
Japa Chanting
28-03-2025
ISKCON Pandharpur
श्रील प्रभुपाद की जय!
जय श्री कृष्ण चैतन्य प्रभु नित्यानंद
श्री अद्वैत गदाधर श्रीवासादि गौर भक्त वृन्द!
“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे”
जय जय श्री चैतन्य जय नित्यानंद
जय अद्वैत चंद्र जय गौर भक्त वृन्द!
जय जय श्री चैतन्य कहो जय नित्यानंद
जय अद्वैत चंद्र जय गौर वृंद!
गौर नित्यानंद की जय!
आप इसको एड्रेस कहो या मेरा संबोधन, सभी के लिए तो है ही। यहां तो मैं पंढरपुर में हूं तो पंढरपुर के भक्त भी यहां समक्ष बैठे ही है और ज़ूम मंदिर तो खचाखच भरा हुआ है। वे तो श्रोता होते ही है जपा टॉक के, किंतु आज का जपा टॉक थोड़ा अधिक केंद्रित करने वाला है उन भक्तों पर जो (मायापुर धाम की जय!) मायापुर पहुंचे हैं और मायापुर से अब एकचक्र ग्राम भी प्रस्थान कर रहे हैं और उनकी संख्या भी काफी है। तीन- साढ़े तीन सौ भक्त मायापुर पहुंचे हैं और वहां से जा रहे हैं एकचक्र ग्राम और कुछ भक्तों को मैं देख भी रहा हूं, सभी तो नहीं, तो यह सारे भक्त रिट्रीट के लिए पहुंचे हैं। सच्चिदानंद प्रभु का वार्षिक रिट्रीट या ट्वाइस द ईयर उनके रिट्रीट कहीं ना कहीं ले जाते हैं और इस समय वे मायापुर पहुंचे हैं। मुझे पूरा तो पता नहीं चला लेकिन आराधना या मेडिटेशन एक विषय लेके यह रिट्रीट चल रही है और साथ ही साथ क्षमा याचना या फॉरगिविंग, ऐसा मोटा-मोटी मुझे कुछ पता चला है। यह संबोधन वैसे रिट्रीट के भक्तों के लिए है और सभी का स्वागत है, सभी तो सुन ही सकते हो l स्पेशली ये रिट्रीट में जो पहुंचे हैं उनका भी विशेष स्वागत और अभिनंदन और सच्चिदानंद प्रभु को खूब-खूब आभार ऐसे रिट्रीट के आयोजन के लिए और भक्तों को अधिक-अधिक शिक्षा देने के लिए। शिक्षित और दीक्षित होते हैं भक्त, शिक्षित भक्त फिर दीक्षित होते हैं। तो ऐसी शिक्षा देते रहिए समय-समय पर, तो ये रिट्रीट के माध्यम से। ओके तो कुछ विचार मैं प्रकट कर सकता हूं । आराधना/ मेडिटेशन या ध्यान आदि ऐसा भी कोई टॉपिक है तो वह मेडिटेशन भी आराधना है या ध्यान भी आराधना है या ध्यान के बिना आराधना कैसे संभव है। हरि हरि! “अनयाराधितो नूनं भगवान् हरिरीश्वर: “
