SB 07.02.45
15-02-2025
ISKCON Delhi

हरे कृष्ण!
ग्रंथराज श्रीमद् भागवतम की जय!
श्रील प्रभुपाद की जय!
समस्त एकत्रित भक्तवृन्द की जय!
निताई गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल!

मेरा तो स्वागत की जरूरत नहीं होते हुए भी आप कर रहे हैं। यदि यह मेरा घर है तो अपने ही घर में स्वागत की कोई जरूरत भी है? हरि हरि! किंतु आपका स्वागत है क्योंकि आप पहली बार आए हो या घर वापसी के लिए आपका स्वागत है, आप घर वापस आए दिवाली पर। हरि हरि! गोपाल कृष्ण गोस्वामी महाराज की जय! घर वापस जब मैं आता हूं तो मैं उन्हें याद करता हूं, आई मिस गोपाल कृष्ण गोस्वामी महाराज, क्योंकि इस घर में सर्वप्रथम हम २ ही थे। फिर २ के ४,फिर ४० के ४००, और अब ४००० हम सब हो रहे हैं। श्रील प्रभुपाद की जय! हम से पहले भी श्रील प्रभुपाद तो थे ही। मैं तुलना नहीं करना चाहता। स्कंध सातवां और अध्याय द्वितीय है और श्लोक संख्या ४५, यहां स्क्रीन पर है। यह श्लोक और यह अध्याय शायद मुझे नहीं कहना चाहिए या इतना ही कहना था कि हिरण्यकशिपु के भ्राताश्री थे कौन? हिरण्याक्ष, वे अब नहीं रहे।

एक स्मृति सभा जिसे शोक सभा भी कहते हैं,मेमोरियल इवेंट आयोजन किए हैं स्वयं हिरण्यकशिपु ही। वहां वे स्वयं भाषण दे रहे हैं या सभी को सांत्वना दे रहे हैं। ये सांत्वना के वचन वैसे उचित भी है और तत्वों-सिद्धांतों से इतनी मिलते-जुलते भी है। जब मेरे पिताश्री नहीं रहे तो फिर मैं गांव गया था, तो वहां मुझे जो भी रिश्तेदार है, घर के सगे-संबंधी हैं उनको संबोधित करना था। तो मैंने पता है क्या किया? मैंने उस सभा में ये हिरण्यकशिपु के वचन दोहराये। ये लोग असुर होते हुए भी, तपस्वी वगैरह होते हैं। हिरण्यकशिपु सर्वश्रेष्ठ तपस्वी थे, रावण भी बड़े पंडित थे और जरासंध बड़े दानी थे, ये गुण माने जाते हैं तपस्वी होना,ज्ञानवान होना या दानी-दानवीर होना , किंतु समस्या यह होती है कि,

“यत्करोषि यदश्न‍ासि यज्ज‍ुहोषि ददासि यत् ।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्” ॥ ( गीता ९:२७)

भगवान को अर्पित नहीं करते अपनी तपस्या का फल। वे ज्ञानी तो होते हैं लेकिन “ज्ञानवान माम प्रपद्यते”, यह नहीं करते या

“देहापत्यकलत्रादिष्वात्मसैन्येष्वसत्स्वपि ।
तेषां प्रमत्तो निधनं पश्यन्नपि न पश्यति ॥” ( भागवत २:१:४)

देखते हुए भी उन्हें दिखता नहीं है क्योंकि वे बहुत आसक्त होते हैं इसलिए सब कहते हुए भी उनको, कहीं हुई बातों का, अनुभव या साक्षात्कार नहीं होता। इस आज के श्लोक में वे कहने वाले हैं:

“न श्रोता नानुवक्तायं मुख्योऽप्यत्र महानसु: ।
यस्त्विहेन्द्रियवानात्मा स चान्य: प्राणदेहयो:” ॥ (भागवत ७:२:४५)

भगवान ही मूलतः वक्ता है और कर्ता भी है। ये सब बड़ी-बड़ी बातें कहते तो है पंडित जैसी, किंतु स्वयं को ही कर्ता मानते हैं और भाषण तो ठोकते हैं बड़ा-बड़ा।

“प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते” ॥ (गीता ३:२७)

यहां तो वे कहने वाले हैं कि हम तो कर्ता नहीं है, वक्ता नहीं है, इसलिए ऐसे लोगों का अनुगमन हम नहीं करते। ठीक है तो हम पहले श्लोक पढ़ते हैं।

“न श्रोता नानुवक्तायं मुख्योऽप्यत्र महानसु:।
यस्त्विहेन्द्रियवानात्मा स चान्य: प्राणदेहयो:॥” (७:२:४५)

न नहीं; श्रोता – सुनने वाला; न – नहीं; अनुवक्ता – बोलने वाला; अयम् – यह; मुख्यः – प्रमुख प्रधान; अपि – यद्यपि; अत्र – इस शरीर में; महान् – महान; असुः – प्राण वायु ; यः – जो; तु – लेकिन; इहा – इस शरीर में; इन्द्रिय – वान् – समस्त इन्द्रियों से उक्त; आत्मा – आत्मा; सः – वह; च – तथा; अन्यः – भिन्न; प्राण – देहयोः – प्राण वायु तथा भौतिक शरीर से। अनुवाद और तात्पर्य: श्रील प्रभुपाद के द्वारा, श्रील प्रभुपाद की जय !

अनुवाद:

शरीर में सबसे महत्वपूर्ण वस्तु प्राण है, लेकिन वह भी न तो श्रोता है और न वक्ता। यहाँ तक की प्राण से परे, आत्मा भी कुछ नहीं कर सकती, क्योंकि वास्तविक निर्देशक तो परमात्मा है, जो जीवात्मा के साथ सहयोग करते है। परमात्मा जीवात्मा के साथ सहयोग करते है। शरीर की गतिविधियों को संचालन करने वाले परमात्मा, शरीर और प्राण से भिन्न है। तात्पर्य श्रीमद् भागवत गीता १५:१५ ,कौन सा है? पढ़ रहे हो क्या? ये बहुत महत्वपूर्ण है ,याद भी कर सकते हैं, १५:१५ अब कभी नहीं भूलोगे। मैंने कुछ सेकंड बिता तो दिए, स्मरण रखो। भगवान भगवद्गीता (15.15) में स्पष्ट रूप से कहते हैं,

“सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत्त: स्मृतिर्ज्ञानं अपोहनं च:” उसका भी भाषांतर है। मैं सबके हृदय में स्थित हूं, मैं मतलब भगवान उवाच चल रहा है। मुझसे ही स्मृति, ज्ञान तथा स्मृति उत्पन्न होती है। यद्यपि आत्मा प्रत्येक भौतिक शरीर में उपस्थित है,(यहां प्रभुपाद इतना कह कर छोड़ सकते थे की आत्मा तो प्रत्येक शरीर में उपस्थित है) लेकिन इसका सबूत भी है कोई प्रमाण है? वकील जब कुछ कहते हैं तो उन्हें सपोर्ट करना होता है अपनी बात को | सभी आचार्यों की, ख़ासकर प्रभुपाद की शैली है कहो। इसी प्रकार वैसे प्रभुपाद कहा करते थे, “कृष्ण को बोलने दो खुद की लिए, तुम चुप रहो।” ऐसा भी कहने का भाव है ,कृष्ण को बोलने दो एंड यू शटअप। लोग तो भाषण देते हैं या तात्पर्य लिखते हैं, टीकाएं / भाष्य देते हैं लेकिन उन सब टीकाओं में उनके खुद के भाषण होते हैं। वे भगवान के मूल भाषण या वचनों को यथार्थ रूप नहीं रखते। वे ऐसा कहते हैं,” मुझे लगता है, मेरा विचार है”। इसी को हम जुआं या गैंबलिंग कहते है।

“मन्दा: सुमन्दमतयो”,कलयुग के लोगों का यह लक्षण भी है। संसार के या कलयुग के लोगों को गुमराह करना बड़ा आसान होता है या गुमराह किया जाता है या गुमराही को वे स्वीकार भी करते हैं मुंडी हिलाके। तो हम लोग चौथा नियम: जुआ नहीं खेलना,जुगाड़ नहीं खेलना,जिसमें मटका/ लॉटरी/ स्टॉक एक्सचेंज आदि भी आता है, ये सब तो मानसिक अटकले है। लेकिन बड़ा जुआं तो तब होता है जब लोग अपने-अपने भाष्य सुनाते है, खासकर गीता या भागवत या सारे शास्त्रों को। फिर वो भगवत गीता नहीं रह जाती ,वह गांधी गीत या राधाकृष्णन गीत बनता है या हमारे महाराष्ट्र के लोकमान्य तिलक गीत हो जाता है। गीता का रहस्य कर्मयोग वे लोग ऐसा कहेंगे । उन्होंने जो गीता प्रस्तुत की उसका शीर्षक है, “गीता रहस्य: कर्मयोग” । महात्मा गांधी कहेंगे गीता का रहस्य या सार क्या है? अहिंसा। ये गुमराही हो गई, यह धोखा हो गया, यह टीचिंग नहीं हुआ बल्कि ये चीटिंग हुआ। इसी कारण से भगवद्गीता, यथारूप नहीं रह जाती। भगवद गीता यथारूप: प्रभुपाद ने बहुत कुछ सोचकर ही इसका शीर्षक दिया, भगवद्गीता कैसी ? यथारूप। जिसमे आचार्य और प्रभुपाद भी भगवान को बोलने देते है।

प्रभुपाद जब मिलते थे, उनके दर्शनों के समय, और यदि प्रभुपाद बोलते-बोलते कोई स्टेटमेंट कहे, तो फिर हमें कहते थे,”फाइंड द रेफरेंस”। तब हरिश्योरि प्रभु या जो भी उनके असिस्टेंट रहे या मुझे भी एक दो बार कहा। फिर हम बुक्स खोलते और ढूंढते उस स्टेटमेंट को जो प्रभुपाद ने थोड़ा सा कह दिया था। फिर प्रभुपाद कहते,” यह मैं नहीं कह रहा हूँ,ये तो भगवान कह रहे हैं या किसी आचार्य ने भी कहा है या ब्रह्मा ने कहा है ब्रह्म संहिता में…लाइक दैट इट शुड बी। परंपरा में में होना चाहिए, “महाजनो एनः गतः स पन्‍थ” उन महाजनों के चरणों के अनुगमन हम कर सकते हैं। हिरण्यकश्यपु की यह भूमिका नहीं है। कुछ ज्ञान की बात कह तो रहे हैं लेकिन “ज्ञान विज्ञान सहितं ब्रह्म कर्म स्वभावचं” ज्ञान के साथ क्या होना चाहिए? विज्ञान, प्रैक्टिकल एप्लीकेशन। हरि हरि! यद्यपि आत्मा प्रत्येक भौतिक शरीर में उपस्थित है – “देहिनो अस्मिन यथा देहे” किन्तु वह इंद्रियों तथा मन इत्यादि के माध्यम से कर्म करने वाला प्रधान व्यक्ति नहीं है।कौन? आत्मा भी प्रधान व्यक्ति नहीं है।

प्राण तो है ही नहीं प्रधान, इसका उल्लेख यहां हुआ है, ‘महानसु’- प्राण वायु। आत्मा तो परमात्मा के सहयोग से ही कार्य कर सकता है, क्योंकि परमात्मा ही उसे कर्म करने या न करने का निर्देश देते हैं। और ये कहां कहे हैं? “15.15” मत्तः मतलब? मुझसे। यह भी थोड़ा-थोड़ा सीखना चाहिए, संस्कृत का थोड़ा-थोड़ा ज्ञान होने से बहुत-बहुत मदद होती है समझने में। व्याकरण को वेदांग कहा है, जैसे षड वेदांग है। संस्कृत का उच्चारण भी संस्कृत का व्याकरण भी,निरुक्ति, इटिमोलॉजी, इनको वेदांग कहा है। वेद समझने के लिए वेदांग का ज्ञान या सार, एक समय तो अनिवार्य हुआ करता था। ज़माना बदल गया लेकिन प्रभुपाद ने जिस प्रकार से श्लोक दिया है,शब्दार्थ दिया है,भाषांतर दिया है, इससे भी संकेत मिलता है कि प्रभुपाद चाहते थे कि हम संस्कृत को भी थोड़ा पढ़े,समझे और सीखे। “मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च“ फ्रॉम मी कम्स नोलेज, रिमेम्ब्रेंस एंड फोर्गेटफुलनेस – सब तो अंग्रेज़ी में कहते हैं, लेकिन यहां भगवान कहे कि सब मुझसे आता। भगवान का किसी को ज्ञान हुआ है या कोई भगवान को भूल बैठा है, ये सब स्मृति और विस्मृति किनसे आती है? भगवान से आती है। भगवान से सब कुछ आता है। “अहं सर्वस्य प्रभवः” इन शब्दों में भगवान ऐसा कहे हैं।

