
Srimad Bhagavatam
06.04.05
28-06-2024
ISKCON Nagpur
“ॐ अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः॥”
“श्रीचैतन्यमनोऽभीष्टं स्थापितं येन भूतले।
सोऽयं रूपः कदा मह्यं ददाति स्वपदान्तिकम् ॥”
“हे कृष्ण करुणा-सिंधु, दीन-बन्धु जगत्पते।
गोपेश गोपिकाकान्त राधाकान्त नमोस्तुते ॥”
“तप्त-कांचन-गौरांगी, राधे वृंदावनेश्वरी।
वृषभानु-सुते देवी, प्रणमामि हरि-प्रिये॥”
“वांछा-कल्पतरूभयो कृपा-सिंधुभ्यो एव च।
पतितानां पावनेभ्यो वैष्णवेभ्यो नमो नमः ॥”
“नमो महा-वदान्याय, कृष्ण प्रेम प्रदायते।
कृष्णाय कृष्ण चैतन्य, नामने गौर-तविशे नमः॥”
“कृष्णाय वासुदेवाय देवकी नन्दनाय च।
नन्दगोप कुमाराय गोविन्दाय नमो नमः ॥”
“नमः ॐ विष्णु-पादाय कृष्ण-प्रेष्ठाय भूतले
श्रीमते भक्ति-वेदांत-स्वामिन् इति नामिने।
नमस्ते सारस्वते देवे गौर-वाणी-प्रचारिणे,
निर्विशेष-शून्यवादी-पाश्चात्य-देश-तारिणे॥ “
“जय श्रीकृष्ण चैतन्य प्रभु नित्यानंद।
श्री अद्वैत गदाधर श्रीवासादि गौर भक्त वृंद।।”
“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।”
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय!”
भागवत कक्षा के लिए उपस्थित हुए सभी भक्तों का स्वागत और अभिनंदन। जो मंगला आरती में भी आए थे उनका विशेष स्वागत और उनके लिए विशेष अभिनंदन। “नित्यं भागवत सेवया” के अंतर्गत आज प्रातः कालीन कक्षा में स्कंद छः अध्याय चार श्लोक संख्या पाँच। ये दिखता है पीछे से ? इसे और कुछ बड़ा करो। ओके!
“द्रुमेभ्य: क्रुध्यमानास्ते तपोदीपि तमन्यव:।
मुखतो वायुमग्निं च ससृजुस्तद्दिधक्षया।।”
अनुवाद और तात्पर्य श्रील प्रभुपाद के द्वारा:-
जल में दीर्घकाल तक तपस्या करने के कारण प्राचेतागण वृक्षों पर अध्याधिक क्रुद्ध थे। उन्हें जलाकर भस्म करने की इच्छा से उन्होंने अपने मुखों से वायु तथा अग्नि उत्पन्न की। हरि हरि! प्राचीनबर्हि राजा के दस पुत्र थे उनका नाम प्रचेताज़ थे। ये क्रोध करने वाले ये उनका थोड़ा सा परिचय। ये हो क्या रहा है? ये क्रोध करने वाले कौन हैं ? और क्यों क्रोध कर रहे हैं? ये हैं प्राचीनबर्हि के दसों पुत्र, जो जल में जाकर तपस्या कर रहे थे। तपस्या बहुत समय चलती रही, इतने में सारे संसार भर में पृथ्वी पर ध्यान नहीं था क्योंकि राजा के पुत्र व्यस्त हैं, बिजी हैं। तब में सारे संसार में पृथ्वी पर सर्वत्र जंगल ही जंगल, अब जंगल में मंगल करना है। तप के उपरांत जब वे बाहर आते हैं, समुद्र के बाहर आते हैं तो देखते हैं कि सर्वत्र जंगल ही जंगल फैला हुआ है, धन धान्य नहीं है, अन्न उत्पन्न नहीं हो रहा है।
“अन्नात भवन्ति भूतानि” अन्न के बिना मनुष्य जी नहीं सकते तो अन्न नहीं है। वृक्ष तो है, कुछ तो उपयोग है किन्तु अन्न भी चाहिए। हरि हरि बच्चे भी चाहिए, इनका पालन पोषण भी होना है। सर्वत्र विस्तृत वन ही वन को, जंगल ही जंगल को जब वे देखे हैं तो उनको आया क्रोध, क्रोधित हुए हैं। सारे जंगल को भस्मसात करना चाहते हैं। इसके लिए अग्नि को उत्पन्न किया है, कहाँ से?
“मुखता: वायु अग्निम च”, मुख से। द्रुमेभ्यः – क्रोधित हुए हैं, किन पर? क्रुद्धमानः क्रोधित हुए हैं, किस पर? वृक्षों पर क्रुद्ध हुए हैं। कौन क्रुद्ध हुए?
“तपोदी पित मन्यवः” – तप करने वाले प्रचेताज़। “मन्यव:” माने तप होता है, अमन्यु माने क्रोध होता है। कई क्रोध करने वाले इसलिए मन्यवः। अपना क्रोध उन्होंने प्रकट किया कैसे? मुख से अग्नि और वायु को प्रकट करके। अग्नि को फैलाना है तो वायु भी चाहिए। वायु और अग्नि उनके मुख से उत्पन्न हुई है और उद्देश्य क्या है? दिधाक्षया- उस वन को राख/ खाक बनाना है।
तात्पर्य में प्रभुपाद लिखते हैं, यह इतिहास है, यह घटनाक्रम ऐसा है। ऐसा एक समय हुआ है। पुराण तो पुराने तो होते हैं, लेकिन “पुराणमपि नवं “ पुराण पुराने होते हुए भी पुराण कैसे होते हैं? नए रहते हैं। यह घटना सत्य है, अतः सत्य को पुनः जीवित रखते हैं ये पुराण। आज के लिए भी यह ताजी खबर है, आज के लिए भी ब्रेकिंग द न्यूज़ है।आज आपके लिए न्यूज को ब्रेक किया जा रहा है।
तात्पर्य:- तपोदीपित मन्यव: शब्द सूचित करता है कि जो लोग कठिन तपस्या किए रहते हैं, उनमें महान योग शक्ति होती है जैसा कि प्रचेताओ से पता लगता है जिन्होंने अपने मुखों से अग्नि और वायु उत्पन्न की। यद्यपि भक्तगण कठिन तपस्या करते हैं, किन्तु वे “विमन्यव: साध्वः” थे जिसका अर्थ है वे कभी क्रुद्ध नहीं होते।
यहां मन्यव: मतलब क्रोधित और विमन्यव: मतलब क्रोध से मुक्त। साधु होते हैं विमन्यव: इसलिए चर्चा करेंगे थोड़ी आगे। हनुमान क्रोधित हुए कि नहीं? वे साधु थे कि नहीं? अर्जुन वैसे क्रोधित नहीं होना चाहते थे, लेकिन भगवान ने उनको उपदेश सुनाके क्रोधित किया, उनके क्रोध को जगाया, ”गेट अप एंड फाइट, उठो”।
“तस्मात् सर्वेषु कालेषु माम् अनुस्मर युध्य च” युद्ध करो, तो युद्ध कैसे होता है? बैठे हुए अर्जुन से? अर्जुन तो बैठ गया बेचारा रथ में, क्रोध से मुक्त हो गया, ऐसे अर्जुन को भगवान ने उपदेश सुनाया ताकि वह क्रोधित होकर लड़े और अर्जुन लड़े भी। अंततोगत्वा युद्ध नहीं करूंगा ऐसा कहने वाले अर्जुन नहीं फिर अंत में क्या कहा?
“करिश्ये वचनम तव”, आपकी ऐसी इच्छा है तो आई एम रेडी, मैं युद्ध करने के लिए तैयार हूं। वैसे भगवान भी क्रोधित होते हैं जैसे नरसिंह भगवान। संसार ने ऐसा क्रोध देखा ही नहीं –
“मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय” मेरे जैसा क्रोध करने वाला और मुझसे अधिक क्रोध करने वाला कोई है ही नहीं। तो क्रोध दिव्य भी होता है। अब आगे बढ़ते हैं ,बाकी बात और कहेंगे धीरे धीरे। वे सदैव सद्गुणों से अलंकृत रहते हैं। भागवत 3.25.21 में कहा गया है –
“तितिक्षव: कारुणिका: सुहृद: सर्वदेहिनाम्।
अजातशत्रव: शान्ता: साधव: साधुभूषणा: ॥”
राजा परीक्षित ने जब देखा, कौन था वो? कलि था। राजा के वेष में कलि प्रकट हुआ और गाय को परेशान कर रहा था, उसके हाथ में तलवार थी। परीक्षित ने जब देखा तो राजा परीक्षित स्वयं अपनी तलवार से उसके खंड या टुकड़े टुकड़े करने के लिए तैयार थे। किंतु कलि ने शरण ली, क्षमा याचना मांगी, ‘क्षमस्व क्षमस्व क्षमस्व’ क्षमा करो। तो वहीं क्रोधित राजा परीक्षित क्षमाशील बन गए। असली स्वभाव क्षमाशीलता है। यद्यपि वैष्णव को तपस्या से पर्याप्त शक्ति मिलती है। वैसे तात्पर्य का हर वाक्य मीनिंगफुल/ अर्थपूर्ण/अर्थ गर्भित होता रहता है। इस श्लोक को समझाने के लिए प्रभुपाद तात्पर्य लिखते हैं, फिर तात्पर्य को पढ़ते पढ़ते उसको समझाना पड़ता है और फिर समझाई हुई बातें भी फिर, फिर उनको भी समझाना पड़ता है। इस प्रकार यह चर्चा आगे बढ़ती रहती है,
“बोधयनंतः परस्परम्” होते रहता है, होना चाहिए। यद्यपि वैष्णव को तपस्या से पर्याप्त शक्ति मिलती है, किंतु विभिन्न कठिनाइयों में पड़ने पर भी वह क्रुद्ध नहीं होता। तो तपस्या सभी को करनी होती है। ब्रह्मा को भी, ज्ञान और शक्ति प्राप्त होने के पहले, पता ही नहीं चल रहा था कि मुझे करना क्या है?और कैसे करना है? सारा मैनुअल उनके पास प्राप्त नहीं था। हाउ टू डू इट ? उनको सृष्टि की रचना करनी तो थी किंतु वे ज्ञानशून्य थे या क्रियाशून्य थे। सृष्टि के शुरुआत में पहले दो अक्षर ब्रह्मा ने जो सुने, वे थे “त प… त प…त प…” कौन कह रहे थे? स्वयं भगवान ही कहे, श्रीभगवान उवाच। इस सृष्टि के पहले व्यक्ति, जिसकी सृष्टि हुई थी वे ब्रह्मा थे और सृष्टि में पहले शब्द का सृजन हुआ/ निर्मिति हुई, वह शब्द था तप। पहले शब्द का उच्चारण इस सृष्टि में भगवान के मुखारविंद से हुआ है, वो शब्द है तप। त.. प.. तप को वे साथ में कहे तो ब्रह्मा को समझ गया कि मुझे तपस्या करनी है, तो उन्होंने तपस्या की,
“तपो दिव्यं पुत्र कायेन सत्वम” भगवान ऋषभदेव भी अपने पुत्रों को कहे थे, ” पुत्रों क्या करो? तपस्या करो”। वैसे तपस्या कौन नहीं करता? इस संसार का हर व्यक्ति तपस्या करता ही है। कई सारी कठिनाइयां झेलते रहता है, कई सारी चुनौतियां का सामना करता है। राजा से रंक तक, गली में रहने वाले लोगों से दिल्ली तक के लोगों तक, सभी क्या करते हैं? गरीब से श्रीमान तक सारे लोग तपस्या करते रहते हैं। लेकिन तपस्या करनी कैसी चाहिए? तपो दिव्यं, दिव्य तपस्या करनी चाहिए। भगवान के लिए असुविधाओं का सामना करना चाहिए,भगवान के लिए धडपड़, भगवान के लिए झगड़े-रगड़े भी हैं। तो भगवान के लिए हमें करने चाहिए।
“यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ||”
तपस्या भी भगवान की प्रसन्नता के लिए। लोग तो तपस्या अपने- अपने इंद्रिय तर्पण के लिए करते हैं, मनोरंजन के लिए करते हैं, अनात्मरंजन के लिए करते हैं। नॉट आत्मरंजन, क्योंकि आत्मरंजन मतलब आत्मा। तपस्या वैसे एंटरटेनमेंट के लिए करते हैं, लेकिन तपस्या वैसे इनलाइटनमेंट के लिए होनी चाहिए। नॉट फॉर एंटरटेनमेंट, इट्स फॉर इनलाइटनमेंट। तपस्या केवल इंफॉर्मेशन गैदरिंग के लिए नहीं होनी चाहिए। इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी चल रही है आजकल। इंफॉर्मेशन गैदरिंग के लिए तपस्या नहीं करनी चाहिए, ट्रांसफॉर्मेशन के लिए करनी चाहिए। उस इंफॉर्मेशन को उपयोग हम कैसे करते हैं? व्हाट हैपन नेक्स्ट? ये तो ट्रांसफॉर्मेशन होता है, विचारों की/ भावों की क्रांति होती है। फिर वह तपस्या/ सारा प्रयास दिव्य हुआ/ पवित्र हुआ।
“तपो दिव्यं पुत्र कायेन सत्त्वं
यस्माद् शुद्धये ब्रह्मसौख्यं त्वनन्तम् “
दिव्य तपस्या क्या करेगी? एक तो शुद्ध करेगी/ स्वच्छ करेगी। “यस्मात तपस्या” मतलब तपस्या से शुद्धिकरण होगा, तपस्या तपाती है। खान से जब कोलार में सोना मिलता है, ऐसा हमने पढ़ा-सुना था। साउथ इंडिया में कोई कोलार नाम का स्थान है वहाँ गोल्ड माइंस हैं। राधा गोपीनाथ की जय! सोने की खान से जब सोना प्राप्त करते हैं, तो सोने के साथ और भी कुछ, जैसे लोहा/ मैंगनीज/ तथा अन्य अलोयज़ भी प्राप्त होते हैं, मिक्स होते हैं/ मिश्रित होते हैं। फिर नेक्स्ट क्या करना पड़ता है? सोना,प्योर गोल्ड प्राप्त करना है। सोने की खान से जो भी प्राप्त हुआ है, उसको उसको तपाते हैं। हमने देखा जस्ट आउटसाइड जोहान्सबर्ग, साउथ अफ्रीका में सोने की खान हमने जाकर देखी। वो एयरपोर्ट के पास था तो भक्त हमको ले गए। हम लोग हेलमेट वगैरह पहन के बाय लिफ्ट, पता नहीं कितना नीचे/ कितने किलोमीटर नीचे अंदर गए? वहाँ खान का सारा जगत था, सब बिजी थे, ठक ठक करके कुछ तोड़ रहे थे,कुछ इकट्ठा कर रहे थे। हमने हेलमेट पहना था, लाइक अ सींग। हमको तो वहां सोना कुछ दिख नहीं रहा था, उनको तो दिख रहा था। फिर दोबारा हम ऊपर आए, तो हमको एक डेमोंस्ट्रेशन दिखाया। द फर्नेसेस जिसमें ‘ओर’ थी; सोना और उसके साथ जो भी मिट्टी है/ धातु है मिश्रित, उसको तपा के फिर उन्होंने बनाया मोल्टन गोल्ड, जिसको “तप्त कांचन गौरांगी राधे” केवल गोल्ड नहीं, वह तप्तका था, मोल्टन गोल्ड। फर्स्ट टाइम वैसे तप्त कांचन गौरांगी का भी हमने दर्शन किया, रियल गोल्ड। रियल गोल्ड के बिस्किट या कॉइन बनाकर वो बेचते भी थे। हमारे पास धन नहीं था खरीदने के लिए।
जब सोने के खान में जो प्राप्त होता है उसको तपाने के उपरांत फिर जो भी नॉन सोना या नॉन गोल्ड होता है, उसको जलाते हैं या उसको अलग अलग करते हैं। तब जाके रियल गोल्ड अलग होता है। उसी प्रकार हम भी जब तपस्या करते हैं- “तपो दिव्यं पुत्रका एन” तपस्या करो, तपस्या करो ऋषभ देव भगवान कह रहे हैं। यस्मात् शुद्धि: याने शुद्धिकरण होगा और हम में से जो रियल मी/ माय सेल्फ/ मैं जो हूं, मेरा जो असली स्वरूप है वह बाहर निकल कर आएगा, उभर के दिखेगा। धिस इज़ नॉट मी, यह झूठा अहम है या यह अहम है या ये मम है और यह रियल मैं हूँ। यह ज्ञान या साक्षात्कार भी तपस्या का ही फल है। और फिर यह जप भी तप है।
“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे”
और सारा भक्ति का जीवन तप ही है। मंगल आरती में प्रातः काल उठना तप है कि नहीं? आज ही कोई माता जी मुझे बता रही थीं मैं पहले नहीं उठती थी महाराज लेकिन पता नहीं मैंने कैसी कृपा की उसपर? आपकी कृपा से मैं हर रोज मंगल आरती में आ रही हूँ,, धन्यवाद! थैंक यू! मेरा आभार मान रही थीं। ये सारा आध्यात्मिक जीवन तपस्या है, केवल प्रसाद ही खाना और कुछ नहीं खाना: नो मीट/ नो फिश/ नो ऐग ; चाय, कॉफी भी नहीं। जीना तो क्या जीना चाय के बिना? तो चाय भी छोड़ना ये भी बड़ी तपस्या है लोगों के लिए। ये चार नियम का जो हम पालन करते हैं, सारी तपस्या ही है। नशा पान नहीं, परस्त्री/पुरुष संग नहीं करना इज़ द बिगेस्ट औस्टेरिटि, इट्स अ मेजर थिंग। जुआ नहीं खेलना- ये करता क्या है फिर? “यस्मात् शुद्धियेत्”– शुद्धिकरण होता है/ प्यूरीफिकेशन होता है। और हममें से जो रियल मी है वो बाहर निकल के आएगा। फिर ऋषभ देव भगवान कहते हैं, ”ब्रह्म सौख्यम तु अनंतम”, मतलब आनंद ही आनंद तुम्हारी प्रतीक्षा में है, सुख ही सुख तुम्हारी प्रतीक्षा में है। “ब्रह्म सौख्यम त्वम” कितना? अनंत अनंत, आनंद का अंत नहीं।
“आनंद ही आनंद गड़े, इकड़े तिकड़े सबई कड़े, आनंदी आनंद गड़े” सो वी आर इनवाइटेड, हमको आमंत्रित किया जा रहा है, प्लीज कम!
“नंद के घर आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की,
हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की”
वे सदैव सद्गुणों से अलंकृत रहते हैं- वैष्णव और प्रभुपाद यहां भागवत का उद्धरण भी दिए है।
“साधवः साधु भूषणम्” ये आभूषण है साधुओं के। साधु और साध्वी के भी क्या भूषण है? सहनशीलता, सहनशीलता यह क्या है? सदगुण है। कारूणिका- करुणा/ कारुण्य,
“सर्वभूत हिते रतः”, भगवान कहते हैं मेरे भक्त कैसे होते हैं? सर्व भूत हिते रतः। सब जीवों के हित में तल्लीन रहते हैं।
“सर्वे सुखिना भवंतु सर्वे संतु निरामयः
सर्वाणि भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित दुखभाग भवेत्”
फिर ऐसे विचार के बन जाते हैं साधु। ऐसे विचार के हम सबको बनना है या ऐसे विचारवाले हम है, यहां से ऐसी शुरुआत भी है। हमें वैसे ही बनना है जैसे हम, क्या कहोगे? हम है। हमें कुछ अलग से नहीं बनना है, हमें साक्षात्कार करना है अपने स्वरूप का- “मैं कौन हूं?” का पता लगवाना है। मैं कौन हूं? मेरी वेशभूषा कैसी है? अंततोगत्वा जब हम रेडी टु टेक ऑफ, या टेक द फ्लाइट एंड टेक ऑफ। वैकुंठ जाने के समय यह भी निर्धारित होता है कि तुम कौन हो? तुम्हारा नित्य नाम कौन सा है? तुम्हारा नित्य स्वरूप कौन सा है? तुम्हारी नित्य वेषभूषा कौन सी है? तुम्हारी नित्य सेवा कौन सी है? और भगवान के लीला में तुम्हारा नित्य स्थान/ स्थल कौन सा है? और कौन से धाम में या वैकुंठ में या साकेत/अयोध्या में या द्वारका में या मथुरा में या वृंदावन में वेअर यू फिट इन? तुम्हारा स्पॉट कहां है जो खाली पड़ा है/ रिक्त है और वो स्थान और कोई नहीं ले सकता, इट्स आल फिक्सड एंड वेकेंट फॉर नाउ। तो वहां वेकेंसी है, यहां भरने की आवश्यकता नहीं है, यह सारा निश्चित होता है। जैसे स्वरूप को हम प्राप्त करते हैं जब फाइनली, “अंते नारायणः स्मृति” अंत में नारायण की स्मृति हुई। इसके लिए जीवनभर हमको अभ्यास करना होगा, जीवन भर तपस्या करनी होगी, जीवन भर
“श्रवणं, कीर्तनं, विष्णु: स्मरणं, पादसेवनं,
अर्चनं, वंदनं, दास्यं, साख्यं, आत्म निवेदनं”
यह सब करना होगा। “एइ जीव कृष्ण दास एइ विश्वास” ऐसा विश्वास होगा जीव में कि मैं तो जीव हूं और यह जीव कैसा है? जीव कृष्ण दास है,हम बॉस नहीं है, हम दास है। याद रखो हम बॉस नहीं है। आसुरी भाव में हमारे भाव कैसे होते हैं? … “ईश्वरो अहं, अहं बलवान, अहं सुखी ” अहं अहं इतना धन मैंने कमाया है और धन कमाने की मेरी सारी योजना तैयार है। उस शत्रु को मैंने उड़ाया है और यह बाकी है हिट लिस्ट में। ऐसा बड़ा विस्तार से वर्णन भगवान गीता में किए हैं – आसुरी संपदा और दैवी संपदा नामक जो अध्याय है वहां भगवान कहे। इस संसार के वैसे आसुरी संपदा वाले लोगों के विचार कैसे होते हैं/ भाव कैसे होते हैं/ दुराचार कैसा होता है? उसका अंतर पहला तो ये है,” ईश्वरो अहं, आई एम कंट्रोलर”। यहां नाटक हो रहा है, नृसिहं भगवान की चतुर्दशी के दिन, उस नाटक में लिखा है कि भगवान की आरती उतारी जा रही है। अमर्क और शंड, शंड और अमर्क सारे विद्यार्थियों को साथ में लेकर जय कर रहे हैं। हिरण्यकशिपु की…जय! बड़े दिल से ये लोग कह रहे हैं हिरण्यकशिपु की जय! उस वक्त इस ऑडियंस ने भी कहा था जैसे आपने कहा। आपकी परीक्षा हुई और कुछ तो फेल हो गए। ऐसा चाहते हुए और हम सभी में भी हिरण्यकशिपु छिपा रहता है, हम में रावण छिपा रहता है। रावण मतलब? और के रोने का या औरों को रुलाने वाला, औरों को कष्ट देने वाला, और उनके आंखों से कष्ट के/ दुख के आँसू बहाने का कारण बनने वाला कहलाता है, कौन? रावण कहलाता। सो ऐसे ही छोटे-मोटे रावण हम होते हैं,रहते हैं। दिखते तो नहीं रावण जैसे, दिखते जेंटलमैन जेंटलमैन, अरे जेंटलमैन। फिर तुम सिक्योरिटी, एयरक्राफ्ट में जाना है तो, सारा ही सब चेक करते हैं। पोटेंशियली एवरी ह्यूमन बीइंग कुड बी टेररिस्ट, ऐसी समझ के साथ सारा सिक्योरिटी चेक होता है। कैसे? अभी-अभी वो देखो सामने टॉयलेट है, उस पर लिखा है जेंटलमैन कैन यूज टॉयलेट,उसका मैंने उपयोग किया। जेंटलमैन होऊंगा इसीलिए मैंने जेंटलमैन बनके उसका उपयोग किया। आई मस्ट बी जेंटलमैन। जेंटल ये जो शब्द है- जेंटल,इसको क्या कहोगे? जेंटल मतलब जो मृदु या कोमल,सौम्य स्वभाव का है। सज्जन को अंग्रेजी में जेंटल कहते, तो कोई कहेगा आई जस्ट यूज द टॉयलेट इन रेस्टोरंट। नाउ यू आर आस्किंग में “टू हैंड्स अप”। सारी सिक्यूरिटी फिर नख से शिखा तक- पीछे हटो/ पीछे मुड़ो- ये भी चेकउप है। ऐसी ऐसी हालत है, तो तपस्या करेंगे/ भक्ति करेंगे/
“ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे”
तो फिर हम, दैन वी बिकम जेंटलमैन।
जेंटलमैन की बात चली रही है तो प्रभुपाद जी से जब पूछा गया कि आप अपने फॉलोवर्स की पहचान कैसे करोगे? और अगर आपको एक शब्द में ही कहना है मेरा फॉलोअर ऐसा होगा, ऐसा पहचाना जाएगा। एक्जेक्टली आई डोंट नो कैसे प्रभुपाद से ये प्रश्न पूछा था कि बताइए/ कहिए, तो प्रभुपाद जी ने एक ही शब्द में बोला, “जेंटलमैन” ही विल भी लाइक अ जेंटलमैन। सज्जन होगा, सौम्य होगा, मृदु होगा। या फिर
“तितिक्ष्व: कारुणिका स्फूरिद: सर्वदेहीनाम अजातशत्रुव:” होगा। अजातशत्रु मतलब जिसका शत्रु नहीं जन्मा है, जिसने शत्रु को जन्म नहीं दिया है, जैसे युधिष्ठिर महाराज। सभी भक्त वैसे अजातशत्रु कहलाते हैं। हम अपने मित्र को क्या बना देते हैं?अपना शत्रु बना देते हैं और किसी को शत्रु को बनाने वाले हम ही होते हैं। किसी को मित्र,किसी को शत्रु इस प्रकार ये द्वंद्व में हम फंस जाते हैं। प्रहलाद महाराज के अनुसार, “ना तो हमारा कोई शत्रु है, ना मित्र है” इस संसार के शत्रुत्व और मित्रत्व जो है उसके परे है। वैसे सभी जीवों के साथ हमारा संबंध है, भगवान के साथ है, भगवान के भक्तों के साथ भी है। हमारा संबंध केवल भगवान के साथ नहीं है, भगवान के साथ और भगवान के भक्तों के साथ। लेकिन हमारा संबंध थ्रू कृष्णा है, मेरा संबंध कृष्ण के साथ है ,तुम्हारा भी कृष्ण के साथ है, और फिर हमारा तुम्हारा संबंध है। हम भगवान से इतने दूर है और जब हम लोग अधिक-अधिक भगवान की ओर, जस्ट इमेजिन जैसे में कभी-कभी ऐसा भी प्रेजेंटेशन दिया हूं। साइकिल या मोटरसाइकिल में या कोई पहिए में एक स्पोक होती है या रिम, एक्सल, स्पोक होते हैं। जो स्पोक्स होते हैं वे दूर-दूर होते हैं, शायद पता भी नहीं होगा कि एक स्पोक के बगल में कोई दूसरा भी स्पोक है। वह नहीं जानता होगा, इट डज़ंट नो। लेकिन स्पोक की अंतिम जो नोक है बाहर वाली, वहां से जब वो एक्सेल की ओर जाएगा हर स्पोक की ओर से, या हर स्पोक बाहर से एक्सेल की ओर जाएगा तो वो भगवान या एक्सेल के पास ही जा रहा है और क्या हो रहा है? एक दूसरों के पास भी जाता है कि नहीं? रहता है कि नहीं? तो सारे स्पोक जा रहे हैं एक्सेल की ओर, और उसी के साथ एक दूसरे की ओर/ पास भी आने लगते हैं और सभी जब एक्सेल के पास या एक्सेल से कनेक्ट हो जाते हैं तो फिर हो सकता है दूसरे को टच भी करें। एक्सेल को भी टच कर रहे हैं और एक दूसरे को भी टच कर रहे हैं, देख रहे हैं, ऑल टुगेदर। बद्ध अवस्था में हम भगवान से भी दूर है और एक दूसरे के भी जो संबंध है, शाश्वत संबंध/ इंटरनल रिलेशनशिप तो हम भूले हैं और फिर हम झगड़ा-लड़ाई करते रहते हैं, मारपीट करते रहते हैं, डकैती करते रहते हैं। यह नहीं जानते कि यह लोग हमारे परिवार के ही हैं, हमारे फैमिली मेम्बर्स हैं। चोरी वगैरह करने के उपरांत प्रभुपाद ये भी कहे हैं कि जब डकैती वगैरह हो गई सफलतापूर्वक, तो फिर सारा जो चोरी का माल है उसको कहीं जंगल में जाकर कर बैठेंगे, बाटेंगे और कहेंगे,” ए ऑनेस्टली, ईमानदारी से बाटेंगे”। अरे मॉल तो चोरी का है, ईमानदारी से चोरी की क्या तुमने? लेकिन ईमानदारी से बाटेंगे। संसार में ऐसे ही चलता हैं ऑनेस्टली। सारी संपत्ति तो भगवान की है।
“ईशावास्य इंदम सर्वं यात्किंच् जगत्याम…”
इस संसार में तथाकथित कुछ ऑनेस्टी चलती रहती है, लेकिन उस ईमानदारी की क्या कीमत है? इतने बदमाश रहे हम, हमने डिसऑनेस्टी के साथ में चोरी की और अब ऑनेस्ट बनना चाहते हैं। इस संसार को कृष्णभावना की आवश्यकता है घर में भी या आपके नगर में भी आप शांति से रहना चाहते हो घरवालों को या गांव वालों को भी कृष्णभक्त बनाओ या कृष्ण कॉन्शियस बनाओ, फिर आराम से रिलैक्स्ड रह सकते हैं, अदरवाइज हूं नोज़, चीटर्स और चिटैड चलता ही रहता है। संसार में चीटर्स और चीटेड चलते ही रहता है, कोई धोखा देता है तो कोई धोखा खाता है। धोखा देने वाले का आपको भी पता है, आप अनुभव कर सकते हैं, सबसे अधिक आप जिसे प्रेम करते हो, वही सबसे अधिक आपका द्वेष भी करता है। कोई साधारण ऐसे पड़ोसी से ज्यादा कुछ आपसी लेनदेन या पर्सनल कुछ ऐसा हो गया छोटा-मोटा। लेकिन जिससे आपने प्रेम किया, ही विल हेट यू द मोस्ट, यह संसार का द्वंद्व है। यह सारे अवगुणों से/ दुर्गुणों से भरा पड़ा यह संसार है। हरि हरि! क्रोध भी वैसे दिव्य क्रोध भी होता है। भगवान को भी क्रोध आता है और हनुमान भी क्रोधित हुए थे। इस संसार की स्थिति इन प्रजापतियों ने देखी, सर्वत्र जंगल है। ऐसा अपेक्षित तो नहीं था तो उनको आया है क्रोध और कुछ व्यवस्था बनाने हेतु वह जंगल को ही लगाए आग़।
“द्रुमेभ्य: क्रुध्यमानास्ते तपोदीपि तमन्यव:।
मुखतो वायुमग्निं च ससृजुस्तद्दिधक्षया।।”
क्रोध करना इज़ अलाउड, क्रोध भी दिव्य होता है। मैं भी ऐसा सोच रहा था कि मंदिर बनाने में इतनी देरी क्यों हो रही है? कोई कुछ क्यों नहीं कर रहा है? वाय लेट, वाय डिलेज़? तो मुझे भी क्रोध आ रहा है, मैं क्रोधित होने जा रहा हूं और समय-समय पर मैं व्यक्त भी करता रहता हूं अपने ढंग से अपना क्रोध। तो मेरे क्रोध को, मेरी भावनाओं को, विचारों को आप समझो। प्रभुपाद चाहते थे यहां मंदिर हो। “नागपुर, यहां पर इस्कॉन का टेंपल होना चाहिए”, श्रील प्रभुपाद की जय! श्री प्रभुपाद कई साल पहले कहके गए और अब तक यह मंदिर निर्माण नहीं हुआ है। क्यों? क्या कर रहे हैं आप? मेरे क्रोध को शांत करना चाहते हो तो क्या करना होगा? आपलोग मिलकर मंदिर बनाओ और थोड़ा जल्दी करो। पिछले साल मैं क्रोध कर रहा था लास्ट विजिट में, तो कल जब मैं वहां गया था साइट पर तो, मंदिर निर्माण का कार्य शुरू हो चुका है। तो कुछ तो आप समझ रहे हो। वैसे गेस्ट हाउस तो बन ही रहा था, लेकिन मेंन टेंपल जो श्राइन है या मेंन टेंपल कंस्ट्रक्शन वह शुरू नहीं हो रहा था। बेसमेंट में डिगिंग वगैरह हो चुका है, पीसीसी स्टार्ट हो गया है, फाउंडेशन का बेस कहो या फर्स्ट स्टेप्स, बेबी स्टेप्स। इसको धीरे-धीरे फ़्लिंथ लेवल तक लाना है और फिर बची हुई धड़ाधड़ मंजिलें खड़ी करनी हैं। इसके लिए जो भी करना अनिवार्य है, सच्चिदानंद प्रभु की अध्यक्षता में, “मयाध्यक्षेण प्रकृति”, मंदिर की आकृति या आकार साकार हो। हरि बोल!
ग्रंथराज श्रीमद् भागवतम की जय!
राधा गोपीनाथ की जय!
श्री प्रभुपाद की जय!
इस्कॉन नागपुर भक्त वृंद की जय!
निताई गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल!