यह राधा है, वह लीला भी है। ये चरण कमल किसके हैं ? गोपिया ढूंढ रही थी कृष्ण को, तो यह कथा-लीला प्रारंभ हो जाती। पहले तो उनको कृष्ण के चरण दिखे, चरणों के चिन्ह दिखे या चरण चिन्हों से अंकित ब्रज देखा उन्होंने चिन्हांकित और थोड़ी देर में आगे जा ही रहे थे तो उन्होंने कृष्ण के चरणों के चिन्हों के बगल में और किसी के चिह्न, जैसे साथ में कोई गया हुआ है, ऐसा भी उनको समझ में आया। तो कई गोपियां पूछने लगी यह किसके चरण हो सकते हैं? तो किसी गोपी ने जरूर कहा पगली कहीं की समझती नहीं हो और किसके? तो नाम तो नहीं लिया है, अनयाराधितो नूनं, निश्चित ही, नूनम, निश्चित ही यह चरण तो राधा के होने चाहिए। अनया, कैसी राधा? जो आराधना करती है वह राधा, तो राधा का नाम राधा है इसलिए क्योंकि वह आराधना करती है। सर्वोच्च आराधिका तो राधा ही है। जय श्री राधे! और फिर सारा संसार आराधना करता है,
“आराधनानां सर्वेषां विष्णोराधयते परम्”
ऐसा भी शिव जी कहे हैं, सभी आराध्य देवों में श्रेष्ठ है आराधनानाम विष्णु आराधते परम/ विष्णु की आराधना करना। चिंता मत करना कि अरे विष्णु क्यों लिखा? कृष्ण सुप्रीम है, परमेश्वर तो कृष्ण है लेकिन यहां विष्णु-विष्णु ही कहा गया । शास्त्र में ऐसा होता है विष्णु मतलब कृष्ण भी होते हैं,या वैकुंठ का उल्लेख होता है किंतु संकेत तो वृंदावन का ही होता है या कई बार प्रेम को काम ही कहा जाता है या भगवान को कभी-कभी ब्रह्म-ब्रह्म भी कहते हैं। तो ब्रह्म मतलब भगवान, परमेश्वर या काम मतलब प्रेम, विष्णु मतलब कृष्ण, वैकुंठ मतलब वृंदावन। शिव जी ने पार्वती से कहा कि सभी आराध्य देव में श्रेष्ठ है विष्णु, उनकी आराधना करनी चाहिए लेकिन इतना ही कहकर शिवजी रुके नहीं है, साथ में क्या कहे?
“तदीयानां समर्चनम् तस्मात परतरं देवी” किंतु रुको! रुको! इस विष्णु/ कृष्ण की आराधना से भी एक अधिक श्रेयस्कर, अधिक श्रेष्ठ आराधना किसकी है? तदीयानां। हरि हरि!
“तुलसी कृष्ण प्रेयसी नमो नम:”
ये तुलसी भी तदीय है, यह गाय भी तदीय है।
तदीय-मदीय मेरे तेरे या भगवान के और फिर वैसे उसी सूची में……
गंगा मैया की जय! गंगा मैया भी तदीया है, भगवान के भक्त भी तदीय है। वे भगवान के मदीय है,पर हमारे लिए वे तदीय है। उनकी आराधना तो भगवान की आराधना से भी श्रेष्ठ है।
“मदभक्त पूजा अपि अधिका:’
स्वयं भगवान ने ही कहा है मेरे से अधिक पूज्य तो मेरे भक्त हैं। अभी-अभी हम मायापुर में थे/ मैं भी था वैसे पहले भी गए हैं तो वहां
“भज गौरांग, कहो गौरांग, लहा गौरांगेर नाम रे
जेई जना गौरंगा भजे, सेई अमारा प्राण रे ॥”
गौरांग का ध्यान करो,उनका नाम लो, लेकिन उसी गीत में आगे क्या कहा है?
