
Kartik Maas Samapn
15-11-2024
ISKCON Vrindavan
हरे कृष्ण, हरे कृष्ण!
बस? हरे कृष्ण ! भूख लगी है ? वैसे भूख लगने पर भक्त आ जाते है, आ रहे है।
अच्छा हुआ आप सब पहुंचे हो और वैसे आज की भगवत कक्षा या देखते है चैतन्य चरितामृत की भी कक्षा हो सकती है। केवल कक्षा के लिए ही आप नहीं पहुँचे हो , आप वृंदावन पहुंचे हो ,वृन्दावन धाम की जय ! ये प्रश्न वैसे पहले भी मैं पूछते रहता हूं की क्या आप वृंदावन पहुंचे हो? या इस कक्षा में पहुंचे हो? या आपको किसी ने यहां पहुंचाया है? उत्तर क्या होगा? ज्यादा कठिन तो नहीं है, सर्व कारण कारणम कौन है?
“ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानंद-विग्रहः
अनादिर आदि गोविंदः सर्व-कारण-करणम्।।”
आज हम बहुत दूर पहुंचे हैं, दुनिया/संसार से दूर, ब्रह्मांडो से दूर, दूर नगरी श्री वृंदावन धाम में हम पहुँचे है,या पहुंचाये गए है। इसको चैतन्य महाप्रभु कहते ही रहे:
“ब्रह्माण्ड भ्रमिते कोण भाग्यवान जीव
गुरु-कृष्ण-प्रसादे पाय भक्ति-लता-बीज”।।
श्रील प्रभुपाद की जय! पूर्ववर्ती आचार्य की ओर से प्रभुपाद और फिर उनके अनुयायी प्रभुपदानुगा, ये सभी कारण बने है और इसी के फलस्वरूप हम वृन्दावन धाम में पहुंचे है। क्या आपको पूर्ण विश्वास नहीं है इस बात पर कि हम वृन्दावन धाम में पहुँचे है? हरि बोल ! आज वैसे कई सारी वैष्णव तिथियां भी है जिनका मैं केवल नाम ही गिनूंगा या स्मरण दिलाऊंगा।
भूगर्भ गोस्वामी तिरोभाव तिथि महोत्सव की जय !
निम्बार्क आचार्य आविर्भाव तिथि महोत्सव की जय !
काशीश्वर पंडित तिरोभाव तिथि महोत्सव की जय !
और आज कृष्ण रास यात्रा भी है, वैसे कार्तिक का मास रास क्रीड़ा के साथ प्रारम्भ हुआ था, याद है ? शरद उत्सव, शरद पूर्णिमा। आज भी पूर्णिमा है और रासयात्रा तो रात्रि को होती है, तो आज रात्रि को कृष्ण,राधा और गोपियां सभी रास पूर्णिमा मनाएंगे। आज कार्तिक का समापन भी हो रहा है। यह अच्छा है क्या ? आप हरि बोल बोल रहे हैं। कई भक्त ऐसा नहीं सोचते है जैसे हमारे ब्रजमंडल परिक्रमा के हजार- डेढ़ हजार भक्त ब्रजमंडल 84 कोस की परिक्रमा कर रहे है और आज उनके लिए एक दृष्टि से अंतिम दिवस है। लेकिन इसको वे अच्छा नहीं मान रहे हैं। वे सोच रहे हैं और आशा है कि आप भी वैसे ही सोच रहे हैं कि कार्तिक मास चलता रहे, चलता रहे और कभी खत्म न हो। कार्तिक मास में अनुभव की हुई भाव भक्ति उसको आप कभी भूलोगे ? मुंडी तो हिला रहे हैं कि नहीं भूलेंगे। तो भूलना नहीं, याद करते रहो, स्मरण करते रहो। केवल स्मरण ही नहीं, एक और शब्द है मनन करते रहो।
