JAGANNATH LILA
07-07-2024
ISKCON Ghaziabad

“ओम नमो भगवते वासुदेवाय”
या मैं सोच रहा था कि कौन सा श्लोक है आज? वैसे ओम नमो भगवते वासुदेवाय भी एक श्लोक हो सकता है। हरि हरि! श्लोक से पहले सर्वप्रथम मैं आप सभी का स्वागत करना चाहूंगा। हरि बोल! मेरे स्वागत को स्वीकार किए कि नहीं? हरि बोल! अब पता चल रहा है। हरि हरि! कई सारे टॉपिक सोच रहा हूं। किंतु मेन टॉपिक तो (जगन्नाथ स्वामी की जय!) जगन्नाथ ही है तो ॐ नमो भगवते वासुदेवाय! जब हम कहते हैं फिरआपने भी कह ही दिया तो हम वासुदेव को नमस्कार करते हैं। फिर भगवान प्रकट भी होते हैं और हमको दर्शन भी देते है। वे वासुदेव, जगन्नाथ स्वामी की जय! जगन्नाथ स्वामी वासुदेव है। वसुदेव के पुत्र को क्या कहते है? वासुदेव कहते है। तो वसुदेव के एक ही पुत्र नहीं थे, पुत्र तो कई हुए लेकिन दो तो बच गए। एक थे बलराम, वैसे पहले बलराम थे, सातवें पुत्र बलराम थे। तो बलराम भी वासुदेव है,सन ऑफ वसुदेव इज़ वासुदेव और वे है बलराम। फिर एक और वासुदेव हैं और वे है कृष्ण। जगन्नाथ स्वामी की जय! मध्यस्थ/मध्य में सुभद्रा भी है। आज रथयात्रा महोत्सव – जगन्नाथ ,बलदेव, सुभद्रा का रथयात्रा महोत्सव है। सुभद्रा भी वसुदेव की पुत्री है। तो दो भाई और मध्य में बहन सुभद्रा। उन सबको हमारा नमस्कार! वैसे कल तक दर्शन भी नहीं हो रहे थे जगन्नाथ के, कल ही नेत्र उत्सव हुआ। सीरीज ऑफ फेस्टिवल्स, एक के उपरांत दूसरे उत्सव जगन्नाथ पुरी में हुआ करते हैं। वैसे जगन्नाथ पुरी धाम और जगन्नाथ स्वामी भी अपने उत्सवों के लिए प्रसिद्ध हैं। उत्सवों के बाद उत्सव। हम सबको उत्सव पसंद होते हैं, ये हमारी कमजोरी है कहो, दिस इज इज़ आवर वीकनेस। “उत्सवप्रिय मानवाः ” ऐसी एक कहावत भी है। मनुष्यों को उत्सव प्रिय होते है। हरि हरि! स्नान यात्रा महोत्सव हुआ, अभी संपन्न किए कि नहीं स्नान यात्रा? याद है? हरि बोल!.. श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु को तो याद है। चैतन्य महाप्रभु, फॉर द फर्स्ट टाइम एवर स्नान यात्रा में रहे, ये पांच सौ वर्ष पूर्व की बात है। वैसे जगन्नाथ को और जगन्नाथ रथ यात्रा को अभी विश्व प्रसिद्ध करने वाले या उसके पीछे कारण बनने वाले, श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु की जय! चैतन्य महाप्रभु ही हैं। वे इतना इंटरेस्ट लेते थे जगन्नाथ में, रियली। इसीलिए जगन्नाथ पुरी में जा कर रह रहे थे चैतन्य महाप्रभु। हरि हरि! श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु, “ राधाय महिमा कीदृशो”, राधा की महिमा को जानने हेतु भी श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु प्रकट हुए थे। ये जो – “धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे”

ये तो रूटीन बिजनेस है। ये तो करते ही रहते हैं हर अवतार में “धर्म संस्थापनाय”, लेकिन जब वे श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु के रूप में प्रकट होते हैं तो उनके पास एक प्राइवेट, पर्सनल, व्यक्तिगत,निजी कारण रहा उनके प्राकट्य के पीछे और वह था, वे राधा रानी को समझना चाहते थे और इसलिए

“राधाभाव द्युति सुवलितम नाैमी कृष्ण स्वरूपम”

