
GOPALBHAT GSM DISAPPEARANCE DAY
07-07-2023
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श्रील गोपालभट्ट गोस्वामी तिरोभाव दिवस – इस्कॉन एन.वी.सी.सी
“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे”।
“जे अनिलो प्रेम धन करुणा प्रचूर…”(वैष्णव गीत)
ये महान दिन होता है,हर्ष का भी दिन होता है और शोक का भी दिन होता ही है। गौर पार्षदों का जब विरह होता है ,फिर विरह की व्यथा होती है, उसको व्यक्त किए हैं नरोत्तम दास ठाकुर अपने इस, “जे अनिलो प्रेम-धन” गीत में। हमको तो ऐसा ज़्यादा कुछ होता नहीं है लेकिन ऐसा होना तो चाहिए, जैसा विचार और भाव नरोत्तम दास ठाकुर व्यक्त कर रहे जब गौर पार्षदों का तिरोभाव होता है।
“जे अनिलो प्रेम-धन करुणा प्रचुर हेना प्रभु कोथा गेला श्रील गोपाल भट्ट ठाकुर”
जो प्रेम धन को प्रचुर मात्रा में लाए और उसका वितरण किए अब वे आज के दिन(वर्ष १५३१) में कहाँ गए? आज पंचमी भी है और मास कौन सा चल रहा है? आषाढ़। “कहां मोर स्वरूप रूप, कहा सनातन” ये नरोत्तम दास ठाकुर की स्वयं के अनुभव है। जैसे जैसे उनको पता चलता रहा कि यह भी आचार्य नहीं रहे, वे भी नहीं रहे,ये भी नहीं रहे, तो वे कहाँ गए? “कहाँ दास रघुनाथ पतित-पावन” पतितों को पावन करने वाले वे दास रघुनाथ कहाँ गए? “कहाँ मोर भट्ट-जुग कहाँ कविराज?” भट्ट युग गोपाल भट्ट और रघुनाथ भट्ट आज जिनका तिरोभाव तिथि महोत्सव मना रहे है। वे गोपाल भट्ट और कौन से भट्ट रघुनाथ भट्ट युग,दो। “एक-काले कोथा गेला गोरा नटराज कहा मोरा भट्ट-जुग कहा कविराज” नरोत्तम दास ठाकुर के पहले यह सब आचार्य धाम वापस जा चुके थे। चूंकि नरोत्तम दास ठाकुर दूसरी पीढ़ी के आचार्य हैं, इसलिए वे पहली पीढ़ी के आचार्यों का स्मरण करते हुए अपने विरह की व्यथा व्यक्त कर रहे है। “एक-काले कोठा गेला गोरा नटराज” गौरा नटराज मतलब गौरांग, तो गौरांग कहाँ गए? वैसे श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु जब अंतर्ध्यान हुए, टोटा गोपीनाथ के विग्रह में प्रवेश किए, तो उस समय से तो गौड़ीय वैष्णव आचार्यों के या गौर पार्षदों के डिपार्चर्स/ तिरोभाव अधिक संख्या में होने लगे। आप समझ ही सकते हो कि क्यों? “पाषाणे कुटिबो माथा अनले पसिबो गौरांग गुनेरा निधि कोठा गेले पाबो” गौरांग महाप्रभु के गुनेर निधि/गुण की निधि थे यह सब। गौरांग महाप्रभु के पार्षद परिकर कोथा गेला? मैं अब उनको कैसे प्राप्त कर सकता हूँ? नहीं प्राप्त कर पाऊंगा “से सब संगीरा संगे जे कोइलो बिलास” इनमें से कईयों का मुझे अंग संग प्राप्त हुआ था, किन्तु अब वे नहीं रहे। “से-संग न पइया कांदे नरोत्तमदास” उनका संग अब प्राप्त नहीं हो रहा है, तो अब क्रंदन करने के बजाय कुछ बचता ही नहीं। आज के दिन वृन्दावन में राधारमण मंदिर में ही कहीं, भगवान की लीला में उन्होंने प्रवेश किया। “जय ॐ नित्य लीला प्रविष्ट श्रील गोपाल भट्ट गोस्वामी महाराज की जय!” वे भगवान की नित्य लीला में प्रवेश किए,उनकी समाधि राधारमण मंदिर के पीछे ही है और उनके सेवित विग्रह राधारमण हैं। आप उनके दर्शन किए हो? वही एक विग्रह गोपाल भट्ट गोस्वामी द्वारा सेवित, वृंदावन में रह गए हैं। बाक़ी सारे विग्रहों को स्थानांतरित करना पड़ा। कोई तो जयपुर में हैं, मदनमोहन करौली में हैं, श्रीनाथजी नाथद्वारा में हैं और अन्य स्थानों पर भी स्थानांतरित किए गए थे वृन्दावन के षड गोस्वामी वृन्दो द्वारा सेवित विग्रह भी। किन्तु एक विग्रह वृंदावन से
“एकम पादम वृंदावनं परित्यज्य, एकम पादम न गच्छति”
राधारमण एक पग भी बाहर नहीं गए, वे हटे ही नहीं वहाँ से और आज भी वहाँ है। जय राधा रमण की जय! वैसे वहाँ रमण जी के विग्रह ही है, राधा का तो सिर्फ मुकुट ही है, कोई उनका विग्रह नहीं हैं। जो शिलाएँ थी गोपाल भट्ट गोस्वामी के पास, उसमें से एक शिला श्री रमण बन गई,राधा तो नहीं बनी। गोपाल भट्ट गोस्वामी उत्तर भारत में वृंदावन आए लेकिन जन्म तो उनका हुआ था श्रीरंगम में,वे वेंकट भट्ट के पुत्र थे। श्रीरंगम कावेरी नदी पर स्थित हैं। कावेरी मैया की जय! ऐसे हर वस्तु का स्मरण करना हमारे पावित्र्य को और बढ़ाता है। गोपाल भट्ट गोस्वामी अनंग मंजरी थे। श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु की जय! चैतन्य महाप्रभु ही मुझे कहना था और वाक्य को पूरा करना था, लेकिन फिर जय कहे बिना रहा नहीं जाता। उन्होंने जब जगन्नाथ पुरी से प्रस्थान किया, उनका