एक नई कुछ बात सुन ली और फिर हल्का सा उस समय स्मरण किया और भूल गए, ऐसा नहीं करना होता है। ऐसा करने से हम को पूरा लाभ नहीं होता, उस श्रवण कीर्तन या अलग-अलग उत्सव में सम्मिलित होने का लाभ तो वैसे मनन से ही होता है। मनन मतलब गो बैक, वहाँ जाओ जो भी आपने अलग-अलग अनुभव किए, श्रवण कीर्तन किया, उसको फिर से याद करो और मनन करो। हरि हरि! मनन-स्मरण जब गाढ़ होता है,थोड़ा और गाढ़ा होता है, जब तरल का घनीभूत होता है स्मरण,तो उसको मनन कहा जाता है। मनन हमारे काम की चीज है, उपयोगी है, अनिवार्य है। ऐसे हम करते रहेंगे तो कार्तिक महोत्सव,अन्य उत्सव तथा और भी
“शृण्वन्ति गायन्ति गृणन्त्यभीक्ष्णश:स्मरन्ति नन्दन्ति तवेहितं जना: ।
त एव पश्यन्त्यचिरेण तावकं भवप्रवाहोपरमं पदाम्बुजम्” ॥ १:८:३६ ॥
“सतां प्रसङ्गान्मम वीर्यसंविदो भवन्ति हृत्कर्णरसायना: कथा: ।
तज्जोषणादाश्वपवर्गवर्त्मनि श्रद्धा रतिर्भक्तिरनुक्रमिष्यति” ॥ ३:२५:२५ ॥
ऐसा कपिल भगवान भी कहे,” जब हम संतों/भक्तों/ साधु के संग में आते हैं तो वह जो प्रसंग होता है वह मेरे वीर्य की/शौर्य की कथाएं होती है। वे कथाएं और श्रवण-कीर्तन एक रसायन या टॉनिक की तरह होते हैं। हम होते तो हैं आत्मा लेकिन इस टॉनिक का पान करने से हम आत्मा से महात्मा हो जाते हैं,लेकिन परमात्मा नहीं होते, ऐसा संभव नहीं । यह सारा भगवान की अहैतुकी कृपा का ही फल है। इस वक्त हम कहीं भी हो सकते थे ब्रह्मांड में,कई सारे स्थान हैं,अनंत कोटि ब्रह्मांड है। ये भी ब्रह्मांड है जिसमें 14 भुवन है और फिर दिल्ली है, कानपुर है, नागपुर है, रायपुर है, पुर की पुर है। लेकिन इस समय हम और कहीं नहीं है,हम कहां हैं? कहां हो? वृंदावन धाम की जय!
“मयाध्यक्षेण प्रकृति: सूयते सचराचरम् ।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते” ॥ (९:१०)
भगवान की अध्यक्षता के अनुसार ही सारे चर-अचर का कहीं पर स्थित होना या विचरण होना या स्थावर होना चालू रहता है। यह सब पूरा भगवान के नियंत्रण में है। भगवान की व्यवस्था और विशेषतया भगवान की कृपा से हम मनुष्य भी बने हैं। उसमें भी कई सारी संभावनाएं हैं, क्या बन सकते थे? 84 लाख योनियों में किसी भी योनि में हो सकते थे लेकिन हम “दुर्लभ मानव :” ये दुर्लभ मनुष्य जीवन हम सबको भगवान प्राप्त कर आए हैं।
“तत्रापि दुर्लभं मन्ये बैकुंठ प्रियदर्शन” मनुष्य जीवन प्राप्त होना दुर्लभ है और भागवत कहता है उससे भी अधिक दुर्लभ क्या है? वैकुंठ प्रियदर्शन। वैकुंठप्रिय वैसे भगवान का एक नाम भी है, उनका धाम भी है वैकुंठ। भगवान के भक्तों को बैकुंठ प्रिय कहा गया है और ऐसे बैकुंठ प्रिय भक्तों का दर्शन, उनके संपर्क में आना, उनके चरणों में पहुंचना “तत्रापी दुर्लभं” दिस इज़ ईवन मोर रेयर। दुर्लभ मनुष्य जीवन प्राप्त होना दुर्लभ है, और भी एक बात दुर्लभ है। मनुष्य तो वैसे कई सारे होते हैं, इस पृथ्वी पर मनुष्य 800 करोड़ है। लेकिन फिर भगवान कहते है, “मनुष्याणं सहस्त्रेषु कश्चित यतिति सिद्ध्ये” उन करोड़ों लाखों हजारों में से कोई-कोई सिद्धि के लिए या धर्म की ओर मुड़ता है और उन दुर्लभ लोगों में से कोई-कोई ही भगवान को तत्वत: जानता है। उन मनुष्य आत्माओ में से सिद्धि के लिए प्रयास करने वाले, इस धर्म को उस धर्म को अपनाने वाले या भगवान को तत्वतः जाने वाले और भी ज्यादा दुर्लभ होते हैं।
श्रील प्रभुपाद द्वारा स्थापित अंतर्राष्ट्रीय श्रीकृष्ण भावनामृत संघ( इस्कॉन) की जय! इसमें भगवान को तत्वत; जानने की व्यवस्था प्रभुपाद ने की है। भगवान को तत्वत: जानना अनिवार्य है। “जन्म कर्म च में दिव्यम्” भगवान का जन्म,उनकी लीला दिव्य है, भव्य है और न जाने क्या-क्या नहीं है। वैसे हर बात का तत्व है: नाम का तत्व/ धाम का तत्व/ गुरु का तत्व/ लीला का तत्व है आदि। हर बात का सिद्धांत है/ शास्त्र है/ साइंस है। शास्त्त्रोक्त या शास्त्र में उक्त,याने उसमें जो कहा गया है, लिखा गया है,उसको साधु, शास्त्र और आचार्य समझाते हैं। भगवान का ही नहीं, भगवत तत्व भी है, जीव तत्व है, शिव तत्व है, तत्व ही तत्व है। तत्वत: जो जानता है तो भगवान कहते हैं,” त्यकत्वा देहम पुनर्जन्म न विद्यते”। माफ करना क्योंकि शुभ दिन है, ब्रह्म मुहूर्त भी है और हम यह शरीर त्यागने की बात का स्मरण दिला रहे हैं। हरि हरि! दिस इज़ नथिंग दिस इज़ अ डेली अफेयर, शरीर को त्यागना। इट्स कॉमन थिंग कि जन्म लिया है तो क्या करना पड़ेगा? मरना पड़ेगा ही। कोई पर्याय है क्या दूसरा? ऐनी अदर अल्टरनेटिव? नो। “जातस्य हि ध्रुवम् मृत्यु”, ध्रुवम् शब्द का उपयोग किया गया, जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है। किंतु फिर यह भी कहा है कि जो मरता है उसका जन्म भी निश्चित है। किंतु इसका अपवाद भी है और वाह है कि जो भगवान या भगवान के भक्तों के संपर्क में आते हैं,साधु संग करते हैं या फिर अंततोगत्वा,
“तत्विधि प्राणिपातेंन परि प्रश्नेंन सेवया
उपदेश्यंति ते ज्ञानम ज्ञानिनः तत्वदर्शिन:”
भगवान गीता के चौथे अध्याय में 34वें शोक में हम सबको, सारे मनुष्य को प्रेरित कर रहे हैं, “जाओ जाओ जाओ,गुरु की शरण में जाओ,प्रश्न पूछो।” क्या भाव है? मिर्ची का क्या भाव है?इसका क्या भाव है,ये प्रश्न भूल जाओ। मनुष्य बने हो “अथातो ब्रह्मजिज्ञासा” ‘अतः’ मतलब अब तुम मनुष्य बने हो, इसलिए अथातो ब्रह्मजिज्ञासा। जिज्ञासा करनी चाहिए मनुष्य को,हरि हरि! जैसे चैतन्य प्रभु ने भी कहा कि,” केने अमाय जारे तापत्रय” यदि हम नहीं जानेंगे ,क्या नहीं जानेंगे? के अमि? हू एम आई? मै कौन हूं? इस से रिलेटेड और भी कई सारे प्रश्न हैं। दूसरा प्रश्न यह भी कि है इतना मुझे परेशान क्यों होना पड़ रहा है? कितनी सारी उलझने हैं एक के बाद एक। समस्याएं पीछा छोड़तो ही नहीं। एक तो “जन्म मृत्यु जरा व्याधि, दुख दोषनुदर्शनम्” चलता रहता है और फिर आदिदैविक, आदिभौतिक और आध्यात्मिक तापत्रय क्यों हमें सताते हैं? इसके उत्तर अगर हम नहीं समझेंगे तो कैसे हित होगा हमारा? यदि हम प्रश्नों के उत्तर हम पता नहीं लगाएंगे तो कैसे चलेगा? इस प्रकार के कई सारे और प्रश्न है और भगवान की कृपा से हर प्रश्न का उत्तर है।
हर उलझन की सुलझन है, बस जिज्ञासु होकर हमें साधु-शास्त्र-आचार्य के पास पहुंचना होगा। उसमें से भी साधु के पास पहुंचना होगा, गुरुजनों के पास पहुंचना होगा। उनके पास पहुंचकर सारी समस्याओं का हल मिल जाएगा, इसलिए हम इस्कॉन में आते हैं,
“साधु संग साधु संग सर्व शास्त्र कय
लव मात्र साधु संग सर्व सिद्धि होय”
मनुष्य जीवन प्राप्त होना दुर्लभ बात है। एक और भी आइटम है जिसका मैने थोड़ा उल्लेख तो कर ही दिया। भगवत प्राप्ति की इच्छा जगना ये दूसरी दुर्लभ बात है, जिसको वैसे कहा गया है, “आदौ श्रद्धा”। दुर्लभ बात तो है मनुष्य शरीर प्राप्त करना,लेकिन और एक भी दुर्लभ क्या है? “आदौश्रद्धा”, संतों में/ भक्तों में/शास्त्रों में श्रद्धा जागृत होना,जिज्ञासु होना ये दुर्लभ बात है। सही शास्त्र और सही प्रमाणिक साधु भी मिलना चाहिए, “एवं परंपरा प्राप्तम” परंपरा में आने वाले साधु के संपर्क में आना चाहिए,जो हमारे सारे आचार्यों की परंपरा है)
“आचार्यवान पुरुषो वेद” ऐसा शास्त्र का कहना है। वेद मतलब जानना या ज्ञानवान होना। पर कौन ज्ञानवान होंगे? आचार्यवान पुरुष या स्त्रियां भी। तो हमारे आचार्य होने चाहिए,जिनके होते हैं आचार्य उनको ही कहते है आचार्यवान। इसी शब्द को समझने के लिए- जैसे जिनके पास होता है धन,उनको कहते हैं धनवान; जिनके पास होते हैं गुण, उनको कहते हैं गुणवान; ऐसे ही कई सारे शब्द बनते हैं, तो उसी प्रकार जिन्होंने अपनाया है आचार्य को तो उनको आचार्यवान कहते हैं। आचार्यवान होने का क्या फायदा है? “आचार्यवान पुरुषो वेद” वेद मतलब जानना, तो मतलब ऐसा व्यक्ति जानकार या ज्ञानवान होगा, “कृष्ण प्राप्ति होय जहां होइते” और ऐसे व्यक्ति को अंततोगत्वा कृष्ण प्राप्ति भी होनी है। हरि हरि! आदौ श्रद्धा के साथ हम संतो/ भक्तों/ आचार्यों के पास पहुंचते हैं। फिर वह क्या करते हैं? आधो श्रद्धा के बाद फिर “साधुसंग/ भक्त संग उनको प्राप्त होता है। ऐसे संग में फिर क्या होता है? “भजन क्रिया” याने भजन क्रिया बताई जाती है,समझाई जाती है,