राधा के भाव को, राधा की द्युति को मतलब कांति को, उनके अंग के रंग को अपनाकर श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु प्रकट हुए थे। राधा का भाव और राधा का रंग भी था ही इसलिए वे कहलाते थे गौर+अंग = गौरांग। राधा रानी गौर अंगी है तो भगवान बन गए गौर अंग – गौरांगी। इसी उद्देश्य के साफल्य/ सफलता के लिए महाप्रभु जगन्नाथ पुरी में रहा करते थे। जगन्नाथ पुरी धाम का भी निमित्त तो शची माता बन जाती हैं, ”ए वृंदावन में मत रहो, डोनट्स स्टे इन वृंदावन, जगन्नाथ पुरी में रहो” ऐसा कहने वाली, ऐसी इच्छा रखने वाली तो शची माता रही। परन्तु शचीमाता को ऐसी प्रेरणा देने वाले तो स्वयं सर्वकारणम् श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु गौरांग ही थे। जय! उनका पर्सनल रीजन/ व्यक्तिगत कारण जो था प्राकट्य के पीछे वो सफल केवल और केवल जगन्नाथ पुरी में ही संभव था, नॉट इन हरिद्वार, नॉट इन वाराणसी, और किसी धाम में संभव नहीं था, केवल एकमात्र जगन्नाथ पुरी धाम की जय! हरि हरि! राधा मतलब विरह भाव से व्यथित जो व्यक्तित्व, वह हैं राधा रानी। तो चैतन्य महाप्रभु पहुंच जाते हैं जगन्नाथ पुरी और अब तो अंतिम लीलाएं, अंतिम मतलब लास्ट डेज की लीलाएं ऐसा नहीं समझना चाहिए या कभी कभी ऐसा कहा जाता है अन्त्य लीला। आदि लीला, मध्य लीला और चैतन्य महाप्रभु की अन्त्य लीला मतलब नॉट द फाइनल राइटस, मतलब चैतन्य महाप्रभु की अठारह सालों की लीला – अंतिम जो अठारह वर्ष जो चैतन्य महाप्रभु रहे जगन्नाथ पुरी में। उसमें से भी लास्ट ट्वेल्व इयर्स अंतिम बारह वर्ष तो चैतन्य महाप्रभु केवल और केवल राधा भाव में ही रहे। कभी कभी राधा का भेष भी वे पहनते, गंभीरा में जब रह रहे थे श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु। उनके परिकर थे स्वरूप दामोदर और रामानंद राय, जो ललिता और विशाखा ही थे और स्वयं चैतन्य महाप्रभु राधा रानी। सो लाइक दैट, दैट वाज़ द टीम, ललिता विशाखा और राधा रानी। श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु सदैव विप्रलंभ अवस्था में/ विरह की व्यथा से व्यथित समय व्यतीत कर रहे थे। हरि हरि! जगन्नाथ रथ यात्रा को एक ऐसा अवसर श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु को प्राप्त होता था। हमको ये समझना होगा कि ऐसे थे श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु, तो जगन्नाथ कैसे थे? राधा रानी ही चैतन्य महाप्रभु के भाव में अपने विरह का समय व्यतीत कर रहे थे। जगन्नाथ स्वामी किसके विरह में जगन्नाथ बन गए? वैसे कृष्ण ही हैं – “जयति जयति देवो देवकीनंदनो सौ” जगन्नाथ कैसे हैं? चैतन्य महाप्रभु रथ यात्रा में पहुंच जाते हैं जगन्नाथ स्वामी के, उन्हें साष्टांग दंडवत प्रणाम करते हैं और उसके समक्ष खड़े होकर प्रार्थना करते हैं। क्या प्रार्थना? ये जो प्रार्थना है –

“जयति जयति देवो देवकीनंदनो सौ”, जय हो! जय हो! किसकी जय हो? देवकी नंदनो सो, याने आप तो देवकी नंदन हो। जगन्नाथ कैसे हैं? देवकीनंदन हैं। वसुदेव और देवकी के नंदन हैं।

ऐसे कृष्ण और जगन्नाथ भी देवकीनंदन हैं और सुभद्रा भी देवकी नंदिनी है। ओरिजिनली जगन्नाथ कृष्ण हैं, बलराम ‘द बलराम- द सेवन चाइल्ड’ हैं और सुभद्रा हरि हरि! सुभद्रा नौवीं पुत्री हैं, वैसे पुत्री तो पहली ही है लेकिन नवें क्रमांक में कहो प्रकट हुई। मथुरा में जन्मे कृष्ण, बलराम और सुभद्रा, यह रूप धारण किए थे एक समय ,हरि हरि! उनको ये रूप धारण करना ही पड़ा , ही हैड नो चॉइस। इसी के साथ सारा इतिहास/ हिस्ट्री, सारे इवेंटस खुल जाते हैं, लेकिन हमारे पास उतना सब कुछ खोलने का समय नहीं है। हरि हरि! संक्षेप में कहें कि ना कहें? कृष्ण, बलराम और सुभद्रा एक समय रोहिणी से सुन रहे थे, कुरुक्षेत्र में सुन रहे थे, द्वारका में भी सुन रहे थे। वैसे दोनों के भी संदर्भ या रेफरेंस मिलते हैं। तो वह रोहिणी सुना रही थी, सुना तो रही थी द्वारका वासियों को कि कृष्ण और बलराम को वृंदावन से कौन लेकर गए? अक्रूर लेकर गए थे। कृष्ण कहे तो थे, “आई ऐम जस्ट नाउ कमिंग, अभी अभी आता हूँ” ऐसा गोपियों को कहे थे। कमिंग तो हुआ नहीं, गोइंग ही हुआ। वहाँ मथुरा से लौटने के बजाए कृष्ण और आगे बढ़े और द्वारका पहुंचे। द्वारका में उनके विवाह भी हुए 16108, बाप रे बाप ! इतने सारे विवाह भी हो गए। फिर व्यस्तता का क्या कहना? तो उनका वृंदावन लौटना हुआ ही नहीं। मैने कहना प्रारंभ तो कर दिया, यह नहीं कि मैं कहना नहीं चाहता था, लेकिन समय कम है। हरि हरि! सूर्य ग्रहण का समय आता है, तबस्नान करने के उद्देश्य से द्वारकाधीश,बलराम,सुभद्रा,वसुदेव,देवकी और सभी मंत्रीगण, इत्यादि, पूरी द्वारका ही वैसे पहुंच जाती है कुरुक्षेत्र, स्नान के उद्देश्य से। उस समय ब्रज वासियों को कहा कि हम बहुत समय से मिले तो नहीं, आप जानते ही हो और मैं जानता ही हूं कि आप कितने उत्कण्ठित हो मुझसे मिलने के लिए,चलो मैं कुरुक्षेत्र आ रहा हूं। तो यदि आपको एतराज नहीं हो, इफ यू डू नॉट माइंड, आप मुझे कुरुक्षेत्र में मिल सकते हो। बृजवासियों को कोई ऑब्जेक्शन हो सकती है क्या? दे वर डिलाइटेड। तो द्वारका वासी भी वहां पहुंच जाते हैं और बृजवासी भी वहां पहुंच जाते हैं। एक समय की बात है जहां सारे द्वारका वासी एकत्रित है एक तंबू में/ टेंट में, रोहिणी मैया माइक्रोफोन लेती है और वह द्वारका वासियों को अपना पर्सनल एक्सपीरियंस/अपना निजी अनुभव सुनाना चाहती है। कैसा अनुभव? जब अक्रूर कृष्ण बलराम को वृन्दावन से मथुरा ले गए उस समय रोहिणी भी वहां वृंदावन में ही थी, यशोदा और अन्य सभी बुजुर्गों के साथ, सभी के साथ। उन दिनों में ब्रज वासियों का जो हाल था, वे विरह की व्यथा से इतने व्यथित थे, ज्वाला में मानो जल रहे थे। वह सारा एक्सपीरियंस सुनाना चाह रही थी रोहिणी, द्वारका वासियों को। लेकिन वो चाहती थीं कि कृष्ण बलराम इसको ना सुने,क्योंकि यदि वे सुनेंगे तो उनसे सहा नहीं जाएगा। दे विल नॉट बी एबेल टू मैनेज या टॉलरेट कहो या असहनीय होगा। इसलिए व्यवस्था की थी, सुभद्रा को बताया कि तुम गेट पर रहो। यदि कृष्ण बलराम आते हैं तो ,कीप देम आउट या दूर भेजो। तो रोहिणी का भाषण/संबोधन प्रारंभ होता है, इतने में कृष्ण बलराम वहाँ प्रवेश द्वार पर पहुंच ही जाते हैं। प्रयास तो किया ही सही सुभद्रा ने ,किंतु छोटी जो बहन है। कृष्ण बलराम बोले, “नहीं नहीं हम अंदर तो नहीं जाएंगे, यहीं खड़े हैं होके तो हमको सुनने दो”। तो ऐसा समझौता हुआ/कंप्रोमाइज हुआ। तो प्रवेश द्वार पर कृष्ण, बलराम और सुभद्रा, ये तीनों भी सुन रहे थे रोहिणी के अनुभव की बात। ब्रजवासी कैसे परेशान थे? विरह की व्यथा से उनकी जान जा रही थी।

“शून्याइतम जगत सर्वम गोविंद विरहेन में” (शिक्षाष्टकम)
“तव कथामृतं तप्तजीवनम कवि भिड़ीदितम् कल्मशा पहम,
श्रवण मंगलम श्रीमदाततम भुवि घृणन्ति ते भूरिदा जना “
(गोपी गीत श्लोक ९)

गोपीयों ने गीत भी गाया है और जब विरह की व्यथा परेशान करती है तो एक बात काम करती है, वो क्या है?
“तव कथामृतम तप्त जीवनम”, जब जीवन तपता है/व्यथित होता है/ जलता रहता है विरह की व्यथा से/ विरह की अग्नि से तो बस यह कृष्ण कथा या

“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे”

ही काम आता है। यह तो कुछ तत्व की बातें ही हो रही है। ये शुरुआत ही है तो थोड़ा सा और आगे बढ़ते हैं। तो कृष्ण बलराम और सुभद्रा सुन रहे थे, कृष्ण सुन रहे थे लेकिन अभी जगन्नाथ नहीं बने थे, बलराम भी सुन रहे थे। बलदेव भी अभी जगन्नाथ पुरी के बलदेव नहीं बने थे, सुभद्रा तो शुरुआत में सुभद्रा ही थीं ऐसी वाली नहीं थी। लेकिन ऐसी वाली बनने वाली है ,कुछ क्षणों में/ मिनटों में, घंटे तो नहीं लगेंगे, कुछ ही मिनटों में। जब यह रोहिणी का सारा अनुभव, फर्स्ट हैंड एक्सपीरियंस, वृंदावन के भक्तों के विरह की गाथा जब कृष्ण, बलराम, सुभद्रा ने सुनी तो उनके स्वरूप में सारी विकृति उत्पन्न हुई। उनकी आकृति में विकृति उत्पन्न हुई या उनकी प्राकृतिक जो आकृति है उसमें विकृति हुई। उनकी प्रकृति भी तो दिव्य ही प्रकृति है। पहले भी दिव्य ही प्रकृति थी और विकृति के उपरांत भी दिव्य ही रही। तो एक सेट ऑफ कृष्ण, जो वहां शुरुआत में सुनने के लिए पहुंचे थे और बलराम और सुभद्रा साथ थे, तो अब एक दूसरा सेट ऑफ कृष्ण बन जाते है, दूसरे बलराम बन जाते हैं और दूसरी सुभद्रा जैसी दिखने वाली बन जाती है। मानो कह रहे हैं, “ नो नो इट्स टू मच”। मानो कान सुनना नहीं चाहते थे तो कान भी अंदर धंस जाते हैं, उनकी आंखें भी फैलती हैं जाइए हर बात को वे सुनते गए,सुनते गए तो उनको अचरज लग रहा था,” ओ रियली!” जब अचरज वाली बात हम सुनते हैं तो हमारी आंखें क्या होती है? खुलती है। कुड बिकम आई ओपनर एंड ओपन मोर एंड मोर,” व्हाट!वाओ! वाओ”। वाओ फैक्टर भी होता है तो आँखें बड़ी होती गई। कछुवा जैसे अपने अवयवों को कभी कोई संकट है तो धंस लेता है, अंदर कर लेता हैं, शैल के नीचे छिपाता हैं। वैसे ही कृष्ण, बलराम, सुभद्रा के सारे अंग भी अपने अंग में धंस जाते हैं, उनके पैरों का कुछ पता ही नहीं, हाथ थोड़े बाहर रह जाते हैं। नोट कीजिए – इसके लिए जगना होगा, अब सोओगे तो फिर ऐंड ऑफ द नोट्स। कृष्ण, बलराम, सुभद्रा किनका स्मरण कर रहे थे?

अपने भक्तों का/ अपने वृंदावन के भक्तों का इंक्लूडिंग ऑफ कोर्स राधा रानी, गोपियों, यशोदा, नंद महाराज और काव्हर्ड बॉयज़ मधुमंगल इत्यादि। सारे भक्तों के संबंध में, वे कैसे मिस कर रहे थे कृष्ण को? तो ये सारी बातें जब कृष्ण, बलराम, सुभद्रा ने सुनी, उनका सारा प्रेम,अपने भक्तों के प्रति जो प्रेम है वह सारा उमड़ आता है, सब जग जाता है। कंप्लीट रिवाइवल ऑफ लॉर्ड्स लव फॉर हिज़ डिवोटीज़। दैट इज़ ऑल इन द माइंड ऑफ जगन्नाथ, बलदेव, सुभद्रा। मानो, “साधवो हदमयम मह्यम” ऐसा भगवान ने घोषित किया भागवत में कि साधु मेरे हृदय होते हैं, उनको हृदय में मैं रखता हूं। तो ये जो प्रसंग कुरुक्षेत्र में हुआ, उस समय उन्होंने सारे भक्तों का स्मरण करते हुए, उनको अपने हृदय प्रांगण में बिठाया है, उनका स्मरण कर रहे हैं, प्रेम का प्रदर्शन कर रहे हैं। जगन्नाथ बलदेव सुभद्रा की जय! द मोस्ट कंसंट्रेटेड लव ऑफ द लॉर्ड फॉर हिज डिवोटीज़, इन जनरल तो भगवान अपने भक्तों से प्रेम करते ही है। ये नहीं कि हम ही उनसे प्रेम करते हैं, इट्स नॉट अ वनवे ट्रैफिक। प्रेम का विनिमय होता है, आदान-प्रदान होता है, भक्त भगवान से प्रेम करते हैं और भगवान भक्तों से प्रेम करते हैं। इन जनरल यह सब समय होता ही रहता है लेकिन इस लीला में जब कृष्ण बलराम राम सुभद्रा बन जाते हैं – जगन्नाथ बलदेव सुभद्रा, तो उस समय तो नथिंग एल्स इज़ ऑन हिज़ माइंड। वे और कुछ सोच नहीं रहे हैं बस अपने भक्तों के संबंध में सोच रहे हैं,

अपने भक्तों के प्रेम का प्रतीक बने हैं भगवान, भक्तों से प्रेम करने वाले भगवान कौन हैं? सभी भगवान हैं ही –

“अद्वैतम अच्युतम अनादि अनंत रूपम”

लेकिन जगन्नाथ का जो रूप है एक्सक्लूसिवली, फुल्ली कॉन्संट्रेटेड, एकाग्रचित्त होकर मानो भगवान केवल अपने भक्तों का स्मरण कर रहे हैं। अपने भक्तों के प्रति अपने प्रेम का प्रदर्शन कर रहे हैं। हरि हरि! चैतन्य महाप्रभु बन जाते हैं राधा रानी, वैसे हैं भी वे एक्चुअल में राधा रानी। “श्रीकृष्ण चैतन्य राधा कृष्ण नही अन्य” वे राधा भी हैं, कृष्ण भी हैं लेकिन अभी यहां जगन्नाथ पुरी में कृष्ण ने बैकसीट ली है और राधा रानी सामने हैं। राधा रानी कैसी हैं? जो कृष्ण को मिस कर रही हैं। राधा रानी इज़ मिसिंग कृष्ण,और जगन्नाथ का क्या हाल है? ही इज़ मिसिंग राधा रानी। सभी भक्तों में जो अग्रगण्य हैं, भक्त शिरोमणि हैं, “राधा रानी महाभाव ठाकुरानी” वो कृष्ण को मिस करती हैं और यहाँ जगन्नाथ, बलदेव और सुभद्रा भी किसको मिस कर रहे हैं? राधा रानी को, नंद – यशोदा को, अपने मित्रों को। इस प्रकार ये द बेस्ट मैच बन जाती है। जगन्नाथ जो राधा रानी को मिस कर रहे हैं और चैतन्य महाप्रभु जो कृष्ण को मिस कर रहे हैं। ऐसे मैच तो मैचलैस हैं, दिस इज़ द बेस्ट मैच। इसलिए भी जगन्नाथ पुरी इज़ द बेस्ट लोकेशन या धाम है। जब रथ यात्रा शुरू होती थी चैतन्य महाप्रभु के समय तब जगन्नाथ अपने रथ में आरूढ़ हुए हैं और चैतन्य महाप्रभु वहां पहुंच जाते हैं, जैसे मैंने कहा पहले, साष्टांग प्रणाम और वंदना भी करते हैं चैतन्य महाप्रभु –

”मैं जानता हूं आप कौन हो?
“जयति जयति देवो मेघश्यामल कोमलांगो
पृथ्वी भार नाशो मुकुंद।”

यू आर दैट कृष्ण। और फिर जब रथयात्रा शुरू हो जाती है जगन्नाथपुरी में, महाप्रभु के समय ,तब रथ पर आरूढ़ हैं कौन?… जगन्नाथ और सामने कौन हैं?… राधारानी। रथयात्रा के समय जगन्नाथ जी का पूरा ध्यान राधा रानी पर होता है, चैतन्य महाप्रभु सामने हैं तो देख रहे हैं उन्हें जगन्नाथ। चैतन्य महाप्रभु जब थोड़ा बगल में जाते हैं तो जगन्नाथ भी उधर देखते हैं, “नयनेर कोने” यानि तिरछी नजरों से वहां देखते हैं। चैतन्य महाप्रभु जिस साइड, तो जगन्नाथ भी देखते हैं उसी साइड। इस प्रकार जगन्नाथ जो कृष्ण हैं और चैतन्य महाप्रभु जो राधा रानी हैं इनके मध्य में ही सारा आदान-प्रदान/ रिसिप्रोकेशन चलता रहता है। उसी समय चैतन्य महाप्रभु के मन में विचार आते हैं, उन्हें कुरुक्षेत्र का वह प्रसंग याद आता है जब सारे ब्रजवासी, द्वारका वासी वहां पहुंचे थे, राधारानी भी पहुंचीं थी गोपियों के साथ। उस समय राधा रानी ने कहा,” आप तो वही कृष्ण हो, पर अब तो आप द्वारकाधीश हो, राजा हो। मैं भी वही राधा रानी हूं लेकिन इट्स नॉट द सेम थिंग, जब हम “जमुना तीर बनचारी” वृन्दावन में जब हम बिहार करते है, राधा कुंड में साथ में रहते हैं। अब वैसा भाव या माहौल तो यहां नहीं है, न तो आपकी वो वेशभूषा भी है। आपकी मुरली कहां है? आप तो हथियार लेकर आ पहुंचे हो। चलो हम चलते हैं, कहां? वृंदावन जाते हैं। ऐसा विचार राधा रानी ने प्रकट किया था, ऐसा भागवत में संक्षिप्त वर्णन है। यहां रथ यात्रा के समय कृष्ण जगन्नाथ के रूप में रथ में विराजमान हैं और चैतन्य महाप्रभु राधारानी के भाव और रूप में वहां उपस्थित हैं। राधारानी सोचती हैं, जैसे उन्होंने सोचा था वहां कुरुक्षेत्र में, कि आप भी वही हो, मैं भी वही हूं,लेकिन कुछ तो भिन्न भी है, चलो वृंदावन जाते हैं। यहां चैतन्य महाप्रभु भी सोच रहे की हम बहुत समय के उपरांत मिल रहे हैं, क्या अब भी आप पहले जैसा प्रेम करते हो? हु नोज।

चैतन्य महाप्रभु राधा भाव में कुछ परीक्षा लेना चाहते हैं, कृष्ण का टेस्ट होगा। तो चैतन्य महाप्रभु क्या करते हैं? रथ के पीछे जाते हैं। ऐसा हुआ है जगन्नाथ पुरी में, चैतन्य चरितामृत में इसका वर्णन है। यदि वे अब भी मुझे याद करेंगे हैं तो जब मैं सामने नहीं रहूंगी, प्रत्यक्ष मेरा दर्शन नहीं होगा,मैं नहीं दिखूंगी। तो शायद वे रुकेंगे या पूछेंगे,” वेयर इज़ राधा रानी? किसी ने देखा है राधा रानी को? तब मोबाइल वगैरह लेकर फोन करेंगे किसी को की राधा रानी कहां है? यदि उनको कोई चिंता नहीं है, पहले जैसा प्रेम नहीं है तो वे आगे बढ़ेंगे। बाय ! फ़िर मिलेंगे ,नहीं मिलेंगे – आई डोंट केयर। ऐसा विचार करके चैतन्य महाप्रभु राधा भाव में रथ के पीछे जाते हैं। तो होता क्या है? जगन्नाथ ने ब्रेक लगाया। रथ को चलायमान करने वाले स्वयं जगन्नाथ जी ही होते हैं। जगन्नाथ जी की मर्जी से ही रथ आगे बढ़ता है, किन्हीं खींचने वालों पर निर्भर नहीं होता है। लोग अपनी कोशिश करते हैं पर रियल चाबी तो जगन्नाथ जी के हाथ में होती है। जब राधारानी सामने नहीं दिखती हैं, तो जगन्नाथ जी रथ को रोक देते हैं। रथ को खींचने का प्रयास तो होता ही है, पर जगन्नाथ जी आगे नहीं बढ़ना चाहते, तो कौन खींच सकता है? लोग चिल्लाते – “खींचो खींचो रथ को”। प्रयास करके कुछ हाथी भी लाए रथ को खींचने के लिए,एक नहीं दर्जनों हाथी रथ को खींचते हैं, लेकिन रथ टस-से- मस नहीं हुआ। क्योंकि राधा रानी का पता नहीं चल रहा वह नहीं दिख रही। तो चैतन्य महाप्रभु समझ गए, येस येस ही स्टिल लव्ज़ मी। अब भी आज भी, बहुत समय के उपरांत बाद भी कृष्ण राधा रानी से उतना ही प्यार करते हैं जैसे पहले किया करते थे। तो जगन्नाथ टेस्ट पास कर लिए, फिर जैसे ही राधा रानी सामने आती हैं जगन्नाथ के समक्ष –

“जगन्नाथ स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे” एक दूसरे के नयन के पथ में दोनों आ जाते हैं, नयन पथ गामी। नयन का जो पथ होता है, द पाथ ऑफ आर विज़न। अब पथ इधर है, अब पथ उधर है। वैसे हमारी प्रार्थना तो ये है कि जहां जहां मैं देखूं,

“यतो यतो यामि ततो नरसिम्हा”।
“जगन्नाथ स्वामी नयन पथ गामी”

जैसे राधा रानी जगन्नाथ जी के नयनों के सामने आती हैं तो ये दोनों एक नयन के पथ पर आ जाते हैं और उसी के साथ धड़ाधड़ गति के साथ रथ को आगे बढ़ाया जाता है। हरि हरि! राजा प्रतापरुद्र आते हैं, आगे और भी कई सारे डिटेल्स हैं यात्रा के। सिर्फ रथ यात्रा को जो नहीं, जगन्नाथ पुरी धाम में जगन्नाथ, बलदेव और सुभद्रा जी के विग्रह की स्थापना करने वाले राजा इंद्रद्युम्न ही रहे। राजा इंद्रद्युम्न, जिनके लिए भगवान जगन्नाथ बलदेव सुभद्रा के रूप में प्रकट हुए। उनका पहले का रूप नीलमाधव का था। नीलमाधव अंतर्ध्यान होते हैं और सूचना देते हैं कि, “ मैं तुम्हें अब दारू ब्रह्म के रूप में प्राप्त हो सकता हूं। ”दारू ब्रह्म दारू पीने वाली दारू नहीं दारू ब्रह्म मतलब काष्ठ – अ पीस ऑफ वुड। काष्ठ कैसा हो? ब्रह्ममय हो। तो वह प्राप्त हुआ ब्रह्ममय। इसका विग्रह भी बनाने की योजना तो बन गई, बनाने तो चाहते थे लेकिन कई सारे प्रयास असफल हुए। अंततोगत्वा कौन आते हैं? विश्वकर्मा आते हैं और वे विग्रह बनाने में सफल होते हैं। दारू ब्रह्म को कुछ तो रुप दिया उन्होंने लेकिन वे भी अंतर्ध्यान हो जाते हैं। जिस रुप में राजा इंद्रद्युम्न को ये विग्रह प्राप्त होते हैं,वो सोचते हैं कि अब कैसे इनकी आराधना होगी? कैसे प्राण प्रतिष्ठा होगी? यह रूप देखो कैसा है? ये तो रूप ही नहीं है, यह तो कुरूप है। स्वरूप नहीं है और ये अधूरा है। ऐसा शोक कर रहे थे, अपनी व्याकुलता प्रकट कर रहे थे। इतने में नारद मुनि पहुंचे थे, “नारायण नारायण …व्हाट इज़ द प्रॉब्लम सर और किंग? मे आई हेल्प यू? क्या मैं आपकी सहायता कर सकता हूं?” राजा बोले,” सहायता क्या, आप देखो क्या हाल कर दिया उस कारीगर या कारपेंटर ने? इट्स इनकंप्लीट एंड फॉर्मलेस, नो फॉर्म। फिर उस समय नारद मुनि ने कहा,” नो नो नो नो नो नो! ये डिटी या मूर्ति इज़ मोर दैन कंप्लीट। ये इनकंप्लीट नहीं, मोर दैन कंप्लीट। एक विशेष लीला के अन्तर्गत भगवान् कृष्ण, बलराम, सुभद्रा ने यह रूप धारण किया था।