परिभ्रमण प्रारंभ हुआ, तो गोदावरी के तट पर वे मिले थे राय रामानंद को, जो साक्षात विशाखा ही थी या थे। अब वे आगे बढ़े हैं तो कावेरी के तट पर श्रीरंगम आए और वेंकट भट्ट के यहां रुके(जिनके और दो भाई भी थे)। उन्होंने श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु को अपने निवास स्थान पर रहने के लिए आमंत्रित किया। वैसे वे वही रहने वाले थे, चाहे आमंत्रित करें या न करें। आमंत्रण तो कारण बना। उस समय चातुर्मास चल रहा था, जैसा अभी चल रहा है न। चैतन्य महाप्रभु का श्रीरंगम में रहना और फिर गोपाल भट्ट गोस्वामी को मिलना, वो भी चतुर्मास में हुआ और गोपाल भट्ट गोस्वामी जी का तिरोभाव भी चतुर्मास में ही हो रहा है। चैतन्य महाप्रभु को श्रीरंगम में रहना ही था वेंकट भट्ट के निवास स्थान पर। उनका उस निवास स्थान पर रहना वाज़ नॉट ऐन एक्सीडेंट, बट धिस वाज़ ऐन अरेंजमेंट,ऐसा ही चाहते थे चैतन्य महाप्रभु। और उस इच्छा की पूर्ति हुई। वेंकट भट्ट जब श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु को आमंत्रित किए तो चैतन्य महाप्रभु चार महीने रहे वहाँ। (सो क्यों रहे हो?वैसे एक के लिए कहा लेकिन यह औरों के लिए भी है। “या लेकी बोले सुने लागे”।
सीधा बैठीए, सिट प्रॉपरली,योगी की तरह बैठिए। कैसे न बैठिए? भोगी की तरह। मैं कहना नहीं चाहता था लेकिन आप ख़ाली स्थान भर सकते हो। ये अंदर होगा ना, जब आचार्यों का कुछ गुणों का व्याख्यान हो रहा है, गौरव गाथा गाने का प्रयास हो रहा है, और हम पूरी तरह से उसे अनदेखा कर रहे हैं। यह सही नहीं है, यह सदाचार नहीं है। उस समय गोपाल भट्ट गोस्वामी केवल सात साल के थे। मैं और भी कुछ कहने वाला हूँ, ऐसा विचार तो आ रहा है। ऐसे अभी महाप्रभु गोपाल भट्ट गोस्वामी को मिल रहे,तो ये दूसरे गोस्वामी है जिनको श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु मिले हैं। पहले गोस्वामी जिनको वे मिले वे थे रघुनाथ दास गोस्वामी। श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु ने संन्यास लिया है और उनको थोड़ा युक्तिपूर्वक नित्यानंद प्रभु और अद्वैत आचार्य शांतिपुर लाए थे। वहाँ सप्त ग्राम से (रघुनाथ दास गोस्वामी का जन्मस्थान) से रघुनाथ दास गोस्वामी चैतन्य महाप्रभु को मिलने आए थे और मिले भी। और अधिक नहीं कहूंगा कि वे मिलें तो क्या हुआ? क्या आदेश हुआ? श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु पूरे दक्षिण भारत की, महाराष्ट्र की भी यात्रा करते हुए हैं जगन्नाथ पुरी लौटते हैं और पुनः वे भ्रमण के लिए प्रस्थान करते हैं। दक्षिण भारत से अब वे पूर्वी भारत याने बंगाल जाते हैं और बंगाल में रामकेली जाते हैं। यहाँ पर वे रूप- सनातन को मिलते हैं, उस समय जीव गोस्वामी शिशु थे कुछ ही साल के, एक-दो साल के ही होंगे। वे महाप्रभु से मिले थे या नहीं मिले थे, ऐसा कहना कठिन है। चैतन्य महाप्रभु तो बालक जीव को देखे होंगे ऐसी संभावना है। रूप-सनातन के भ्राता अनुपम के पुत्र थे जीव गोस्वामी रामकेली में। श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु पुनः वैसे जगन्नाथपुरी लौटते हैं और तीसरी बार जब वे भ्रमण के लिए निकलते हैं/प्रस्थान करते हैं तो वृंदावन जाते हैं।
वृंदावन से लौटने के रास्ते पर वे वाराणसी आते हैं। यहाँ वैसे उनका दूसरी बार सनातन गोस्वामी के साथ मिलन होने वाला है और रूपगोस्वामी के साथ तो मिलना हुआ ही था प्रयागराज में। लेकिन यहाँ पर रघुनाथ भट्ट को मिलते हैं वाराणसी में, ये तपन मिश्र के पुत्र रहे। तपन मिश्र वैसे बांग्लादेश के थे और चैतन्य महाप्रभु ने उनको कहा था तुम वाराणसी जाओ। उस समय उनको समझ नहीं आया कि वाराणसी जाने को क्यों कहा है? महाप्रभु बोले क्योंकि “मैं आने वाला हूँ भविष्य में वहाँ, तो वहीं मिलूँगा”। वाराणसी में जहाँ चैतन्य महाप्रभु दो मास रहे हैं, तो वहाँ पर यह रघुनाथ भट्ट भी बालक थे,(जैसे गोपाल भट्ट भी एक बालक थे)। जीव गोस्वामी तो बालक भी नहीं थे, शिशु थे। रूप और सनातन बुजुर्ग थे,बड़े थे। रघुनाथ दास युवा थे इसलिए उनको कहा गया था कि जाओ विवाह करो। इस प्रकार श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु का इन षड गोस्वामी वृन्दो के साथ अलग- अलग समय अलग- अलग स्थानों पर मिलन हुआ था और इन सब को एक-एक करके श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु वृंदावन भेजते हैं। वैसे सब से पहले जिनको भेजा था वे तो थे लोकनाथ गोस्वामी और भूगर्भ गोस्वामी। किन्तु लोकनाथ गोस्वामी की षड गोस्वामी वृन्दो के समूह में गणना नहीं होती किन्तु वह यह छह के अलावा
“वन्दे रूप-सनातनौ रघुयुगौ श्रीजीव-गोपालकौ” इन छह के साथ और भी दो के नाम जोड़े जाते हैं।
और वे हैं: लोकनाथ गोस्वामी और कृष्णदास गोस्वामी। इनका भी एक विशेष समूह/टीम/ संघ है। अब हम श्रीरंगम की कथा पर वापस आते हैं, महाप्रभु ने संन्यास लिया है इस बात पर गोपाल भट्ट गोस्वामी प्रसन्न नहीं हैं। एकांत में वे क्रंदन कर रहे थे,”आखिर क्यों संन्यास किया?” फिर वहां रहकर चैतन्य महाप्रभु प्रस्थान भी कर रहे थे, श्रीरंगम को छोड़ रहे थे। यही तो होता है संन्यास लेने से,कई लोग बिछुड़ जाते हैं,पीछे छूट जाते हैं। गोपाल भट्ट को भी पीछे छोड़कर महाप्रभु आगे बढ़ रहे हैं। इस बात से गोपाल भट्ट प्रसन्न नहीं थे, इसलिए महाप्रभु स्वप्नादेश में अपनी नवद्वीप की लीलाओं का दर्शन देते हैं। ये लीलाएं जब श्रवण करते गोपाल,तो रोमांचित होते हैं, अश्रु धाराएं बहने लगती हैं। स्वप्न में ही महाप्रभु गोपाल को अपनी गोद में लिटाते हैं और स्वयं भी आंसू बहा रहे होते हैं। उनके आंसुओं से गोपाल भट्ट का अभिषेक हो रहा होता है।हरि हरि! महाप्रभु श्रीरंगम में वेंकट भट्ट के यहां थे, वेंकट भट्ट के दो भाई और थे। उनमें से एक थे प्रबोधानंद सरस्वती ठाकुर,श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु सभी पर प्रभाव डाले। इस परिवार के लोग लक्ष्मी नारायण के आराधक थे,महाप्रभु ने देखा कि उन लोगों को थोड़ा दर्प/ अभिमान भी था कि वे लक्ष्मी नारायण के पुजारी थे। चैतन्य महाप्रभु देख रहे थे वेंकट भट्ट की यह सोच है कि नारायण/ विष्णु ही हैं अवतारी और कृष्ण उनके अवतार हैं। तो मतलब नारायण ही सर्वोपरि है। यह ग़लतफ़हमी/ मिसअंडरस्टैंडिंग कईयों तो होती ही है। तो महाप्रभु के इस विषय में कई संवाद हुए होंगे, उसमें से एक संवाद में महाप्रभु कहे, ”तुमारी लक्ष्मी वैसे प्रसिद्ध पतिव्रता नारी तो है, किंतु वे हमारे कृष्ण का पीछा क्यों करती रहती है या कृष्ण को क्यों चाहती है? वे वहाँ जाकर बेलवन/ श्रीवन/ लक्ष्मीवन में तपस्या कर रही है और श्रीकृष्ण का अंग-संग चाहती है।” ये काफ़ी लंबा संवाद है। तो वेंकट भट्ट बोले, “हां हां एक ही बात है। नारायण ही है कृष्ण, कृष्ण ही है नारायण।” तब चैतन्य महाप्रभु बड़ा विस्तार से समझाते हैं कि वृंदावन में तो नन्दनन्दन हैं,
“आराध्यो भगवान बृजेशतनय तद्धाम वृन्दावनम” यहाँ तो बृजेन्द्र नंदन की आराधना होती है और आराधना कैसी होती है?
“राम्या काचित उपासना ब्रजवधू वर्गेन या कल्पित:” वहाँ की जो गोपांगनाए/बृजवधू/ गोपियाँ जिस भाव से आराधना करती है, वही वैसे आराधना की सर्वोच्च पद्धति है। आराधना करनी है तो वो राधा जैसी/ गोपी जैसी आराधना करो। राधाभाव में /गोपी भाव में आराधना करनी चाहिए। हमारी तो राधा है, तुम्हारी लक्ष्मी हैं। तुम्हारी लक्ष्मी हमारे कृष्ण की आराधना करना तो चाहती है, किन्तु हमारे कृष्ण की आराधना करने के लिए अनुगत्य अनिवार्य होता है। अनुगत्य होना या फ़ॉलोअर होना आवश्यक है।
“एहि निवेदन धर सखिर अनुग़त कर सेवा अधिकार दिए कर निजदासी”
मेरा निवेदन है तुलसी महारानी के चरणों में की मुझे अनुगत्य प्रदान करें। लेकिन तुम्हारी जो लक्ष्मी हैं ये अनुगत्य स्वीकार नहीं करना चाहती है। तुम्हारी लक्ष्मी राधाकृष्ण की रासक्रीडा में प्रवेश तो करना चाहती हैं पर लेकिन किसी को फॉलो नहीं करना चाहती। जो भी रास क्रीड़ा में प्रवेश करना चाहते हैं तो दो बातें आवश्यक है: एक तो गोपी जैसा रूप चाहिए और दूसरा गोपी जैसा भाव भी चाहिए, जिसमें आनुगत्य अनिवार्य हैं। लेकिन तुम्हारी लक्ष्मी तो लक्ष्मी बने रहना चाहती हैं अपने वैभव/ साज-सिंगार समेत। जबकि यदि कृष्ण मुरली का वादन करते थे तो गोपियाँ वह सुनते ही दौड़ पड़ती थी। कोई तो एक ही क़ान में कर्णकुंडल पहने होती थी, दूसरे में पहने बिना हीं निकल जाती थी। क्योंकि बीच में ही उन्हें मुरली की नाद सुनाई देती थी तो श्रृंगार बीच में छोड़कर दौड़ पड़ती थी के, सारा श्रृंगार अंततोगत्वा उल्टा-सुल्टा करके। महालक्ष्मी तुम्हारी लक्ष्मी मुरली की नाद सुनेगी तो बोलेगी,” बजने दो, मेरा सिंगार तो नहीं हुआ है, आई ऐम नॉट फिनिश्ड। ही हैज़ टू वेट फ़ॉर मी”। ये भावों का भेद है, मतलब प्रेम भी कुछ कम-अधिक भी हैं। हरि हरि! कृष्ण वैसे भी रसराज कृष्ण है, भक्ति रस के सिन्धु हैं। मैं कहीं पढ़ रहा था कहीं लिखा है, गौड़ीय वैष्णव लिटरेचर में कि श्रीकृष्ण ही है जो पाँच प्रमुख रस है और सात गौण रस है, ये सारे रसों का प्रदर्शन करते हैं। पांच और सात कितने हो गये? थोड़ा सोचिए ताकि नींद नहीं आए। आपका सोचना बंद होता है तो नींद आती है, इसलिए इंटरैक्टिव सेशन होना चाहिए। नारायण तो ढाई रसों का प्रदर्शन करते है और कृष्ण कितने? 12 रसों का। एक स्थान पर ऐसे रेफरेंस देखने-पढ़ने को मिला तो मुझे आश्चर्य हुआ। इस प्रकार के संवाद वहाँ चार मास होते रहे और कीर्तन भी होता ही रहा।
“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे,
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे”
तो “हरेर नाम एव केवलम्” ही पर्याप्त है। तो उसी से बाकी के जन समूह की संख्या,उसी चतुर्मास में, श्रीरंगम में कुछ अधिक हुई जब चैतन्य महाप्रभु वहाँ निवास कर रहे थे। वैसे भी चैतन्य महाप्रभु आकृष्ट कर रहे थे अधिक से अधिक जीवों को और फिर उनका फ़ोकस इस परिवार के ऊपर भी था। उसी से यह सारा परिवार गौड़ीय वैष्णव परिवार हो गया। वे सभी राधाकृष्ण के पुजारी बन गये, एक तो गोपाल भट्ट जो आगे जाके गोस्वामी बने; वेंकट भट्ट तथा प्रबोधन्द सरस्वती ठाकुर दोनों ने श्रीरंगम को त्याग कर सीधे वृन्दावन प्रस्थान किया। वृन्दावन धाम की जय! वे वहाँ निवास करने लग गए और फिर वहाँ करेंगे,
“आराध्यो भगवान बृजेशतनय तद्धाम वृन्दावनम” वृन्दावन की भी आराधना करेंगे और गोपीभाव मे सब करेंगे। ऐसे यह तो अनंग मंज़री है ही गोपाल भट्ट गोस्वामी। प्रबोधानन्द सरस्वती ठाकुर काम्यवन में एक सुरभी कुंड है, जिसके तट पर अपनी कुटिया बनाकर रहने लगे और इन्होंने कई सारे ग्रंथों की भी रचना की और विशेष परिकर/फ़ॉलोअर रहे प्रबोधानंद सरस्वती ठाकुर। फिर उन्हीं के शिष्य बन जाते हैं गोपाल भट्ट गोस्वामी,अपने अंकल/चाचा से उन्होंने दीक्षा ली और गोपाल भट्ट गोस्वामी अब वृंदावन में निवास कर रहे थे। ये सभी गोस्वामियों के लिए, वैसे श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु का आदेश या अपेक्षा यह थी कि वे क्या- क्या करेंगे?
१) भगवान के लीला स्थलियों को खोजेंगे। अब खोजने की क्या आवश्यकता है वह नहीं बताऊँगा लेकिन ऐसा कहकर मैं फिर कहना शुरू कर ही रहा हूँ। मुसलमानों के आक्रमणों के कारण श्रीवृंदावन के विग्रह स्थानांतरित किए गये थे और वृन्दावन की यात्रा करने के लिए कोई नहीं आ रहा था, परिक्रमाये बन्द थी। तो चैतन्य महाप्रभु ‘ ग्लोरी ऑफ वृन्दावन’ का रिवाइवल या पुनः वृन्दावन के वैभव की स्थापना करना चाहते थे। श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु की जय! एक तो लोग भूल गए थे कि कौन सी लीला कहाँ हुई? कौनसी लीला स्थली कहाँ है? तो षड गोस्वामी वृन्द को आदेश था कि आप उन लीला स्थलों को खोजेंगे।
२) दूसरा आदेश था कि उन स्थानों पर मंदिर का निर्माण होगा और विग्रह की आराधना होगी।
३) ग्रंथों की रचना करनी होगी।
४) आखिरी आदेश था कि खूब प्रचार/ प्रसार/ श्रवण/ कीर्तन करना होगा।
तो गोपाल भट्ट गोस्वामी ऐसे कार्य में लगे ही थे और उनके वृन्दावन पहुँचने के पहले लोकनाथ गोस्वामी वहाँ पहुँचे हुए थे। रुप और सनातन भी पहुँचे थे। गोपाल भट्ट गोस्वामी जब आते हैं तो रूप और सनातन बड़े प्रसन्न होते हैं, दे आर सो हैप्पी। चैतन्य महाप्रभु जो जगन्नाथ पुरी में थे, उनको संदेश भेजते हैं, “गोपाल भट्ट गोस्वामी इज़ हीयर, गोपाल भट्ट गोस्वामी आए हैं”। 500 वर्ष पूर्व उनकी कोई पद्धति होगी या पोस्टमैन आते जाते होंगे, बिटवीन वृन्दावन एंड जगन्नाथ पूरी। चैतन्य महाप्रभु को जब पता चला कि गोपाल भट्ट वृंदावन पहुँचे हैं तो उनके भी उनके आनंद की सीमा नहीं रही, ही वाज़ जॉयफुल। गोपाल भट्ट गोस्वामी के जीवन चरित्र पर लिखा या या ‘ भक्ति रत्नाकर’ में उल्लेख आता है, चैतन्य महाप्रभु ने स्वयं की डोर (मतलब पता नहीं ),एक कौपीन और एक लकड़ी का आसन गोपाल भट्ट गोस्वामी के लिए वृन्दावन भेज दिये। हरि हरि! ‘हरि भक्ति विलास’ की रचना में भी गोपालभट्ट गोस्वामी भी जिम्मेदार रहे। वे बिल्व मंगल ठाकुर के “कृष्ण कर्णामृत” पर भी भाष्य लिखे जो प्रसिद्ध है। जीव गोस्वामी लिखते है कि मैंने जो “षड संदर्भ” की रचना की है इसमें भी मुझे मदद हुई। गोपाल भट्ट गोस्वामी का जो वाङ्मय कॉन्ट्रिब्यूशन है उसकी मदद लेकर ही मैंने षड संदर्भ लिखे। अन्य गोस्वामियों के तो विग्रह थे लेकिन गोपाल भट्ट गोस्वामी के पास शिलाएं थी, 12 अलग-अलग शिलाएं थी, जिसको नेपाल जाकर (उस समय तो शायद पता नहीं क्या नाम था) गंडकी नदी से इन शिलाओं को प्राप्त किया था। एक समय इन शिलाओं को लौटाने के उद्देश्य से वे जाते भी हैं और उस नदी में पुनः उनका विसर्जन करने का प्रयास भी होता है। लेकिन ये शिलाएँ जैसे ही वे रख देते, जल में छोड़ते, तो वे पुनः उनके हाथ में आकर अपना स्थान ग्रहण करती। गोपाल भट्ट गोस्वामी को छोड़ना नहीं चाहती थीं। हम को माया नहीं छोड़ती, उनको कृष्ण नहीं छोड़ रहे थे। इन शिलाओं की आराधना चल तो रही थी,लेकिन गोपाल भट्ट के मन में तीव्र इच्छा थी कि क्या मेरे भी विग्रह हो सकते हैं।
“वंशी विभूषित करान” ताकि फिर मैं भी उनको बंसी धारण करा सकता और कई सारे श्रृंगार अर्पित करता सकता मैं,तो भगवान जान ही गए गोपाल भट्ट गोस्वामी की इच्छा। एक दिन की बात है भगवान की प्रेरणा से ही एक सेठजी आए। हमारे केशव प्रभु जैसे सेठजी भी श्रृंगार-मुकुट बनाते रहते हैं और गोपाल कृष्ण महाराज को देते हैं उनके विग्रह की आराधना के लिए। एक सेठ जी बहुत सारा वस्त्र/ श्रृंगार/अलंकार लेकर आए और गोपाल भट्ट गोस्वामी को दे दिए। उन्होंने उनको स्वीकार तो किया लेकिन सोच रहे थे क्या करूंगा मैं इतने सारे श्रृंगार का क्योंकि मेरे भगवान तो शिला ही है? उस रात्रि को अपनी शिलाओ को विश्राम कराया और स्वयं भी विश्राम किए। जब प्रातः काल उठते हैं और देखते हैं ”उत्तिष्ठ उत्तिष्ठ गोविन्द त्रैलोक्यं मंगलम कुरु” ऐसी प्रार्थना की होगी उन्होंने, जगिए जगिए कहकर भगवान को जगाते हैं, तो देखते हैं कि एक शिला अब शिला नहीं रही, वह श्री श्री रमण बन गए। क्या अद्भुत घटना है। भगवान है कि नहीं, भगवान होते हैं क्या? त्रिभंग ललितम भगवान, इसका समाचार सर्वत्र फैला। रूप गोस्वामी और सनातन गोस्वामी भागे दौड़े आए, श्री रमण के दर्शन के लिए, बहुत बड़ा उत्सव संपन्न हुआ। तब से प्रतिवर्ष जिस दिन शिला बनी रमण ,उस दिन बड़ा उत्सव होता है वृंदावन में वैशाख पूर्णिमा।
नरसिंह चतुर्दशी के दूसरे ही दिन, वैशाख पूर्णिमा के दिन गोपाल भट्ट गोस्वामी की शिला एक विग्रह बन गई। एक समय ऐसी भी घटना घटती है गोपालभट्ट गोस्वामी सहारनपुर जाते हैं (उत्तर प्रदेश में एक जिला है सहारनपुर) वहां एक ब्राह्मण के साथ उनकी मुलाकात होती है। यह ब्राह्मण थोड़े दुखी थे,उनके दुख का कारण यह था कि उनका अपत्य नहीं था या उनकी संतान नहीं थी। इस बात को गोपाल भट्ट गोस्वामी समझ गए कि वे क्यों दुखी है,क्यों निराश हैं? तो उन्होंने विशेष आशीर्वाद दिया इस ब्राह्मण को कि तुम्हारे पुत्र होंगे और फिर सचमुच उनको पुत्र हो ही गया। ऐसा कहा था उस ब्राह्मण ने कि,” यदि मुझे पुत्र प्राप्त होता है तो उसको मैं आपकी सेवा में समर्पित करूंगा”। तो ब्राह्मण का पुत्र गोपीनाथ पुजारी करके प्रसिद्ध हुआ। गोपाल भट्ट गोस्वामी के नहीं रहने के उपरांत( ऐसे पहले भी करते रहे होंगे) ये गोपीनाथ ही पुजारी बनते हैं तथा सेवा को आगे बढ़ाते हैं राधा रमण की और अंत तक करते रहे।हरि हरि!
महाप्रभु के परिकरों में से एक तो नवद्वीप में रहे, दूसरी टीम रही जगन्नाथ पूरी में और तीसरी थी वृंदावन में,वृंदावन धाम की जय! लेकिन यहां वृंदावन के छह गोस्वामियों की जो टीम है, उनको विशेष शक्ति-बुद्धि-युक्ति दे के उनसे प्रचार को आगे बढ़ना चाहते थे, गौडीय वैष्णव परंपरा का प्रचार। इस परंपरा में ईश्वर पुरी भी थे जिनसे चैतन्य महाप्रभु ने दीक्षा ग्रहण की थी। फिर माधवेंद्र पुरी,ईश्वर पुरी,चैतन्य महाप्रभु और फिर षड गोस्वामी वृंदो का नाम आता है। परंपरा के आचार्यों को हम देखते हैं, सोचते हैं कि कौन कौन हैं? चैतन्य महाप्रभु के उपरांत षड गोस्वामी वृंदो का तो क्या कहना, “सद्दधर्म संस्थापकों” उन्होंने धर्म की स्थापना का कार्य किया और विश्व में धर्म का प्रचार-प्रसार होता रहे उसकी सारी फाउंडेशन/ नींव डाली है इन 6 गोस्वामियों ने। गोस्वामियों में जूनियर मोस्ट रहे जीव गोस्वामी आयु की दृष्टि से भी। एक-एक करके इनके तिरोभाव होते हैं अन्य पांच गोस्वामियों के,फिर बचते हैं जीव गोस्वामी जो एक समय तो गाड़िया वैष्णव परंपरा के रक्षक/ विचारक/ शिक्षक रहे। षडगोस्वामी वृंद के उपरांत थे “आचार्यत्रय”, इन तीन आचार्य में कौन-कौन थे?
नरोत्तम दास ठाकुर की जय!
श्यामानंद पंडित की जय!
श्रीनिवासाचार्य की जय!
श्रीनिवास आचार्य वैसे गोपाल भट्ट गोस्वामी के शिष्य बनते हैं और लोकनाथ गोस्वामी के शिष्य बनते हैं नरोत्तम दास ठाकुर तथा हृदय चैतन्य (बंगाल के अंबिका कलना के हृदयानन्द) के शिष्य बनते हैं श्यामानंद। एक समय तो यह तीनों वृंदावन में ही थे और जीव गोस्वामी उनके शिक्षा गुरु रहे हैं। इन तीनों को जीव गोस्वामी भेजते हैं, ”अब तुम प्रचार के लिए जाओ और प्रचार का आधार ग्रंथ ही है”,’ बुक्स आर द बेसिस’। वे सारे गौडीय वैष्णव लिटरेचर से बैलगाड़ी भर देते हैं और बोलते हैं कि बंगाल जाओ, प्रचार करो। ये तीनों आचार्य ने उड़ीसा-बंगाल क्षेत्र में प्रचार को आगे बढ़ाया। इन तीन आचार्यों के उपरांत रिक्त स्थान रहा कहो या उस समय के कुछ प्रमुख नामी आचार्य के नाम तो सुनने को नहीं मिलते हैं। फिर विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर की जय! लगभग 250-300 वर्ष पूर्व विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर और उनके शिष्य बन जाते हैं बलदेव विद्याभूषण। तो पहले वे 6 थे षड गोस्वामी वृंद, फिर ये 3 आचार्य हो गए, फिर ये दोनों की टीम रही विश्वनाथ चतुर्थी ठाकुर और बलदेव विद्याभूषण। बलदेव विद्याभूषण ने हमारे संप्रदाय को और भी मान्यता प्रदान करवाई। लोकमान्य/सर्वमान्य हो गया ये गौडीय संप्रदाय, जब बलदेव विद्याभूषण ने अपने गुरु विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के आशीर्वाद और आदेश अनुसार टीका लिखी जिसमें गोविंद देव जी की भी कंट्रीब्यूशन रहा, उन्होंने भाष्य लिखा जयपुर में जाकर,जो गोविंद भाष्य कहलाया। बलदेव विद्याभूषण और विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने कई सारे ग्रंथ लिखे और यही उनकी कंट्रीब्यूशन रही। गौडीय वैष्णव लिटरेचर में ग्रन्थ ही आधार है तो और भी कई सारे ग्रंथों की रचना की और कई भाष्य लिखे उन्होंने। फिर उनके उपरांत करीब डेढ़ सौ वर्ष पूर्व एक और तीन आचार्य की टीम बन जाती है और वे है
श्रील भक्तिविनोद ठाकुर , श्रील भक्तसिद्धांत सरस्वती ठाकुर और श्रील भक्तिवेदांत स्वामी श्री प्रभुपाद की जय!
इस हरे कृष्ण आंदोलन को सारे विश्व भर में फैलाना है क्योंकि चैतन्य महाप्रभु की जो भविष्यवाणी है
“पृथ्वी ते आछे यत नगर आदि ग्राम , सर्वत्र प्रचार होईबे मोर नाम” इस भविष्यवाणी को सत्य करना ही है तो ये सारे आचार्य ने अपना-अपना योगदान दिया है। ये तीन-चार सौ वर्ष तो इसकी तैयारी होती रही। हम वैसे कहते रहते हैं श्रील प्रभुपाद ने तैयारी की 1922 में, उनको आदेश मिला है कि “ तुम पाश्चात्य देश में जाकर के प्रचार करो”। हम थोड़ा डर जाते की कहीं मुझे तो नहीं कहा जा रहा है। प्रभुपाद की लाइफ टाइम प्रिपरेशन रही,1922 में तो आदेश प्राप्त हुआ,फिर 11 सालों के उपरांत प्रभुपाद की दीक्षा हुई 1933 में। फिर और 11 सालों के उपरांत 1944 में प्रभुपाद ग्रंथों की रचना या ‘ बैक टू गॉड हेड’ मैगजीन का पब्लिकेशन स्टार्ट किए। फिर और 11 सालों के पश्चात प्रभुपाद वानप्रस्थ आश्रम को अपनाए। हर 11 सालों के ऊपरांत कुछ विशेष घटना घटती रही है प्रभुपाद के जीवन में। 1954 के बाद 1965 में श्रील प्रभुपाद जी पाश्चात्य देश गए और फिर 1966 को इस्कॉन की स्थापना हुई। फिर और 11 सालों के उपरांत श्रील प्रभुपाद नित्य लीला में प्रवेश कर गए। तो इसको हम लोग प्रिपरेशन कहते हैं लाइफ टाइम प्रिपरेशन। किंतु प्रभुपाद के पहले भी सारे आचार्यगण भी प्रिपरेशन/ तैयारी कर रहे थे। फिर श्रील भक्तिविनोद ठाकुर एक मास्टर प्लान बनाते हैं/ ब्लूप्रिंट बनाते हैं।
“गोद्रम कल्पतवी” भक्तिविनोद ठाकुर, नामहट्ट का जो प्रचार है, उसकी सारी रुपरेखा इस ग्रंथ में लिखते हैं। प्रभुपाद जी जिस साल जन्मे थे उसी साल भक्तिविनोद ठाकुर ने कई सारे अपने ग्रंथों को,पूरे विश्वभर में भेजा था। बुक डिस्ट्रीब्यूशन शुरू हुआ था और गौडीय वैष्णव परंपरा का संदेश श्रील भक्तिविनोद ठाकुर सारे विश्व में फैलाना प्रारंभ किए थे। परिक्रमा की सारी नियमावली भी लिखे थे। उन्हें सातवें गोस्वामी कहते हैं, वृंदावन के 6 गोस्वामी के अलावा, नवदीप के एक और गोस्वामी हुए, और वे हैं भक्तिविनोद ठाकुर। इन्होंने ने ही वैसे श्रील भक्ति सिद्धांत सरस्वती ठाकुर को ट्रेन किया था इसलिए वे बने थे, “अपसिद्धांत ध्वान्त हरिणे”। भक्तिविनोद ठाकुर एक स्पिरिचुअल या सोशल साइंटिस्ट बनके सारा अवलोकन करके उनको बताए कि ये अपसिद्धांत है, ये है आऊल, ये है बाउल, ये कर्ता भाजा, ये गौरांग नागरी, ये सहजिया,आदि हैं। तो भक्ति सिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने अपने जीवन में क्या-क्या क्या? “अपसिद्धांत ध्वान्त हरिणे” का कार्य किया। इसी के साथ वैसे,
“परित्त्राणाय साधुनाम विनाशाय च दुष्कृतां” भी किया, याने दुष्टों संहार करना। ऐसा भगवान तो करते ही है जब-जब वे स्वयं प्रगट होते हैं,लेकिन जब वे प्रगट नहीं होते तब उनका कार्य उनके आचार्य करते हैं। जिन आचार्यों को चैतन्य प्रभु/श्रीकृष्ण ही कहे है,”आचार्य माम विजानिया”,मतलब आचार्य मैं ही हूं। कभी-कभी समय-समय पर भगवान प्रगट होके “परित्रणाय च साधुनाम” करते हैं। लेकिन जब वे नहीं होते तो अपना कार्य परंपरा के आचार्यों से करवाते हैं। श्रील भक्ति विनोद ठाकुर ब्लू प्रिंट बनाए सारे संसार में प्रचार-प्रसार का और ये भविष्यवाणी भी की थी कि कोई महापुरुष संसार-भर में जायेंगे,देश-विदेश में प्रचार करेंगे और ऐसा प्रचार सुननेवाले भारत लौटेंगे, नवद्वीप पहुंचेंगे। वे सारे भारतीयों के साथ एकत्रित होके क्या गाएंगे?
“जय शचीनंदन जय शचीनंदन जय शचीनंदन गौर हरि!” भक्ति विनोद ठाकुर ऐसी तैयारी कर रहें थे ताकी हरे कृष्ण आंदोलन सारी पृथ्वी पर फैल जाए।
और फिर भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर उसको आगे बढ़ाए, उन्होंने गौडीय मठ के 64 मठों की स्थापना भी जिसमें से साठ भारत में और चार आउटसाइड इंडिया में स्थापित किए। वे भेज रहे थे अपने अलग-अलग शिष्यों को इंग्लैंड,जर्मनी और कुछ यूरोपीयन कंट्रीज में, लेकिन उनको इतना यश नहीं मिला। फाइनली गए भक्तिवेदांत स्वामी श्रील प्रभुपाद की जय! वे सेनापति भक्त ही थे। गौरांग महाप्रभु ने सैनिकों को जन्म दिया था। कुछ को अमेरिका में, कुछ को साउथ अमेरिका,ऑस्ट्रेलिया ,अफ्रीका आदि में। आप पूछोगे कि सेनापति भक्त है तो उसकी सेना कहाँ है? प्रभुपाद जैसे विदेश गए, न्यूयॉर्क गए, बोट में बैठकर गए। सेना है तो बोट चाहिए ना? तो जलदूत में बैठकर देवदूत जा रहे थे, भक्तिवेदांत स्वामी श्रील प्रभुपाद देवदूत की जय! सेनापति भक्त की जय! और कहां जा रहे थे? न्यूयॉर्क। व्हाई न्यूयॉर्क? कुछ भक्तों का कहना है इसलिए मैं भी कहता रहता हूं, ”कैपिटल ऑफ कली” कली का कैपिटल, कलयुग की राजधानी है न्यूयॉर्क। इसलिए उसको गंतव्य स्थान बनाकर श्रील प्रभुपाद वहां पहुंचे हैं और पहुंचते ही उन्होंने “टाइम बॉम्ब: बुक्स” तथा
“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे”
नाम रूपी बम की वर्षा के साथ कई सारे घायल हो गए। या कई सारे जो घायल किए गए, उनमें जो दुष्टता थी उसका नाश होते ही उनका रक्षण हुआ, वे भक्त बने। सेना को चैतन्य महाप्रभु ने जन्म दिया ही था, तो श्रील प्रभुपाद जहां-जहां गए, 14 टाइम्स अराउंड द वर्ल्ड, उनकी सेना प्रभुपाद को मिली और उन सैनिकों की मदद से सारे विश्वभर में हरे कृष्ण आंदोलन का प्रचार-प्रसार और स्थापना होती गई। चार नियम :- मांस नहीं खाना, अवैध संबंध न रखना, जुआं न खेलना है, नशा न करना आदि इस सब नियमों के साथ उनकी जो दुष्टता/ दुर्गुण है उसका विनाश हुआ। नो मोर सिंस, उनसे जो पाप हो रहा था वो पाप करना बंद हुआ और उनको पुण्य आत्मा बनाया गया।हरि हरि! “श्रृंवतः स्वकथा कृष्ण पुण्य श्रवण कीर्तन:” इस प्रकार इस विश्व में चैतन्य महाप्रभु के मिशन को फैलाने का कार्य श्रील प्रभुपाद ने किया। वैसे हम तो कहते रहते हैं कि ये श्रीप्रभुपाद द्वारा स्थापित संघ है, लेकिन ओरिजिनल संस्थापक तो इस आंदोलन के गौरांग महाप्रभु और नित्यानंद प्रभु ही हैं।
“संकीर्तनैक पितरौ कमलायताक्क्षौः विश्वमभरो
द्विजवरौ युगधर्मपालौ वंदे जगतप्रियकरौ करुणावतारौ”
फाउंडिंग फादर्स तो गौरांग महाप्रभु और नित्यानंद प्रभु ही हैं, जो कृष्ण बलराम है,जो राम लक्ष्मण है। औपचारिक दृष्टि से श्रील प्रभुपाद से या उनको निमित्त बनाकर “निमित्त मात्रम भव सब्यसाची” इस हरे कृष्ण आंदोलन की स्थापना करवाए। इस पृथ्वी पर प्रेम धर्म या
“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे”
येभी क्या है? प्रेम धर्म/ प्रेम धन है, जिसकी स्थापना करने वाले इस अंतरराष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ के आप सब सदस्य हो। लगे रहिए इस कार्य में “धर्मम तु साक्षात भगवत प्रणीतम” धर्म को भगवान देते है, भगवान बताते हैं कि यह धर्म है। कलयुग का धर्म कौनसा है? “कलि कालेर धर्म हरिनाम संकीर्तन“ यह आपको पता होना चाहिए कि कलयुग का धर्म है नाम संकीर्तन। ये धर्म आपको किसने दिया? स्वयं भगवान श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु ने।
“गोलोकेर प्रेम धन हरि नाम संकीर्तन”
“नमो महावदान्याय कृष्ण प्रेम प्रदायते”
‘द’ मतलब देना। ऐसे धर्म देनेवाले/ प्रेम का धन देनेवाले भगवान ही हैं। यही तो बात है कि प्रेम का धन सर्वोपरि है, प्रेम सर्वोपरि है, इसको पंचम पुरुषार्थ कहा गया है। श्री व्यास देव शुरुआत में कई सारे ग्रंथों की रचना तो किए किंतु ये लेखक होकर भी संतुष्ट नहीं थे/ प्रसन्न नहीं थे अपने कार्य से। नो जॉब सेटिस्फैक्शन। उनका जॉब क्या था? ग्रंथों की रचना करना और संकलन करना। बद्रिकाश्रम में जब नारद मुनि से मुलाकात हुई तब नारद मुनि ने पूछा,” क्या बात है? तुम बहुत निराश लग रहे हो”। प्रातःकाल का समय भी है,आप सरस्वती के तट पर बैठे हैं बद्रीकाश्रम में और चेहरा क्यों उदास है?” व्यासदेव ने कहा कि “मैं सारे ग्रंथ तो लिखे हैं लेकिन मैं संतुष्ट नहीं हूं। मुझे कोई समाधान बताइए। कुछ त्रुटि रही होगी, कुछ कमी रही होगी,कुछ अपूर्णता या कुछ दोष रहे होंगे। तो उन्होंने सारे ग्रंथ दे दिए नारद मुनि को जो श्रील व्यासदेव के गुरु भी है। वैसे ये दोनों भगवान भी है, शक्त्यावेश अवतार है व्यासदेव और नारद मुनि भी। लेकिन एक बन जाते हैं दूसरे के शिष्य। फिर उन्होंने कहा, “आप मेरे ग्रंथों का बुकरिव्यू करो, इसका कुछ निरीक्षण करो, कुछ कमेंट करो।” तब नारद मुनि ने कहा,
“धर्माध्यस्य अर्थ: वासुदेवस्य महिमा हि न अनुवर्णित:” अर्थात इसमें आपने धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष पर इतना जोर दिया है पर उतना जोर आपने भगवान की महिमा पर नहीं दिया। धर्म/अर्थ/काम/मोक्ष की तो आपने खूब चर्चा की लेकिन “कर्मकांड, ज्ञानकांड केवल विषयेर भांड” तब फिर व्यासदेव एक और ग्रंथ लिखे, ग्रंथराज श्रीमद् भागवत पुराण की जय! इस ग्रंथराज श्रीमद् भागवत में “हरि सर्वत्र गीयते” आदौ- मध्ये-अन्ते में हरि ही हैं, हरि कहो या वासुदेव।
“वासुदेव परा क्रिया वासुदेव परा वेदा
वसुदेव परम तपः वासुदेव सर्वम” जिस ग्रंथ में ऐसा है वो है श्रीमद् भागवतम। ऐसे ग्रन्थ को आधार बनाकर चैतन्य महाप्रभु स्वयं इसके श्रवण में अधिक रुचि रखते थे, अन्य ग्रंथों की अपेक्षा। वैसे भी कृष्ण ने कहा है,
“त्रिगुण्य विषय वेदा स्त्रैगुण्य भावार्जुनः“ वेदों का विषय क्या है? तीन गुण है: सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण। अन्य पुराण हैं उसमें से कुछ सात्विक पुराण, कुछ राजसिक और कुछ तामसिक पुराण है। इसलिए भगवान कहे ,गुणातीत बन जाओ। इसलिए गुणातीत ग्रंथ की रचना हुई जो है श्रीमद् भागवतम। चार पुरुषार्थ हैं और उनसे परे या ऊंचा हैं पंचम पुरुषार्थ- “प्रेम पुरुषार्थ”। श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु का ये आंदोलन क्या करता है? प्रेम प्रदान या प्रेम का दान करता है। वह प्रेम देता है जिसकी खोज में जीवात्मा है और प्रेम के स्रोत या प्रेमी तो भगवान है। प्रेम कहो या आनंद कहो,हम सब आनंद की खोज में है। भगवान का एक नाम ही आनंद है,वे सच्चिदानंद विग्रह है। उनका नाम भी आनंद है,”नंद के घर आनंद भयो”। नंद के घर आनंद भयो मतलब क्या उनका पूरा घर आनंद से भर गया, उनकी कोठी भर गई? नहीं, आनंद भयो मतलब कृष्ण प्रगट हुए। तो कृष्ण को भी आनंद ही कहते हैं, “कृष्ण प्रेम प्रदायते” मतलब प्रेम देना, याने कृष्ण को देना ही प्रेम देना है।
“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे”
इस धर्म का प्रचार और प्रसार करना है। बाकी अन्य कई सारे तथाकथित धर्मों का या मैनमेड रिलिजन या मनोधर्म का नहीं करना। मेंटल स्पैक्यूलेशन में,” मुझे लगता है, आई थिंक ऐसा होता है” आदि को गैंबलिंग कहते हैं, जुगाड़ भी कहते हैं। वी आर बीइंग चीट्टेड धर्म के नाम से। इनमें कुछ आधा ही सत्य होता है। कहां गोपाल भट्ट गोस्वामी और कहना तो नहीं चाहिए, लेकिन इस धर्म के संस्थापक,उस धर्म के संस्थापक, संसार में जिनकी संख्या अधिक है,33% ऑफ द पापुलेशन ऑफ़ द वर्ल्ड इज़ क्रिश्चियन, 25% है मुस्लिम बंधु और हिंदू सिर्फ 14% है। पर औरों ने ऐसा फैला दिया है जाल, उनके जो संस्थापक है और उनके जो ग्रंथ है, उनमें अधिकतर “सर्वधर्माण परित्यज” वाली बातें ही मिलेगी। कहां ये षड गोस्वामी वृंद, कहां गोपाल भट्ट गोस्वामी और कहां 1500 वर्ष या 1400 वर्ष पूर्व एक धर्म की स्थापना हुई, 2000 वर्ष पूर्व दूसरे एक धर्म की स्थापना हुई, ढाई हजार वर्ष पूर्व और एक धर्म की स्थापना हुई। यह भी तो बात है ही कि शुरुआत हुई, जिसकी शुरुआत होती है उसका क्या होता है? अंत भी होता है। लेकिन वैसे सभी जीवो का एक धर्म है, एक ही धर्म है और उस धर्म का नाम है सनातन धर्म या भागवत धर्म। प्रहलाद महाराज ने क्या कहा?
”कौमार्यम आचरेत प्राज्ञों धर्माण भागवतान” भागवत धर्म को अपनाना चाहिए, कुमार अवस्था में शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए। वैसे जैव धर्म/सभी जीवो का एक ही धर्म है और उसमें धर्मांतरण संभव भी नहीं है। किंतु इस संसार में चलते रहते हैं, फालना धर्म/अमुक धर्म/तमुक धर्म और फिर ये “आया राम गया राम” भी होते हैं, आते हैं और जाते हैं, एलो और गेलो। ये किसने कहा है? लोचन दास ठाकुर ने कहा। श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु ने जो धर्म दिया है वो शाश्वत धर्म है, प्रेम धर्म है और इसी का अभाव में संसार में। जिसकी कमी है या अभाव है, उसकी पूर्ति करना हमारा धर्म है।
“योग क्षेमम वहांयह्म” गोपाल भट्ट गोस्वामी की प्रसन्नता के लिए चलो हम पुनः और उत्साह, निश्चय और धैर्य के साथ धर्म के आचार और प्रचार में लगे रहते हैं।
निताई गौर प्रेमानंद हरि हरि बोल!