“सताम प्रसंगात मम वीर्य संविदो” कृष्ण कहते हैं वहां “मैं टॉपिक बनता हूं”। सत्संग में टॉपिक विषय कौन होता है? मैं रहता हूं याने भगवान रहते हैं। भगवान ने कहा
“मतचित्त: मतगत प्राण: बोध्यन्त: परसपरम
कथयन्तश्च माम नित्यम तुष्यन्ति च रमन्ति च”
अपने भक्त का परिचय देते हुए भगवान गीता के 10वें अध्याय में बोले “मतचित्तः” मेरे भक्त का चित्त कहां रहता है? मुझ में। “मतगत प्राण:” उसका प्राण मुझमें समर्पित रहता है।
“राधा कृष्ण प्राण मोर जुगल किशोर, जीवन मरने गति आर नहीं मोर”
भक्त समर्पित होता है,उसको भजन सुनाया जाता है, भजन करो। भजन में भी दो प्रकार होते हैं:- एक विधि होती है और एक निषेध होता है। डू दिस डोंट डू दिस।
“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे”
यह विधि है इसको करो और फिर क्या मत करो? चार नियमों का उल्लंघन न करो,जो इस प्रकार हैं:-
नो मीट ईटिंग ,नशा पान नहीं करो, अवैध स्त्री/पुरुष संग नहीं करो, जुआ नहीं खेलो। ऐसे सारे शास्त्रों का विभाजन – एक विधि और एक निषेध में होता है। यह सब समझाया जाता है साधु संग में,और भजन क्रिया को जब हम अपनाते हैं तो उसका फल क्या होता है? ”अनर्थ निवृत्ति” यह सब भक्तिरसामृत सिंधु में रूप गोस्वामी प्रभुपाद ने समझाया है। इस ग्रंथ को ‘ साइंस ऑफ भक्तियोग’ कहा है अंग्रेजी में। भक्तियोग का शास्त्र कौनसा है? भक्तिरसामृत सिंधु,जो रूप गोस्वामी ने इस संसार का दिया,वे रूप मंजरी थे। रूप मंजरी नाम सुना है? अष्ट सखियां होती है, गोपियां होती है और मंजरियां होती है। इन मंजरियों की लीडर हैं रूप मंजरी हैं जो भगवत धाम/गोलोक से अन्य परिकरों के साथ यहां प्रकट हुई और उन्होंने कई सारा भक्ति के रहस्य का उद्घाटन किया, विस्तार में सब समझाया है,अपना अनुभव दिया है। रूप गोस्वामी, अन्य आचार्य तथा षड गोस्वामी वृन्द भी है,’गौर गणोदेश दीपिका’ नामक ग्रंथ में ऐसे कई सारे परिकरों का वर्णन है।
“कृष्णवर्णम त्विषा कृष्णम सांगोपागास्तत्र पार्षदम”
भगवान श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु की जय! वे भी तो प्रकट हुए जो स्वयं कृष्ण ही थे। लेकिन वे अकेले प्रकट नहीं हुए, केवल चैतन्य महाप्रभु अवतार नहीं हुआ, कई सारे असंख्य सख्यभाव वाले/वात्सल्य भाव रसवाले/ माधुर्य रसवाले असंख्य परिकर भी पधारे थे। हरि बोल! उन सभी ने मिलकर के सहयोग दिया है या कृष्ण भगवान को प्रस्तुत किया है। इस अंतरराष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ में श्रील प्रभुपाद ने अन्य पूर्ववर्ती आचार्यों की टीकाओं पर आधारित और चैतन्य महाप्रभु के परिकरो के जो ग्रंथ/ वांग्मय रहे हैं, उनको सार रूप में प्रभुपाद अपने ग्रंथों में प्रस्तुत किए है। ऐसा वांग्मय संसार में और कहीं नहीं है,ना तो किसी देश में है ना तो किसी धर्म में है ना तो हिंदू धर्म में ही है, जैसा कि गौड़िय वैष्णव परंपरा में प्रस्तुत किया गया है। जैसा भक्ति विनोद ठाकुर,फिर श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर, फिर भक्तिवेदांत स्वामी श्रील प्रभुपाद प्रस्तुत किए हैं, दिस इज़ अनपरेल/मैचलेस है/अतुलनीय है।
बाकी और धर्म का अपना-अपना एक ग्रंथ होता है। जिसको कहते है “द बुक ऑफ द रिलीजन”, जैसे बाइबल- द बुक ऑफ द रिलीजन; कुरान- द बुक ऑफ द रिलीजन। उनका तो एक एक बुक ऑफ रिलीजन है लेकिन हमारे पास तो…. सो मैंनी बुक्स हैं, ग्रन्थालय हैं, लाइब्रेरी ऑफ रिलीजन है। और भी लाइब्रेरी वैसे है चार वेद हैं,उपवेद है, अठारह पुराण हैं, उपपुराण हैं,उपनिषद है,वेदांत सूत्र है,महाभारत है,गीता है,भागवत है,चैतन्य चरितामृत है,चैतन्य भागवत है और फिर इन एडिशन टु ऑल दिस .. गौड़ीय वैष्णवों ने, चैतन्य महाप्रभु के परिकरो ने या गौड़ीय वैष्णव परंपरा के आचार्यों ने बहुत कुछ लिखा है, उपलब्ध कराया है, माइन्यूट डिटेल्स के साथ। ये बहुत बड़ी देन है और ये सब चैतन्य महाप्रभु की व्यवस्था से ही है। चैतन्य महाप्रभु के सेनापति भक्त श्रील प्रभुपाद की जय! उनको निमित्त बनाके महाप्रभु ये सारा उपलब्ध कराए हैं। हरि हरि! इसका हम सभी को फायदा उठाना है और केवल उसमें परमार्थ है, इसका फायदा उठाना भी परमार्थ है। लेकिन फिर थोड़ा कुछ स्वार्थ भी हो सकता है अगर केवल अपने लिए हमने ये सारा ज्ञान अर्जन किया और अपने पास ही रखा। नहीं नहीं.. तो इसको क्या करना है हमें? क्या करना है? इसको शेयर करना है, शेयर विद अदर्स। आजकल बहुत शेयरिंग चलता रहता है, शेयरिंग..डाउनलोड दिस, मेक दिस वायरल, शेयर करो, बिकम सब्सक्राइबर। ये कृष्ण भावना को हमें या कृष्णभावना का सारा शास्त्र और विधि विधान है,कार्यकलाप है, एक्टिविटीज है, प्रोजेक्ट्स है,
“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे” – ये है।
ये सब कुछ है। प्रभुपाद के ग्रन्थ हैं,प्रसाद है ,फेस्टिवल्स है,कार्तिक महोत्सव की जय। ये सारा हमे शेयर करना है और ऐसा करके अपने जीवन को सफल करना है। ये बात चैतन्य महाप्रभु ने कही है, किन शब्दों में?
“भारत भूमि मनुष्य जन्म होइले यार
जन्म सार्थक करि करो परोपकार “
मनुष्य जन्म प्राप्त हुआ है तो अपना हाथ ऊपर करो। लेकिन प्रभुपाद ऐसा भी कहा करते थे कि केवल हम मनुष्य जैसे दिखते है इसलिए हम मनुष्य है, हम ऐसा क्लेम भी नहीं कर सकते। शास्त्रों में वैसे द्विपाद पशु भी कहा है। पशु वैसे चतुष्पाद होते है, फोर लैग्ड एनिमल्स। लेकिन कई सारे मनुष्य वैसे दो पैर के पशु ही दुर्दैव से हैं। तो उन सबके साथ ये परोपकार करना है, ये कृष्णभावना को शेयर करना है औरों के साथ।
“जारे देखो तारे कहो कृष्ण उपदेश” भगवद गीता का अब मैराथन भी है, कार्तिक महोत्सव लगभग पूरा हो रहा है, इसी के साथ एक मैराथन शुरु हो रहा है। गीता जयंती महोत्सव की जय! आप की जानकारी के लिए वैसे, इस्कॉन के जो लीडर्स है,स्पेशली इन इंडिया, उन्होंने एक संकल्प लिया है कि आने वाले गीता जयंती के महोत्सव का जो मैराथन है, इस मैराथन में, किसी को याद है कितने ग्रंथों का वितरण करने का संकल्प लिया है? डज़ समवन रिमेंबर? येस, कहो। मैने जो सुना है वो सही ही होना चाहिए, ४५ लाख भगवद गीता। हरि बोल! इंक्लूडिंग बिग बुक्स। दैट इस ओवर फोर मिलियन बुक्स (अगर गिनती को पाश्चात्य देश में कन्वर्ट करेंगे तो)। इतने सारे ग्रंथों का वितरण करने का संकल्प लिया हुआ है। हरि बोल! स्पेशली इस वर्ष ये सब इतने सारे ग्रंथों का वितरण एक तो हमारे पूर्ववर्ती आचार्यों की प्रसन्नता केलिए, चैतन्य महाप्रभु की प्रसन्नता के लिए और श्रील प्रभुपाद की प्रसन्नता के लिए तो जरूर ही है और साथ ही साथ गोपाल कृष्ण गोस्वामी महाराज की प्रसन्नता केलिए भी (जो ग्रन्थ वितरण क्षेत्र में, “ही वाज़ ऑलवेज नंबर वन”)। उन्हीं की प्रेरणा से भी सारे संसार में, स्पेशली भारतवर्ष में, इतने सारे लाखों/करोड़ों ग्रंथों का वितरण हुआ है। इस साल का ग्रन्थ वितरण भी गोपाल कृष्ण महाराज के चरणों में श्रद्धांजलि के रूप में रहेगा। इस वर्ष मैराथन श्रील प्रभुपाद एंड गोपाल कृष्ण महाराज की गौरव गाथा बढ़ाने हेतु भी करना है। आप तैयार हो? हरि बोल! ओके द टाइम इज़ अप। आप सब श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु के आंदोलन के सदस्य हो। हो की नहीं? हरि बोल! वैसे “संकीर्तनैक पितरों”, इस आंदोलन के फाउंडिंग फादर्स तो गौरंगा और नित्यानंद प्रभु है, ओरिजिनली।
दाऊजी का भैया कृष्ण कन्हैया!
दाऊजी का भैया कृष्ण कन्हैया!
कृष्ण कन्हैया….कृष्ण कन्हैया दाऊजी का भैया!
कृष्ण कन्हैया….दाऊ जी का भैया!
गौरंगा नित्यानंद! नित्यानंद गौरंगा!
त्रेता युग में जो प्रकट हुए थे राम और लक्ष्मण, वही द्वापर युग में कृष्ण बलराम के रूप में प्रकट होते है।
फिर वही राम-लक्ष्मण, कृष्ण-बलराम, कलियुग के प्रारंभ में “नंदनंदन जेई शची सुत होईलो सेई
बलराम होईलो निताई” वही बन जाते हैं गौरांग और नित्यानंद प्रभु। यहां तो चलता रहता है, दाऊ जी का भैया कृष्ण कन्हैया, वृंदावन में ।लेकिन आप मायापुर नवद्वीप जाओगे तो वहां क्या कहते हैं? गौरंगा नित्यानंद। तो उन्हीं का आंदोलन है जिसकी स्थापना श्रील प्रभुपाद किए १९६६ में और जिस आंदोलन के परिवार के हम सभी सदस्य है। तो रजिस्ट्रेशन इज़ ऑन,हमको संख्या बढ़ानी है सदस्यों की ताकि अधिकाधिक ग्रंथों का वितरण हो, अधिक मंदिरों का निर्माण हो,अधिकाधिक जीव भक्त बने, अधिकाधिक प्रसाद वितरण हो, अधिकाधिक उत्सव मनाए जाएंगे और फिर अधिकाधिक नगरों और ग्रामों में हरिनाम का प्रचार हो। ये सब आप को करना है।
हरि बोल! धन्यवाद!