‘भगवान है’ इस प्रकार का ज्ञान हमको देने वाले भी कौन हैं? भगवान। और यदि कोई कहता है,’भगवान नहीं है, गौड डज़ नौट एग्ज़िस्ट’ तो भगवान की विस्मृति हो गई है उनको और ये विस्मृति किससे आती है? भगवान से ही आती है। इस प्रकार का दिमाग, “विनाश काले विपरीत बुद्धि” कहो या विस्मृति भी एक प्रकार की विपरीत बुद्धि ही है। जब हमारा विनाश होने का समय आता है अपने कर्मों के अनुसार, तो हमें भगवान को भुला देने वाले भी भगवान ही हैं। याद दिलाने वाले भगवान, भुला देने वाले भी भगवान। मैं समय समय पर कहता ही रहता हूँ। एक व्यक्ति आया अपने मित्र से मिलने के लिए, ही प्रेस्ड द बैल। घर का छोटा बालक, दे आर द फर्स्ट वन्‍स जो द्वार खोलने के लिए दौड़ते हैं।उस व्यक्ति ने पूछा – “इज़ योर फादर हियर”? बच्चा बोला,” मैं देखकर आता हूं”। बच्चा जाता है ढूंढने के लिए और बताता है अपने पिताजी को, वह आपके मित्र मिलने के लिए आये हैं। तो पिता…”ओ दैट फ्रैंड, आई डोंट वांट तो सी हिम”। ऐसा मन ही मन में वह सोचते हैं और फिर अपने पुत्र को बताते हैं कि,”उनको जाके बता दो कि मैं घर में नहीं हूँ”। बच्चा इज़ बैक एट द डोर, द्वार पर जाकर क्या कहता है कि,”मेरे पिताजी ने कहा है कि मैं यहां नहीं हूँ”। तो दुनिया में दो ही पार्टी हैं- आस्तिक और नास्तिक पार्टी। एक आम आदमी पार्टी और दूसरी आम आत्मा पार्टी।

“मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च” ‘भगवान हैं’ कहने वाले को भी कहलवाने वाले और ‘भगवान नहीं है’ ऐसा भी कहलाने वाले भगवान ही हैं। इसी को कहा है- “सर्व कारण कारणं” ही इज़ कौज़ ऑफ औल द कौज़ेज़। कौज़ एंड इफेक्ट, कार्य और कारण। कोई उनकी स्वीकृति के बिना कर्म नहीं कर सकता। क्योंकि परमात्मा,

“उपद्रष्टा तथा अनुवंता” अर्थात साक्षी और अनुमति देने वाले दोनों भी वे ही हैं। यह भगवान ने कहाँ पर कहा है? यहाँ प्रभुपाद रेफरेंस नहीं दे रहे, लेकिन क्या रेफरेंस है? मैं साक्षी हूँ और उपद्रष्टा हूँ, अनुमंता हूं। मैं परमिट करता हूं। वैसे भी किसी कार्य की पूर्णता के लिए पांच कारण होते हैं। अन्य चार कारणों के अलावा फाइनल फैक्टर कौन सा होता है? परमात्मा। परमात्मा इज़ द फाइनल फैक्टर टु क्लोज़ द डील। हरि हरि! जो व्यक्ति प्रामाणिक गुरु के निर्देशन में ध्यान से अध्ययन करता है वही इस वास्तविक ज्ञान को समझ सकता है। क्या ज्ञान? कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान ही व्यष्टि आत्मा हैं, जीवात्मा के संपूर्ण कार्यकलापों के संचालक एवं उन कार्यों के फलों के नियामक हैं। व्यष्टि और समष्टि ऐसे दो कॉन्सेप्ट है। सारी आत्माओं को मिलाकर ‘समष्टि’ कहते हैं और फिर उसमें से एक व्यष्टि आत्मा होती है,एक व्यक्ति या इंडिविजुअल। गुरु भी समष्टि और फिर व्यष्टि, जैसे ये एक गुरु, ये एक गुरु,आदि।

श्री गोपाल कृष्ण महाराज जी की जय! श्रील प्रभुपाद की जय! ये भी गुरु, फिर ये भी आचार्य,लेकिन फ़िर उनका समष्टि और व्यष्टि भी होता है, कलेक्टिव एंड दैन इंडिविजुअल। गुरु के बिना वास्तविक ज्ञान को कोई नहीं समझ सकता है, गुरु के निर्देशन पर ध्यान से अध्ययन करने पर ज्ञान प्राप्त होता है।

“आचार्यवान पुरुषो वेदा” जिस व्यक्ति के आचार्य हैं/गुरु हैं, जिसने अपने जीवन में आचार्य को अपनाया है अपने जीवन में या जो आचार्यवान है ऐसा व्यक्ति ज्ञानवान बनेगा।
“बहुनाम जन्मनामंते ज्ञानवान मां प्रपद्यंते” ज्ञानवान किसे कहते हैं? “ वासुदेव सर्वम इति” ज्ञानवान होना माने क्या होना? वासुदेवम सर्वम,मतलब वासुदेव ही सब कुछ हैं ऐसा समझना मतलब वासुदेव को समझना। इनको ज्ञानवान कहते है। परंतु ऐसे लोग कितने हैं? “स महात्मा सुदुर्लभा:” सच पर्सन्स आर वैरी वैरी रेयर।

“मनुष्याणं सहस्त्रेषु कश्चित यतति सिद्ध्ये” सिद्धि के लिए तो हजारों लाखों प्रयत्न करते रहते हैं, उनमें से कोई ही ऐसा प्रयास करता है। प्रयास करने वालों में से भी भगवान को तत्वतः जानने वाले तो दुर्लभ होते हैं। अल्टीमेटली भगवान को कैसे जानना होता है? तत्वतः, तत्व से जानना। इसमें हम साइंटिफिकलि आदि शब्दों का प्रयोग करते हैं। कृष्ण कहते हैं “जन्म कर्म च मे दिव्यं एवं यो वेत्ति तत्वतः” जो व्यक्ति मेरे जन्म मेरी लीला को कैसे जानता है? तत्वतः जानता है। जो जानता है तत्वतः, तो फ़िर क्या होगा?

“त्यक्त्वा देहम पुनर्जन्म नैति मां एति” मतलब वह मुझे प्राप्त होगा या जहां मैं रहता हूं वहां आएगा, भगवत धाम लौटेगा। उसको खुद लौटने की जरूरत नहीं है, उसको लौटाया जाएगा। सब कुछ भगवान ही करते हैं। जब भगवत धाम लौटने का समय आता है तो हमें कुछ फ्लाइट बुकिंग या ट्रेन बुकिंग ऐसा कुछ नहीं करना पड़ता है, सारी व्यवस्था भगवान ही करते हैं। हमें कुछ भी चिंता करने की जरूरत नहीं होती। ऐसे भी कहा है “ना हाथी है ना घोड़ा है, वहां कैसे जाना है?” सबको पैदल ही जाना है, पदयात्रा करते हुए ही जाना है। लेकिन शर्त क्या है? “सजन रे झूठ मत बोलो” दैन गोइंग बैक टू होम इज़ गारंटीड। यद्यपि जीवात्मा की इंद्रियां होती हैं, किन्तु वह वास्तविक स्वामी नहीं होता उन इन्द्रियों का।

स्वामी तो परमात्मा होते हैं। हमें शरीर दिया गया है और शरीर क्या है? एक बंच ऑफ सेंसेज। अलग-अलग इंद्रियों को अटैच किया है, उससे बनता है शरीर। कुछ कर्मेंद्रियां हैं, कुछ ज्ञानेंद्रियां हैं इससे शरीर बनता है। प्रभुपाद तात्पर्य लिख रहे हैं कि उस के स्वामी हम नहीं हैं। इंद्रियों के स्वामी कृष्ण हैं, जिससे कृष्ण का नाम क्या बन जाता है? ऋषिकेश। फलस्वरूप परमात्मा को ऋषिकेश कहा जाता है, ये भी याद रखो और समझो इसको कि परमात्मा का एक नाम ऋषिकेश क्यों है? यदि इस शब्द को हम समझेंगे तो जान सकते हैं कि उनको ऋषिकेश क्यों कहा जाता है? ऋषिक मतलब इंद्रियां। ऋषि और ईश: ये दो शब्द हैं, दोनों को साथ में कहेंगे तो ऋषिकेश। जैसे एक शब्द अगर राम है और दूसरा शब्द है ईश्वर, तो दोनों को साथ में कहेंगे रामेश्वर। जैसे लंदनेश्वर, पैरीश्रेश्वर,आदि प्रभुपाद ने नाम दिए।

राधा लंदनेश्वर नाम दिया प्रभुपाद ने राधा और लंदनेश्वर को। इंद्रियां तो हमारे पास हैं, हमको दी हुई हैं पर उनके स्वामी तो भगवान हैं। परमात्मा प्रत्येक जीवात्मा को यही परामर्श देते हैं कि उनकी शरण ग्रहण करके सुखी बना जाए। यह कहाँ कहा है? तुरंत प्रभुपाद लिख रहे हैं – “सर्वधर्मान् परित्यज्य मां एकम् शरणम् व्रज” यह सुखी होने का मार्ग है और इंद्रियों के जो स्वामी हैं वो है भगवान्। तो इंद्रियों को अपने स्वामी की सेवा करनी चाहिए। ऐसे ही जब इंद्रियां इन्द्रियों के स्वामी/नियामक/ नियंत्रक की सेवा करती हैं, तो ही इंद्रियां तृप्त होंगी, संतुष्ट होंगी समाधान होगा। इसी के साथ ही फेमस/प्रसिद्ध भक्तियोग की परिभाषा भी बन जाती है। भक्तियोग किसको कहते हैं?

“ऋषिकेण ऋषिकेस्य सेवनम भक्ति: उच्यते” उच्यते मतलब कहा जाता है। किसको भक्ति कहते है? जब हम इंद्रियों द्वारा इंद्रियों के स्वामी ऋषिकेश भगवान की सेवा करते हैं तब उसे कहते हैं भक्तियोग। हरि हरि! यदि ऐसा नहीं करते हैं, इंद्रियों का प्रयोग भगवान की सेवा में नहीं करते हैं, तो हम अपने खुद के शरीर की इंद्रियों तृप्ति के लिए करते हैं,सेंस ग्रेटीफिकेशन के लिए और अंततोगत्वा मनोरंजन या मन की तृप्ति के लिए करते हैं, एंटरटेनमेंट हेतु करते हैं। कई बार डिबेट होता है कि यह जीवन एंटरटेनमेंट / मनोरंजन के लिए है या एनलाइटनमेंट के लिए? अभी तो कहने वाले हो आप लोग कि एनलाइटनमेंट के लिए। लेकिन कुछ लोग के लिए एंटरटेनमेंट ही जीवन होता है, मनोरंजन ही जीवन है। हरि हरि! वैसे आत्मरंजन भी उचित नहीं है, परमात्मा रंजन ही ठीक है, याने भगवान को प्रसन्न करना है,यही उचित है।

लेकिन जो खुद का आत्म रंजन या इंद्रतृप्ति इत्यादि करते हैं तो उनका दूसरा मार्ग है,
“ध्यायतो विषयान् पुंसां“ फिर आगे क्या होता है,” संगस्तेषु उपजायते”। जब व्यक्ति ध्यान करता है, एक प्रकार के ध्यानी का उल्लेख भगवान करते हैं। इस जगत में मोस्ट ऑफ़ द पीपल क्या करते हैं?

ध्यायतों विषयान, मनुष्य क्या करते हैं? ध्यान करते हैं? किसका ध्यान करते हैं? विषयों का ध्यान करते हैं। संस्कृत के ज्ञान से समझना कितना आसान होता है। विषयान माने विषयों का, यहां बहुवचन भी चल रहा है विषयों का, बहुवचन क्यों? क्योंकि इंद्रियां भी बहुत है, पांच तो है ही और हर इंद्रिय का एक-एक विषय होता है, ऑब्जेक्ट का मेडिटेशन या ग्रिटिफिकेशन कहो। शब्द, स्पर्श ,रूप ,रस ,गंध यह पांच विषय है और भगवान ने हमको पांच इंद्रियां भी दी है। यह पांच इंद्रियां इन पांचों विषयों का ध्यान करती रहती हैं जब वे मनोरंजन करना चाहती हैं यह संसार बस पांच विषयों से भरा हुआ है। ये आपके सुपर बाजार, मॉल कल्चर इज़ हीयर। बाजार में या मॉल में यू विल फाइंड ओनली फाइव काइंड्स आफ ऑब्जेक्टस।

केवल पांच प्रकार की वस्तुएं या ऑब्जेक्ट्स होते हैं। लेकिन नाम हाट में अलग होता है। रिमाइंडर दे रहा हूं, ताकि आपको न लगे कि कैसा प्रेजेंटेशन हो रहा है? महाराज मॉल पहुंचा रहे हैं। नाम हाट में क्या होता है? एक ही होता है,केवल नाम ही होता है। “हरेरनामेव केवलम” लेकिन दुनिया वालों ने ‘बाजार हाट’ खोले हैं। नाम हाट वर्सेस बाजार हॉट। संसार भर में कितने सारे बाजार हैं वहां ये पांच प्रकार के विषयों का वितरण होता है। फिर क्या होता है?

“संग: तेषु उपजाते” विषयों का ध्यान करते ही,कुछ टेलीविजन स्क्रीन पर देखा या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया या प्रिंट मीडिया में देखा एडवरटाइजमेंट, तो देखते ही/सुनते ही हम ध्यान शुरू करते हैं। फिर ऐसे ध्यान से सेंसेज़ जब सेंस ऑब्जेक्ट का ध्यान करते है तो विषयों में जीव या व्यक्ति आसक्त होता है। नेक्स्ट फिर क्या होता है? आसक्ति से फिर कामवासना उत्पन्न होती है और काम की तृप्ति के लिए प्रयास करते हैं। अंततः आत्मा तो प्रसन्न नहीं होता। जब प्रसन्न नहीं होता या उसको यश नहीं मिलता तो क्या होता है? फील्स फ्रस्ट्रेटेड। फिर क्रोध आता है उसको। फिर क्रोध से सम्मोह या मोहित होता है। वैसे मोहित है लेकिन उसका मोह और भी बढ़ जाता है और फिर स्मृति भ्रष्ट होती है। फिर भगवान की विस्मृति हो जाती है। धीरे-धीरे हम कहां तक पहुंच गए? भगवान की विस्मृति तक, वी हैव टोटली फॉरगॉटेन कृष्ण। और फिर क्या होता है? बुद्धि नाश।

इसके बाद नेक्स्ट इज़ “बुद्धि नाशात प्रणश्यति” सिर्फ विनश्यति नहीं कहा, प्रणश्यति कहा। प्र जोड़ने से क्या हो गया? सम्यक प्रकार से या भलीभांति या बढ़िया से उसका नाश होता है। कंप्लीट डिस्ट्रक्शन एंड ही ग़ोज़ टू हेल्। तीन अलग-अलग प्रवेश द्वारों से आगे बढ़ता है ‘काम, क्रोध और लोभ’ इनको नरक की ओर ले जाने वाले गेट कहा है। लेकिन कृष्णभावनामृत आंदोलन में हम यह प्रोसेस को रिवर्स करने का अभ्यास करते है। यह सब साधना है, यह सब सिखाया/ समझाया/ बुझाया जाता है। जब हम साधुसंग में आ जाते हैं तो फिर शिक्षा गुरु/दीक्षा गुरु मार्गदर्शन करते हैं। हम लोग फिर विषयों का ध्यान करने की बजाय या विषयों का ही ध्यान होता है वैसे लेकिन विषय का प्रकार परिवर्तित होता है। इंद्रियों के जो विषय है, शब्द स्पष्ट रूप रस और गंध, उसका ध्यान करने की बजाय साधकों को भगवान से संबंधित जो शब्द है ,रूप है, राधा पार्थसारथी की जय! इनका जो रूप, शब्द,स्पर्श भी है।

“कोमलांगों श्यामलांगो” जगन्नाथ के बारे में बोला जाता है, भगवान का दर्शन करेंगे तो कैसे लगते हैं? श्यामल जगन्नाथ और अगर स्पर्श करेंगे तो?कोमल,वेरी सॉफ्ट। भगवान से संबंधित जो कई सारे शब्द हैं जिनको परब्रह्म कहा गया है, शब्द परब्रह्म। ऐसे शब्द,स्पर्श, रूप(भगवान का सौंदर्य), रस। “रसों वै स:” कृष्ण वैसे रस के ही बने हैं,” अखिल रसामृत मूर्ति, अखिल रसामृत सिंधु भी है” और सिंधु की मूर्ति भी है, भगवान का रूप भी है रस का बना हुआ। शब्द/ स्पर्श/रूप/ रस और गंध; सारे गंध के स्रोत तो भगवान ही हैं। कोई व्यक्ति अगर डाउन या एक्सxडिजेक्टेड फील कर रहा हो तो यदि वह फूल को सूंघेगा तो क्या उसपे अच्छा प्रभाव पड़ेगा। गंध तो पृथ्वी में भी है और वह गंध मैं हूं ऐसा भगवान कहते हैं भगवत गीता में। वही गंध फिर पुष्पों में भी आ जाती है या कस्तूरी में आ जाती है, वैसे भी भगवान का खुदका जो स्वरूप है वह भी सुगंधित होता है।

भगवान के लोटस हैंड, लोटस फेस, आदि हैं। (ठीक से बैठिए आप, मन की एकाग्रता के लिए अनुकूल है ही कि हम योगी की तरह बैठे,ना कि भोगी की तरह)। भगवान के सात अलग-अलग अवयवो की तुलना कमल के साथ हुई है, अभी हम नहीं कहेंगे सारे आइटम। लोटस फेस, लोटस हाथ, लोटस फीट, लोटस नेवल ,आदि। केवल लोटस की ऐसे ही उपमा नहीं दी है, दे आर लाइक लोटस। केवल देखने के लिए सुंदर नहीं है लाइक ए लोटस, किंतु स्पर्श करेंगे तो कोमल भी होते हैं। कमल कोमल होता है तो भगवान का अंग में कुछ अवयव भी कोमल हैं। कमल का और क्या वैशिष्ट्य होता है? उसकी गंध, द फ्रेगरेंस। लॉर्ड्स होल बॉडी इज़ वेरी वेरी फ्रैगरेंट। भगवान जहां भी जाते हैं सारा वातावरण बन जाता है फ्रेगरेंस से भर जाता है और उनके चले जाने पर भी वहां खुशबू बनी रहती है। कभी-कभी जटिला-कुटिला जब वहां जाते हैं राधाकुंड के तट पर, तो कहते है, इस समय हमारी बहू या नंद कहां होगी? राधा कुंड में। वह राधा कुंड में गई होगी तो उसको ढूंढते-ढूंढते खोजते-खोजते जाती हैं, कहां हो कहां हो राधे? (उनका वो भाव तो नहीं होता है जैसे षड गोस्वामियों का भाव होता है कि राधे कहां हो)

“हे राधे व्रज देविके च ललिते, हे नंद सुनो कुत:?” उनका भाव तो गोस्वामियों से अलग होता है या विचार / दृष्टिकोण / इंटेंशन इज़ डिफरेंट। तो यदि वे वहां पहुंच जाती है जहां राधारानी का कृष्ण के साथ मिलन हो रहा है, लीला संपन्न हो रही है, झूलन यात्रा हो रही हैं,तो कृष्ण इस वेरी एक्सपर्ट क्योंकि वे डिसअपीयर हो जाते है, उस स्थान से कृष्ण अदृश्य हो जाते हैं। जटिला, जो सास है,जब पहुंच जाती है,तब पहले कृष्ण तो वहां थे लेकिन जैसे पता लगता है जटिला आ रही है कृष्ण वहां से अदृश्य हो जाते हैं। तो फिर राधा कहती उनको कि,” क्यों परेशान करती रहती हो? मैं तो यहां कृष्ण से मिलने नहीं आई थी, कृष्ण तो यहां आये ही नहीं थे”। ऐसा कहने पर जटिला सूंघती है वहां की हवा। फिर बोलती कि, ” तुम ये क्या कह कही हो? यह सुगंध तो कृष्ण की है।” सुगंध से उसको पता चलता है कि कृष्ण यहां पर थे, अभी-अभी कृष्ण यहां होने ही चाहिए थे क्योंकि इतनी यह सुगंध फिर कहां से आ रही है? तो यह शब्द, स्पर्श, रूप, रस ,गंध कृष्ण से संबंधित ही यह सारे विषय भी है। तो करना क्या है? “ध्यायतो विषयान पुनसाम” इस संसार के जो शब्द है ,संसार के रूप/रस/ गंध/शब्द/ स्पर्श हैं,इनके बजाय(इनको मारो गोली कहो) या इनके स्थान पर कृष्ण का शब्द/ स्पर्श/ रूप/ रस/गंध इनका ध्यान करने से “ध्यायतो विषयान पुनसाम संगशतेशु उपजायते” इन विषयों में हम जुड़ेंगे जो आध्यात्मिक, दिव्य, अलौकिक विषय है ,कृष्ण से संबंधित विषय है। आसक्ति नाम का एक भक्ति का स्तर भी है।

श्रद्धा से कहां तक? प्रेम तक, जिसमें अलग-अलग सोपान है। उनमें से एक ऊंचा सोपान/ सीढ़ी/ स्तर है तो उसे आसक्ति कहते हैं। ये दिव्य अलौकिक संग़ से क्या होगा? ” संगात संजायतें प्रेम:” प्रेम उत्पन्न होगा,काम उत्पन्न नहीं होगा, काम जागृत नहीं होगा,प्रेम जागृत होगा। और वहां क्या था? “कामात क्रोधो भिजायते” इस से क्रोध जागेगा। लेकिन प्रेमात? प्रेम जागेगा, क्रोध नहीं आएगा। “वीतराग भय क्रोध:” हम लोग मुक्त होंगे सांसारिक क्रोध से। या क्रोध आता भी है तो जब किसी ने विष्णु या वैष्णव के चरणों में अपराध किया। उस प्रकार का क्रोध आएगा जैसे हनुमान क्रोधित थे या भगवान पार्थसारथी ने ही अर्जुन को उपदेश सुना करके क्रोध को जगा दिया। अर्जुन पहले अहिंसक बनना चाह रहे थे, महात्मा गांधी की तरह अहिंसक या उनकी जो समझ थी। भगवान ने कहा, “तस्ममातसर्वेशु कालेषु ,माम अनुस्मर युद्ध च” तुम्हें युद्ध करना है। व्हाट इस द टास्क? उनको भगवान का स्मरण भी करना है।

भगवान का स्मरण करते हुए, “मम अनुस्मार युद्ध च “,’च’ क्या मतलब क्या होता है? च मतलब और। अतः दो कार्य साथ में करने हैं- माम अनुस्वार याने भगवान का स्मरण भी करना है और साथ ही साथ युद्ध भी करना है। भगवान से प्रेम भी करना है और साथ ही साथ क्रोध करना है। दुर्योधन दुशासन… नाम भी देखो क्या है? हरि हरि! ‘दुश’ मतलब नॉट गुड। और फिर “कामात क्रोधोभिजायते” तो यहां ‘प्रेमात’ याने प्रेम से और भी प्रेम उत्पन्न होना चाहिए। या क्रोध उत्पन्न होता भी है तो जस्टिफिकेशन हो कि कोई आध्यात्मिक दिव्य कारण के लिए,हम क्रोधित भी हो सकते हैं। अगर भौतिक क्रोध है तो क्या होगा? “क्रोधात भवति सम्मोह”। लेकिन दिव्य क्रोध, दिव्यानंद या प्रेम का अनुभव करेंगे तो मोह से मुक्त होंगे। जैसे हरे कृष्ण मूवमेंट एक प्रकार का जाल फैलाती है, हम लोग को मोहित करती है, कृष्ण से मोहित करती है। कृष्ण भी मोहन है और कृष्ण को भी मोहित करती है राधा रानी ,मदनमोहन मोहिनी बन जाती है। तो दिव्य मोह भी है, भौतिक मोह के बजाय अगर हम अप्राकृतिक/दिव्य मोह से आकृष्ट होंगे, आसक्त/लिप्त होंगे तो ये अच्छा है। और फिर आगे क्या है? “बुद्धि नाशात” सांसारिक प्रक्रिया हो रही है, ध्यान से लेकर के नाश तक, अगर ये सारी प्रक्रिया अगर स्पिरिचुअल / आध्यात्मिक/ अलौकिक है तो क्या होने वाला है? मैंने कहा ही था कि हमारा विनाश नहीं होने वाला है, हमारा क्या होगा? हमारा विकास होने वाला है। विनाश के विपरीत और भी कुछ शब्द हो सकते हैं लेकिन, विनाश और विकास का साथ है ना। विनाश नहीं होगा,क्या होगा? विकास होगा। “सब के साथ, हमारा हाथ” तो विकास के लिए बुद्धि की आवश्यकता है, लेकिन जब विनाश का समय आता है तो ”विनाश काले विपरीत बुद्धि”। लेकिन जब हमारे विकास का समय आता है, भगवान हमें भाग्यवान बनाते हैं, “ब्रह्मांड भ्रमिते कौन भाग्यवान जीव गुरु कृष्ण प्रसादे पाए भक्तिलता बीज” गुरु के पास, हरे कृष्ण मूवमेंट के पास, भक्तों के संग में हमको लाया जाता है, यहां पर हमें बुद्धि प्राप्त होती है। स्वयं भगवान हमको स्बुद्धि देते हैं।

“तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते” ॥ १० ॥

जो भी साधक सतत कर रहे हैं। देखिए, सतत शब्द कितना महत्वपूर्ण है। इनके बीच में कोई रिक्त स्थान नहीं है। सतत मतलब लगातार। “तेशाम सतत युक्तनाम” और कैसे युक्त है? “भजताम प्रीति पूर्वकम”, जो प्रीतिपूर्वक सारी साधना भक्ति में, सेवा में युक्त है, ऐसी व्यक्ति को भगवान कहते हैं, “ददामि बुद्धि योगम त्वं“ ददामि, तो क्रिया हुई, तो इसका सर्वनाम क्या होगा? जैसे अहं नमामि होता है न या अहं गच्छामि जैसे शब्द। यहां अहं मतलब भगवान ही है, पर अहम शब्द का उपयोग नहीं किया है। इस वाक्य या श्लोक में अहं नहीं आया है,किन्तु ददामि कहा है तो ददामि कहने वाले तो स्वयं भगवान ही हैं। उन्होंने कहा नहीं है किन्‍तु कहा जा भी सकता था यदि इसको पद्य का गद्य बनाते हम या पोयट्री का प्रोज़ बनाएंगे हैं तो वहां अहं शब्द आएगा। कृष्ण स्वयं कह रहे “अहं ददामि बुद्धियोगम्” मैं बुद्धि दूँगा, आई विल गिव यू इंटेलिजेंस।

“मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च” मैं उसे ज्ञान दूंगा, स्मृति दूंगा, विस्मृति नहीं दूंगा, जिस ज्ञान और स्मृति का उपयोग,

“तं येन मामुपयान्ति ते” तो ऐसा श्रोता यानि ऐसा व्यक्ति जो “तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्” कर रहा है – उसका “येन मामुपयान्ति ते” हो। “उप’ माने निकट,पास जैसे उपवास होता है। एकादशी के दिन हम क्या करते हैं? उपवास करते हैं,मतलब निकट वास। भगवान के निकट वास करने का दिन एकादशी होता है। उप मतलब नियर,ऐसे कई शब्द हैं। उपयान्‍ति, “उप” माने पास, “या” माने गो। “या” एक क्रिया है जिसका अर्थ होता है जाना। कईयों को जाना है इसलिए “याति” नहीं “यान्ति” हो जाता है। ते यान्ति मतलब वे जाते हैं। कहां जाते हैं? माम्- मेरे पास आते हैं या मैं जहां रहता हूँ वे वहां आते हैं। और ऐसी बुद्धि मैं देता हूँ, “ददामि बुद्धियोगं”। वहां तो “बुद्धि नाशात् प्रणश्यन्‍ति”, दे गो टू हेल,बुद्धि का नाश हो जाता है, अधः पतन हो जाता है, अधम बन जाते हैं और इस जगह तो जो साधक है उसकी भक्ति/ साधना के सातत्य के परिणामस्वरूप उसे भगवान बुद्धि देते हैं। ये नहीं कि भगवान स्वयं बात करने वाले हैं, वे हमारे ह्रदय में भी हैं, परमात्मा हैं। वे स्फूर्ति दे सकते हैं –

“सदा हृदय कंदरे स्फूर्तवा सचिनंदन:” – ऐसा कृष्ण दास कविराज गोस्वामी भी कहे है, लिखे हैं मंगलाचरण में चैतन्य चरितामृत में। आप सब के हृदय प्रांगण में शचिनन्‍दन भी हैं, नन्‍दनन्‍दन हैं, वे आप सबको स्फूर्ति देते रहें। हरि हरि! और यदि हमें भगवान की दी हुई स्फूर्ति सुनाई नहीं दे रही है, ऐसा भी होता है, तो हमें क्या करना चाहिए?

“बोधयन्‍तः परस्परम्”
“कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च”
या ये भी है “गुह्यमाख्याति पृच्छति” या यह भी है “ददाति प्रतिगृह्णाति”

“भुङ्क्ते भोजयते चैव षड्विधं प्रीतिलक्षणम् “ तो हम बुद्धि औरों से भी, भक्तों से भी प्राप्त कर सकते हैं। और हम जो थोड़ा बुद्धु चल रहे हैं, हमारा दिमाग काम नहीं कर रहा है तो काउंसलिंग वगेरह इस प्रकार भक्तों के संग में। ऑफ कोर्स हम सभी के लिए प्रभुपाद हमें बुद्धि दे रहे हैं, सारे संसार को बुद्धि दे रहे हैं श्रील प्रभुपाद। सारी बुद्धिमत्ता की बातें सुबह प्रातःकाल जागते हुए दी हैं। जब मंदिर लाजपत नगर में था, 21A लाजपत नगर यह एड्रेस था, क्या आपको पता है? उस साल की राधाष्टमी के लिए प्रभुपाद राधा पार्थसारथी मंदिर आये थे। लाजपत नगर आए थे, हैदराबाद से आये थे। और उस समय मंदिर क्या, 500 गज़ में बनी कोठी में इस्कॉन था और उसमें से आधा ही हमारे पास था। आप कल्पना कर सकते हैं कि 2 फ्लोर वाली कोठी है, ग्राउंड फ्लोर और फर्स्ट फ्लोर।

आधा हमारे पास और आधा मालिक के पास। एक सरदार जी थे- क्या नाम था? वह रहते थे। प्रभुपाद जब आये थे राधा अष्टमी को उत्सव में सम्मिलित होने को, तब प्रभुपाद हमारे साथ ही रहे उसी बिल्डिंग में रहे। सच ए हंबल अबोर्ड या रेजिडेंस में प्रभुपाद रहे। वहां पर भी हमने अनुभव किया अर्धरात्रि के समय हम तो सो गये पर प्रभुपाद विश्राम किये, हम तो सोते रहे पर प्रभुपाद मध्य रात्रि को जग जाते, मध्य रात्रि के पहले ही जग जाते और अपने सारे डिक्टेशन और ट्रांसलेशन कार्य किया करते थे। ट्रांसलेशन करते करते प्रभुपाद बाहर आए तो सर्दी की कुछ शुरुआत हो गयी थी। मध्य रात्रि को थोड़ी ठंडी हो जाती है। प्रभुपाद बाहर आए तो उन्होंने देखा कि कई सारे भक्त छत पर ऐसे ही लेटे हुए हैं- न तो कोई बोरी, न तो कोई बिस्तर, न कम्बल, नथिंग इज़ देयर। प्रभुपाद बोले, क्यों व्यवस्था नहीं हुई है,उनके पास कंबल क्यों नहीं हैं? सौभाग्य से मैं उस समय प्रेसिडैंट नहीं था, नहीं तो मेरा गला पकड़ते। हरि हरि! वहां तक प्रभुपाद आते रहे,उन्होंने शुरू किया था……बंगाली मार्केट से पहले भी वह क्या जगह थी? आनंद निकेतन – हाँ हाँ, आनंद निकेतन। जब पहली बार …..फोर्गेट इट…. आपको क्या बताऊं। हम अनुभव कर रहे हैं कुछ नाम भूल रहे हैं। आनंद निकेतन, वास्तव में राधा पार्थसारथी की स्थापना आनंद निकेतन में ही हुई। 1972 में हुई न? हां 1972 में हुई। तो वहां भी एक छोटी सी कोठी में ही आरम्भ हुआ,फिर राधा पार्थसारथी बंगाली मार्केट आए, फिर वहां से बाबा टोडरमल लेन लाए गए। वहां पर भी दो लोकेशन पर राधा पार्थसारथी कुछ समय के लिए रहे,फिर वहां से लाजपत नगर स्थानांतरित हुए। और वहां से फिर M119, ग्रेटर कैलाश, नंबर 1, 2, 3? नंबर 1 में।

भगवान किराये के मकान में रहते थे। यह अच्छा था क्या? नहीं यह अच्छा नहीं था पूरी तरह से, एम 119 ग्रेटर कैलाश 1 में परम पूज्य गोपाल कृष्ण महाराज (बीबीटी के ट्रस्टी तो थे ही) नें लीडरशिप ली। हमनें 8 लाख का ग्रांट ले लिया बीबीटी से,गोपाल कृष्ण महाराज व्यवस्था किये। मैं प्रेसिडेंट था और महाराज जीबीसी थे, और साथ ही बीबीटी ट्रस्टी भी। तो पहली बार भगवान ग्रेटर कैलाश में खुद की कोठी में थे। खुद की कोठी में थे। फिर फाइनली बहुत खोज भूमि के लिए, फाइव-टेन इयर्स, यह स्थान हमको दिखाया गया। तो उस समय इसका हाल क्या था…क्या कहना, नहीं कहना ही अच्छा है। उन दिनो में – आजकल तो मोदी हर परिवार के लिए टॉयलेट वगैरह….उस समय तो कॉमन टॉयलेट था… बाकी निवासियों के लिए ओपन टॉयलेट था। तो हम जब यहां पहुँचे थे तो डीडीए की अथॉरिटी हमको भूमि दिखाने के लिए लाये थे, तो यहां पैर रखने की भी जगह नहीं थी… सब समझ गये। हरि हरि! तो फाइनली थोड़ा जंगल भी था, उसका भी मंगल हुआ। आई थिंक जस्ट उन दिनों में डीडीए का एक एकड़ का एक लाख कुछ मूल्य होता था, अचानक मूल्य बढ़ा दिया गया, शायद आठ लाख ऐसे कुछ हो गई। तो यह तीन एकड़ भूमि को 24 लाख के आसपास में खरीदा गया। अब हम सोच भी नहीं सकते कि क्या प्राइस चल रहे हैं? हरि हरि! फिर यहां भूमि पूजन हुआ सब हुआ, वैसे ये टेंपल ओपनिंग एक ऑफरिंग की तरह थी क्योंकि श्रील प्रभुपाद की जन्म शताब्दी हम मना रहे थे। तो 1996 में हमें ओपनिंग करने का कुछ संकल्प/ इच्छा तो थी लेकिन हुआ नहीं, तब फाइनली 1998 में रामनवमी के दिन अटल बिहारी वाजपेई(जो अभी-अभी प्रधानमंत्री बने थे कुछ दिन पहले), उनका प्रथम जनसामान्य के साथ साक्षात्कार हुआ,और वो क्या हुआ? राधा पार्थसारथी टेंपल ओपनिंग और इस ऑडिटोरियम में कई सारी व्यवस्था श्री गोपाल कृष्ण महाराज ने की, हीं वाज़ अ बिग पी.आर.।

इस्कॉन के पी.आर. को संभालने वाले भी वही थे। गवर्नमेंट रिलेशन ,मिनिस्टर, प्राइम मिनिस्टर, प्रेसिडेंट को कल्टीवेट करना आदि भी। मुझे भी अपने साथ ही ले जाते थे, वो ही आगे होते थे। अंत में श्री अटल बिहारी वाजपेई मान गए और “ राधा पार्थसारथी की जय!” तो राधा पार्थसारथी की स्थापना हुई, टेंपल ओपनिंग हुआ, आप में से कोई थे? अच्छा आप थे,मोहन रूपा प्रभु भी ऑफ कोर्स थे, और इनके अलावा कोई और? कहां थे आप? हरि हरि! तुम भी थे पाञ्चजन्य? मैं 1978 के जुलाई महीने की 8 तारीख को,जहां तक मुझे याद है, यहां मुझे पहुंचाया गया था, गोपाल कृष्ण महाराज जी ने मुझे पहुंचाया। उस दिन मुझे न्यू दिल्ली टेंपल इस्कॉन का अध्यक्ष बनाया गया,तब से हम साथ में रहे। पहले बंबई में थे और बाद में फिर बंबई में। इस प्रकार हम साथ में थे प्रभुपाद की इच्छा से, श्रील प्रभुपाद की जय! प्रभुपाद की प्रसन्नता के लिए इतना सारा समय हम साथ में थे जैसे ब्रदर्स, एक ही परिवार के थे। इसमें कोई अचरज वाली बात भी नहीं है।

1974-75 गोपाल कृष्ण महाराज को प्रभुपाद स्वयं कनाडा से इंडिया ले आए और यहां लाते ही उन्हें पूरे भारत का जीबीसी बनाया। उस समय जो कॉरेस्पोंडेंस चल रहा था गोपाल कृष्ण महाराज और प्रभुपाद के मध्य में, उसमें से एक पत्र में प्रभुपाद ने लिखे थे कि दिल्ली में बहुत दिनों से कोई नया मंदिर या कुछ विशेष ऐसा कुछ नहीं बना है, बस ये टाटा बिरला, नॉट टाटा, पर बिरला मंदिर तो हैं,इसका उल्लेख भी किए थे। पर इसके अलावा कोई दमदार ऐसा कोई मंदिर नहीं बना है, तो तुम बनाओ दिल्ली में मंदिर। ऐसा आदेश कहो या ऐसी इच्छा व्यक्त किए थे प्रभुपाद, गोपाल कृष्ण महाराज से ऐसी अपेक्षा थी। तो एक मंदिर तो बना ही लिए महाराज और जाते-जाते और भी दस-बीस मंदिर बनाए दिल्ली एन. सी.आर. में। 19 टेम्पल्स ओके, सही करने के लिए धन्यवाद! फ़िर ब्यूरो मीटिंग के लिए गए थे देहरादून। एक-दो दिन पहले, महाराज के प्रयाण के पहले, जाते-जाते वहां एक और मंदिर के लिए भूमि पूजा करके गए थे महाराज। देहरादून इस्कॉन टेंपल की भूमि पूजा करके महाराज आगे बढ़े। हरि हरि!

गोपाल कृष्ण गोस्वामी महाराज की जय!
श्रील प्रभुपाद की जय!
श्री राधा पार्थसारथी की जय!
गौर भक्त वृंद की जय!
आप सबकी भी जय! जय जय हो!

आप थोड़ा लेट आए, आज नहीं, जब भी आप ज्वॉइन किए, हरे कृष्ण मूवमेंट में आए, जैसा कहते है कि “बैटर लेट दैन नेवर”। तो आपके इस्कॉन में प्रवेश के लिए और सक्रिय योगदान के लिए हम अपनी प्रसन्नता व्यक्त करते हैं और आपका अभिनंदन करते हैं।
गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल!