
ध्रुव महाराज का राज्याभिषेक || प. पू. लोकनाथ स्वामी महाराज (शब्दशः प्रतिलेखन subtitles)
दस्तावेज़ विवरण: इस वीडियो में प. पू. लोकनाथ स्वामी महाराज श्रीमद्भागवतम् के चतुर्थ स्कंध से ध्रुव महाराज के राज्याभिषेक, उनके पारिवारिक जीवन और यक्षों के साथ हुए युद्ध के प्रसंग पर विस्तार से कथा कह रहे हैं।
प्रवक्ता – लोकनाथ स्वामी गुरुमहाराज
दिनांक – 10 June 2026
नीचे वीडियो का (Word-to-Word Transcripts) समय के साथ दिया गया है।
वासुदेवाय कृष्ण बलराम को हमारे नमस्कार जगन्नाथ बलदेव सुभद्रा की जगन्नाथ और बलदेव कृष्ण बलराम और मध्य में सुभद्रा और गौ निताय श्री गौ निताय की वे भी कृष्ण बलराम है वैसे नंद नंद नंदन ज सची सुत होइल सई जो नंद नंदन थे हुए आज भी है वृंदावन में नंद नंदन वही तो सची सुत होईल स वही तो सची सुत बने सची माता के नंदन बने बलराम होईल निताय और बलराम बन गए नित नित्यानंद प्रभु इस प्रकार 5000 वर्ष पूर्व वृंदावन में प्रकट हुए कृष्ण बलराम पुनः 500 वर्ष पूर्व गौर निता के रूप में प्रकट हुए गौ निता भी कृष्ण बलराम है ओम नमो भगवते वासुदेवाय कृष्ण बलराम को नमस्कार क्योंकि वासुदेव वासुदेव नंदन इसीलिए भगवान को का एक नाम वासुदेव तो दो वासुदेव एक कृष्ण वासुदेव एक बलराम भी वासुदेव इनका सानिध्य तो इस भागवत कथा के सभी सत्रों में सानिध्य दर्शन इनके चरणों की सेवा आरती उतारने का हम सभी को अवसर प्राप्त हुआ आज बालाजी भगवान की जय गोविंदा गोविंदा गोविंदा गोविंदा गोविंद भी बालाजी भी आज यहां प्रकट हुए हैं वे भी गोविंद ही है भी कृष्ण है गोविंद भगवान को जब गाय प्यारी होती है तो उनको गोविंद कहते हैं गाय के रखवाले नमो ब्रह्मण्य देवाय गो ब्राह्मण हिताय च जगत हिताय कृष्णााय गोविंदाय नमो नमः वे गोविंद जिनको नमो ब्रह्मण्यदेवाय गो ब्राह्मण हिताय भगवान गाय का और ब्राह्मणों का हित करते हैं उनसे प्रेम करते हैं गाय के ये रखवाले गोविंदा गोविंदा गोविंदा ओम नमो भगवते वासुदेवाय इन गोविंद के गोपाल के कृष्ण बलराम के मतलब वैसे जगन्नाथ बलदेव सुभद्रा और हमारे राधा कुंज बिहारी लाल की राधा वृंदावन चंद्र की इन सभी के चरणों में हमारे प्रणाम कृष्ण के चरणों में कृष्ण जिनका नाम है गोकुल जिनका धाम है ऐसे श्री भगवान को कितने बारंबार बारंबार बारंबार और केवल कहने की बात नहीं कभी-कभी हम लिखते कोटि कोटि प्रणाम शायद शायद एक भी प्रणाम नहीं करते लेकिन हम लिखते हैं कोटि कोटि साष्टांग दंडवत प्रणाम कितने कितने प्रणाम कोटि-कोटि पुनः पुनः सदैव प्रणाम इनके चरणों में ही नतमस्तक होकर हम आज का कथा सत्र प्रारंभ करते हैं वैसे कहने जा रहा था लेकिन आपसे यह भी कहते आ रहे हैं कि भागवत कथा के अंतर्गत कई सारे महोत्सव आज तो बालाजी यज्ञ भी संपन्न हुआ वही भागवत कथा का ही तो वैसे अपराण काल अपराण इन द आफ्टरनून कुछ 4:30 4:30 5 बजे ही यह भागवत कथा महोत्सव प्रारंभ हुआ यज्ञ के साथ और फिर एक विशेष कीर्तन मंडली भी यहां पधारी थी हमारे मल्होत्रा एंड कंपनी उनके सहयोगी जो हर वर्ष यहां पधारते हैं विशेष करके 31 दिसंबर को आज भी पधारे उन्होंने आज कीर्तन भी सुमधुर कीर्तन भी प्रस्तुत किया साथसाथ बर्थडे पार्टी भी संपन्न हुई |
ये भागवत कथा के हैप्पी बर्थडे और अब कीर्तन और श्रीमद् भागवत कथा और और वहां समापन नहीं होगा पुष्प अभिषेक महोत्सव भी है हरी हरी वो और आज विशेष दिन या विशेष रात्रि मध्य रात्रि इस मध्य रात्रि के थ्री से फिर एक नया नया वर्ष का पर्व प्रारंभ होगा उस समय तक भी यह कथा और कीर्तन हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ये कीर्तन भी संपन्न होता रहेगा इस तरह यह आज का सातवां और अंतिम कथा सत्र विशेष है जिस कथा सत्र में आप सभी पधारे हुए कथा प्रेमियों का आप सभी आत्माओं का वैष्णवों का कृष्ण भक्तों का आज पुनः मैं हार्दिक स्वागत करता हूं हरिभ सुस्वागतम इस वर्ष हम ध्रुव महाराज चरित्र का संस्मरण कर रहे हैं और अब ध्रुव महाराज जैसे कल के सत्र में हमने यह कथा क्रम का के में श्रवण किया कि ध्रुव महाराज मधुबन से राजा उत्तानपाद अपने पिताश्री के राजधानी उनके महल में पुनः लौट गए कैसा उनका स्वागत हुआ हार्दिक स्वागत सारे नगर के निवासी ब्राह्मण पुरोहित मंत्रीगण मातापिता बंधु उत्तम भी बस स्वागत कोई छोटी समिति नहीं थी अलग से सारा नगर ही एक रिसेप्शन कमेट बन चुका था सभी ने हिस्सा लिया कायन मनसा सा वाचा तो विद ध्रुव महाराज अब बिठूर में पहुंचे हैं लालित नितम पित्र 36 हजार वर्ष रहेंगे वे जैसे राजा स्वर्ग के राजा इंद्र अपने स्वर्ग में अमरावती नामक राजधानी में रहते हैं का संपन्न जीवन समृद्ध जीवन उसे कुछ कम समृद्ध और सुखी जीवन नहीं था|
ध्रुव महाराज का उत्तानपादो राज ऋषि प्रभावम तनयतम क्या हुआ उत्तानपाद राजा श्रत्वा दृष्ट अद्भुतम प्रपदे विस्मयम परम उनके प्रभाव के संबंध में पिता श्री उत्तान पाद ने नारद जी से बहुत कुछ सुना ही था जब नारद जी लौटे थे मधुबन से उत्तानपाद राजा को मिलने के लिए समाचार देने के लिए कहा है इन दिनों में ध्रुव और कैसे कार्यकलाप में वह व्यस्त है और उसकी तपस्या का प्रभाव से प्रभावित हुए थे सारे देवता गण भी और एक समय तो उनका दम भी घुट रहा था तो सभी ने नोट किया था आ ओ ध्रुवा और तपस्वी महा तेजस्वी ओजस्वी ध्रुव के कारण यह हमारा हाल हो रहा है तो उसे राहत मिले इस उद्देश्य से वे सभी भगवान से मिले थे और भगवान ने कहा था मैं संभालूंगा अब अपने अपने लोक लौट सकते हो और फिर भगवान स्वयं मधुबन आए थे तो इस प्रकार ध्रुव के कारण में से सारे संसार भर में खलबली भी मची हुई थी सर्वत्र चर्चा थी ध्रुव महाराज ध्रुवा और उसकी तपस्या और फिर ध्यान और धारणा और समाधि और भक्ति तो जो बातें उत्तानपाद राजा ने नारद मुनि से सुनी थी सब उसको देख रहे थे राजा उत्तानपाद ध्रुव महाराज के सारे सारे कार्यकलाप और सारे ऊंचे भाव भी भक्ति भाव भी प्रपदे विस्मयम परम और यह सब देख के उनको ही सरप्राइज एंड प्लीज कहते हैं उनको आश्चरज भी लग रहा था और हर्ष भी हो रहा था उत्तानपाद राजा के ख्याति को वह बढ़ा रहा था उनका सुपुत्र ध्रुवा वी विक्षो वयसम चतम प्रकृति नाम च समतम अनुरक्त प्रजम राजा ध्रुवम चक्रे भूव पति तो ध्रुव अपनी उम्र में बढ़ रहे हैं दिन ब दिन या कई सारे वर्ष आ रहे हैं जा रहे हैं 31 दिसंबर आ रहा है हैप्पी न्यू ईयर चल रहा है और एक साल बीत रहा है तो आयु में बढ़ रहे हैं और साथसाथ वे केवल उम्र से वृद्ध नहीं हो रहे हैं ज्ञान वृद्ध भी वे हो रहे हैं ज्ञान वृद्ध परिपक्व हो रहे हैं अपने ज्ञान विज्ञान ज्ञान का सुनी हुई बातों का वे अनुभव कर रहे हैं इसी के साथ उस राजधानी के राजा के मंत्री सम्मान सत्कार करने लगे हैं |
ध्रुव का भी उसके समक्ष भी झुक रहे हैं राजकुमार के समक्ष उसके गुणों को गुणों की खान थे सज्जन थे और बुद्धिमान थे कृपालु थे दयालु थे वे क्या नहीं थे तित कारुणिक सुरदम सर्व देह नाम अजात शत्रव शंतः साधवा साधु भूषण ये साधु के आभूषण है ये सारे आभूषणों से ध्रुव समलंकृत था कारुणिका कारुण्य ध्रुव का कारुण्य सुरदम सर्वदेह नाम और सभी सभी का मित्र सभी के साथ मैत्री का संबंध ध्रुव का अजात शत्रव और उसका कोई उसने किसी शत्रु को जन्म लेने नहीं दिया उसका कोई शत्रु नहीं था हम ही किसी को शत्रु बनाते हैं उत्पन्न करते हैं हमारे और हम किसी को मित्र तो किसी को शत्रु तो लेकिन ध्रुव महाराज अजात शत्रवा उसका कोई शत्रु नहीं था जिस प्रकार का स्वभाव सुरदम सर्व देह नाम सभी के प्रति मैत्री का व्यवहार अजात शत्रवा शांतः शांत प्रकृति का स्वभाव ध्रुव महाराज तो ऐसे आभूषणों से यह समलंकृत तो क्यों ना मंत्री भी उनका सम्मान सत्कार करेंगे अनुरक्त प्रजम राजा और प्रजा भी जनता भी जनता का भी स्नेह बढ़ रहा था ध्रुव के प्रति ध्रुवम चक्र भूवापति तो राजा ने जब देखा ध्रुव महाराज अब कुछ गुण संपन्न तो उचित समय आने पर उन्होंने ध्रुव को ध्रुव को सिंहासन पर बिठाया राज अभिषेक संपन्न हुआ भूव भूव पति भुआ मतलब पृथ्वी के पति सम्राट केवल राजा ही नहीं सम्राट राजा के राजा थे कई सारे भिन्नभिन्न राजा इस प्रदेश का इस देश का इस क्षेत्र का किंतु हुआ ध्रुव महाराज पृथ्वी पति ही सारे पृथ्वी के राजा बने जब देखा राजा ने जब देखा था कि मैं मैं भी वृद्ध हो रहा हूं अब जिम्मेदारी ध्रुवों को देनी चाहिए तो दे दी वैसे जैसे दशरथ राजा दशरथ भी एक समय अपनी वृद्धावस्था में और राम अब कुछ उम्र में भी और अनुभव में भी बड़ा बन चुका है तो एक समय वे आईने में देख रहे थे तो कुछ सफेद बाल some grey hair तो उन्होंने सोचा कि अब यह वानप्रस्थ का समय है
यहां का सम्राट या राजा बनेगा राम और मैं वन में प्रस्थान करूंगा तो उसकी तैयारी वे कर रहे थे तो आगे का प्रसंग आप जानते ही हो घटनाक्रम क्या लेकिन दशरथ नहीं आ अभी तो he retire बाल सफेद हो रहे यानी कि बाल सफेद हो रहे तो पुनः काला करते उसको पॉलिश करते हैं क्या हुआ वनम विरक्त प्रतिष्ठत तो वन के लिए वे प्रस्थान किए आत्मनः गति अपने आगे का जो मार्ग है या गंत गंतव्य स्थान है भगवत धाम लौटना है भगवान के चरणों का को प्राप्त करना है या अंते नारायण क्या स्मृति अते नारायण स्मृति उसकी तैयारी के लिए राजा आगे बढ़े धीरे-धीरे भविष्य में ध्रुव महाराज का विवाह हुआ प्रजापति दुहतरम तो शिशुमार नामक प्रजापति की पुत्री भ्रमी नामक भ्रमी उसका नाम उसके साथ विवाह हुआ और दो पुत्र जन्मे एक के उपरांत एक का नाम रखा कल्प दूसरे का नाम वत्सर एक दोनों भी का दोनों नामों का संबंध वैसे काल गणना के साथ है ब्रह्मा का एक दिन कल्प कहलाता है तो एक पुत्र का नाम कल्प रखा और एक वर्ष व्सर एक वत्सर दो वत्सर मतलब एक एक साल तो इस प्रकार दो पुत्रों के नाम रखे और एक विवाह हुआ वायु की पुत्री ईला तो देखिए यह घराना ध्रुव महाराज का कोई जैसे मनु महाराज के ये ग्रैंड सन प्रौत्र तो फिर उनका विवाह तो ऐसा प्रजापति की पुत्री के साथ एक विवाह तो वायु देवता के पुत्री के साथ दूसरा विवाह उत्कल नामक पुत्र ने जन्म लिया इलावती के ईला के नाटिला ईला के गर्भ से और एक कन्या रत्न भी प्राप्त हुआ जिसके नाम का उल्लेख यहां नहीं आता है बड़े भाई का तो विवाह हुआ लेकिन उत्तम जो अनुज थे अनुज ध्रुव अग्रज और उत्तम अनुज उसका विवाह अब तक नहीं हुआ था और अब ऐसे कभी भी होना नहीं था तो जब वे अविवाहित ही थे तो एक समय की बात है जैसे भगवान ने ध्रुव महाराज को यह बताया ही था तुम्हारे उत्तम की क्या गति होगी उसका वध होगा तो शिकार के लिए गया हुआ ये उत्तम इस उत्तम का वध एक यक्ष ने किया इसका पता चलने के उपरांत उसकी माता उसकी खोज में कहां है या है या नहीं है या जिंदा है
या मरा है पता लगवाने खोज ने जंगल में उसने भी प्रवेश किया सुरुचि ने तो वह दावा अग्नि जंगल में लगी हुई आग में उसके भी प्रवेश हुआ और उसी के साथ उसके भी अंतिम संस्कार करने वाला तो कोई नहीं था लेकिन संपन्न हुआ अंतिम संस्कार तो जब ध्रुव महाराज को पता चला कि मेरे भ्राता श्री का वध करने वाले यह यक्ष है कोई यक्ष है तो ध्रुव महाराज बड़े क्रोधित हुए और बदला लेने हेतु वे भी चल पड़े जहां यक्ष निवास किया करते थे उनके नगरी के पास जाकर उन्होंने शंख ध्वनि की चुनौती दी आ जाओ मैदान में कौन है मेरे भ्राता श्री का वध करने वाला तो उस शंख ध्वनि के नाद के श्रवण से ही सभी भयभीत हो गए यक्षों के पत्नियां सोचने लगी अब अब क्या होगा हमारे पतिदेवों का क्या भविष्य इनको जिंदा भी तो छोड़ेंगे ध्रुव तो तो ध्रुव ने जब ललकारा तो यक्ष तो आ गए यहां कहा है
एक लाख और कुछ 30 हजार यक्ष एक साथ ध्रुव के साथ ध्रुव अकेले और यह सब यक्ष इन दोनों के बीच में संग्राम एक रणांगन रण का आंगन बन गया तो ध्रुव महाराज ने अपना धनुष चला के सभी यक्षों के अंगों में सिर में छह छह बाण चलाए इसके साथ वे सभी भागे और नगरी में छिपे और ध्रुव महाराज जाना चाहते थे नगर में प्रवेश करना चाहते थे उनके सारथी ने नहीं कहा नहीं नहीं नहीं आप यही रुके रहिए अब उनकी जो नेक्स्ट जो चाल है यक्षों की उसकी प्रतीक्षा कीजिए तो रुके रहे ध्रुव महाराज तो यक्षों ने आकाश से बड़े-बड़े अलग-अलग सिद्धि को प्राप्त ऐसे यक्ष बड़ी भीषण घोषणाएं आकाश से ध्वनि सुनाई देने लगी कई सारी हड्डियां और रक्त मांस की भी वर्षा होने लगी बड़ी भयानक स्थिति उत्पन्न हुई और सर्वत्र और वे अपने बाणों से हमला भी करने लगे ध्रुव के ऊपर और इतने बाण कि जिसके कारण सर्वत्र अंधेरा छा गया जहां ध्रुव महाराज थे मानो जैसे पर्वत के ऊपर कोई बादल उमड़ आए वर्षा के समय तो अंधेरा उत्पन्न हो ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई थी तो अब सभी सोच रहे थे अभी तो ध्रुव का अंत वैसे स्वर्गवासी भी चिंतित थे कि अब अब क्या होगा अब ध्रुव महाराज का क्या होगा वे प्रार्थना कर रहे थे और तो इसी के साथ वैसे ध्रुव महाराज उस अंधेरे से ऐसे बाहर आए मानो कोहरे से कोई सूर्य सूर्य पुनः उदित होके सर्वत्र प्रकाश को फैला दे और उस समय फिर ध्रुव महाराज ने अपने सर्वशक्ति और सामर्थ्य के साथ कहा है नारायण ऋषिवर नारायण के द्वारा उनको प्राप्त विशेष अस्त्र धनुष पर उन्होंने चढ़ाया और उसको सभी की ओर यक्ष जो वहां थे उसको फेंके हैं बड़ा तीक्षण था वो शस्त्र अस्त्र और और भी बाण उसे वर्षा कर रहे हैं
ध्रुव महाराज अब सारे यक्ष जाति को या वो घराने को समूल नष्ट करने के उद्देश्य से युद्ध खेल रहे हैं तो वैसे मनु महाराज भी और भी स्वर्ग के देवता भी सोच नहीं नहीं नहीं इतना इतना अन्याय तो नहीं होना चाहिए ध्रुव महाराज कुछ अपने सीमा से अधिक बाहर जाके वैसे वध तो उत्तम का वध करने वाला तो एक यक्ष होगा एक यक्ष का अपराध के कारण सभी को अपराधी मान के सभी को सभी की हत्या करना उचित नहीं है तो मनु महाराज जो ध्रुव महाराज के दादा है ग्रैंड फादर स्वयं आए हैं
अलम व्स अति रोशना रुको रुको रुको रुको शांत हो जाओ ध्रुव शांत हो जाओ इनफ इस इनफ बहुत हो गया ना मार्ग ही साधु नाम ये साधु तुम साधु हो तुम संत हो तुम भक्त हो तुम ऐसे सुरित भी हो इन बातों को तुम भूल गए क्या तुम हो कौन तो तुम्हारे लिए यह मार्ग उचित नहीं है अन्याय कर रहे हो तुम ऋषिकेश अनुवर नाम जो ऋषिकेश के अनुगमी होते हैं ऋषिकेश भगवान के जो भक्त होते हैं उनके लिए यह ऐसा कार्य उचित नहीं है हम्म
