
Srimad Bhagavatam
HADAPSAR_25_31_2023_D1
25-12-2023
ISKCON Pune
हरे कृष्ण!
श्रील प्रभुपाद की जय!
श्री विट्ठल रुक्मिणी की जय!
श्री श्री राधा वृंदावन चंद्र की जय!
श्री राधा कुंज बिहारी लाल की जय!
श्री श्रीराम सीता लक्ष्मण हनुमान जी की जय!
श्री श्री गौर निताई की जय!
श्रील प्रभुपाद की जय!
संत तुकाराम महाराज की जय!
निताई गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल!
श्रील प्रभुपाद अपने कार्यक्रम कहो सत्संग कहो प्रवचन जिस गीत से प्रारंभ किया करते थे उसी से हम भी प्रारंभ करेंगे। उस गीत से आप परिचित होंगे वैसे, उसका नाम है,
“जय राधा माधव कुंज बिहारी”….
ऐसा सरल और मधुर ये गान है आप भी गईयेगा और फिर
“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे हरे राम राम हरे हरे”
कीर्तन – जय राधा माधव कुंज बिहारी……
हरिनाम संकीर्तन – हरे कृष्ण हरे कृष्ण……
इस मंत्र का उल्लेख और कीर्तन तो हम आदौ, मध्ये और अन्ते करते ही रहेंगे जो इस कलयुग का धर्म है,
“कलि कालेर धर्म हरिनाम संकीर्तन”
आप सब परिचित हो इस हरे कृष्ण महामंत्र से?कौन कौन जानता है वो हाथ ऊपर करें,सुंदर। हरि हरि!
कथा तो आप सुन रहे हो,विट्ठल-रुक्मिणी की होने वाली है,और यहां श्रीविट्ठल-रुक्मिणी भी विराजमान हैं। आप सब दर्शन कर रहे हो? किन्तु हम वहां पहुंचने ही वाले हैं पंढरपुर, पंढरपुर धाम की, श्री विट्ठल-रुक्मिणी की, वहां के संतों/भक्तों की, चंद्रभागा मैया की, गोपालपुर की, इत्यादि-इत्यादि कथाएं करने ही वाले हैं। किंतु हम कृष्ण जहां प्रकट हुए, मथुरा धाम की जय! मथुरा जहां कृष्ण जन्मे और वैसे जन्म लेते ही रातों-रात गोकुल पहुंचे।
“कृष्ण जिनका नाम है,गोकुल जिनका धाम है, ऐसे श्री भगवान को मेरा और आप सबका भी,बारम्बार प्रणाम है”
कृष्ण की वृंदावन लीलाओं का संक्षेप में संस्मरण करके हम आगे बढ़ेंगे। कृष्ण वैसे जहाँ-जहाँ जाएंगे हम भी वहाँ पहुंचेंगे, वहाँ की लीलाओ का भी श्रवण करेंगें। हरि हरि!आप श्रवण करोगे, मैं कीर्तन करूंगा और श्रवण कीर्तन से फिर स्मरण होगा-
“श्रवणम कीर्तनम विष्णु स्मरणम,”
विष्णु का , कृष्ण का या फिर राधा वृंदावन चंद्र का,फिर आगे रुक्मिणी-द्वारकाधीश का और फिर आगे पंढरपुर में विट्ठल-रुक्मिणी का हमें स्मरण होगा। कैसे?
“श्रवणम कीर्तनम विष्णु स्मरण”
विष्णु या कृष्णस्य, द्वारकाधीशस्य स्मरणम, तो मथुरा की लीलाओं का संक्षिप्त ही संस्मरण करते हुए हम आगे बढ़ेंगे। द्वारका धाम की जय! फिर द्वारका पहुंचते ही रुक्मिणी हरण लीला का स्मरण होगा, जैसे प्रभुजी स्मरण दिला रहे थे या बता रहे थे कहो। रुक्मिणी हरण लीला, रुक्मिणी मैया की जय! पहले तो रुक्मिणी का स्मरण होगा, रुक्मिणी हरण लीला, रुक्मिणी-द्वारकाधीश का विवाह होगा और फ़िर धीरे-धीरे अन्य पटरानियों के साथ भगवान का विवाह और फिर 16,100 राज पुत्रियों के साथ भगवान का विवाह। तो हो गई संख्या 16,108 और फिर उन्हीं के साथ द्वारकाधीश उतने महलों में निवास करेंगे और वहां कई सारी लीलाएं सम्पन्न होंगी। नारद मुनि भी आने वाले हैं द्वारका धाम और वे हर महल में प्रवेश करके दर्शन करने वाले हैं, वहाँ उन्होंने क्या-क्या देखा? कैसा-कैसा अनुभव रहा उनका? उनका आंखों देखा दर्शन उसका भी हम श्रवण करेंगे और फिर धीरे-धीरे और घटनाएं घटने वाली हैं, रुक्मिणी मानिनी बनेगी रूठने वाली है और द्वारका को छोड़कर दिंडीरवन चंद्रभागा के तट पर पहुंचेगी और फिर नेचुरली, जैसे सीता की खोज में राम,”सीते! सीते!” खोज रहे थे सर्वत्र या दंडकारण्य में। वैसे द्वारकाधीश भी ऑफ कोर्स,राम तो पैदल जा रहे थे पर द्वारकाधीश राजा जो हैं, तो वे रथ पर विराजमान होकर सर्वत्र खोजने वाले हैं। ये तो हम बताएंगे, अभी कथा नहीं हो रही है, मैं केवल बता रहा हूं कि हम लोग कौन-कौन सी कथा करेंगे। जब द्वारकाधीश को रुक्मिणी प्राप्त होती है तो फिर आगे क्या होता है? पुंडलिक से भी मिलने वाले हैं और फिर आगे क्या होता है? कैसे द्वारकाधीश जो रुक्मिणी की खोज के लिए गए थे, रुक्मिणी प्राप्त तो हुई किंतु रुक्मणी और द्वारकाधीश अभी विट्ठल-रुक्मिणी बने हैं, वहीं रह गए और तबसे अब तक जो विट्ठल-रुक्मिणी बने हैं रुक्मिणी द्वारकाधीश, जो भगवान प्रकट हुए थे मथुरा में, उनका कृष्ण जन्मस्थान मथुरा धाम में और फिर वृन्दावन लीला, मथुरा लीला, द्वारका लीला और फिर पंढरपुर लीला। तो वहाँ विग्रह बनते हैं सच्चिदानंद विग्रह, भगवान का विग्रह भी भगवान का अवतार होता है। और यहां तो भगवान अवतरित हुए थे ही,वही पंढरपुर में विग्रह बने। इस विग्रह की किसी ने स्थापना नहीं की, प्राण प्रतिष्ठा नहीं हुई, स्वयं भगवान द्वारका से वहाँ पहुंच गए और वहां ईंट पर खड़े हुए, “बिट्टए वर्ती… सुंदर ते ध्यानम वे……(भजन)।
भगवान वहाँ रह गए, पंढरपुर में, दूसरे एक अपने रूप से कहो या विस्तार से, लौटे तो सही द्वारका और 125 सालों तक इस धरातल पर जो लीलाएं खेल रहे थे इसका समापन हुआ। फिर कृष्ण “स्वधामोपगते” अपने स्वधाम कृष्ण लौटे तो ही, किंतु एक रूप में एक स्वरूप में वे इस धरातल पर ,संसार में रह गए और वो रूप, वो स्वरूप, वो प्राकट्य है श्री श्री विठ्ठल रुक्मिणी की जय! वैसे यह विठ्ठल-रुक्मिणी विग्रह का वैशिष्ट्य है और यह अद्वितीय है/ मैचलेस है/अनुपम है। मथुरा में प्रकट हुए भगवान,आज भी विराजमान हैं और वो रूप है श्री श्री विठ्ठल रुक्मिणी की जय! इस प्रकार हम पहुंचने ही वाले हैं पंढरपुर, विट्ठल और रुक्मिणी की लीलाएं सुनने वाले ही हैं और वैसे कह तो दिया आपको की वही गीत आज गाने वाले हैं जिसे श्रील प्रभुपाद गाया करते थे।चलो हम उसको गा ही लेते हैं लेकिन कहते-कहते मुझे और एक बात जो सुनानी है वो यह है कि आज हम गीता जयंती महोत्सव की जय! केवल दो ही दिन पहले गीता जयंती मनाई। मैं जरूर चाहता हूं और ये भागवत कथा भी तो प्रारंभ हो रही है ही तो फिर मैंने ये सोचा कि चलो हम हम गीता और भागवत की थोड़ी सी तुलनात्मक दृष्टि से इसका दर्शन करते हैं, समझते हैं। तो ये गीता और भागवत इसको पुनः तुकाराम महाराज कहे,
“गीता भागवत करिती अखंड चिंतन विठोबा चे”
तो गीता भागवत के संक्षिप्त श्रवण या तुलनात्मक दृष्टि से के कुछ बातों का श्रवण भी करेंगे और फिर वृंदावन लीला को प्रारंभ करेंगे और लगता है आजके सत्र के अंत-अंत में हम वहां पहुंचेंगे और मथुरा वृंदावन लीला का संक्षेप में श्रवण कीर्तन होगा।
“जय राधा माधव कुंज बिहारी” ….. (भजन) गाते हैं।
तत्पश्चात हरिनाम संकीर्तन…. (गायन)।
अंत में मंगलाचरण (उच्चारण)।
“सुंदर ते ध्याना उभे विठ्ठेवरी…..(तुकाराम अभंग)
“जय जय विट्ठल रुकमाई…”
“कृष्णाय वासुदेवाय देवकी नन्दनाय च।
नन्दगोप कुमाराय गोविन्दाय नमो नमः॥”
“श्रीराम चंद्र चरणौ मनसा स्मरामी
श्रीराम चंद्र चरणौ वचसा गृणामि
श्रीराम चंद्र चरणौ शिरसा नमामि
श्रीराम चंद्र चरणौ शरणं प्रपद्ये”।।
“आराध्यों भगवान ब्रजेश तनय तद धाम वृन्दावने
रम्या काचित उपासना व्रजबधु वर्गेंन या कल्पिता”
“श्रीमद भागवतम पुराण अमलम प्रेम पुमार्थो महान
श्रीचैतन्य महाप्रभु मत मिदम तत्राधरो न परः”
“नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्।।”
“नमः ॐ विष्णु पादाय कृष्ण प्रेष्ठाय भूतले
श्रीमते भक्तिवेदान्त स्वामी इति नामिने।
नमस्ते सारस्वते देवे गौर-वाणी-प्रचारिणे
निर्विशेष-शून्यवादि-पाश्चात्य-देश-तारिणे ॥”
“श्रीकृष्ण चैतन्य प्रभु नित्यानंद
श्रीअद्वैत गदाधर श्रीवासादि गौरभक्त वृंद।।”
“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे”
“ओम नमो भगवते वासुदेवाय!”(३ बार)
गीता जयंती महोत्सव की जय!
भागवत कथा महोत्सव की जय!
दोनों उत्सव यहां संपन्न हो रहे हैं। दो ही दिन पहले एकादशी थी जिस एकादशी एक नाम मोक्षदा एकादशी है तो उसी का दूसरा नाम वैकुंठ एकादशी भी है। नाम सुने वैकुंठ एकादशी? उसी दिन भगवान पहुंच गए अर्जुन को लेकर पहुंचे, “धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र संवेता युयुत्सव:” और उनके पहुंचने के पहले ही है जब वे भी पहुंच रहे थे ही, 18 अक्षौहिणी सेना भी वहां पहुंच चुकी थी। हरि हरि! वहां पहुंचने पर अर्जुन ने कृष्ण को,अब उनका नाम हो चुका है पार्थसारथी, पार्थ के सारथी को कहा,
“ सैन्यो उभयो मध्ये रथम स्थापय में अच्युत:”
हे अच्युत! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के मध्य में पहुंचा दो। क्यों? मेरे साथ कौन है जो युद्ध खेलना चाहते हैं? दिखा तो दो। तो कृष्ण ने जैसे ही अर्जुन के रथ को, वो रथ स्वयं कृष्ण का भी नहीं है, कृष्ण तो केवल ड्राइवर/ चालक थे। उन्होंने रथ आगे बढ़ाया दोनों सेनाओ के मध्य में,वहां एक वृक्ष भी था जिसका नाम अब… गीता तो अर्जुन ने सुनी किंतु उसी समय यह वृक्ष भी सुन रहा था। तो वृक्ष भी अमर हुआ, उसे अक्षयवट कहते हैं। आज भी उस गीता के उपदेश का साक्षी वो वृक्ष है वहां मौजूद है। आप गए हो कुरुक्षेत्र? जरूर जाओ। रथ को जब आगे बढ़ाया तो फिर कृष्ण कहते हैं,देखो देखो!
“पश्च ऐतान समवेतान कुरून”
तुम देखना चाहते थे न कि किनके साथ तुम्हें युद्ध खेलना है या कौन पहुंचे हैं तुम्हारे साथ युद्ध खेलने के लिए? तो देखो तो सही। “पश्च ऐतान समवेतान कुरून” कौन पहुंचे हैं? कौरव पहुंचे हैं। गीता के प्रथम अध्याय में कहे हुए केवल यह चार-पांच ही छोटे-छोटे शब्द है, इतने ही शब्द कृष्ण भागवत गीता के प्रथम अध्याय में कहे है किन्तु इन शब्दों ने अर्जुन पर एक प्रकार का जादू किया है और अर्जुन जो इतना जोश में था कि कौन है मेरे साथ युद्ध करने वाला? कृष्ण के ये वचन सुनते ही अर्जुन के मन में ,हृदय प्रांगण में, चेतना में क्रांति हुई है। ये शूरवीर अब कांपने लगा है और अर्जुन ने कहा भी,
“सीदन्ति मम गात्राणि मुखम च परिशुष्यति गांडीवम संस्श्रृते हस्तात “
मेरे हाथ कांप रहे हैं, गला सूख रहा है, मेरे हाथ से धनुष छूट रहा है और
“न श्रेयः अनुपश्यामी हत्वा स्वजनमाहवे”
और मुझे कोई श्रेय दिखाई नहीं दे रहा है, किसमें? अपने स्वजनों की हत्या करके मुझे इसमें कोई कल्याण या श्रेय नहीं दिख रहा है। धीरे-धीरे अर्जुन” मैं युद्ध नहीं करूंगा “ ऐसा कहकर अर्जुन बैठे भी है, अश्रुपूर्ण हैं , अश्रु बहा रहे है। ऐसे अर्जुन को अब कृष्ण गीता का उपदेश सुनाएंगे और उन्होंने सुनाया भी।
“श्रीभगवान उवाच” गीता सुनाई और अर्जुन ने सुनी भी और फिर क्या हुआ? “नष्टो मोहा” जो अर्जुन मोहित थे, “धर्म सम्मूढ़ चेतासा” उनकी चेतना से विमूढ़ हो चुके थे, “हृदय दौर्बल्यम “ वीकनेस ऑफ द हार्ट , हृदय दुर्बल हो गया था। तो ऐसे अर्जुन ने जब गीता के वचन सुने हैं, तो अर्जुन ने कहा,
“नष्टोमोहा स्मृति लब्धवा त्वत प्रसादान मया अच्युत:
गत संदेहा स्थितोस्मि करिश्ये वचनम तव।।”
आई ऐम रेडी नाओ, मेरा मोह नष्ट हो चुका गया है, मेरी सारी शंकाओं का समाधान हो चुका है। अब मैं स्थित/ स्थिर हो चुका हूं और आपके आदेश का पालन करने के लिए तैयार हूं। तो ये करती है गीता। संभ्रमित, मोह और माया या भागवत के अनुसार “मम अहम ममेंति” जो इस संसार के मायावी जीव हैं, वैसे हमारा माया के बाहर आने का प्रयास भी हो रहा है। यहां कथा में आए हो तो मतलब माया से मुक्त होना चाहते हो कि नहीं आप? माया क्या है? “अहम और मम” इन दो शब्दों में माया का वर्णन हुआ है, “मी आणि माज़ा”। भगवान ने कुरुक्षेत्र में गीता का उपदेश अर्जुन को कुरुक्षेत्र में, एकादशी के दिन, मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी के दिन प्रात: काल में ही सुनाई । कोई पूछ रहा था,” ओ कहां,किसने, किसको,कितने बजे सुनाई?” इन सबके उत्तर है, सारा इतिहास है, सारी घटित घटनाएं हैं, इति+ह+आस, सो ईट हैपेंड। गीता तो कुरुक्षेत्र में कही गई और भागवतम हस्तिनापुर में, हस्तिनापुर के बाहर गंगा के तट पर। इन दोनों स्थान पर वृक्ष है: कुरुक्षेत्र में अक्षयवट है जहां गीता का प्रवचन भगवान सुनाएं और गंगा के तट पर भी जहां शुकदेव गोस्वामी राजा परीक्षित को भागवत कथा सुनाएं, वहां भी एक वृक्ष है शुक्रताल में। भगवद गीता को सुनाने के लिए भगवान को 45 मिनट लगे। लेस दैन वन आवर में भगवान ने गीता अर्जुन को सुनाई। भागवत की कथा 7 दिनों तक चलती रही अहर्निश, डे एंड नाइट। जब गीता सुना रहे थे भगवान अर्जुन को, कहना भी पड़ेगा कि जो मायावी या संभ्रमित/मोहित जन है उनके लिए है भगवद गीता, ताकि वे बनेंगे भगवान के भक्त। क्योंकि कृष्ण ने कहा है,
“मनमना भव मद्भक्तो मद्याजी माम् नमस्कुरु”
मेरा स्मरण करो, मेरे भक्त बनो, उनको भक्त बनने के लिए या जीव को पुनः कृष्ण भावना/ भक्ति भावना को जागृत करने के लिए है भगवत गीता। किंतु भागवतम उनके लिए है,जैसे गीता महात्म्य में कहा है,
“सर्वोपनिषदो गावो दोगधा गोपाल नंदन:”
सारे जो उपनिषद है उसकी बन गई गए गाय, उपनिषद रूपी गाय बनी। भगवान उसका दूध दोहन करने वाले ग्वाले बने कहो और पार्थ/अर्जुन बछड़ा बने हैं और वे आस्वादन कर रहे हैं दुग्ध का, जो अमृत है। “गीतामृतम महत” इस गीता के पान को अर्जुन ने कहा, यह प्रसाद है, “तत्प्रसादात मया अच्युत:” आपके मुखारविंद से निकला हुआ यह वचन है। गीता क्या है?
“या स्वयं पद्मनाभस्य मुख पद्ममात विनिश्रितः”
गीता वे वचन है जो भगवान पद्मनाभ के मुखारविंद से निकले हुए वचन ही भगवत गीता है। इसका पान अर्जुन ने किया है और उसी के साथ वे तृप्त हुए हैं/संतुष्ट हुए हैं, माया से मुक्त हुए हैं। फिर संभ्रमित नहीं हुए किंतु हो गए, “नष्ट मोहा” इत्यादि-इत्यादि जैसे उन्होंने कहा। फिर “सुधिर भोक्ता” याने अर्जुन ने गीता अमृत का प्रसाद ग्रहण किया और फिर प्रसाद का हो जाता है महाप्रसाद। भगवान ग्रहण करते हैं या श्रील प्रभुपाद जैसे आचार्य प्रसाद ग्रहण करते हैं तो उनका फिर जो जूठन है/उच्छिष्ट है उसको महाप्रसाद कहते हैं। तो प्रसाद अर्जुन के लिए और फिर महाप्रसाद “सुधिर भोक्ता” मतलब जो बुद्धिमान लोग हैं उस गीता का श्रवण / अध्ययन करेंगे। गीता के वक्ता हुए श्रीकृष्ण और श्रोता है अर्जुन और जहां तक भागवत की बात है ये पुनः भागवत के ही वचन में प्रारंभ में ही आता है,
“निगमकल्पतरोर्गलितं फलं, शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम् ।
पिबत भागवतं रसमालयं, मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः” ॥
अर्थ:
सारे जो वेद बने हैं वे एक वृक्ष बने है और इस वृक्ष से प्राप्त होता है फल। ये वेद रूपी वृक्ष बना और उसमें लगा है फल, गलितम फ़लम याने पका हुआ फल है। और आगे क्या हुआ है? “शुक मुखाद” शुकदेव गोस्वामी को शुक़ कहां है और वैसे वे हैं भी शुक। राधा रानी के पेट पैरट , वृंदावन में राधा रानी का अपना एक निजी पालतू पेट तोता होता है,जो वैसे शुकदेव गोस्वामी के रूप में प्रकट होकर यह सारी भागवत कथा का अमृत राजा परीक्षित को सुनाते हैं। वैसे इसके रचयिता तो श्रील व्यास देव है, श्रील व्यास देव सभी 17 पुराणों की फिर 18वे पुराण की रचना किए। फिर व्यास देव ही स्वयं अपने पुत्र को, शुकदेव गोस्वामी को ये भागवत कथा पढ़ाए-सिखाए और फिर जब कृष्ण जब आए तो गीता का उपदेश सुनाए। एक गणना के अनुसार कृष्ण 100 वर्षों से इस धरातल पर थे, भगवान की उम्र का तो कोई हिसाब नहीं क्योंकि वे सनातन हैं,वे सच्चिदानंद हैं, सत चित और आनंद, सत मतलब शाश्वत हैं। पर उस समय वे 100 वर्ष के थे जब वे अर्जुन को गीता का उपदेश सुनाए। जन्म हुआ मथुरा में और फिर 125 सालों के उपरांत भगवान अपने धाम लौटे।
“श्याम त्यत्वा स्वपदम गत: , तद दीना कलिराया त:”
इसका मतलब पृथ्वी को त्याग कर भगवान स्वपदम गत: अपने धाम को प्राप्त किए/ अपने धाम लौटे। उसी दिन से कलयुग प्रारंभ हुआ, उस दिन से द्वापर युग का अंत हुआ जिस दिन भगवान अपने धाम चले गए। वैसे भगवान संसार में नहीं रहे, ये समाचार अर्जुन ही द्वारका से हस्तिनापुर आकर दिया। बैड न्यूज़,अच्छा समाचार नहीं था। कुंती ने समाचार सुनते ही प्राण त्याग दिए।
“पुण्यायितम जगत सर्वम गोविंद विरहेन में”
गोविंद के बिना ये संसार बेकार है, संसार में अब कुछ नहीं अगर कृष्ण नहीं रहे। उसी समय पांचों पांडव और द्रौपदी, दे आर गोइंग टू रिटायर, वे प्रस्थान करने वाले है बद्रिका आश्रम की ओर और फिर स्वर्गारोहण और जहां भी कृष्ण है वहां उनको पहुंचना है। प्रस्थान करने के पहले सभी पांडवों ने, युधिष्ठिर महाराज ने महाराज परीक्षित को सम्राट बनाया। सारे पृथ्वी के सम्राट बन गए राजा परीक्षित, परीक्षित को पृथ्वीपति भी कहा है। हरि हरि! एक समय सारी पृथ्वी का कारोबार, हस्तिनापुर वाज़ द कैपिटल, वहां से सारा कारोबार संभाला जाता था। सारी पृथ्वी ही थी भारत, …महा…भारत। महाभारत का जो ग्रन्थ है, इसको “हिस्ट्री ऑफ ग्रेटर इंडिया” ऐसा प्रभुपाद लिखते हैं। सारी पृथ्वी पर भारत वर्ष फैला हुआ था। आरी पृथ्वी और यही संस्कृति से सुसंस्कृत लोग थे और
“एकम शास्त्रं देवकीपुत्र गीतम” सारी पृथ्वी पर बस एक ही शास्त्र,
“गीता सुगीता कर्त्तव्यः किमन्ये शास्त्र विस्तारै:” ऐसा भी कहा है कि जब गीता है उपलब्ध, तो अन्य शास्त्रों की आवश्यकता ही क्या है? तो एकम शास्त्रं देवकी पुत्र गीतम, सारे संसार भर में एक ही शास्त्र था ये 5,000 वर्ष पूर्व की बात है और जिन धर्मों के नाम आप जानते हो या हम सभी जानते है, ये सब बच्चे धर्म है। हरि हरि! कोई 500 वर्ष पुराना है कोई 1400 वर्ष पुराना ये आप जानते हो। कौनसा 2,000 इयर्स ओल्ड है, आज हैप्पी क्रिसमस टू यू ऑल! आज जीसस क्राइस्ट का बर्थडे तो नहीं है, रिसरेक्शन डे है। उनको सूली पर चढ़ाया तो था फिर जब उतारें तो उनको समाधिस्थ करना था पर वे उठ गए। ही जस्ट गॉट अप। तो वो आज का दिन है, वो भी एक धर्म है, क्रिश्चियेनिटी 2,000 इयर्स ओल्ड और बुद्धिज़्म 2,500 वर्ष पुराना है और भागवत धर्म? वैसे हिंदू धर्म के नाम से जो धर्म प्रचलित हुआ है शास्त्रों में तो जैसे गीता,भागवत, पुराण इनमें कही पर भी हिंदू नाम आता ही नहीं। हिंदू..