहा था, “ध्यायतो विषयान्” विषयों का ध्यान करने से। यहां भगवान को विषय बनाने से, भगवान वैसे विषय हैं और हम आश्रय हैं। भगवान को विषय बनाया आश्रय ने,जीव ने तो कहां जाएगा? ,”ऊर्ध्वं गच्छति” , ऊपर जाएगा, ऊपर से भी ऊपर जाएगा। ऊपर जाएगा जहां स्वर्ग ही कहा है, फिर स्वर्ग से भी परे जाएगा। कहां जाएगा?

“परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातन:

यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम “

वहां जाएगा।

 

वैकुण्ठ धाम की जय! 

भू वैकुण्ठ की जय!

वृंदावन धाम की जय!

एकादशी महोत्सव की जय! 

पंढरपुर धाम की जय!

गौर प्रेमानंदे!