
Intro To Bhagavad GITA
11-12-2024
ISKCON Kurukshetra
ॐ नमः भगवते वासुदेवाय ! हरि हरि!
गीता जयंती महोत्सव की जय!
फिर ये भी कहना होगा कि कुरुक्षेत्र धाम की जय !
भगवत गीता की जय! श्री कृष्ण अर्जुन की जय !
श्रील प्रभुपाद की जय !
निताई गौर प्रेमानन्दे, हरि हरि बोल !
यह है भगवद्गीता , भगवान का गीत, श्रीभगवान उवाच की बजाय प्रारंभ होता है धृतराष्ट्र उवाच से और सुदैव से वे एक ही बार बोलने वाले है।
“धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सव:।
मामका: पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥” (१:१)
आज के दिन याने ५१६१ वर्ष पहले यहां धृतराष्ट्र उवाच हुआ है और श्रीभगवान् उवाच, अर्जुन उवाच, संजय उवाच भी पूरी भगवद गीता में हुआ है। श्री कृष्ण, संसार की दृष्टि से अगर उनके जीवन काल की गणना करनी है, तो कृष्ण 90 वर्ष के थे जब द्वारका से वहां पहुंचे थे। धृतराष्ट्र बैठे हैं हस्तिनापुर में और उनके चरणों में बैठे हैं उनके सचिव संजय । श्रील व्यास देव ने विशेष शक्ति /सामर्थ्य/ बुद्धि दी है दूरदर्शन की। वे दूर से ही देख सकते थे कुरुक्षेत्र का दृश्य। केवल दृश्य ही नहीं, कुरुक्षेत्र में कही हुई बातें भी/ वार्तालाप या संवाद भी , इतना ही नहीं वैसे कौन क्या विचार कर रहा है? क्या सोच रहा है? इसको जानने की क्षमता या शक्ति भी श्रील व्यास देव संजय को दिए थे। वैसे वे धृतराष्ट्र को ऐसी शक्ति/मौका/ सामर्थ्य देना चाहते थे परंतु उन्होंने कहा,”नहीं नहीं! मैं नहीं”, क्योंकि वे जानते थे कि उनके पुत्रों का क्या हाल होने वाला है।
“परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे” ॥ (४:८)
‘विनाशाय च दुष्कृताम्’, वे दुष्ट है उनका विनाश होगा, तो उनका विनाश मैं देखना नहीं चाहता हूं । मुझे ऐसी दृष्टि, ऐसा सामर्थ्य मुझे मत दो। फिर श्रील व्यास देव संजय को ऐसी शक्ति/सामर्थ्य/बुद्धि दिए जिसको वह एकदम ईमानदारी से स्वीकार करते हैं अट्ठारहवें अध्याय में । कुरुक्षेत्र के मैदान में जो जो भी होने वाला है वहां का सारा दृश्य, वहां के सारे संवाद संजय सुनाने वाले हैं। भगवत गीता का संवाद भी संजय सुनकर फिर धृतराष्ट्र को सुना रहे हैं और कहते हैं कि, “मैं यह सब सुन पा रहा हूं, कैसे ? ‘ व्यास प्रसादात’, व्यास की कृपा से यह संभव हो रहा है।” व्यास भी भगवान हैं , उनके शक्तियावेश अवतार है। जिन्होंने सारे शास्त्रों की रचना की है, इंक्लूडिंग महाभारत। यह जो युद्ध हो रहा है इसको वैसे महाभारत का युद्ध ही कहते हैं और इसमें जो भी घटना घट रही है उसको संजय धृतराष्ट्र को सुना रहे हैं। धृतराष्ट्र ने पूछा है, “ किम अकुर्वत संजय ?” बता दो क्या हुआ जब मेरे पुत्र और पांडु पुत्र एकत्रित हुए हैं। “धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे” उन्होंने पूछा है कि कुरुक्षेत्र में जो लोग युद्ध खेल रहे हैं( ऐसा ही कह कर सकते थे लेकिन मजबूरी उन्होंने उनको कहना पड़ा) धर्मक्षेत्र में। क्योंकि कुरुक्षेत्र एक धर्मक्षेत्र है। वे जानते थे कि मेरे पुत्र धार्मिक नहीं है इसलिए कुरुक्षेत्र जो धर्मक्षेत्र है, मेरे पुत्रों के अनुकूल नहीं होगा, मेरे पुत्र जीतेंगे नहीं, ऐसा सोचते हुए वे पूछ रहे हैं,”धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे”। यदि कोई स्थान होता तो, दिल्ली या कोई और स्थान, तो बात और होती। किंतु यह धर्मक्षेत्र है और यहां पर युद्ध हो रहा है तो धृतराष्ट्र बड़े चिंतित है, और पूछते हैं,” कहो कहो क्या हो रहा है?” यह प्रश्न है धृतराष्ट्र का, इसके कई सारे उत्तर होंगे या है भी। संजय सुनाते जायेंगे। किंतु एक प्रश्न तो यह भी है कि किसकी जीत हो रही है ? मेरे पुत्र जीत रहे हैं कि नहीं ? मुख्य प्रश्न तो यही है। यह पहला प्रश्न गीता के पहले श्लोक में पूछा है, इसका उत्तर गीता के अंतिम श्लोक में संजय ने ही दिया है,
“यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धर: ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम”॥ (१८:७८)
किंतु एक प्रश्न तो यह भी है कि किसकी जीत हो रही है ? मेरे पुत्र जीत रहे हैं की भी नहीं ?यहां मुख्य प्रश्न तो यही है तो यह पहला प्रश्न गीता के पहले श्लोक में जो यह पूछा है, इसका उत्तर गीता के अंतिम श्लोक में संजय ने ही दिया है,
“यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धर: ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम” ॥ (१८:७८)
तो पांडू पुत्रों की जीत निश्चित है।
“उक्तवानस्मि दुर्बुद्धिं मन्दं दुर्योधनं पुरा ।
यतः कृष्णस्ततो धर्मो यतो धर्मस्ततो जयः”॥ १३:१५३:३९॥
“यतो धर्म ततों जय“ ऐसा भी सिद्धांत है जो महाभारत में व्यासदेव लिखे है। जहाँ धर्म है वहाँ जीत होती है। यह जोड़ी है- जहां योगेश्वर कृष्ण और धनुर्धर अर्जुन, वहां श्री/विजय/नीति होती है। एक्स्ट्रा आर्डिनरी पावर का प्रदर्शन होगा और नीति नियमों का पालन भी किया जाएगा जहां कृष्ण और अर्जुन साथ में है। इसलिए हमें सीखना भी चाहिए, सदैव कृष्ण के पक्ष में रहना चाहिए, कृष्ण की पार्टी में होना चाहिए। यह अंतरराष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ, यह कृष्ण पक्ष है। “श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु की जय!” ये श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु का पक्ष है इसीलिए चैतन्य महाप्रभु ने ऐसे भी कहा है,
“चैतो-दर्पण-मार्जनं भव-महा-दावाग्नि-निर्वाणं
श्रेयः-कैरव-चन्द्रिका-वितरणं विद्या-वधू-जीवनम्
आनन्दामबुधी वर्धनं प्रतिपदं पूर्णामृतस्वदानं
सर्वात्मा-स्नपनम् परमं विजयते श्री-कृष्ण-संकीर्तनम्।।”