जिसका मैं विटनेस हूं, लोकनाथ स्वामी नहीं, नारद मुनि ने कहा,” आई वाज़ द विटनेस”, वे यह सारी लीला/ महिमा सुनाएं, इस रूप की गुण गाथा गाए, इसका स्पैशल सिग्निफिकंस/ महत्व/ महिमा बताए। ऐसा महिमा तो केवल जगन्नाथ स्वामी की ही है, तो फिर राजा तैयार हुए और उन्होंने स्नान यात्रा का आयोजन किया। स्नान यात्रा को सर्वप्रथम करने वाले राजा इंद्रधुम्न ही रहे थे जिसमें ब्रह्मा जी भी आए। ये सब तो है ही इतिहास कि पुरोहित बन जाते हैं ब्रह्मा जी। इसलिए हम जब स्नान यात्रा करते हैं, लगभग दो सप्ताह पहले हुई थी स्नान यात्रा सर्वत्र। स्नान यात्रा पहला अभिषेक है या इसको अपीरियंस भी कहते हैं, जगन्नाथ जी का अपीरियंस डे बन जाता है। काष्ठ थे या दारू ब्रह्म थे, दारू ब्रह्म से यह रूप वाले बनाए गए जगन्नाथ बलदेव सुभद्रा। तो वो दिन स्नान यात्रा का दिन होता है। हरि हरि! स्नान यात्रा के बाद फिर अनवसर उत्सव कहते हैं, भगवान बीमार भी हो जाते हैं,उन्हें फीवर आ जाता है। डॉक्टर ने नाड़ी परीक्षा वगैरह की होगी, डायग्नोसिस के बाद फिर बेड रेस्ट, नो विजिटर्स, स्पेशल डाइट। तो यह चलता रहता है अनवसर एक काल अवधि में। जगन्नाथ के दर्शन नहीं होते लगभग दो सप्ताह के लिए। तब वैसे कहते हैं और सत्य ही है कि जगन्नाथ दर्शन देते हैं अलार्नाथ में। अलार्नाथ नमक एक और धाम या विग्रह है और चैतन्य महाप्रभु वहां जाकर दर्शन किया करते थे, बाकी सभी भक्त भी, ये प्राचीन काल से ऐसी परिपाटी है। फिर भगवान जगन्नाथ बलदेव सुभद्रा की जय! उनके स्वास्थ्य में सुधार होता है तो फिर कल के दिन,अ डे बिफोर रथ यात्रा, वे दर्शन देते हैं। वह फिर और एक उत्सव बन जाता है, उसको कहते हैं नेत्रोत्सव। ऐसा नाम कभी आपने सुना नहीं होगा, फिल्म फेस्टिवल, दिस फेस्टिवल,ये शो ,वो शो,डॉग शो और क्या-क्या? हमने यह भी सुना है ,मटन महोत्सव! वाह रे वाह!

मतलब तुम्हारी जिव्हा के लिए उत्सव। ऐसे संसार में उत्सव चलते रहते हैं जिव्हा के लिए। नासिका के लिए हम सूंघते रहते हैं पाउडर, दिस एंड दैट, तो नासिका के लिए उत्सव। कानों के लिए क्या-क्या सुनते रहते हैं? तो करणोत्सव। शरीर और मन भी उसके साथ जुड़ता रहता है इस भौतिक जगत में जो अलग-अलग उत्सव मनाए जाते हैं लेकिन उन उत्सवों में आत्मा का तो कोई न तो संबंध है, न कल्याण है, न आनंद है, ये आत्मा के लिए उत्सव नहीं है। सारे उत्सव जगन्नाथ भगवान के संबंध के जैसे स्नान यात्रा उत्सव है, अन्वसर भी एक उत्सव बन जाता है, नेत्रोत्सव भी उत्सव बन जाता है, फिर गुंडिचा मार्जन भी महोत्सव बन जाता है। आपने भी किया गुंडिचा मार्जन? फिर उसी दिन नेत्रोत्सव भी,नेत्रों के लिए उत्सव। फिर आज होगा जगन्नाथ रथयात्रा महोत्सव की जय! देयर इस नो अदर फेस्टिवल लाइक जगन्नाथ रथ यात्रा , ये मैचलेस/ अतुलनीय है। और इस उत्सव के केंद्र में, चैतन्य महाप्रभु के प्रकट लीला के समय, इसके केंद्र में जगन्नाथ और चैतन्य महाप्रभु रहे। तो यह रथ यात्रा महोत्सव चैतन्य महाप्रभु का मोस्ट फेवरेट उत्सव है। यह रथ यात्रा महोत्सव अधिकतर जगन्नाथ पुरी में ही मनाया जाता था। प्रभुपाद भी दैवीय रथ यात्रा उत्सव मनाया करते थे, गौर मोहन डे उनकी सहायता करते थे। बच्चों का रथ यात्रा महोत्सव जिसके लीडर अभय हुआ करते थे। इतने छोटे थे अभय एंड कंपनी, कीर्तन करने के लिए मृदंग भी नहीं उठा सकते थे। प्रभुपाद हमको सुनाया करते थे, सुनाया है कई बार पब्लिकली कि गौर मोहन डे कीर्तन मंडली का आयोजन करते थे। बड़े लोगों को किराए पर लेते थे, गौर मोहन डे उनको हायर करते थे, उनको दो रुपए देते थे। प्रभुपाद ने बचपन में अपने मित्रों के साथ जगन्नाथ रथ यात्रा का आयोजन किया था, तो जब वे बड़े हुए ,इस्कॉन की स्थापना की तो सैनफ्रांसिस्को में उन्होंने 1967 में फर्स्ट टाइम रथ यात्रा का आयोजन किया। जगन्नाथ जी प्रकट हुए उसकी भी एक कहानी/ लीला है।

एक गुड़िया मिली मालती माताजी को, प्रभुपाद फिर कहे, “ श्यामसुंदर इन गुड़ियों / डॉल्स को सामने रखो और बड़े आकार की तीन गुड़िया/ डॉल्स या मूर्तियां बना दो। मूर्तियां जब बन गई प्रभुपाद ने कहा,” वी विल हैव ए रथ यात्रा इन सैनफ्रांसिस्को”। हरि बोल! रथ तो मिला नहीं या बनाया नहीं, फ्लैट बेड ट्रक ही लाया गया और उसी में स्थापना की, जिसमें सामने जगन्नाथ, बलदेव, सुभद्रा थे, और प्रभुपाद की वहां खड़े होने की व्यवस्था थी। कैलिफोर्निया, सैन फ्रांसिस्को के गोल्डन गेट पार्क में सर्वप्रथम इस्कॉन जगन्नाथ रथ यात्रा संपन्न हुई। 10,000 लोग आए थे वहां। देखते हैं आज गाजियाबाद में कितने हजार आते हैं? फिर प्रभुपाद ने कहा था अब इस शहर का नाम होगा ‘नवीन जगन्नाथ पुरी’। तबसे कम से कम इस्कॉन जगत में तो , सैनफ्रांसिस्को का नाम नवीन जगन्नाथ पुरी हो गया। पहली रथ यात्रा तो 1967 में हुई और फिर धीरे-धीरे ये रथयात्रा फैलते- फैलते ऑल कॉन्टिनेंट/ कंट्रीज/सिटीज़ एंड टाउंस तक गई। अब इस्कॉन इस पृथ्वी पर, 700 नगरों में रथयात्रा का आयोजन करता है। हरि बोल! नाम तो है जगन्नाथ, पहले तो वे कुछ पांडानाथ, पण्डो के नाथ थे, लेकिन अब श्रील प्रभुपाद ने जगन्नाथ को सचमुच, नॉट इन द नेम ओनली, बट लिटरली, अक्षरशः जगन्नाथ को जगन्नाथ बनाया। हरि बोल! दिल्ली में रथयात्रा के निमित्त गोपाल कृष्ण महाराज और मैं बने थे। ऑल द वे टू 1981, गोपाल कृष्ण महाराज दिल्ली के जीबीसी थे और और लोकनाथ स्वामी दिल्ली का टेंपल प्रेसिडेंट था। जीबीसी और टेंपल प्रेसिडेंट हमको मिलाकर भी भक्तों की संख्या बहुत कम हुआ करती थी। उन दिनों इस्कॉन वाज़ इन लाजपत नगर, 21 फिरोज शाह गांधी रोड पर राधा पार्थसारथी मंदिर हुआ करता था। हरि हरि! प्रभुपाद ने दिए राधा पार्थसारथी, राधा पार्थसारथी की जय! अभी एनसीआर में कई सारे मंदिर गोपाल कृष्ण महाराज ने बनाए, हमने भी कुछ थोड़े बनाए,पर महाराज ने अधिक बनाए हैं। हरे कृष्ण! वी आर मिसिंग गोपाल कृष्ण महाराज। ये जगन्नाथ, बलदेव, सुभद्रा भी वैसे दिल्ली मंदिर में थे एक समय। प्रणव प्रभु याद है आपको नाम? वे जगन्नाथ को गाजियाबाद ले आए। उन्होंने और यहां के भक्तों ने मिलकर गाजियाबाद में भी रथयात्रा प्रारंभ की और फिर गाजियाबाद का खुद का रथ भी था। एनसीआर में जहां भी रथयात्रा होती है, तो यहीं गाजियाबाद इस्कॉन का रथ और गाजियाबाद इस्कॉन के जगन्नाथ, बलदेव, सुभद्रा जाया करते थे। फिर हम भी, गोपाल कृष्ण महाराज और मैं, दोनों रथयात्राओं में साथ में रहा करते थे। वैसे ऐसा कहते कहते ‘आई एम जस्ट मिसिंग हिम’। आप सोचेंगे और कहेंगे दैट इज़ हाउ वी फील अबाउट हिम, वी आर मिसिंग हिम मोर। हरि हरि!

ओके वी विल स्टॉप हियर।
जगन्नाथ बलदेव सुभद्रा की जय!
जगन्नाथ रथयात्रा महोत्सव की जय!
श्रील प्रभुपाद की जय!
श्री श्रीमद गोपाल कृष्ण गोस्वामी महाराज की जय!
गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल!

आई एम श्योर महाराज विल बी विथ अस इन हिज़ स्पिरिट।
आई एम श्योर यू विल फील हिज़ प्रेजेंस।
राइट नाऊ आई एम फीलिंग हिज़ प्रेजेंस।
हरि हरि बोल!
गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल!