Srila Prabhupada
08-04-2025
ISKCON Rohini

हरि हरि! तो देख लेते हैं। कृष्ण चैतन्य! देख लेते हैं मेरे गले का क्या हाल है? आप सभी उपस्थित भक्तों का पुनः स्वागत है। कल भी हुआ था यदि आप कल थे। फिर मैं सोच रहा था कि वैसे यहां प्रातः कालीन श्रृंगार दर्शन की जय!
श्रील प्रभुपाद व्यास पूजा की जय!
नॉट व्यास पूजा, गुरु पूजा की जय!
और भागवत कक्षा की जय!

इसमें जो उपस्थित रहने वाले भक्त होते हैं जैसे आप आज हो, आप विशेष भक्त हो, यू आर वेरी स्पेशल डिवोटीज, क्या आप सहमत हो? आप भगवान को,
“मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये” सुनाई दे रहा है पीछे ठीक से? इज़ एवरीथिंग ओके? माताएं सुनना चाहती हो? फिर नहीं सुनाई देता है तब भी चलेगा यदि सुनना ही नहीं चाहती हैं। हजारों में, मनुष्याणां सहस्रेषु मतलब हजारों-हजारों हज़ार में नहीं हजारों में, सहस्रेषु बहुवचन में कहा है। हजारों में एक, “कश्चित यतति सिद्धये”- सिद्धि के लिए हजारों में से कोई विरला व्यक्ति ही सिद्धि के लिए प्रयास करता है। हरि हरि! ( इको है क्या?कोई है क्या? समवन हु कैन लुक इन टु दिस) और फिर उन प्रयास करने वाले जो विरले ही होते हैं फिर उनमें से

‘मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये’ यतताम प्रयास करने वाले में से, यततामपि सिद्धानां सिद्ध होने का जो प्रयास कर रहे हैं, प्रयत्नशील है फिर उनमें से भी कुछ ही होते हैं कुछ/ कश्चिद् जो क्या करते हैं? भगवान को कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः: मुझे, मुझे मतलब मुझे नहीं, कौन कह रहे है? श्रीभगवान् उवाच : तत्त्वत: कृष्ण कह रहे हैं तो यह कश्चित माम् वेत्ति तत्त्वत:, माम वेत्ति मतलब मुझे जानते हैं। कैसे जानते हैं? तत्त्वतः:। ऐसे फिर और भी विरले होते हैं। तो फिर आप वे भक्त हो गए, जो उस श्रेणी के हो जो भगवान को तत्वतः जानने के लिए यहां उपस्थित हो चुके हो। कुछ पल्ले पड़ रहा है? हरि हरि!

एनीवे आई ऐम सप्पोज्ड टू बी रीडिंग आल्सो, तो श्रील प्रभुपाद ने, श्रील प्रभुपाद की जय! सारे संसार को भगवान को समझाया तत्त्वत:, भगवत तत्व भी समझाया और भगवान को तत्त्वत: समझना अनिवार्य होता है। वैसे तो हम राम कथा/ कृष्ण कथा नानी-नाना से सुनते ही रहते हैं। हरि हरि! किन्तु इस कथा को इस लीला को, भगवान के तत्व को तो हम आचार्यों से ही समझ सकते हैं।

“आचार्यवान पुरुषो वेद”, नो स्लीपिंग, सीधे बैठिए, बी अलर्ट। इसके लिए भी प्रभुपाद प्रसिद्ध रहे।

“एबे यश घुसुक त्रिभुवन” सारे त्रिभुवनों में श्रील प्रभुपाद की ख्याति प्रसिद्ध है या हमको और और फैलानी है प्रभुपाद की ख्याति या महिमा कहो। श्रील प्रभुपाद की जय! पता नहीं यहां क्या मैं पढ़ने जा रहा हूं? मैं और कुछ सोच तो रहा था। हां श्रील प्रभुपाद ने कहना जारी रखा आध्यात्मिक जीवन सबसे सौभाग्यशाली जीवन होता है। क्या कहे प्रभुपाद? आध्यात्मिक जीवन सबसे सौभाग्यशाली है, इसको आप याद रखोगे? हरि हरि! जब हम सुनते हैं, उसका फिर हमें चिंतन या मनन भी करना होता है। तब सुनी हुई बातें फिर हमारी प्रॉपर्टी बन जाती है या हमारी संपत्ति बन जाती है। हरि हरि! सामने फर्श पर बैठे हुए भक्तों पर उन्होंने गहरी दृष्टि डाली। सामने जो भक्त बैठे थे जैसे आप बैठे हो, प्रभुपाद ने गहरी दृष्टि डाली।

गहरी दृष्टि याने गौर से देखा या ध्यानपूर्वक देखा। ऐसे ही प्रभुपाद दृष्टि डाल रहे थे हम भक्तों या शिष्यों पर,जो अभी-अभी हम बंबई से पधारे थे ये 1972 की बात है। हम राधा दामोदर मंदिर पहुंचे थे, उस वर्ष के और इस्कॉन के पहले कार्तिक व्रत या महोत्सव में हमें सम्मिलित होना था,जिसके लिए प्रभुपाद ने हमें आमंत्रित किया था। यह सौभाग्य की बात, ये हमारे सौभाग्य की बात थी तो जैसे ही हम प्रभुपाद के कक्ष में पहुंचे, प्रभुपाद का कमरा जानते हो? राधा दामोदर मंदिर देखा है? और मैंने जीवन में वृंदावन का पहला मंदिर जो देखा वो राधा दामोदर ही था और वो भी राधा दामोदर महीने में मास में, कृष्ण चैतन्य! तो श्रील प्रभुपाद के कक्ष में हम पहुंचे और एक तो जो सादा जीवन/ सिंपल लिविंग श्रील प्रभुपाद कर रहे थे, क्या कहा जाए? आई वास शॉक्ड, छोटा सा कक्ष या कमरा था, मुंबई से आए हुए हम 10-15 भक्त जब वहां बैठ गए तो कमरा फुल हो गया/ हाउसफुल।

दैट वास द साइज ऑफ द रूम और प्रभुपाद का ये आसन तो भूल जाओ, बस एक छोटे-से गद्दे पर, में बी ए फ्यू इंचेस हाइ, प्रभुपाद वहां बैठे थे। मुझे कहना तो यह था संक्षेप में, तो हम जब बैठे प्रभुपाद ने जो गहरी दृष्टि डाली ये जब पढ़ा तो मुझे याद आया कि प्रभुपाद हम सभी उपस्थित मुंबई से पधारे हुए शिष्यों पर गहरी दृष्टि डाल रहे थे या कृपा दृष्टि भी डाल रहे थे कहो या कृपा दृष्टि की वृष्टि कर रहे थे हम सभी पर। हरि हरि! तो प्रभुपाद ध्यानपूर्वक गहराई यहां पे शब्द उपयोग हुआ गहराई, तो गहरी दृष्टि से देख रहे थे तो हम सभी की ओर गहरी दृष्टि से, हमारी दृष्टि तुम पर भी जा रही है।

मैं प्रभुपाद के सामने और बीच में बैठा था तो प्रभुपाद देखते हुए,एक शिष्य को देखा, दूसरे को देखा, तीसरे को देखा फिर जब मुझे देखने की बारी आती थी तो प्रभुपाद थोड़ा रुक जाते थे और ऐसा हाथ का उपयोग करते थे तो उनकी दृष्टि थोड़ी और गहरी हो जाती और मुझ पर स्थिर हो जाती उनकी दृष्टि। फिर वे आगे बढ़ते तो प्रभुपाद का हेड एंड होल्ड थिंग वाज़ लाइक अ कैमरा/ मूविंग कैमरा। जब जब मुझे देखने की बारी आती तो प्रभुपाद हल्का सा रुकते, ही यूज़्ड टू टेक पॉज एंड देन प्रोसीड, तो ये कई बार हुआ तो मैं सोच रहा था क्या, हो क्या रहा है? क्या मैंने तिलक नहीं पहना हुआ है? कि मेरे बटन ठीक नहीं है? व्हाट इज गोइंग ऑन? हरि हरि! मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा था या तब तक मुझे समझ में नहीं आया जब तक प्रभुपाद ने नहीं कहा,” स्टॉप इट!”, इसको रोको। तो उन दिनों में ऐसी और भी कुछ लोगों की /मनुष्यों की आदत होती है, वैसी मेरी भी थी। वहां बैठे-बैठे जब मैं ध्यानपूर्वक कुछ बात को सुनता तो मैं अपने को ऐसे हिलता था या इसको मैं हिलाता था, एंड आई वास वायलेंटली शेकिंग माय थाई । मुझे तो पता नहीं था, कभी मैं सोचता ही नहीं था। बट फोर प्रभुपाद इट वास सम काइंड ऑफ डिस्टरबेंस, तो प्रभुपाद कहे स्टॉप इट, स्टॉप इट। हरि हरि! ना जाने कितने वर्षों से मैं वो करता ही आ रहा था, कर ही रहा था लेकिन जब से प्रभुपाद ने कहा तब से आई स्टॉपड इट फॉर फॉर ऑल द टाइम। इसके बाद पहले, या आज ही या जब-जब मैं बोलता हूं इस विषय पर तो थोड़ा डेमोंस्ट्रेशन चलता है कुछ-कुछ क्षणों के लिए। हरि हरि! तो इस पर फिर आगे व्याख्या भी है, जब मैं यह कहता हूं तो गुरु के दो प्रकार के आदेश होते हैं। डू इट- इसको विधि कहते हैं, एक विधि होती है और दूसरे होते हैं- निषेध। निषिद्ध बात है- डू दिस, डोंट डू इट।

मैंने सोचा कि मेरे साथ प्रभुपाद ने “डोंट डू” से शुरुआत की। वैसे दिस वाज़ माइ- मेरी पहली मुलाकात थी प्रभुपाद के साथ। मैंने पहले तो प्रभुपाद को खूब देखा था, सुना था मुंबई में। लेकिन आमने-सामने और वैसे उस समय श्रील प्रभुपाद के साथ मेरा संबंध भी स्थापित होना था। मैं उनका शिष्य बनने वाला था उसी कार्तिक मास में। हमारे मुंबई के टेंपल प्रेसिडेंट गिरिराज प्रभु ने मुझे लेटर ऑफ रिकमेंडेशन भी दिया था, इनिशिएशन के लिए। तो उसको भी लेकर बैठा था। उनको वो भी देना ही था, लाइक दैट एंड इट वाज़ आर फर्स्ट टाइम। क्या हुआ? फिर दीक्षा भी हुई और देन वही राधा दामोदर मंदिर में ही या राधा दामोदर के कोर्ट यार्ड -साइड बगल वाले कोर्ट यार्ड में जहां रूप गोस्वामी की समाधि और भजन कुटीर के बीच में हम बैठा करते थे और प्रभुपाद आगे थोड़ा-सा हल्का-सा प्लेटफार्म था, बिल्ड प्लेटफार्म वहां फिर पुन: छोटे से आसन पर प्रभुपाद बैठा करते थे और उस दिन भी बैठे थे। उस दिन मुझे विधि प्रभुपाद ने सुनाई- चांट 16 राउंड, मिनिमम 16 राउंड डेली। तो उसी दिन “ये करो और यह मत करो’ दोनों ही थे।

“नमः ॐ विष्णु-पादाय कृष्ण-प्रेष्ठाय भूतले,
श्रीमते भक्ति वेदांत-स्वामिन इति नामिने।
नमस्ते सारस्वते देवे गौर-वाणी-प्रचारिणे,
निर्विशेष-शून्यवादी-पाश्चात्य-देश-तारिणे”

आई सपोज़, मैं सोच ही रहा था कि ये “जय राधा माधव” भजन या गीत को गाया जाए या नहीं गाया जाए। मैं सोच रहा था कि मुझे भागवत कक्षा तो नहीं देनी है लेकिन फिर मैंने गा ही डाला क्योंकि मैं सोच रहा था। तो प्रभुपाद भी भागवत रहे, ही वाज़ भागवत, “नित्यम भागवत सेवया” जहां यह उल्लेख होता है प्रथम स्कंध में सूत गोस्वामी कहते हैं तो वहां प्रभुपाद लिखते हैं भागवत दो तरह के हैं – ग्रंथ भागवत और व्यक्ति भागवत। भागवत मतलब जो भगवान से संबंधित उसको भागवत कहते हैं। भागवत, ये जो शब्द है, इट्स रिलेटेड विद द लॉर्ड। तो ग्रन्थ भागवत भी भगवान से संबंधित है। श्रील प्रभुपाद की जय!

श्रील प्रभुपाद जैसे भक्त भी आचार्य भी वैसे वे तो तदीय है या मदीय है तो वे भागवत है। उनकी कथा,जैसे आप हर एकादशी को प्रभुपाद की कथा करते हो, तो यह भी भागवत कथा ही है। श्रील प्रभुपाद महा भागवत प्रभुपाद की जय! तो “कृष्ण प्रेष्ठाय भूतले”, प्रभुपाद कैसे हैं? कृष्णप्रेष्ठ और प्रेष्ठ मतलब क्या? प्रिय। यू हैव टू नोट दिस, ये छोटी-छोटी बातें कोई मोटी बात नहीं है,हमको पता होनी चाहिए। हम जो गाते हैं/ कहते हैं या उनसे हमें परिचित भी होना चाहिए हम क्या गा रहे हैं? या क्या कहा जा रहा है? मैं ही कह रहा हूं

“नमः ॐ विष्णु-पादाय कृष्ण-प्रेष्ठाय – वेरी डियर टू कृष्ण/ कृष्ण प्रेष्ठ। प्रभुपाद कैसे रहे? कृष्ण प्रेष्ठाय, कृष्ण प्रेष्ठ रहे मतलब ये प्रिय रहे। “तुलसी कृष्ण प्रेयसी नमो नमः” जैसे तुलसी प्रिय या प्रिया होती है तो प्रभुपाद भी ऐसे ही प्रिय रहे, भगवान के प्रिय और उसमें भी गौर भगवान के वे प्रिय रहे इसलिए गौरांग महाप्रभु कहा करते थे,” मोर सेनापति भक्त”, यहां मोर मतलब मयूर नहीं, नॉट पीकॉक। मोर मतलब मेरे/ माइ/ मेरे सेनापति भक्त, श्रील प्रभुपाद की जय। ऐसा हम लोग समझ चुके हैं कि इसको शास्त्रों में,शायद चैतन्य मंगल में भी उल्लेख हुआ है कि मेरा सेनापति भक्त आयेंगा। वो सेनापति भक्त श्रील प्रभुपाद थे, सेनापति भक्त थे, याने कमांडर इन चीफ ऑफ द संकीर्तन आर्मी। यदि वे थे या हैं ही सेनापति तो फिर सेना कौन है? हम उनके कौन हैं? हम उनकी सेना हैं। श्रील प्रभुपाद सेना की जय! आप सैनिक हो, हरि हरि! श्रील प्रभुपाद भगवान को प्रिय है और श्रील प्रभुपाद ने हमको उनकी सेना बनाया। इस प्रकार फिर हम भगवान के भी प्रिय हो जाते हैं।

“नमस्ते सारस्वते देवे गौर-वाणी-प्रचारिणे” मैं सोच रहा था शायद आज का यही श्लोक है। नमो: ओम, ये प्रणाम मंत्र है, दिस इज द श्लोका फॉर द डे, आज प्रातःकाल का। मैं शायद सोच रहा था तो “नमस्ते” मतलब नम:+ते, ऐसे दो शब्द है उसको साथ में कहने से क्या होता है? संधि के साथ नमस्ते होता है। अन टू यू, हम नमस्कार करते हैं, यू या आपको।

“नमस्ते सारस्वते देवे”, आप भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर के शिष्य रहे, उसी को क्या कहा है? नमस्ते सारस्वते देवे, तो ऐसा आप सबको कहना भी होगा, हम नहीं कहते, हम तो सरस्वती कहते हैं लेकिन वो सरस्वती नहीं है। वैसे हैं भक्तिसिद्धांत सरस्वती ही, फिर सरस्वती का ‘सारस्वते’ होता है संस्कृत में, चतुर्थी में जब नमस्कार की बात होती है, तो सरस्वती का सारस्वते होता है। वैसे श्रील प्रभुपाद को स्वयं अपने शिष्यों को सुधारना पड़ा। थिस इज़ इन राइटिंग, प्रभुपाद ने लिखा,”नो!नो! इट इज़ नॉट सरस्वती। “नमस्ते सरस्वती देवे”, नॉट सरस्वती, प्रभुपाद ने सुना और उसको सुधार किया कि सरस्वती नहीं सारस्वते देवे होगा।

“गौर वाणी प्रचारिणी”- श्रील प्रभुपाद ने क्या किया? गौर वाणी का प्रचार किया। ही वाज़ स्पोक्सपर्सन ओफ गौरांग। क्या कहते हैं? प्रवक्ता या संवाददाता ऐसा कुछ तो कहते हैं। उन्होंने चैतन्य महाप्रभु के संदेश को फैलाया/ प्रचार किया। हरि हरि! चैतन्य चरितामृत को अंग्रेजी भाषा में भाषांतर किया बंगला से, तब से लोग चैतन्य महाप्रभु को पुनः तत्वत: समझने लगे, चैतन्य प्रभु का तत्व या चैतन्य प्रभु भगवान हैं/ गौर भगवान हैं, यह बात भी संसार के लोगों को बताई ( इन्क्लूडिंग भारतीय भी नहीं जानते थे)। जानते नहीं थे इसलिए मानते भी नहीं थे, जानते नहीं तो मानेंगे कैसे? प्रभुपाद ने चैतन्य चरितामृत का प्रकाशन अंग्रेजी भाषा में, फिर प्रभुपाद ने अन्य सभी ग्रंथों का भाषांतर कराया। संसार के सभी प्रमुख भाषाओं में इंक्लुदिंग चाइनीस, चाइनीज़ लोग भी जानते हैं,

“श्रीकृष्ण चैतन्य राधा कृष्ण नहीं अन्य” तो गौरवाणी प्रचारिणे के बाद

“निर्विशेष शून्यवादी पाश्चात्य देश तारिणे” आप सुन रहे हैं ना? आपको इंटरेस्ट है?आर यू फीलिंग बोरिंग? यह है तो अमृत। श्रील प्रभुपाद ने गौरवाणी का प्रचार किया,यहां गौरवाणी का मतलब है तो बहुत कुछ है, शब्द तो कहें गौरवाणी का प्रचार किया या गौरांग महाप्रभु की इच्छा को प्रकाशित किया या चैतन्य महाप्रभु की भविष्यवाणी को सच करके दिखाया था। लोट ऑफ़ थिंग्स‌- गौर वाणी प्रचारिणे और यहां तक की मायापुर धाम की जय! कौन जानता था? ना तो गौरांग महाप्रभु को दुनिया जानती थी ना तो उनकी लीलाओं को न उनकी भगवत्ता को, इन बीइंग गौड हैड को नहीं जानते थे, न तो उनके धाम को जानते थे,नथिंग। ये श्रील प्रभुपाद को क्रेडिट जाता है। हरि हरि! महाप्रभु ने कहा

“पृथिवीते आछे यत नगर आदि ग्राम।
सर्वत्र प्रचार हइबे मोर नाम।।”

ऐसा कहके तो वे आगे बढ़े चैतन्य महाप्रभु लेकिन भविष्यवाणी का तो कुछ नहीं हो रहा था, हरि हरि! वैसे भी चैतन्य महाप्रभु के “स्वधाम उपगते” श्रीकृष्ण चैतन्य प्रभु स्वधाम उपगते, हम तो जानते हैं चैतन्य महाप्रभु अपने धाम/ उपधाम में लौटे, जगन्नाथपुरी में टोटा गोपीनाथ के विग्रह में प्रवेश किया। और भी कुछ मत तो हैं कि जगन्नाथ में प्रवेश किये या महोदधि – बंगाल का जो महासागर है उसमें प्रवेश किया। ऐनीवे अधिक प्रचलित या जो गौड़ीय वैष्णव को जो मान्य जो बात है वो तो टोटा गोपीनाथ में प्रवेश किये और अंतर्ध्यान हुए। तो उनकी भविष्यवाणी का क्या होना था? मेरे नाम का प्रचार कहां-कहां तक होगा? एक रोहिणी में होगा, कुरुक्षेत्र में पहुंच जाएगा, तो प्रभुपाद ने उस भविष्यवाणी को सच करके दिखाया। वैसे स्वयं चैतन्य महाप्रभु भी अपनी ही भविष्यवाणी को सच करके दिखा रहे थे। 6 वर्षों तक चैतन्य महाप्रभु ने सर्वत्र भ्रमण करके हरिनाम का

“ऐही राधाकृष्ण भावे गौर अवतार
हरे कृष्णा नाम गौर करीला प्रचार”

तो उन्होंने प्रचार किया हरिनाम का,किंतु बाहर के प्रचार का कार्य उन्होंने भक्तिवेदांत स्वामी श्रील प्रभुपाद पर छोड़ दिया, मेरा सेनापति भक्त। तो प्रभुपाद ने हरिनाम को सारे संसार भर में फैलाया। क्यों फैलाया कि नहीं? हरि बोल! फैलाने दो,हमको क्या? ठीक है। हमें हर्ष होना चाहिए इस बात का, हरि हरि! धाम को भी प्रकाशित किए श्रील प्रभुपाद, मायापुर को कोई जानता था? मैंने एक-दो बार कहा वैसे श्रील प्रभुपाद ने जब हमें बोले कि पदयात्रा या बुलक कार्ट संकीर्तन पार्टी शुरू करो। वो आदेश वैसे दिल्ली में ही श्रील प्रभुपाद ने मुझे आदेश दिया था, जब इस्कॉन लाजपत नगर में था और दिन भी था राधा अष्टमी का, राधा अष्टमी का दिन। श्रील प्रभुपाद सोचते होंगे कि हरि नाम का प्रचार तो बड़े-बड़े नगरों में तो हो ही रहा है देश-विदेशों में लेकिन छोटे-छोटे ग्रामों का क्या होगा? कम से कम भारत में तो अधिकतर आबादी कहां रहती है? गांव में या अधिक रहा करते थे। दुर्दैव की बात है कि अब सब शहर की ओर दौड़ रहे हैं इसलिए भी वैसे ऐनीवे, इस माइग्रेशन को रोकना है, लोग जो शहरों की ओर दौड़ रहे हैं। तो गांव गांव जाओ और हरिनाम का प्रचार करो, तो प्रचार करते हुए हम जब मायापुर की ओर जा रहे थे बैलगाड़ी के साथ में/ बुलक कार्ट यात्रा थी या पैदल यात्रा थी, इट वाज़ नॉट एयर यात्रा, बस पैदल यात्रा। तो रास्ते में हम भक्तों को यूपी में लोग पूछते थे,” महाराज कहां जा रहे हैं? कहां यात्रा जा रही है यात्रा?” तो हम कहते हम मायापुर जा रहे हैं, इस बात को सुनते ही वे कहते, क्या आप महाराज लोग हैं और आप मायापुर जा रहे हैं? आप कृष्णपुर नहीं जा रहे हैं, रामपुर नहीं जा रहे, पर आप मायापुर जा रहे हैं। इतना ज्ञान या इतना अज्ञान था मायापुर के संबंध में, तो मायापुर का ज्ञान था ऑलमोस्ट जीरो या ऑलमोस्ट निल। इस मायापुर को प्रभुपाद ने वर्ल्ड फेमस बनाया/ वर्ल्ड फेमस मायापुर धाम की जय!

1972 में प्रभुपाद ने पहली बार इस्कॉन की ओर से मायापुर में जमीन खरीद ली थी और इस लैंड पर प्रभुपाद ने गौर पूर्णिमा महोत्सव संपन्न किया। उस उत्सव में प्रभुपाद ने यह दर्शाया या इसका डेमोंसट्रेशन दिया कि देखो! देखो! हरिनाम सर्वत्र फैला ही हुआ है, कई सारे देशों में नगरों में है, देखो ये भक्त न्यूयॉर्क का है। ही हैड सम 60-70 डिसाइपिलस विथ हिम तो लगभग हर भक्त अलग-अलग देश का या अलग-अलग नगर का/ ग्राम का था तो प्रभुपाद ने सिद्ध कर दिखाया कि देखिए

“पृथिवीते आछे यत नगर आदि ग्राम।

सर्वत्र प्रचार हइबे मोर नाम।।”

देखो! देखो! इस देश में हुआ हो हुई होगा प्रचार इसलिए तो उस देश के ये भक्त हैं,इस देश के ये भक्त हैं, इस देश के इस नगर के ये भक्त हैं, प्रभुपाद ने सिद्ध करके दिखाया। उसी समय इस्कॉन के पहले मायापुर फेस्टिवल में ही, भूमि पूजन भी हुआ टी. ओ. वी. पी. का, प्रभुपाद ऐसा प्रोजेक्ट बनाना चाहते थे। टेंपल ऑफ़ वैदिक प्लैनेटेरियम याने टी.ओ.वी.पी., इसको भी समझ जाओ। प्रभुपाद ने अनंत शेष की स्थापना भी की और उस गौर पूर्णिमा फेस्टिवल के तुरंत बाद 1972 में प्रभुपाद वृंदावन आए और उस समय तक वृंदावन का लैंड भी प्रभुपाद को प्राप्त हुआ था। मिस्टर और मिसेज सराफ ने वो लैंड देने का सोचा था लेकिन बाद में दे कि ना दे, ऐसा भी सोच रहे थे। क्षीरोदशायी विष्णु करके प्रभुपाद के डिसाइपल थे, जो भारतीय दे लेकिन रहते थे लंदन में। प्रभुपाद ने उनको भेजा था कि गो टू वृंदावन एंड ऑर्गेनाइज इस्कॉन इन वृंदावन। तो वो मिस्टर सराफ के साथ डील कर रहे थे। लैंड को दे दे प्रभुपाद को/ इस्कॉन को या ना दे, उनका मन में ऐसा चल रहा था/ दुविधा उत्पन्न हो रही थी। तो ऐसी एक योजना बनाई कि कागज की दो चिट्ठियों के ऊपर, एक में लिखा जाएगा इस्कॉन को दे दो/ प्रभुपाद को दे दो। दूसरे में लिखा था प्रभुपाद को मत देना और ये दोनों चिट्टियां सराफ अपने घर के जो मंदिर या विग्रह के चरणों में वो चिट्टियां रखी थी। फिर सराफ को ही एक चिट्ठी उठानी थी और जो भी लिखा था वैसा ही होगा।

उन्होंने आंखें बंद करके चिट्ठी को उठाया और पढ़ा तो उसमें लिखा था दे दो लैंड प्रभुपाद को। मानो भगवान इंटरवीड/ इंटरफीयर्ड,उन्होंने डिक्टेशन दिया कि यस गिव लैंड टू प्रभुपाद। तो प्रभुपाद मायापुर से यहां आए, वन मोर भूमिपूजन लगभग 10- 15 दिनों के उपरांत मायापुर के और फिर प्रभुपाद यहां से मुंबई गए। बाय दैट टाइम मुंबई में भी प्रभुपाद ने हरे कृष्ण लैंड जुहू वाला लैंड खरीदा था और वहां हरेकृष्ण फेस्टिवल प्रभुपाद ऑर्गेनाइज किए थे और फेस्टिवल के दरमियान वहां भूमिपूजन भी होने जा रहा था, थर्ड भूमिपूजन इन वन मंथ। ऑफ कोर्स मैने मायापुर का भूमिपूजन मिस किया और वृंदावन का भी, किंतु उस हरे कृष्ण फेस्टिवल जुहू में जो हरे कृष्ण लैंड पर जो मनाया जा रहा था उसमें मैं आया था, एज़ अ न्यू भक्त, आई वाज़ अ कॉलेज स्टूडेंट। आप में से कोई है कॉलेज स्टूडेंट? हरि हरि! मैंने भी विटनेस किया वह फेस्टिवल ओपनिंग। वैसे पहले मैं संपर्क में आया था इस्कॉन के 71 के अनदर हरे कृष्ण फेस्टिवल। आज मैं सोच रहा था/सोचता ही रहता हूं जब कीर्तन हो ही रहा था, आज भी हो रहा था तो मुझे याद आया कि द फर्स्ट एवर हरे कृष्ण फेस्टिवल जो मैंने अटेंड किया था वो 71 में, मार्च/ अप्रैल में था। तो मेरा जो टेक-अवे था, व्हाट डिड यू टेक अवे फ्रॉम दिस फेस्टिवल? तो मैं तो कहूंगा आई टुक अवे,

“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे”

एक तो वहां की एडवर्टाइजमेंट भी हो चुकी थी “अमेरिकन साधुज़ आर इन टाउन” मुंबई में कौन आए हैं? अमेरिकन साधु/ यूरोपीय साधु आर हियर। यह सुनकर ही लोग हैरान होते थे मुंबई के, कौन अमेरिकन? साधु? फॉरगेट इट। तो सच की झूठ पता लगवाने के लिए हजारों लोग वहां पहुंच रहे थे। मैं भी पहुंच रहा था, आई वास कन्विंस्ड, उनका कीर्तन परफॉर्मेंस देखकर ही मैं भी कन्विंस्ड हो गया/ पागल हो गया/ गया काम से। कुछ प्रभुपाद के छोटे-छोटे ग्रंथ; मोटे-मोटे ग्रंथ खरीदने के लिए मेरे पास उतनी धन राशि नहीं थी, तो छोटे-छोटे ग्रंथ हमने लिए। कुछ बैक टू गॉड हैड पत्रिकाएं भी ली थी और लाॅर्ड इन द हार्ट। पूरा भागवत के वॉल्यूम प्रकाशन के पहले, भागवत के एक- एक चैप्टर की एक-एक पुस्तिका प्रभुपाद बनाते थे तो उसमें से कुछ बुकलेट्स् भी मैने खरीदी थी। एक तो हरिनाम साथ में किया और प्रभुपाद के बुक्स भी। फिर हरि हरि!

मैं हमारे गांव के कुछ लोगों के साथ कमरा शेयर करता था तो जब भी वे कमरे में नहीं हुआ करते थे, मैं देखता था कि कब रूम खाली होगा? और फिर अंदर से सारा बंद करता था सब दरवाजे- खिड़कियां बोल्टिंग और फिर मैं हरे कृष्ण भक्तों को मंच पर जो नाचते हुए/ गाते हुए उनको याद करते हुए मैं अकेला ही नाचता और मेरी केमिस्ट्री की बड़े-बड़े बुक्स के अंदर प्रभुपाद की छोटी-छोटी किताबें रखते हुए मैं पढ़ता था। ऐज इफ आई वाज़ डूइंग सम एनालिटिकल स्टडी, मैं यह पता लगवाने नहीं देना चाहता था कि गांव वालों को कि पता चले कि मैं और कुछ पढ़ रहा हूं आध्यात्मिक। इसके पीछे भी कारण था कि छिप-छिप के मैं उनको पढ़ता था। आई कैप्ट माइ स्पिरिट अलाइव फिर पुनः 1972 का जो हरे कृष्ण फेस्टिवल हुआ मैं वहां भी जाता रहा और इन द मीन टाइम ऐसा होता ही है,होना भी चाहिए,

“वासुदेवे भक्ति भक्तियोग: प्रयोजित:
जनयत्याशु वैराग्यं ज्ञानं च यद हैतुकम”

जब हम भक्ति करते हैं, मैंने भी भक्ति करना प्रारंभ किया था तो दो बातें प्राप्त होती है: एक ज्ञान और वैराग्य। ज्ञान प्राप्त होता है उसी के साथ वैराग्य भी आ जाता है/ जागृत होता है/ उत्पन्न होता है। आइ हैड नो अट्रैक्शन फॉर माय स्टडीज ऐनी मोर। जब भी विद्या को पढ़ रहा था ( विद्या तो थी ही नहीं, अविद्या को पढ़ रहा था); लिखा तो होता है कि “विद्यालय”, ये विद्यालय, फलाना वो विद्यालय, अमुक विद्यालय, तमुक विद्यालय। लेकिन वैसे वह विद्या का आलय नहीं होता है, किसका आलय होता है? अविद्या का आलय। वैसे हमें एक पेंट का डिब्बा और ब्रश लेकर जाना चाहिए और क्या लिखना चाहिए? ‘अ’ लिखना चाहिए, विद्यालय का अविद्यालय। आई स्टार्टेड थ्रोइंग माय बुक्स अवे एंड नोटबुक्स अवे। मैं जब कॉलेज से कमरा की ओर आता था एवरीडे ई यूज्ड टू थ्रो फ्यू बुक्स, स्वाहा! थिस स्वाहा!दैट स्वाहा! मैं खूब याद कर रहा था हरे कृष्ण भक्तों को और प्रभुपाद को, लेकिन आई हैड नो क्लू कि कहां है प्रभुपाद? कहां है हरे कृष्ण? लेकिन पुनः जब पता चला कि हरे कृष्ण फेस्टिवल 72 में होने जा रहा है तो मेरी जान में जान आ गई…….

और आई रैन। आई डिड नॉट रन वहां की जो लोकल ट्रेन होती है, मुंबई की लोकल ट्रेन आर वेरी फेमस। तो उसमें बैठकर मैं जुहू पहुंचा, संत क्रूज एंड देन जुहू। तो पुनः प्रभुपाद का एसोसिएशन श्रवण-कीर्तन हुआ। हरि! और जैसे नारद मुनि ने भी कहा ही है जब वे श्रील व्यास देव के साथ बात करते है, संवाद होता है श्रीमद भागवतम के प्रथम स्कंध में ही। हाउ आई बीकॉम डिवोटी ऑफ द लॉर्ड कृष्ण? कैसे नारद मुनि, उस वक़्त वे मुनि भी नहीं थे, ही वाज़ जस्ट नारद, मे बी नारद भी नहीं थे।

ना+रद मतलब क्या? जो नारायण को देता है उसको क्या कहते है? नारद। द मतलब गिवर/ देने वाला। नारद..नारायण तो तब तक वैसे नारद भी नहीं बने थे। तो वहां जो भक्तिवेदान्तों की भागवत कथा हुई और उस भागवत कथा के अंतर्गत जो भक्तों का, संतों का, साधुओं का जो संग मिला,

“साधुसंग साधुसंग सर्व शास्त्र कोय
लव मात्र साधु संग सर्व सिद्धि हय”

ऐसा ही हुआ तो उस दरमियान, नारद मुनि कुछ छोटी-मोटी सेवा करते थे, “ए बेटा! वो फूल लेके आयो”, ये रहा फूल। “कुछ जल लेके आयो”, प्लीज टेक दिस वाटर। तो इस प्रकार सेवा भी कर रहे थे और फिर वह कहते है कि मैं उनकी अनुमति से प्रसाद भी लिया करता था। विथ दैर परमिशन आई यूज्ड टू ऑनर दैट प्रसादम और दिस इज हाउ आई केम तो कृष्ण कॉन्शियसनेस। नारद मुनि ने कहा है कि इस प्रकार मैं कृष्ण भक्त बना। वैसे आई कैन नॉट, मै तो कहने जा रहा था कि ऑलमोस्ट इन एवरी केस, ऐसे ही होता हैं। ऐसी सोच शायद ठीक नहीं थी, इन एवरी केस इन एवरी केस, ऐसे ही होना चाहिए और ऐसा ही होता है। भक्तों के संग से, साधु संग से फिर हम आगे बढ़ते हैं, उन्नति करते है,प्रगति करते हैं। हरि हरि! फिर गोपाल कृष्ण महाराज भी यही कहें हैं कि वे भी प्रभुपाद के संपर्क में आये कनाडा में, ही वास अटेंडिंग प्रभुपाद के सत्संग और उनके डिसिपल के संपर्क में भी आये एंड मन में वैराग्य उत्पन्न हुआ। ही हैड अ बिग जॉब, कोका कोला या कोक, ही वाज़ अ बिग पर्सन, बिग पोस्ट। हरि हरि! इसके पहले वह सेवा भी कर रहे थे जब वे प्रभुपाद और उनके शिष्यों के संपर्क में आए, इन मॉन्ट्रियल (कनाडा)।

गोपाल कृष्ण महाराज हैड अ बिग सैलरी, बिग फैट सैलरी। भक्तों को पता चला तो धीरे-धीरे वैसे कई सारे शिष्य संपर्क करने लगे गोपाल कृष्ण महाराज के साथ। उन दिनों में फंड्स का काफी शॉर्टऐज हुआ करता था इस्कॉन में, तो ये व्यक्ति धनी हैं यह भी पता चला और उनकी श्रद्धा भी है प्रभुपाद में तो, बारंबार वो कॉन्टैक्ट चल रहे थे एंड गोपाल कृष्ण महाराज वाज़ जेनेरेसली डोनेटिंग, डेडिकेटिंग हिज़ हार्ड अर्नड मनी। इस प्रकार वे सेवा भी किये और हरि!हरि! प्रभुपाद उनकी सेवा से बहुत प्रभावित भी हुए थे। उन दोनों का कम्युनिकेशन, कॉरेस्पॉन्डेंस भी चलता रहा। उस समय शुरुआत में तो प्रभुपाद विदेशों में रहा करते थे। वैसे न्यूयॉर्क, सेनफ्रांसिको,देन मॉन्ट्रियल, प्रभुपाद का इस प्रकार का भ्रमण रहा। लगभग एक वर्ष वे न्यूयॉर्क में ही थे। वहाँ से प्रभुपाद सैनफ्रांसिस्को (वेस्ट कोस्ट) जिसको कहते है वहां गये। अपने जीवन की वेरी फर्स्ट फ्लाइट, उसके पहले प्रभुपाद कभी विमान से यात्रा नहीं किए थे, पहली उनकी एयर यात्रा न्यूयॉर्क टू सैनफ्रांसिस्को थी। दैन देयर वाज़ सम वीजा का इश्यू था, तो प्रभुपाद कनाडा, बगल में कनाडा है तो वहां के मॉन्ट्रियल शहर में प्रभुपाद गए और वहाँ गोपाल कृष्ण महाराज केम इन कॉन्टैक्ट विद श्रील प्रभुपाद। श्रील प्रभुपाद शुरुआत में तो अपने गुरु के आदेश का पालन कर रहे थे, वैसे जीवन भर करते ही रहे, “यू प्रीच इन द वेस्ट, इन इंग्लिश लैंग्वेज”। वो कार्य बड़ी सफलतापूर्वक प्रभुपाद किए थे। फिर प्रभुपाद लौटे बैक टू इंडिया, भारत लौटे लेट 70 ज़ में, 1977 के अंत में। फिर प्रभुपाद सिक्स मंथ्स इन इंडिया सिक्स मंथ्स इन द वेस्ट, ऐसा फॉर्मूला था, प्रभुपाद ऐसा समय व्यतीत कर रहे थे। धीरे धीरे भारत में मंदिरों का निर्माण भी प्रभुपाद चाहते थे। वैसे प्रभुपाद ऐसा भी सोच रहे थे कि मैंने जो विदेश में प्रचार किया, थिस वास आ विल एंड डिजायर ऑफ माई गुरु महाराज। लेकिन प्रीचिंग इन इंडिया, दिस इज माय ओन विल ला, माई ओन डिजायर क्योंकि प्रभुपाद अपने मिशन को तो भारत में ही प्रारंभ किए थे।

झांसी में जब थे तो वहाँ लीग ऑफ डिवोटीज नामक सार्वभौम सभा की स्थापना किए थे और शायद सोच रहे झांसी इज गोइंग टू बी माय इंटरनेशनल हेडक्वार्टर, ऐसा सोच के वो तैयारी कर रहे थे। लेकिन वो बात नहीं बनी। प्रभुपाद को वहां आगे से बढ़ना पड़ा, झांसी से वृंदावन आए। हम वैसे कहते रहते है झांसी के डिवोटीज, मैं भी उनके साथ में, इस्कॉन वाज़ कंसीव्ड इन झांसी एंड डिलीवर्ड इन न्यूयॉर्क। समझ रहे हो? कंसीव/ कांसेप्शन जानते हो? कंसीविंग द चाइल्ड, तो इस्कॉन का कांसेप्शन/ संकल्पना भी कह सकते हो ला, वो झांसी में हुई और फिर उसकी डिलीवरी /उसका विवरण /उसकी स्थापना/ उसका रजिस्ट्रेशन फाइनली कहा हुआ? न्यूयॉर्क में हुआ, 1966। प्रभुपाद का मिशन जो प्रभुपाद इंडिया में वे करना चाहते थे, अनफ़ॉट्यूनेटली कोई लोग ज्वाइन नहीं कर रहे थे प्रभुपाद को। प्रभुपाद वॉन्टेड सम फुल टाइम डेवोटीज या यंगस्टर्स, यहाँ तक की प्रभुपाद अखबारों में ऐड भी देते थे, वी वांट सम यूथस जिसको मैं ट्रेंन करूँगा और फिर उन्हें संसार भर में भेजूंगा, कृष्ण भावना के प्रचार-प्रसार के लिए। हाउ मेनी चिल्ड्रन दो यू हैव? आधा दर्जन है मेरे बच्चे, अब वो दिन चले गए। “अष्टपुत्र सौभाग्यवती” वगैरह नॉट अलाउड नाउ, “हम दो हमारे दो”, अच्छा अब वो भी नहीं रहा, हम दो और हमारा एक, नॉट इवन टू। प्रभुपाद का समय तो आई हैव सिक्स चिल्ड्रन, आई हैव एट चिल्ड्रन, ई हैव फॉर चिल्ड्रन, सो गिव् मी वन चाइल्ड, वन सन। सो नो वन वाज़ विंलिंग, नो वन वाज़ कमिंग फॉरवर्ड। प्रभुपाद, वन टाइम ही वाज़ ट्रैवलिंग ऑन द ट्रेन और एक पालक अपने बालक को याने एक फादर अपने बालक को लेकर ट्रैवलिंग कर रहा था तो प्रभुपाद के पास आकर कहा, “प्लीज ब्लेस माय सन, प्लीज ब्लेस माय सन। मेरे बच्चे को आशीर्वाद दो।” प्रभुपाद ज्यादा ध्यान नहीं दे रहे थे लेकिन बारंबार आके वो निवेदन तो करता रहा।

फाइनली प्रभुपाद ने कहा, ‘गिव मी योर सन”। वो आशीर्वाद मांग रहा था और प्रभुपाद कह रहे थे तुम अपने बच्चे को मुझे दे दो। यह बात जब उस पालक ने सुनी तो फिर पुन: नहीं आया वो, न ही कोई निवेदन किया। कहीं दूर के डिब्बे में जा के बैठ गया, वो डर गया शायद स्वामी जी ले जाएंगे मेरे बच्चे को। सो देयेर इज़ सो मच अटैचमेंट और भारत में कई प्रकार के एस्पिरेशंस थे उन दिनों में, इंडिया वाज़ इन अनदर मूड, अनदर लक्ष्य ही थे भारत-भारतीयों के समक्ष। ये 50- 60 इयर्स पहले की बात है। जैसे मैने भी ज्वाइन किया तो आई वाज़ द फर्स्ट कॉलेज यूथ टू ज्वाइन हरे कृष्ण मूवमेंट। अब एवरीथिंग हैज़ चेंजड। भक्ति बुढ़ापे में देखी जायेगी। क्या भरोसा है कि बूढ़े बनोगे कि जवानी में मर जाओगे? ऐसे कहा करते थे। हाउ मेनी ऑफ यू आर अंडर 30? 30 साल से कम उम्र वाले यह कौन-कौन और कितने बैठे है? 30 और लेस वाले? एट लीस्ट 25% – 30%। ऐसा नहीं हुआ करता था 30-40-50- 60 इयर्स एगो, यूथ सिनेमा घर को हाउसफुल करते थे, नॉट द टेम्पल्स। अब हरे कृष्ण टेंपल्स आर बिकमिंग हाउसफुल, कौन हाउसफुल कर रहा है? यूथ आर मेकिंग हाउसफुल। तो प्रभुपाद सोच रहे थे कि मेरी मिशन इन इंडिया इज़ इनकंप्लीट, जो चाहते थे करना वो कर नहीं पाए। विदेश गए वहां तो इतना यश मिला उनको तो फिर पुन: प्रभुपाद जब लौटे तो ही वॉन्टेड टू कम्प्लीट, पुश फॉरवर्ड हरे कृष्ण मूवमेंट। तो प्रभुपाद यहाँ मंदिरों का निर्माण भी चाहते थे तो बैक टू गोपाल कृष्ण महाराज। वैसे कई सालों से प्रभुपाद भारत में आ ही रहे थे और छ:-छ:महीने बिता रहे थे और यहाँ कुछ-कुछ मंदिरों का निर्माण भी चल रहा था। किंतु प्रभुपाद प्रगति से / प्रोग्रेस से उतने प्रसन्न नहीं थे, तो एक बार वह गोपाल कृष्ण महाराज को पत्र लिखे। महाराज वाज़ स्टिल इन कनाडा।

उस पत्र में उन्होंने यह लिखा था कि (स्पेशली दिल्ली की बात वह लिख रहे थे) दिल्ली में कोई नया मंदिर पिछले 50- 100 वर्षों में नहीं बना। एक बिरला मंदिर का तो उल्लेख वे किए थे, ये बिरला मंदिर जिसका एक बड़ा नाम है, बड़ा मंदिर है। लेकिन उसके बाद तो कोई नया मंदिर नहीं बना हुआ है। यू कम, तुम आओ, कम बैक टू इंडिया और दिल्ली में एक मंदिर बनाओ। उस लेटर में तो एक मंदिर की बात थी तो गोपाल कृष्ण महाराज आए और तुरंत ही प्रभुपाद ने गोपाल कृष्ण महाराज को यहां का जीबीसी गवर्निंग बॉडी कमिश्नर भी बनाया। उन दिनों में सारे इंडिया के लिए एक ही जीबीसी हुआ करते थे, अभी तो कई सारे हैं, दे आर सो मैंनी, लेकिन उस समय एक ही जीबीसी थे। दैट यूज़ टु बी 74 ऑनवार्ड्स, गोपाल कृष्ण महाराज जीबीसी बने और फिर उन्होंने दिल्ली में मंदिर, जो प्रभुपाद ने आइडिया दिया थी उसका निर्माण भी करना था। 50वी एनिवर्सरी ऑफ थिस कृष्ण बलराम टेम्पल ओपनिंग। वैसे गौर गोविंद स्वामी महाराज का संन्यास भी वैसे 1975 में कृष्ण बलराम टेम्पल ओपनिंग के दिन ही हुआ था तो उनकी भी 50 वी एनिवर्सरी ऑफ संन्यास भी मनाई जा रही थी, लाइक दैट। तो और एक एनिवर्सरी का मैं भी सोच रहा था कि 1974 से लेकर 2024 तक गोपाल कृष्ण महाराज और हम तथा भी, हम एक टीम के रूप में भारत में दिल्ली में कार्य किए। सो दैट बिकम्स अनादर एनिवर्सरी, 50 वी एनिवर्सरी ऑफ आवर बीइंग टुगेदर एंड आई वाज़ वन ऑफ द फर्स्ट वन टू जॉइन हिम और हिस टीम। फॉरचुनेटली और अनफ़ॉर्रचुनेटली जिसे कहते हैं अंग्रेजी में आई वाज़ आल्सो द लास्ट वन टू बी विथ गोपाल कृष्ण महाराज इन दैट देहरादून हॉस्पिटल। सो एक और प्रकार की 50 वी एनिवर्सरी भी थी या फिर यह कह सकते हैं कि वैसे सब प्रभुपाद का ही था ।

मुझे भूल जाओ, गोपाल कृष्ण महाराज वर्कड इन इंडिया ऐज़ अ गवर्निंग बॉडी कमिश्नर एंड इन सो मैनी कैपेसिटीज़, ब्यूरो चेयरमैन एंड इंटरनेशनल बीबीटी चेयरमैन/ पर्सन/ मेंबर फॉर 50 इयर्स। हम साथ में थे वैसे मुंबई में हम साथ में थे कई वर्षों तक। फिर प्रभुपाद ने मुझे संन्यास दिया और मैं ट्रैवलिंग करना चाहता था लेकिन गोपाल कृष्ण महाराज मुझे छोड़ना नहीं चाहते थे। जिस ट्रैवलिंग पार्टी को मैं ज्वाइन करना चाहता था या हंसदूत स्वामी करके और एक जीबीसी और इस्कॉन संन्यासी /लीडर थे जो बसेस से ले के आए थे जर्मनी से और वे चाहते थे कि मैं उनके साथ ट्रैवलिंग करूँ। पर गोपाल कृष्ण महाराज चाहते थे कि मैं मुंबई को न छोड़ू। तो यह दोनों में संघर्ष हो रहा था, मैं बीच में पीसा जा रहा था। तो वैसे फिर वृंदावन में, इन 76 वृंदावन फेस्टिवल के समय फिर ये दोनों भी लीडर प्रभुपाद के पास पहुंचे, मै भी वह बैठा था। प्रभुपाद बन गए जज और दोनों भी एडवोकेट जैसे अपनी- अपनी बात को सुना रहे थे। उसमें से एक बात जो गोपाल कृष्ण महाराज कहे थे कि लोकनाथ स्वामी इज़ द की-मैंन इन बॉम्बे, हाउ कुड ही गो? लेकिन उस समय से प्रभुपाद मेरे फेवर में गए, मैं भी थोड़ा ट्रैवलिंग करना चाहता था, संन्यास जो लिया था और मैं थोड़ा कीर्तन का प्रेमी भी कहो तो इस ट्रैवलिंग पार्टी में खूब कीर्तन ही कीर्तन होना था तो मैं जाना चाहता था। सो आई काइंड ऑफ लास्ट हिम और ही लॉस्ट मी फॉर सम टाइम। अगेन फिर पुन: गोपाल कृष्ण महाराज सोच ही रह थे कि कैसे, हाउ तो गेट लोकनाथ स्वामी बैक। महाराज किसी को छोड़ते नहीं थे,किसी को पकड़ लेते थे तो पकड़े रहते प्रेम से, प्रेमपूर्वक। फिर प्रभुपाद ने मुझे बुलॉक कार्ट ट्रैवलिंग संकीर्तन पार्टी भी शुरू करने के लिये कहा था, वह भी चल रही थी। एक समय मुंबई में था मैं तो गोपाल कृष्ण महाराज ने, ही डिवाइसड अनादर प्लैन और प्रभुपाद के पास जाकर प्रभुपाद का अप्रूवल भी ले लिया था और वो था कि लोकनाथ स्वामी को बीबीटी ट्रैवलिंग संकीर्तन पार्टी का चार्ज दिया जाए।

प्रभुपाद कहे, वाई नॉट? यस गिव हिम द चार्ज। इस प्रकार आई वाज़, एक प्रकार से आई वाज़ बैक इन बॉम्बे, पुन: बम्बई का पार्ट मैं बन गया और गोपाल कृष्ण महाराज के साथ बीबीटी बुक डिस्ट्रीब्यूशन करता रहा। फिर प्रभुपाद भी नहीं रहे इन 77, लेकिन हम बुक डिस्ट्रीब्यूशन तो कर ही रहे थे। उस समय तक वैसे दिल्ली में प्रभुपाद इस्कॉन की स्थापना किए हुए थे, राधा पार्थसारथी की प्राण प्रतिष्ठा किए थे। व्हाट वाज़ दैट टाउन? आनंद निकेतन नाम की एक कॉलोनी है, ऑन द वे टू एयरपोर्ट, ज्यादा दूर नहीं एयरपोर्ट से। तो वहां प्रभुपाद ने एक किराए का मकान लिया था और वहां पर इस्कॉन शुरू हुआ, राधा पार्थसारथी की स्थापना हुई, प्राण प्रतिष्ठा हुई जो 72 की बात है। एम आई सेईंग इट राइट? फिर वहाँ से राधा पार्थसारथी वैसे बंगाली मार्केट शिफ्ट किए गए। बंगाली मार्केट आप जानते हो? चांदनी चौक या विजय चौक, उसके पास में बंगाली मार्केट में इस्कॉन था कुछ समय के लिए। वहां से भी शिफ्ट करना पड़ा बिल्कुल बगल में एक बाबर लेन करके, उस लेन में गली में राधा पार्थसारथी को एक और कोठी में शिफ्ट किए। वहां से भी शिफ्ट होना पड़ा लाजपत नगर, 21 फ़िरोज़ शाह गांधी रोड। लाजपत नगर में वन/ टू /थ्री ऐसा ही कुछ पता था, जहाँ राधा पार्थसारथी को शिफ्ट किया गया था। हरि हरि! और वैसे इन सभी स्थानों पर, प्रभुपाद जब भी दिल्ली आते थे तो उसी कोठी में रहा करता थे,उसी मंदिर में ही रहा करता थे।

तो पार्थ सारथी मंदिर, ५०० गज में बनी हुई एक कोठी या मकान के मालिक ने आधा घर तो अपने पास रखा था जहां वह बावा होलीडे होम चलता था। होलीडे होम याने आधा गेस्ट हाउस था। यू कोल्ड इमेजिन 500 गज की कोठी में, गज में बनी हुई कोठी में आधा उनके पास था आधा हमारे पास था। उसी में पार्थ सारथी मंदिर भी था,आश्रम भी था,सब कुछ था। प्रभुपाद जब ७६ के राधा अष्टमी उत्सव के लिए राधा पार्थसारथी मंदिर आए, प्रभुपाद हेड फलों फ्रॉम हैदराबाद टू दिल्ली टू पार्टिसिपेट इन राधा अष्टमी फेस्टिवल। प्रभुपाद उसी कोठी में रह गए, भगवान भी उसी कोठी में, प्रभुपाद भी उसी कोठी में और हम भी उसी कोठी में रहते थे। यू कुड इमेजिन कितना छोटा था लेकिन प्रभुपाद.. हरि हरि!

मुझे जो आदेश मिला,”तुम बैलगाड़ी से प्रचार करो, हरिनाम का प्रचार करो” उसी राधा अष्टमी के दिन प्रभुपाद मुझे वह आदेश दिए थे। दैन प्रभुपाद अर्जेंटली,७७- ही डिपार्टेड। तब मैं बीबीटी ट्रैवलिंग संकीर्तन पार्टी के साथ वैसे ट्रेवल कर ही रहा था, बुक डिसटीब्यूशन करते हुए। वैसे प्रभुपाद जब थे तब भी ट्रैवलिंग चल ही रहा था। ट्रैवलिंग करते-करते बुक डिसटीब्यूशन करते-करते, एक समय ७७ के अक्टूबर मास में हम बद्रीकाआश्रम पहुंचे थे वॉयल डिसटीब्यूटिंग प्रभुपाद बुक्स। लेकिन प्रभुपाद का स्वास्थ्य ठीक नहीं हम जानते ही थे लेकिन कुछ सुधार हो रहा है, नहीं हो रहा है, पता लगवाने का और कोई मार्ग नहीं था। स्वयं वृंदावन आकर पता लगवाने के अलावा कोई और मार्ग नहीं था। हमारी पार्टी, जिस पार्टी का नाम था नारद मुनि ट्रैवलिंग संकीर्तन पार्टी, यह गोपाल कृष्ण महाराज की अध्यक्षता में भी चल रही थी। ही वाज़ अ बी बी टी,ट्रस्टी एंड उन्होंने और प्रभुपाद ने मुझे वह सेवा दी हुई थी,बुक डिस्ट्रिब्यूशन की। तो हम जब लौटे वृंदावन तो प्रभुपाद वाज़ वेरी काइंड टु गिव अस, हमारी पार्टी को दर्शन देने के लिए। एनीवे मुझे यह कहना था कि बुक डिस्ट्रीब्यूशन,जिसको गोपाल कृष्ण महाराज यूज्ड टू पुश सो मच, बुक डिस्ट्रीब्यूशन का प्रमोशन, प्रिंटिंग, बीबीटी की ओर से उसका डिस्ट्रीब्यूशन, इसके लीडर रहे गोपाल कृष्ण महाराज। हमारे सारे मूवमेंट में सबसे अधिक प्रिय, वेरी डियर कहो प्रोजेक्ट या सर्विस, प्रभुपाद जिसको कहते थे बुक डिस्ट्रीब्यूशन, ईफ यू वांट टू प्लीज़ मी, क्या करो? डिस्ट्रीब्यूट माई बुक्स। “तुम मुझे अगर प्रसन्न करना चाहते हो तो मेरे ग्रंथों का वितरण करो”। तो गोपाल कृष्ण महाराज ने इस हरेकृष्ण मूवमेंट में जितना बुक डिस्ट्रीब्यूशन किए हैं या करवाए हैं,आई थिंक वह तो मैचलेस रहा। देयर इज़ नो अनदर पर्सन-

“मत्त: परतरं नान्यत्” तो कितना प्रसन्न किए होंगे या किए गोपाल कृष्ण महाराज श्रील प्रभुपाद को बुक डिस्ट्रीब्यूशन करते हुए एंड नॉट ओनली, ऑफकोर्स बुक डिस्ट्रीब्यूशन। ऐनी वे आई वांटेड टू से क्विकली। वैसे बुक डिस्ट्रीब्यूशन भी प्रिय रहा करता था प्रभुपाद को और बुक डिस्ट्रीब्यूटर्स भी प्रिय होते थे प्रभुपाद के। इसलिए जब प्रभुपाद को बताया कि बुक डिस्ट्रीब्यूटर्स आर हीयर, तो प्रभुपाद उनको मिलने के लिए तैयार हो गए। वे बीमार चल रहे थे बहुत दिनों से, महीनों से लेकिन बुक डिस्ट्रीब्यूटर्स आर इन टाउन और आ पहुंचे हैं तो, “लैट देम कम, लैट देम कम”। हमको एंट्री पास मिला, हम बुक डिस्ट्रीब्यूटर्स, बुक डिस्ट्रीब्यूटर्स और हम प्रभुपाद के बगल में बैठे थे,बेड के बगल में। हरि हरि! आई फॉरगॉट द नेम। पार्थसारथी मंदिर जब लाजपत नगर में था तो वहां पड़ोस में एक हमारे कांग्रेगेशन के मेंबर रहा करते थे, ही वाज़ एन इंटीरियर डेकोरेटर। तो उन्होंने प्रभुपाद का बेड बनाया जिसका उपयोग प्रभुपाद कर रहे थे, इन हिज़ लास्ट डेज़। आई फॉरगॉट द नेम। तो प्रभुपाद हमसे पूछने लगे विच बुक इस सेलिंग द मोस्ट? आप कल्पना नहीं कर सकते प्रभुपाद किस स्थिति में वहां लेटे थे तो भी उन्होंने पूछा,कौन सा बुक सबसे अधिक वितरण हो रहा है? दिस वन दैट वन और हम वह रिपोर्ट जब बता रहे थे तो प्रभुपाद बेकेम एनलाइवेंड। उस समय हमने एक बात कही थी, हमने कहा प्रभुपाद से कि हम जब बद्रीकाश्रम में थे तो हम व्यास गुफा गए और वहां पर हमने आपकी भगवद गीता श्रील व्यास देव को दिखाई। हमको पता नहीं था, हमने तो दिखाई नहीं थी, आई वाज़ अ लिटिल ह्यूमरेस जिसको कहते हैं। हम गए तो थे प्रभु बात की गीता को लेकर, हमने तो नहीं देखा व्यास देव को लेकिन उन्होंने जरूर हमें देखा होगा और हमारे साथ जो भागवत गीता थी वह भी जरूर देखी होगी, इसलिए हमने कहा व्यासदेव को दिखाई। अब यह बात सुनकर प्रभुपाद के उनके चेहरे पर उत्साह था। श्रील प्रभुपाद पास्ड अवे तब हमारी ट्रैवलिंग पार्टी चल रही थी। सो दिस वाज़ ७८ में, मंथ ऑफ जुलाई। इस रहस्य का पता अब तक हमको नहीं चला, गोपाल कृष्ण महाराज हमारी पार्टी को,नारद मुनि ट्रैवलिंग संकीर्तन पार्टी को, और फिर मुझे उस पार्टी का लीडर भी बनाए थे, वे ही बनाए थे कहो। वो खोजते- खोजते वे नागपुर पहुंचे, गोपाल कृष्ण महाराज।

नागपुर में एमएलए हॉस्टल था,एमएलए हॉस्टल में हमारी पार्टी वहां रह रही थी और अचानक हमने गोपाल कृष्ण महाराज को वहां देखा। सो दैट वाज अ बिग सरप्राइज। उन दिनों में कोई संपर्क का कोई साधन नहीं था जैसे ईमेल ऐंड एस एम एस, इवन फोन वाज़ नॉट पॉसिबल और हम सर्वत्र भ्रमण कर रहे थे। ट्रैवलिंग एवरी डे टाउन टू टाउन एंड विलेज। लेकिन महाराज जिस प्रकार वे अचानक प्रकट हुए तो हमको अचरज लगा, हाऊ डिड ही फाइंड आउट? आपने कैसे पता लगवाया? हम पूछते रहे लेकिन उन्होंने कोई जवाब तो नहीं दिया, वह रहस्यमयी बात रही। उनका प्रपोजल यह था, जो ही हैड लॉस्ट मी शुरुआत में, पहले मैं मुंबई में था उनके साथ फिर उन्हें छोड़कर चला गया था ट्रैवलिंग पार्टी में। फिर पुनः लाकर मुझे बुक डिसटीब्यूशन पार्टी का चार्ज तो दे दिया। पार्शियली है गेन्ड मि बैक, लेकिन हे वांटेड टू गेन में फुली बैक। तो उन्होंने प्रस्ताव रखा कि तुम दिल्ली जाओ या दिल्ली आओ और वहां अभी कोई टेंपल प्रेसिडेंट नहीं है जो भी थे वह पलायन कर चुके है। आई थिंक दे वर वेस्टर्नर्स, विजाज़ या डिफरेंट इश्यूज थे एंड देयर वाज़ नो वन टू लुकाफ्टर राधा पार्थसारथी इन द टेंपल। हम तुरंत भागे-दौड़े, स्पीडली हम दिल्ली पहुंचे और ७८ की जुलाई की ८ तारीख को हम टेंपल पहुंचे और गोपाल कृष्ण महाराज ने मुझे वहां का टेंपल प्रेसिडेंट बनाया। आज भी ८ तारीख है, तो कुछ एनिवर्सरी भी हो गई क्या? इट इज़ अ मंथ आफ अप्रैल, दैट वाज जुलाई। तब से पुनः हम बन गए कलीग्स, ऑफकोर्स ही वाज़ जी बी सी, आई वाज़ जस्ट अ टेंपल प्रेसिडेंट एंड लाइक दैट प्रभुपाद के कार्य को गोपाल कृष्ण महाराज आगे बढ़ाए ऑल ओवर इंडिया। ओरिजनली यह सारा कार्य श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु की जय!

सारा चैतन्य महाप्रभु का कार्य था। सो दैट वाज आर फर्स्ट टेंपल, राधा पार्थसारथी। फिर धीरे-धीरे, एक ही मंदिर बनाने की बात तो मैनें पढ़ी थी या सुनी थी लेकिन धीरे-धीरे गोपाल कृष्ण महाराज कहने लगे नो! नो! नो! प्रभुपाद वांटेड ट्वेल्व टेंपल्स,१२ मंदिर चाहते थे। धीरे-धीरे गोपाल कृष्ण महाराज ऐसे हमको नोएडा भेजें।l, ही गैव मी नोएडा और गोपाल कृष्ण महाराज कंटिन्यूड इन दिल्ली। हम भी कुछ छोटा-मोटा वहां भी कुछ कर रहे थे,छोटा-मोटा लेकिन महाराज तो मोटा-मोटा कार्य दिल्ली भर में किए और एक के बाद एक मंदिरों का निर्माण होता रहा और फिर हमको ओपनिंग का इनविटेशन भेजते थे एंड आई यूज्ड टू कम एंड ओपन द टेम्पल्स विद गोपाल कृष्ण महाराज। तो बनते-बनते इस्कॉन रोहिणी मंदिर की जय! इसका भी निर्माण और ओपनिंग, आज प्रातःकाल में सोच रहा था,दिस वाज़ द लास्ट बिग टेंपल दैट महाराज ओपांड इन दिल्ली। इसी के साथ, यह मेरे विचार रहते ही है कि इस राजधानी को भारत की राजधानी को, प्रभुपाद भी गोपाल कृष्ण महाराज भी धर्म-धानी बनाना चाहते थे, धर्म-धानी। सो रोहिणी के ग्रैंड टेंपल ओपनिंग में भी हम साथ में थे और फिर जाते-जाते गोपाल कृष्ण महाराज और एक मंदिर ओपनिंग तो नहीं लेकिन भूमि पूजन इन देहरादून किये, जब हम ब्यूरो मीटिंग में थे। मीटिंग वहाँ हो रही थी तो लास्ट डे ऑफ़ द मीटिंग आई थिंक, वहां भूमि पूजा हुई। गोपाल कृष्ण महाराज के साथ हम भी थे वहां, भूमि पूजा करके वे आगे बढ़े।

इस प्रकार बुक डिसटीब्यूशन में ही वाज़ नंबर वन इन द वर्ल्ड, हरि बोल! और नंबर ऑफ़ टेंपल्स, बिल्ट एंड ओपेंड, आई थिंक हू एल्स? आई थिंक ही इस द वन, ही इज़ आल्सो द नंबर वन इन टेंपल ओपनिंग एंड आल्सो डिवोटी मेकिंग। आप सबको भी उन्होंने, ऑफ कोर्स यह सब उनकी प्रेरणा से है। फिर हमारे मंदिरों के अधिकारी और साथ में आप सब कांग्ग्रीगेशन और यूथ, मिलजुल के यह सब निर्माण, प्रचार, प्रसार और बुक डिस्ट्रीब्यूशन कर ही रहे हो। ऑफ कोर्स सो दैट क्रेडिट गोज़ टू यू आल्सो। रुक्मणी कृष्ण प्रभु जैसे, केशव मुरारी प्रभु एंड क्वाइट ए फ़्यू लीडर्स जिनको ही एंपावर्ड, पावर ऑफ अटॉर्नी देकर कई सारे कार्य,महान कार्य गोपाल कृष्ण महाराज करते रहे, करवा के गए और उस कार्य को हम सबको आगे बढ़ाना है। ऐसा कार्य ही हमारे सबकी ओर से श्रद्धांजलि होगी गोपाल कृष्ण महाराज के चरणों में या हस्त कमलों में। जिस प्रकार के ट्रेंड्स, ट्रेंड्स कहो वे सेट किए हैं उसको आगे बढ़ाना है। यह नहीं कि जितना महाराज ने किया बस दिस इस इट। ऐसा तो नहीं सोच रहे आप? यस? ऐसा नहीं सोच रहे ना? आपका सारा जीवन है। वैसे प्रभुपाद चाहते थे, एक्सपेक्ट करते थे कि सेकंड जेनरेशन, आप सेकंड जेनरेशन हो वी आर द फर्स्ट जेनरेशन ऑफ इस्कॉन डेवोटीज़ एंड यू द ग्रैंड डिसाइपल्स। हम तो डिसाईपल ही हैं पर आप कैसे हो? यू आर ग्रैंड डिसाइपल। केवल डिसाईपल और ग्रैंड डिसाइपल, हु इज़ बिगर? मोटा कौन है? ग्रैंड, यू आर ग्रैंड डिसाइपल सो अ लॉट इज़ एक्सपेक्टेड। प्रभुपाद भी सेकंड जेनरेशन से बहुत कुछ आशा और अपेक्षा रखते थे और रखते भी हैं। हरि हरि!

एक समय तो कोई ज्वाइन नहीं कर रहा था, अर्ली डेज में। मैं यूथ, एज़ ए यूथ ज्वाइन किया कहो।

वैसे और भी कुछ ज्वाइन तो कर रहे थे लेकिन संख्या बहुत कम थी। एक समय मैं और प्रभुपाद, मुंबई में प्रभुपाद के कमरे में हम बैठे थे तो वहां बातें हो रही थी कि इंडिया गवर्नमेंट का सपोर्ट नहीं है, पब्लिक का सपोर्ट नहीं है, यह सपोर्ट नहीं है, वह सपोर्ट नहीं है। स्पेशियली मैनपॉवर का शॉर्टेज था इसलिए हमारे मंदिरों को अंग्रेज का मंदिर कहते थे। वृंदावन अंग्रेज का मंदिर और मायापुर साहिबेर मठ। विदेशी अंग्रेजी साहब, तो बंगाली लोग कहते साहिबेर मठ। मायापुर जो मंदिर है वो साहब/ साहिबेर मठ और यह अंग्रेज का मंदिर था, क्युकी इंडियंस वर नॉट कमिंग फॉरवर्ड। तो प्रभुपाद मुझे उस समय कहे थे, उन्होंने कहा तो सही। उन्होंने कहा कि वी नीड, वी नीड मोर मैन लाइक यू। मुझे और चाहिए और इंडियंस, यूथ चाहिए। तो जो अभी कहा प्रभुपाद ने, प्रभुपाद की इच्छा की पूर्ति भगवान गौरांग कर रहे हैं। आपको जब मैं देखता हूं बड़ी संख्या में और केवल यहां पर ही नहीं, सर्वत्र सर्वत्र ऑल ओवर द वर्ल्ड, स्पेशली ऑल ओवर इंडिया, कांग्रेगेशन एंड द यूथ इतनी संख्या में ज्वाइन कर रहे हैं, वी हैव प्रोबेबली नो इंडिया, क्योंकि वी ट्रेवल ऑल द टाइम एंड हम देखते हैं सर्वत्र कैसे हरि हरि!

इस्कॉन के सपोर्टर बना रहे हैं, इस्कॉन के फुल टाइम डिवोटीज़ बन रहे हैं, इस्कॉन के ग्रंथो का वितरण कर रहे हैं, हरिनाम कर रहे हैं, यह कर रहे हैं, वह कर रहे हैं, पदयात्रा कर रहे हैं, सो मेनी टेम्पल्स आर बीइंग बिल्ट। आपकी जानकारी के लिए वैसे प्रभुपाद के समय तो, वी हैड सेवन ऐट टेम्पल्स इन इंडिया और अब वि हैव छोटे-मोटे मिलाके – आउटपोस्ट, प्रीचिंग सेंटर,एक्सटेंशन सेंटर,फुल फ्लैज्ड टेम्पल्स। इन सब की संख्या ३०० से अधिक हो चुकी है। मोर दैन थ्री हंड्रेड एंटीटीज़ ऑफिशियली, दे आर सबमिटिंग देयर अकाउंट्स मतलब दे आर ऑथराइज्ड। दिस इज़ एक्स्पैंशन, वेरी इनकरेजिंग एंड सर्टेनली इट इज़ वेरी प्लीजिंग टू श्रील प्रभुपाद,प्लीजिंग टू गोपाल कृष्ण महाराज एंड वी आर आल्सो प्लीज़्ड दैट यू आर स्टेपिंग फॉरवर्ड इन बिग नंबर एंड यू आर वेरी एक्टिवली इन्वॉल्वड।

अभिनंदन और धन्यवाद आप सबका!
निताई गौर प्रेमानंदे!

ओह! आई सी, टुडे इज़ जय पताका महाराज का सेवेंटी सिक्स्थ जन्मदिन है। आज एकादशी है ना? वैसे गोपाल कृष्ण महाराज की व्यास पूजा भी एकादशी के दिन ही, मेरी भी एकादशी के दिन ही और जय पताका महाराज का भी जन्मदिवस / व्यास पूजा एकादशी के दिन ही होती है। तो आज के दिन मायापुर में, ऑफकोर्स ऑल ओवर द वर्ल्ड, स्पेशली मायापुर में इट्स ए ग्रैंड व्यास पूजा महोत्सव जय पताका महाराज का मनाया जा रहा है। यू में लाइक टू डू समथिंग हेयर आल्सो? ओर में बी देयर इज़ सम प्लान। ओके!