“जेई जना गौरांग भजे सेही अमार प्राण रे”
जो गौरांग को भजने वाले भक्त है वे तो हमारे प्राण है।
तो भक्त तो कहते रहते हैं-
“राधा कृष्ण प्राण मोर जुगल किशोर”
तो राधा कृष्ण तो प्राण है ही भक्तों के और साथ ही साथ भक्तों के प्राण होते हैं अन्य भक्त। अन्य भक्त भी भक्तों के प्राण होते हैं/ प्राण धन होते हैं और फिर उनकी भी आराधना होती है।
वैसे पुजारी जब आरती उतारता है भगवान की आरती और फिर दर्शन मंडप की ओर मुड़ता है तो वहां जो उपस्थित भक्त हैं/ दर्शनार्थी है उनकी भी आरती उतारता है। अंत में हर आइटम, शायद आपको समझ में नहीं आता होगा को यह हो क्या रहा है? पहले तो भगवान की आरती हो रही थी, अंत में पूर्णाहुति कहो हर आइटम की, तो भक्तों की आराधना होती है।
“श्री कृष्ण चैतन्य प्रभु नित्यानंद
श्री अद्वैत गदाधर श्रीवास आदि गौर भक्त वृन्द”
तो वैसे गौर भक्त वृन्द भगवान गौरांग से अलग नहीं किये जा सकते, वे अविभाज्य है। इस पंचतत्व में भी या पंच तत्व कंप्लीट पूरा होता है,या पंच तत्व का आप ध्यान भी कर रहे थे या पंचतत्व के ध्यान की पद्धति का कुछ स्मरण कर रहे थे तो पंचतत्व की आराधना या ध्यान पूरा होता है, जब साथ में गौर भक्त वृंद का भी ध्यान या आराधना या उपासना होती है। हरि हरि! उस से हम लोग थर्ड क्लास रह जाते हैं, भगवान की तो आराधना करते है पर फिर भक्तों के चरणों में अपराध करते रहते हैं, भक्तों का गुणगान गाते नहीं, कुछ गुण दोष देखते रहते हैं और उसकी चर्चा भी करते हैं/ उसका ब्रॉडकास्टिंग भी होता है तो ऐसे भगवान ऐसे भक्तों को वैसे तृतीय श्रेणी के बोलना अच्छा तो नहीं लगता लेकिन कहा जाता है ,”थर्ड क्लास थर्ड क्लास” थर्ड क्लास क्या करता है,? भगवान की तो खूब आराधना करता है लेकिन भक्तों को या भगवान के गुण गाता है और भक्तों को गाली देता है या हो सकता है कभी गोली भी मार सकता है।तो
“यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ
तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः”
यह बहुत विशेष वचन है भक्तों में भी/ वैष्णव में भी कुछ गुरुजन होते हैं जो गुरुजनों की भूमिका निभाते हैं तो यह वचन कहता है यस्य देवे परा भक्ति, जैसे आपकी पराभक्ति है। देवै मतलब जब आराधना/ मेडिटेशन की बात का उल्लेख होता है तो ऑब्जेक्ट ऑफ़ द मेडिटेशन, उसको सप्तमी में कहते हैं या भक्ति जिसकी करते हैं वहां सप्तमी चल रही है। तो यहां सप्तमी विभक्ति की बात चल रही है। यस्य देवे मतलब देव का दैवे हुआ,
“यस्य देवै परा भक्ति” जिसकी है भगवान में भक्ति कैसी? परा भक्ति। तो वैसे ही जैसे यस्य देवी पराभक्ति वैसे हो यथा देवै तथा गुरौ। यहां गुरौ सप्तमी है हुई याने गुरु में या पर जो होता है ये सप्तमी विभक्ति का संकेत है। देवे और गुरौ या भगवान और गुरु, दोनों की आराधना होनी चाहिए। फिर वह कंप्लीट आराधना है,फिर “ वंदे अहम” यहा जो मंगलाचरण है उसका पहली पंक्ति में तो आराधना कहो / वंदना कहो/ प्रार्थना कहो या हम अर्चना ही कर रहे हैं, किसकी? तो वन्देहम “श्रीगुरु श्रीयुत पद कमलम” युत मतलब दो या युगल,दोनों चरण कमलों के। अगर वह लंगड़े है तो बात अलग है। ऐसा देखना भी नहीं चाहिए, भक्तों के अंगों में कोई दोष या ये काला है या लंगड़ा है या अंधा है ये देखना नहीं होता है। ऐसा देखना / ऐसा सोचना भी अपराध है, तो सावधान! तो