“परम विजयते श्री कृष्ण संकीर्तनम “ तो इस युद्ध में आज के दिन ,५१६१ वर्ष पूर्व, जो मैं कहने जा रहा था, युद्ध खेला जा रहा है , यह आयोजित-नियोजित युद्ध है, यह धर्म युद्ध है। कहां युद्ध खेलेंगे?और किस दिन प्रारंभ होगा? इतना ही नहीं बल्कि कितने बजे या समय से प्रारंभ होगा? यह सारा पूर्व निर्धारित हुआ करता था धर्मयुद्ध में। आजकल के जो युद्ध हो रहे हैं यह सारे अधार्मिक युद्ध है, वे धर्म युद्ध नहीं है इसलिए धर्म युद्ध का एक भी नियम का पालन नहीं करते। कुरुक्षेत्र का युद्ध मानो विश्वयुद्ध वर्ल्ड-वॉर चल रहा है, सारे संसार के राजा कुल मिलाकर १८ अक्षौहिणी सेना वहां एकत्रित हो चुकी है। आप पहुंच जाओ कुरुक्षेत्र और कल्पना करो कि कितनी सेना? १८ अक्षौहिणी सेना मतलब बहुत बड़ी सेना होती है। उसमें से एक अक्षौहिणी सेना थी नारायणी सेना जो दुर्योधन के पक्ष से लड़ रही थी, जब दुर्योधन और अर्जुन दोनों पहुंचे थे द्वारिका।
तब कृष्ण ने कहा कि, “ मैं स्वयं को और मेरी संपत्ति को दो हिस्सों में बाटूंगा, एक हिस्से में मैं रहूंगा दूसरे हिस्से में मेरी सेना रहेगी, टेक अ पिक, आप चयन करो। दुर्योधन ने सोचा कि एक व्यक्ति से क्या लाभ होगा? मैं तो सेना पसंद करूंगा, हाहाहाहाहा! बेचारा अर्जुन, उसे तो एक ही व्यक्ति मिला और मुझे तो अक्षौहिणी सेना मिली। ”ऐसी चॉइस हम संसार भर के बद्धजीव करते रहते हैं। भगवान का संसार, भगवान का मायावी साम्राज्य या संपत्ति को हम पसंद करते हैं,लक्ष्मी को पसंद करते हैं, लेकिन नारायण को नहीं। नारायण को लक्ष्मी से दूर करना चाहते हैं और स्वयं उपभोग करना चाहते हैं भगवान की संपत्ति का। इसका भी प्रदर्शन हो रहा है इस कुरुक्षेत्र के मैदान में, इससे भी हमें सबक सीखना है कि हमें कृष्ण के साथ जाना चाहिए। माया का चयन नहीं करना चाहिए,कृष्ण का चयन करना चाहिए। मैंने ये भी कहा कि कितने बजे युद्ध शुरू होगा? ये भी निर्धारित हुआ करता था। उस संबंध में मैं यह पूछता ही रहता हूं कि आज के दिन जो भगवान ने भगवत गीता का उपदेश सुनाया तो कितने बजे सुनाया होगा? कॉमन सेंस ही है वैसे इसका उत्तर, धर्मयुद्ध प्रातःकाल ही शुरू होते थे, सूर्योदय के समय प्रारंभ होते थे और सूर्यास्त तक चलता था युद्ध। प्रातः काल में ही दोनों सेनाएं पहुंचीं हैं आमने सामने हैं –
“ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतु” ॥१. १४ ॥
विशेष रथ में विराजमान हैं माधव और पांडव, यहां पांडव मतलब अर्जुन है। दोनों ने अपने-अपने शंख, जिनको दिव्य शंख कहा है, बजाए। भगवान स्वयं उस रथ को हाँक रहे हैं। अर्जुन का एक नाम पार्थ है क्योंकि वे पृथा पुत्र हैं। कुंती का एक नाम है पृथा, पृथा का पुत्र है इसलिए उसका नाम पार्थ है। कृष्ण बने हैं उनके सारथी इसलिए कृष्ण का एक नाम पार्थसारथी है, क्योंकि भगवान केवल रथ के चालक बनें हैं – सिर्फ एक ड्राइवर है। हरि हरि! ऐसी पोज़ीशन लेते हैं भगवान अपने भक्त के लिए और इस प्रकार भगवान अपना वात्सल्य प्रकट करते हैं अर्जुन के प्रति। प्रातः काल में यह कृष्ण- अर्जुन का रथ भी वहां पहुँचा है। वैसे अर्जुन तो बड़े जोश में थे, होश में और जोश में थे। उन्होंने कहा,” मेरे साथ युद्ध करने के लिए कौन तैयार है?कौन पहुँचे हैं?मुझे दिखा तो दो। देखने के लिए क्या करना होगा?
“एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्” ॥ १.२४ ॥
मेरे रथ को थोड़ा आगे बढ़ाओ और दोनों सेनाओं के मध्य में पहुंचा दो। ऐसा अर्जुन का आदेश प्राप्त होते ही भगवान नें या पार्थसारथी नें उनके रथ को आगे बढ़ाया है और
“भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् ।
उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरुनिति” ॥१. २५ ॥
जब निकट से अर्जुन देख ही रहा था शत्रु सैन्य को, तब कृष्ण नें ध्यान आकृष्ट किया कि,” तुम यहां एकत्र हुए कुरु पुत्रों को देख रहे हो ना?वे कुरु हैं।” इन शब्दों नें जादू किया है अर्जुन के विचारों में मंथन और क्रांति के। इसी के साथ अर्जुन के मन में मोह और ममता जागृत हुई है और वे कह रहे हैं,” नहीं नहीं नहीं, मैं इनके साथ युद्ध नहीं करुंगा।”
“न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ।
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च” ॥ १.३१ ।।
यह तो मेरे स्वजन हैं,.मेरे अपने लोग हैं, मेरे परिवार के लोग हैं। इनके साथ युद्ध करके मुझे तो कोई अपने हित की बात नहीं दिख रही है। मैं युद्ध नहीं करुंगा, देखो मेरे हाथ से गांडीव छूट रहा है। मेरा गला सूख रहा है, मेरे सारे अंग कांप रहे हैं और आप कह रहे हैं कि युद्ध करो। मैं युद्ध नहींं करुंगा।” ऐसा कह कर अर्जुन ने बगल में रख दिया अपना धनुष-बाण और रथ में बैठ गये। मतलब उन्होंने साफ शब्दों में कह दिया, “ नो वॉर ,मैं युद्ध नहीं खेलुंगा”। कह तो रहे ही थे और फिर अपना धनुष बाण बगल में रखकर और बैठकर और अधिक यह स्पष्ट कर दिया कि मुझे युद्ध नहीं करना है। हरि हरि! अश्रुपूर्ण हैं, अश्रुधारा बह रही है, वे पूरे संभ्रमित हो चुके हैं और फिर अर्जुन ने कहा है:
“कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः ।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्” ॥२. ७ ॥
पहला जो अध्याय है इसमे अधिकतर संजय उवाच और अर्जुन उवाच ही हैं। पहले अध्याय को भी भगवद्गीता तो कहते ही है, सेटिंग द सीन चल रहा है। लेकिन वहां भगवान नहीं बोले हैं, या केवल एक छोटा सा वाक्य बोले हैं- “पश्य एतान सम्वेतान कुरून”, बस ये चार या पाँच शब्द कहे हैं। बाकी सारी बातें संजय और अर्जुन उवाच है, वैसे अर्जुन का ही गीत है। उन्होंने अपने सारे कंसर्न्स या अपनी चिंता के विषय सुनाए हैं- इस धर्म का क्या होगा? जाति धर्म का क्या होगा? कुरु धर्म का क्या होगा? स्त्री धर्म का क्या होगा? यदि युद्ध होगा तो इन सारे धर्मों का क्या होगा? इसलिए अंत में कृष्ण कहने वाले हैं:
“सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच: “ ॥१८. ६६ ॥
ऐसा कहने का भी कारण है क्योंकि अर्जुन ने कई सारे धर्मों का नाम लिया था। इसलिए भगवान ने कहा,” अर्जुन मेरी शरण में आ जाओ, मैं संभालूंगा, मैं तुम्हें मुक्त करूंगा। तुम या कोई भी व्यक्ति मेरी शरण में आता है उसे मैं मुक्त करूंगा, उसे मोक्ष दूंगा। यहां मोक्ष का नाम आया ही है,तो आज की एकादशी का नाम भी है मोक्षदा एकादशी ही है, मोक्ष देने वाली एकादशी। कौन मोक्ष देगी? भगवद्गीता मोक्ष देगी, मुक्त करेगी या भगवद्धाम ले जाएगी या उसी दिन अर्जुन को भी मोक्ष प्राप्त हुआ।
“नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।
स्थितोऽस्मि गतसन्देह: करिष्ये वचनं तव” ॥ १८.७३ ॥
अर्जुन कहने वाले हैं, जैसे ही गीता का उपदेश वे सुने और उनको सारे साक्षात्कार हुए, तब उन्होंने यह भी कहा,” आप जो भी कह रहे हो वह सब सत्य ही है”।
“सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव ।
न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवा:” ॥ १०.१४ ॥
आपका कहा हुआ हर अक्षर, हर वचन सत्य है और मुझे वो मंज़ूर है जैसा आपने कहा है, ऐज़ इट इज़। अर्जुन की स्पिरिट ऐसी रही, जैसा वे सुन रहे थे और समझ रहे थे भगवद्गीता के संवाद को। प्रातः काल को अर्जुन युद्ध के लिए तैयार नहीं थे,तो उनको तैयार करना है, उनको होश में और जोश में लाना है। बाकी भगवान ग्यारहवें अध्याय में भी दिखाएंगे।
विराट रूप का दर्शन करा कर कि युद्ध करने वाला तो मैं ही हूं या मैं चाहता हूं। तुम्हारे चाहने या नहीं चाहने पर यह युद्ध रुकने वाला नहीं है, तुम केवल निमित्त मात्र हो।
“तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून्भुंक्ष्व राज्यं समृद्धम् ।
मयैवैते निहता: पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्” ॥ ११.३३ ॥
तुम निमित्त बनो, मेरे हाथ का एक हथियार बनो, बिकम इंस्ट्रूमेंट इन माई हैंड्स। वैसे युद्ध तो मैं चाहता हूं क्योंकि मैं प्रकट हुआ हूं, किस लिए?
“परित्राणाय साधुनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थानार्थाय सम्भवामि युगे युगे” ॥ ४.८ ॥
यह युद्ध धर्म की स्थापना भी है और इस युद्ध में दुष्टों का संहार होगा और भक्तों की रक्षा होगी। इस उद्देश्य से मैं प्रकट हुआ हूं और वैसा ही होगा। युद्ध तो होना ही है। शुरुआत में जब अर्जुन तैयार नहीं थे और वे अपना आर्गुमेंट तो देते रहे और शायद सोचा होगा कि भगवान कहेंगे कि,” हां ठीक है, ठीक है! अर्जुन युद्ध नहीं खेलना है तो छोड़ दो, जाओ और अब हम नाश्ता कर लेते हैं।” वैसे तो भगवान के सभी जीव और अर्जुन भी भगवान के पूरे नियंत्रण में हैं। हम लोग नियंत्रित रहते हैं और भगवान नियंता है। यह अर्जुन के साथ जो भी हो रहा है या उसकी जो विचारधारा बन रही है, इसके पीछे तो स्वयं कृष्ण ही है। अर्जुन का उदास या हताश होना संभव ही नहीं था, परन्तु भगवान ने संभव कर दिया। भगवान अर्जुन को जो सुनाना चाहते थे गीता का संदेश/ उपदेश, वो संदेश हर जीव के लिए है। भगवान ने ऐसी स्थिति निर्माण की है जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता और यह भी नहीं था कि, “ अर्जुन कल सुबह मैं तुम्हें उपदेश सुनाऊंगा”। एक सेकंड पहले भी किसी को पता नहीं था कि यह अद्भुत संवाद कृष्ण और अर्जुन के बीच में होने वाला है। वर्ल्ड फेमस संवाद, सारे संसार एक कल्याणकारी संवाद किसी सभागृह /स्टेडियम/ ऑडिटोरियम या किसी आजाद मैदान में भगवान ने भाषण या उपदेश नहीं दिया। कुरुक्षेत्र के मैदान में, वो वह भी युद्ध के समय में, वे ये उपदेश दे रहे हैं। अर्जुन को वे इस संसार के बद्धजीवो वाला या बद्ध बनाए हैं,
“माया मुग्ध जीवेर नाही स्वतः कृष्ण ज्ञान
जीवेर कृष्ण कैला कृष्ण वेद पुराण।।”
संभ्रमित जीवों को पता नहीं चलता कि वे कौन है? भगवान कौन है? उनका क्या संबंध है? उनका क्या धर्म है? कृष्ण ने अर्जुन को बनाया ऐसे विचार वाला। ये संसार अगर एक मणिमाला है तो सारे जीव एक एक मणि होते है और अर्जुन भी वैसा ही एक मणि बनाए है। वैसे गीता का संदेश-उपदेश भगवद गीता के दूसरे अध्याय से प्रारंभ होने वाला है। और वो तब होगा जब अर्जुन सुनने के लिए तैयार होगा। पहले ऐसा समय था कि वह सुनने के लिए तैयार नहीं था, अपनी बातों को बोलता गया,बातों को बीच के घुसाता जा रहा था। लेकिन जैसे अधिकाधिक बोलता गया,वैसा ही अधिकाधिक संभ्रमित भी होता गया अर्जुन। लेकिन फिर उसने स्वीकार किया द्वितीय अध्याय के सातवें श्लोक में,
“कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः ।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्” ॥ ७ ॥
मैं कार्पण्य दोष से प्रभावित हो चुका हूं, कृपणता ( माईज़रली) जो मनुष्य को शोभा नहीं देती ऐसी कृपणता। एक होता है ब्राह्मण जो ब्रह्म को जानता है, उच्च विचार वाला होता है, विशाल दृष्टि वाला होता है ब्राह्मण और ब्राह्मण का बिल्कुल विपरीत शब्द है कृपण। अर्जुन कह रहे हैं कि, “ मैं कृपणता को प्राप्त हो चुका हूं,अभी अभी मेरा ऐसा ही स्वभाव बन चुका है और धर्म के संबंध में “सम्मूढ़ चेता:” मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है, सही/ गलत का पता नहीं चल रहा है, धर्म क्या है? धर्म क्या है? मेरा क्या कर्तव्य है? व्हाट टू डू, व्हाट नॉट टु डू।
इसलिए “ पृछामि” मैं आपसे पूछ रहा हूं। क्या पूछ रहा हूं? मेरा कल्याण जिन बातों में है या मेरा क्या धर्म है ऐसा आप मुझे कहिए, निश्चित रूप से कहिए। अभी तो मेरा डामाडोल चल रहा है, मैं स्थिर नहीं हो रहा हूं, अस्थिर हूं। ऐसा सोचते हुए अर्जुन ने कहा,” मैं आपकी शरण लेता हूं, मैं आपका शिष्य बना हूं, मुझे उपदेश कीजिए।” वैसे जो भी ज्ञान को प्राप्त करना चाहते हैं, उनको भी शिष्य बनना होगा। अर्जुन ने जो स्टैंड लिया हुआ है या स्वीकार किया है कि,” मैं कार्पण्य से प्रभावित हो चुका हूं और धर्म की बातों में मूढ़ हो चुका हूं। कृपया अब आप मुझे मेरे फायदे की बात, धर्म की बात सुनाइए।” ऐसे विचार वाला हमें बनना होगा, तभी तो जो भगवान ने उपदेश अर्जुन को सुनाया, वही उपदेश हमारे भी पल्ले पड़ेगा, हमें भी समझ में आएगा। यह भी नोट करने की बात है। हरि हरि! यहां से अब संवाद शुरू होगा, प्रातः काल में संवाद हो रहा है। अभी इसी समय जब हम बात कर रहे हैं तो वह संवाद तो हो नहीं पाएगा, समय के अभाव से। इसी समय की यह ऐतिहासिक घटना है, महाभारत एक इतिहास है। अरे भाई अगर ये इतिहास है तो तुम इसको फर्स्ट वर्ल्ड वॉर क्यों नहीं कहते हो? तुम्हारा फर्स्ट वर्ल्ड वॉर तो 1918 में हुआ, तुम्हारा सेकंड वर्ल्ड वॉर 1940-41/42/44 में हुआ। लेकिन यह वाला वॉर तो 5161 वर्ष पूर्व हुआ। तो फर्स्ट वर्ल्ड वार कौन सा हुआ? जो 1918 में हुआ या कि जो 5000 वर्ष पूर्व हुआ, वह फर्स्ट वर्ल्ड वॉर? तो हिस्टोरियंस / इतिहासकार जो इस संसार के हैं, वह स्वीकार नहीं करते हैं दुर्देव से। केवल इतिहासकार ही नहीं, कई सारे धार्मिक प्रवृत्ति के लोग भी नहीं मानते कि यह ऐतिहासिक घटना है। क्या सचमुच कृष्ण वहां कुरुक्षेत्र में थे? हमारे महात्मा गांधीजी को यह बात मंजूर नहीं थी, क्योंकि गीता का सार अहिंसा है ऐसा वो निकालना चाहते थे । लेकिन यहां तो कृष्ण अर्जुन को हिंसा करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं, तब यह बात मुझे मंजूर नहीं है,यह घटना घटी ही नहीं है, कृष्ण थे ही नहीं वहां, ऐसा उपदेश हुआ ही नहीं और भी पता नहीं क्या-क्या गांधीजी कहते हैं। लेकिन ये इतिहास है, दिस इज़ अ फेक्ट। वहां एक वृक्ष भी है जिसे अक्षयवट कहते हैं। अर्जुन कृष्ण के संवाद को उस वृक्ष ने भी सुना, वह भी अजर/ अमर/ अक्षय हुआ। 5161 वर्षों से वह वहीं पर है, साक्षी है उस संवाद का और भी कई सारे चिन्ह हैं, साइंस है, आर्कियोलॉजिकल प्रूफ है जिससे बिल्कुल साफ है कि वहां युद्ध हुआ था। वहां की मिट्टी में भी लालिमा है, लाल लाल वहां की मिट्टी है, क्योंकि इतना सारा खून वहां पर बहा था।
और जहां भीष्म पितामह शरशय्या पर लेटे थे, वह स्थान अभी भी वहां है, उसकी प्रदर्शनी भी है।
“सैन्यो उभयो मध्ये”, मेरे रथ को दोनों सेनाओं के मध्य में खड़े करो,ऐसा अर्जुन ने कहा और भगवान ने वैसे ही किया। वह निश्चित स्थान भी है और वहाँ रथ भी है, उसमें कृष्ण-अर्जुन भी बैठ है, इजेक्ट लॉकेशन इज देयर। यह सारी फैक्टस/एविडेंस/प्रूफ हैं। महाभारत इतिहास है, ऐसी समझ से स्वीकार करेंगे तभी तो हम भगवत गीता को समझ पाएंगे। श्रील प्रभुपाद जी जैसे आचार्य, “एवं परंपरा प्राप्तम” इसीलिए भी परंपरा में आने वाले आचार्यों से हमें भगवत गीता सीखनी चाहिए या उनके लिखे हुए तात्पर्य या भाष्य पढ़ने चाहिए। श्रील प्रभुपाद, आई थिंक 1971 में, अमृतसर से दिल्ली जा रहे थे रेलवे से, अपने विदेश के शिष्य भी साथ में थे, तो ट्रेन जब धर्म युद्ध कुरुक्षेत्र के मैदान से गुजर रही थी, तो प्रभुपाद ने उंगली करके दिखाया,” देखो! ओवर देयर, ओवर देयर, वॉर टुक प्लेस ओवर देयर।” खिड़की में से प्रभुपाद इशारा कर रहे थे। यह है विश्वास, यह है अटूट श्रद्धा और समझ कि यही तो है वह ऐतिहासिक स्थल, ऐतिहासिक घटना और ऐतिहासिक उपदेश भगवत गीता। ऐसे व्यक्ति ही क्वालिफाइड हैं भगवत गीता के संबंध में कहने और भाष्य तथा तात्पर्य लिखने के लिए। श्रील प्रभुपाद की जय! उन्होंने हमें भगवद गीता दी है और जानबूझकर उसको “भगवत गीता ऐज इट इज़” ऐसा भी नाम दिया है , “भगवद गीता यथारूप” जिसमें कोई कोरी कल्पना नहीं है, मेंटल स्पैक्यूलेशन नहीं है। ‘ आई थिंक’, ‘ मेरा विचार’ और ‘ मेरे ख्याल’ इस भगवत गीता ऐज़ इट इज़ में नहीं मिलेंगे। ऐट द ऐंड हम इतना ही कहेंगे कि एक तो हम सभी के लिए भगवान ने भगवत गीता का उपदेश सुनाया है इसलिए आप सभी के पास ये वाली भगवद गीता होनी चाहिए और उस भगवत गीता को पढ़ना चाहिए । आज के दिन भगवत गीता के अध्ययन का भी संकल्प को, भगवान को सुनो ल, लिस्टन टू कृष्ण। दुनिया वाले तो कई सारी बातें करते रहते हैं कई सारी ग्राम कथाएं/ गॉसिप, दिस दैट, अखबार है कथा कादंबरी है एंड व्हाट नॉट, बाप रे बाप। इनसे बचना है तो कृष्ण कथा को सुनना होगा, श्री भगवान उवाच । सो प्लीज़, जैसे अर्जुन ने मंजूर किया था कि “मैं कृपण हूं, ऑफ कोर्स अब और कृपण नहीं रहना चाहता हूं,मैं ब्राह्मण बनना चाहता हूं, वैष्णव बनना चाहता हूं, मोह माया से मुक्त होना चाहता हूं, इसलिए आप कृपया सुनाइए मुझे”। हम को भी वी शुड कम टू आवर सेंसेज, बिगिन रीडिंग। केवल रीडिंग ही नहीं बल्कि भगवत गीता की स्टडी होनी चाहिए, रेगुलर स्टडी। “एकं शास्त्रं देवकीपुत्र गीतम” और बस एक ही शास्त्र पर्याप्त है ‘भगवत गीता ऐज़ इट इज़’
“गीता सुगीता कर्तव्या किमन्ये शास्त्रवि
यं पद्मनाभस्य मुख पद्मद्विनी: सृता” ।।
अन्य शास्त्र में ऐसा भी महात्म्य कहा गया है। यह गीता बुद्धिमान लोग पढ़ेंगे ,तो आप भी बुद्धू मत रहो बुद्धिमान बनो। यह “गीता अमृतम महत” गीता अमृत का पान करो। ऐसा भी कहा गया है “सर्व उपनिषद गावो” सारे उपनिषद जो है, मान लो उस से बनी है गाय, तो कृष्ण बन जाते हैं “दोग्धा गोपाल नंदन” इसका दोहन करने वाले ग्वाले। फिर बछड़ा भी चाहिए “पार्थों वत्स:” याने पार्थ/अर्जुन बन जाते है बछड़ा। “सुधीर भोक्ता” तो महा महाप्रसाद, इस गीता को अर्जुन वैसे प्रसाद कहे। अर्जुन ने इस प्रसाद का जो आस्वादन किया है तो यह महाप्रसाद बना है। ऐसी महाप्रसाद गीता को सुनेंगे,पढ़ेंगे, उसका पान करेंगे सुधीर बुद्धिमान लोग। ऐसा है गीता अमृतम महात्म्य। ओके सो यू हैव टू रीड, आपको सबको पढ़ना है भगवत गीता और साथ ही साथ इस गीता को अधिक से अधिक लोगों/ जीवो/ मनुष्यों तक पहुंचाना है। ऐसा करने के लिए भगवान में भगवद गीता में ही अंत में कहा है,
“न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तम: ।
भविता न च मे तस्मादन्य: प्रियतरो भुवि” ॥ १८.६९ ॥
“मुझे उनसे और अधिक कोई प्रिय व्यक्ति नहीं है, किनसे ? जो गीता का संदेश या संवाद औरों के पास पहुंचाएंगे, अधिक से अधिक लोगों के पास पहुंचाएंगे वे मुझे प्रिय है।” तो आप भगवान के प्रिय बनना चाहते हो? दैन यू हैव टू डिस्ट्रीब्यूट भगवद गीता और साथ ही साथ प्रभुपाद भी कहा करते थे,” इफ यू वांट टू प्लीज़ मी, डिस्ट्रीब्यूट माई बुक्स, डिस्ट्रीब्यूट भगवत गीता”। प्रभुपाद कहा करते थे, “यदि मुझे प्रसन्न करना चाहते हो तो गीता का वितरण करो”। अभी इस्कॉन का गीता जयंती मैराथन चल रहा है और हमें 40 लाख से अधिक गीता का वितरण पूरे भारत वर्ष में करना है। आप अपना अपना कोटा स्वीकार करो और अधिक से अधिक गीता का वितरण करो इस महीने में। रीड गीता एंड डिस्ट्रीब्यूट गीता, गीता का अध्ययन करो और वितरण करो। “ गीता वासा, गीता वाटा” (मराठी में)। आप कभी जा भी सकते हो, आपका विश्वास/ श्रद्धा बढ़ेगी यदि आप कुरुक्षेत्र जाओगे, दैट इज अनदर थिंग। वैसे प्रभुपाद 1975 में मुझे जो संन्यास दीक्षा दिए, दिसंबर की 6 तारीख को हम लोग वो अनुष्ठान मना रहे थे। प्रभुपाद कुरूक्षेत्र से आए थे वृंदावन जहां दीक्षा समारोह संपन्न हुआ था। प्रभुपाद कुरूक्षेत्र क्यों गए थे? इस्कॉन के लिए भूमि/लैंड देखने के लिए गए थे और प्रभुपाद चाहते थे जहां गीता का संवाद हुआ उसी क्षेत्र में लैंड मिले। उस समय तो तुरंत नहीं मिला था, लेकिन अब इस्कॉन ने लैंड प्राप्त किया हुआ है। इट्स नॉट वेरी फॉर काम फ्रॉम एग्जैक्ट लोकेशन जहाँ भगवत गीता अर्जुन को सुनाई गई थी, जहाँ अक्षय वट भी है। वहाँ कृष्ण अर्जुन के मंदिर का इस्कॉन कुरुक्षेत्र द्वारा निर्माण प्रारंभ हो चुका हुआ, गोपाल कृष्ण महाराज की प्रेरणा से। अब साल दो साल में उसकी ओपनिंग भी होने वाली है। यू आर ऑल वेलकम, प्लीज़ विजिट कुरुक्षेत्र एंड गैट फ़र्दर इंस्पायर्ड। कुरुक्षेत्र मंदिर के निर्माण केलिए आप कुछ सहायता कर सकते हो,उसका भी स्वागत है।
श्रील प्रभुपाद की जय!
इस्कॉन कुरुक्षेत्र की जय!
भगवद गीता ऐज इट इज़ की जय!
कुरुक्षेत्र धाम की जय!
कृष्ण अर्जुन की जय!
निताई गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल!