“वंदेहम श्रीगुरु श्रीयुत पदकमलान श्रीगुरुन” ,
यहां गुरुन मतलब शिक्षा गुरुज़ और वैष्णवान, सबका समावेश हो रहा है। उसी मंगलाचरण में आगे फिर षड गोस्वामियों की आराधना/ स्मरण/ वंदना कहो करनी होती हैं। फिर पंचतत्व है, वो याद आ रहा हैं न, वो पंक्ति वो मंगलाचरण तो पहले गुरु और वैष्णव, फिर आगे बढ़ो या नीचे उतरो उस पंक्ति के श्लोक को आप देख रहे हो तो पहले षड गोस्वामी,बाद में राधा- कृष्ण और केवल राधा कृष्ण ही नहीं “ललिता- विशाखान अन्वितान” मतलब वहां ललिता विशाखा से ही पूर्ण विराम नही है, अन्वितां मतलब और भी अष्ट सखियां भी हैं, गोपियां भी हैं, मंजरियां है। तो राधा -कृष्ण के साथ में उनकी भी आराधना होनी चाहिए। यह हुआ ये ही कि आराधना की कुछ विचार या चर्चा कहो या बातें कहो, वैसे आराधना की पद्धति है,
”यज्ञैः सङ्कीर्तनप्रायैर्यजन्ति हि सुमेधसः ”
आराधना कहो या यजन्ति कहो, यजन्ति मतलब वरशिप, ये यज धातु से वरशिप बना है। कलयुग में कैसे हम आराधना करते हैं? आराधना की बात हो रही है, यज्ञ करते हैं। यज्ञ से आराधना करते हैं। लेकिन केवल यज्ञ करके वहां कहा नहीं है, श्रीमद् भागवत के 11 स्कंध के पांचवें अध्याय के 32 वें श्लोक में श्रीमद् भागवत (11.5.32) में कहा है कि कौन सा यज्ञ करना चाहिए कलयुग में? उस यज्ञ का नाम है “संकीर्तन यज्ञ” और फिर ऐसे यज्ञ द्वारा यजन्ति ही भगवान के भक्ति आराधना करेंगे भगवान की……। जीव गोस्वामी का स्ट्रांग रिकमेंडेशन है
उनका कि यह जब हम आराधना करते हैं भगवान की
“श्री-विग्रहराधन-नित्य-नाना”
आप श्रृंगार भी कर रहे हो, फिर आरती उतार रहे हो, अभिषेक इत्यादि सब कर रहे हो तो साथ में हरिनाम जरूर होना चाहिए।
“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे”
या और भी कुछ गुण गा सकते हैं, भजन गीता या संध्या-आरती या मंगल-आरती के गान, गान के साथ आराधना होनी चाहिए फिर आराधना कंप्लीट हो गई/ पूरी हो गई। वैसे सतयुग में कौन सी आराधना होती है भगवान की? ध्यान करके। आप लोग जो वहां पहुंचे हो रिट्रीट के लिए मायापुर पहुंचे हो अभी या जा रहे हो एकचक्र ग्राम तो ध्यान भी आप कर रहे थे या ध्यान भी आपको सिखाया जा रहा था सच्चिदानंद प्रभु द्वारा कि कैसे ध्यान करना चाहिए? ध्यानपूर्वक जप करना चाहिए या ध्यान करना चाहिए भगवान के रूप का ध्यान करना चाहिए, ऑब्जेक्ट ऑफ मेडिटेशन पहले फिक्स करना चाहिए। तो सतयुग में होता था ध्यान, ध्यान ही विधि हुआ करती थी भगवान की आराधना की विधि, लेकिन हम जब संकीर्तन करते हैं, संकीर्तन या कीर्तन अपने में पूर्ण भी है, कंप्लीट भी है।
“पूर्णः शुद्धो नित्य-मुक्तो, अभिन्नत्वं नाम-नामिनोः’
तो जब हम जप करते हैं तो हम ध्यान करते हैं तो हो गया सत्य युग की जो विधि है ध्यान करने की हम लोग ध्यान करते हैं। मंत्र मेडिटेशन काफी प्रसिद्ध बात है या जप करते हो तो हरिभक्ति विलास में कुछ विधि भी समझाई है, उसके अंतर्गत मंत्रार्थ चिंतनम। हमें चिंतन करना चाहिए, किसका चिंतन? मंत्र के अर्थ या मंत्र के भावार्थ को भी कह सकते हैं। चिंतन दैट इज मेडिटेशन, वही तो ध्यान है तो ध्यान हो गया,आप ध्यान कर रहे हो। जप तो किया लेकिन ध्यान नहीं किया तो सबसे बड़ा अपराध तो यही है। वैष्णव अपराध वैसे भी बड़ा है/ खराब है। बड़ा मतलब अच्छा नहीं क्योंकि बड़ा है। कोई न सोचे कि वैष्णव अपराध बड़ा है तो चलो बड़ा काम करते हैं, चलो वैष्णव अपराध कर लेते हैं बड़ा काम है। तो सावधान! ऐसे में बड़ा ,बड़ा खराब है/ निकृष्ट है, उत्कृष्ट नहीं है। निकृष्ट है/ निम्न है यह वैष्णव अपराध। तो यह सारे अपराध तो 10 अपराध है ही, किंतु ध्यानपूर्वक जप नहीं करना इस अपराध की तो और कोई अपराध बराबरी कर ही नहीं सकता। तो ध्यानपूर्वक जप नहीं करना यह भी एक महान अपराध है। ध्यान जरूर करना चाहिए तो जप करते समय, कीर्तन करते समय, हम ध्यान करते हैं तो सतयुग जैसे आराधना करते हैं हम। फिर त्रेता युग में आराधना की पद्धति क्या है?
त्रेतायां यजतो मखैः “
यज्ञ करो, यज्ञ स्वाहा! स्वाहा! तो यह हरे कृष्ण महामंत्र यह यज्ञ भी है, संकीर्तन यज्ञ है। हम संकीर्तन करते हैं तो क्या करते है? हम यज्ञ करते हैं। मतलब त्रेतायुग की आराधना भी कवर हो गई, त्रेतायुग की आराधना भी हम कर रहे हैं, जप करते समय कीर्तन कर रहे हैं और
“द्वापरे परिचर्यायाम”
द्वापर में आराधना होती है तो वैसे ये जप करना ही आराधना है, जप करना ही अपने में एक आराधना है। अच्छा अच्छा मैं कहने वाला था कि इसको पूर्ण कहा है, ये हरिनाम कैसा है? “नित्य मुक्त पूर्ण शुद्ध है”, पूर्ण है , कंप्लीट है। तो जप किया,कीर्तन किया तो सब कुछ हुआ, कुछ बचा नहीं क्योंकि आपने ध्यान भी किया, आपने यज्ञ भी किया, आपने आराधना-अर्चना भी की, इसलिए भी कहा है
“हरेर नामेव हि केवलम”
तो केवल हरिनाम किया तो सब कुछ पूर्ण हुआ, ये कंप्लीट है। इसे सौंदर्य कहो- इट्स द ब्यूटी ऑफ द संकीर्तन या जप, महामंत्र का जप-कीर्तन। तो यह कुछ बातें हैं आराधना के संबंध में और रादर फॉरगिविंग/ क्षमा याचना की बात है तो जैसे दस नाम अपराध है तो 10 क्या होते हैं? धाम अपराध भी होते हैं। आपको पता भी तो था , आप भी भक्त जो मायापुर में पहुंचे हो रिट्रीट के लिए, अब और परिक्रमा भी कर रहे हो। आप आपने, आई थिंक 16 राउंड का जप भी कर रहे थे । कुछ दिनों तक एवरी डे 64 राउंड्स, तो आप आराधना भी कर रहे थे, आप परिक्रमा भी कर रहे थे, धाम की परिक्रमा करते तो हम लोग धाम की सेवा करते हैं। परिक्रमा करना l, धाम की परिक्रमा करना ये पादसेवनम नाम की आराधना या भक्ति होती है। जो नवविधा भक्ति में से
“श्रवण कीर्तनं विष्णो स्मरणं पाद सेवनम”
यह पाद सेवन या परिक्रमा जब आप करते हो, आपने मायापुर की परिक्रमा की है पूरी तो नहीं, वैसे लेकिन कुछ स्थानों पर तो आप गए। आप एकचक्र ग्राम भी जाने वाले हो और वहां भी परिक्रमा करोगे तो, धाम अपराधों को भी याद रखो। केवल याद ही नहीं रखना, क्या करो? मेक श्योर आप अपराध ना करो। आप भूल जाओगे तो फिर अपराध करोगे। सो डू नॉट कमिट ऑफेंसेस एट द फीट ऑफ धाम, या धाम अपराध। धाम अपराधों में एक बड़ा अपराध यह है जो धाम को प्रकाशित करते हैं, दोज हु रिवील धाम अन टू अस, उनके चरणों में अपराध। वहां जैसे वैष्णव अपराध है, हरि हरि! वैष्णव अपराध वहां है, दस नाम अपराधों में। तो यहां धाम अपराधों में पहला अपराध क्या है? जो हमें धाम को प्रकाशित करते हैं, वहां की लीला जो बताते है,
“अध्यापि इह सेई लीला करे गौर राय”
वे कहेंगे आपको, अरे! अरे! यहां तो अब भी वही लीलाएं भगवान कर रहे हैं। इस प्रकार भी धाम का परिचय आपको दे सकते हैं, धाम को प्रकाशित कर सकते हैं। धाम में जो लीलाएं संपन्न हो रही थी/है/ होती रहेगी, उसको आपको समझाएंगे- बुझाएंगे, आपके हृदय प्रांगण में उसको प्रकट करेंगे। तो ऐसे भक्तों के चरणों में अपराध करना क्या हुआ? धाम अपराध। तो जो हमें धाम में कथा सुनाते हैं, धाम का परिचय देते हैं, धाम की सेवा में लगे हुए हैं, उनके चरणों में अपराध क्यों करना? क्या करो? क्या करो? सेवा करो…..
अपराध मत करो,अपराध मत करो। हमने अपराध नहीं किया फिर भी आपने आधा ही काम किया। करना क्या चाहिए? सेवा करनी चाहिए। उनकी आराधना भी करनी चाहिए यह भी हम अभी सुन रहे थे। आराधना भगवान की, वैसे हमारे गौड़ीय वैष्णव में यह बात प्रसिद्ध है “गुरु गौरांगो जयत:”। दोनों की भी जय हो! गुरु और गौरांग की जय! और ऑल ग्लोरीज टू द असेंबल्ड डिवोटीज़! समवेत भक्त वृन्द की जय!
तो जो भी धाम में एकत्रित हुए हैं उनकी सेवा करें,इसके अलावा और भी हैं, वह भी धाम अपराध हो जाता है। हम धाम तो गए और फिर क्या हुआ?
यत्तीर्थबुद्धि: सलिले न कर्हिचित् “
श्रीमद्भागवत पुराण (स्कंद १०, अध्याय ८४, श्लोक १३)
वहां गए और तीर्थ को क्या समझ लिया? यहां तो स्नान का स्थान है। चलो स्नान कर ले, गंगा में स्नान करते हैं,किसी कुंड में स्नान करते हैं, बस स्नान हुआ तो हो गई यात्रा, फिनिश्ड। चलो एयरपोर्ट दौड़ते हैं, रेल स्टेशन जाते हैं। तो ऐसे जन अपराधी हैं, अनाड़ी है ,वैसे ऐसे जनों की तुलना गौखर:, स एव गौखर:। करना तो क्या चाहिए? वहां के जो अभिज्ञ जन है,
“यत्तीर्थबुद्धिः सलिले न कर्हिचिज् जनेष्वभिज्ञेषु”
वहां के जो अभिज्ञ, ज्ञ मतलब ज्ञाता और अभिज्ञ मतलब बहुत कुछ या सब कुछ जानने वाले को अभिज्ञ कहेंगे। ज्ञ,अभिज्ञ तो अभिज्ञ जो है वहां के, वहां के जो पंडित है, या धाम के गुरु हैं तो उनके चरणों में पहुंचना चाहिए और उनसे सुनना चाहिए। तो वैसे आप ऐसा अपराध नहीं कर रहे थे क्योंकि आप बहुत सारा समय, अधिकतर समय श्रवण में कीर्तन में बिता रहे थे, सच्चिदानंद प्रभु से श्रवण कर रहे थे। आपने जरूर स्नान किया होगा,स्नान भी करना चाहिए ,गंगा मैया की जय! यहां स्नान का विरोध नहीं है। स्नान करने वालों की भी जय हो! लेकिन केवल स्नान से काम बनने वाला नहीं है वैसे, “सर्वात्म-स्नपनम्” आपकी आत्मा का सर्वात्मा, मतलब बॉडी-माइंड-सोल यह सबको फिर सर्व,सर्व जी शब्द है सर्वात्मा । वैसे बॉडी भी आत्मा है, बॉडी को/ शरीर को भी आत्मा कहा जाता है। तो केवल बॉडी का स्नान नहीं कराना है तीर्थ में, आत्मा का भी/मन का भी/ अंतःकरण का भी, इसको स्वच्छ करना है। तो वह स्वच्छ होगा जब अभिज्ञ जनों की संगति में हम समय बिताएंगे। हरि हरि!
आप मायापुर पहुंचे हो तो , एक बार भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर कहे कि, “आप कहां गए थे?” एक शिष्य बीच में उठकर चला गया और कहा कि मैं दर्शन करने गया था, आरती हो रही है ना मैं इसलिए गया था। उसने सोचा यह बात सुनकर श्रील भक्ति सिद्धांत सरस्वती ठाकुर बहुत प्रसन्न होंगे, शाबाश!अच्छा हुआ!
आप सब मुर्ख कहीं के, ऐसा आपने क्यों नहीं किया? यह तो बीच में गया उठकर आरती अटेंड किया, आरती देखी उसने दर्शन किया कहता है तो आप बुद्धू कहीं के, आप दर्शन नहीं किये। ऐसा शायद वह सोचा होगा जब दर्शन करने गया था। ओके टाइम इज़ अप! हमको तो और भी टॉपिक तो था। एनीवे, तो यह श्रवण-कीर्तन ही आराधना है, यह शिक्षा ग्रहण करना ही आराधना है। फिर हम ध्यानपूर्वक आराधना करेंगे, ध्यान पूर्वक जब हम ऐसे सेमिनार्स सुनते हैं तो हम ध्यान करना सिखते हैं। या जब सेमिनार होता है तभी तो ध्यान चालू ही होता है।
ध्यान,आपका ध्यान है कि नहीं? इस ध्यान से कुछ ध्यान हो रहा है? यदि आप ध्यानपूर्वक सुन रहे हो तो ध्यान और श्रद्धा पूर्वक सुन रहे हो । अरे अरे क्या हुआ? आप तो एक ही व्यक्ति को वैकुण्ठ ले जा रहे हो। कौन थे वह? ऐसा गोकर्ण ने कहा,” केवल आप छोटा सा विमान लेकर आए हो, केवल एक व्यक्ति को ले जा रहे हो पर कथा तो हजारों ने सुनी। उत्तर में विष्णुदूत एयरहोस्ट ने कहा, हां सुनी तो सही या बीच-बीच में सो भी रहे थे, शरीर तो था लेकिन कहां सुनी? बैठा तो था लेकिन ध्यान तो यहां-वहां, कहां सुनी? या सुन भी ली तो फिर जब वहां से कथा स्थली से वे गए काम के लिए, तो कथा में जो भी सुना था वहीं छोड़ के आगे बढ़े। तुरंत ही लग गए अपने काम-धंधों में और विचारों में। और भूल गए कथा सुने भी थे, क्या कथा सुने थे? तो करना तो क्या होता है? सुनी हुई कथाएं या सेमिनार में जो-जो प्रस्तुतीकरण होता है, उसका मनन करना होता है मनन मनन या उसके पहले स्मरण भी है।
“श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं”-
स्मरण करना है स्मरण। ऐसा भी कह सकते हैं कि श्रवण कीर्तन परिणत होना चाहिए, किसमें? इसका परिणाम इसके फलस्वरूप,श्रवण-कीर्तन के फलस्वरूप क्या होना चाहिए? स्मरण और स्मरण को धारण करना है तो उसके लिए मनन करना होगा, उसको ठीक-ठाक से मन में बिठाना है। जैसे गाय या पशु दो बार कहते हैं ना, एक बार ऐसे ही खा लेते हैं, चबा लेते हैं, चबाते नहीं है खाते ही खाते हैं। फिर बाद में गाय बैठती है, पशु बैठते हैं और पहले का खाया हुआ मुख में लाते हैं, रवन मराठी में और हिंदी में जुगाली करते हैं। तो फिर रस बनता है। जुगाली किया हुआ, नाइसली च्यूड जो फूड को च्यूड, फिर रस का फिर रक्त और फिर आगे क्या क्या बनता है। यह मनन को आगे निधि ध्यास भी कहा है और फिर ध्यान होगा और कब तक ध्यान करना चाहिए? या कब तक स्मरण करना चाहिए? सब समय। गोपियां क्या करती थी? हाँ? हाँ? स्मर्तव्य:। स्मर्तव्यव्य: मतलब? स्मरण करना चाहिए। स्मर्तव्य,कर्तव्य,गंतव्य ऐसे शब्द चलते हैं। तो यहां स्मरण करने योग्य या स्मरण करना चाहिए। तो गोपियों, राधा रानी क्या करती थी?
“स्मर्तव्यः सततं विष्णुर् विस्मर्तव्यो न जातुचित्”
देखिए यहां गोपियां स्मरण कर रही है लेकिन नाम किसका आ रहा है? नाम तो विष्णु का आ रहा है, गोपियों की बात यहां चल रही है, स्मर्तव्यः सततं विष्णु:, यहां विष्णु मतलब कृष्ण और विस्मर्तव्यो न जातुचित् । फिर चैतन्य महाप्रभु कहे हैं भगवान की आराधना आप करना चाहते हो और आराधना की बात वे कहे, वि आर स्टिल विद आराधना। आराधना करना चाहते हो तो कैसी आराधना करो?
“रम्या कचिद उपासना”- आराधना, उपासना,ध्यान कैसे करो?
“रम्या कचिद उपासना व्रजवधू-वर्गेण या कल्पिता”
ब्रज वधू वर्ग ने जो जैसी आराधना की वैसी आराधना करो। उसमें स्मरण जरूर होना चाहिए, चिंतन जरूर होना चाहिए और श्रवण-कीर्तन से स्मरण होता है/ याद आता है, डू यू रिमेंबर कृष्ण? या रिमाइंडर , आत्मा को रिमाइंडर मिलता है कि कृष्ण ऐसे है। कृष्ण से संबंधित बातें हमें याद रखनी चाहिए या कृष्ण भक्तों से संबंधित बातें हैं, विष्णु और वैष्णव यह जोड़ी है और फिर वैकुंठ। आराधना इन दोनों की होनी चाहिए और हम कहां गए थे? मेलकोटे गए थे अभी, तो वहां भी हमने स्मरण किया। वहां श्रीसंप्रदाय है या चैतन्य महाप्रभु ने हर संप्रदाय से दो-दो बातें या उनकी विशेषताएं उस संप्रदाय की, जो चार वैष्णव संप्रदाय हैं, दो-दो बातें अपने संप्रदाय में स्वीकार की थी । तो उसमें से श्रीसंप्रदाय से वैष्णव सेवन, विष्णुजन-सेवन या वैष्णव सेवन। तो यह हमें सीखना चाहिए, करना चाहिए, वैष्णवों की सेवा, वैष्णवों की आराधना। हां ये अलग-अलग प्रकार से हो सकती है। भगवान को हम खिलाते हैं भोग तो हम प्रसाद खिला सकते हैं वैष्णवों को, उनकी सेवा है यह आराधना है,यह अपना प्रेम है। केवल भगवान से प्रेम नहीं करना है, हमें भक्तों से भी प्रेम करना है।
ओके धन्यवाद!