हिंदू.. इंडस.. सिंधु वैसे सिंधु नदी के उस पार जो लोग रहते है न, तो सिंधु से फिर बना हिंदू, ऐसे अपभ्रंश होते हुए उन लोगों का हिंदू नामकरण औरों ने किया हुआ है। हमारे शास्त्रों में भी यह हिंदू नाम नहीं है। हमारे शास्त्रों में जो धर्म है उसका नाम है सनातन धर्म की जय! भागवत धर्म की जय! और जैव धर्म, यह धर्म सभी जीवों का है। भागवत धर्म, जो भागवत कथा या भागवत ग्रन्थ पर भी आधारित है, वो भागवत धर्म/ सनातन धर्म हर जीव का यही धर्म है। भगवान कहे गीता में,
“सर्वस्य चाहं हृदी सन्निविष्टो”
सभी के हृदय प्रांगण में मैं विराजमान हूं, कब कहे भगवान? 5000 ईयर एगो। गीता कितनी पुरानी है? आप कहोगे 5,000 इयर्स एगो, कोई दिखा भी रहे मुझे 5 थाउजेंड इयर्स एगो। लेकिन गीता कहते समय ही भगवान,
“इमम विवस्वते योगं प्रोत्तवान अहम अव्ययम”
हे अर्जुन! जो ज्ञान मैं तुम्हे आज अभी दे रहा हूं यह ज्ञान मैंने विवस्वान देवता को, सूर्य देव को दिया हुआ था लाखों वर्ष पूर्व। वही ज्ञान मैं पुनः तुम्हे दे रहा हूं। फिर आप कहोगे कि 5,000 वर्ष पुरानी नहीं है भगवद गीता,ये तो लाखों वर्ष पुरानी है,करोड़ों वर्ष पुरानी है। लेकिन यह भी सच नहीं है क्योंकि यह गीता शाश्वत है, सनातन है।
“एकम शास्त्रं देवकीपुत्र गीतम “
एक ही शास्त्र पर्याप्त है। “एको देवो देवकीपुत्र एव” एक ही देव,आदिदेव है और वे है देवकी पुत्र / देवकी नंदन।
“गोपाला गोपाला, देवकीनंदन गोपाला
देवकीनंदन गोपाला देवकीनंदन गोपाला….
पांडवों ने राजा परीक्षित को सम्राट बनाया, राज्याभिषेक किया, वे सिंहासनस्त हुए और 30 वर्ष उन्होंने कारोबार संभाला भारत वर्ष का। फिर उनको,जो भी उन्होंने किया, उसका शाप मिला, ‘विदिन सेवन डेज तुम्हारी मृत्यु होगी’। परीक्षित राजा की मृत्यु होगी, यह समाचार मिलते ही राजा परीक्षित अपने सारे कारोबार की जिम्मेदारी अपने पुत्रों को देते है और अपनी राजा/सम्राट की वेशभूषा को उतारते है, बस केवल लंगोट ही धारण करते हुए वे गंगा तट पर पहुंच जाते हैं। थिस वाज़ अ वे ऑफ फास्ट कम्युनिकेशन, सारे ब्रह्मांड भर में समाचार पहुंच गया कि राजा परीक्षित को श्राप मिला हुआ है, विदिन सेवन डेज वो नहीं रहेंगे और वह वैराग्यवान बनकर गंगा के तट पर पहुंचे है। सारे संसार भर के राजर्षी/ महर्षि/देवर्षि वहां पहुंच जाते है और विचार विमर्श हो रहा था कि अब यह जो सात दिन बचे हुए है, तो कैसे बिताना चाहिए उनको अपना यह समय? तो कई सारे प्रस्ताव आए : इनको दान-धर्म करना चाहिए, तीर्थयात्रा करनी चाहिए़, अष्टांग योग करना चाहिए,ऐसे कई सारे विचार विमर्श हो रहे थे, प्रस्ताव रखे जा रहे थे। इतने में शुकदेव गोस्वामी जी पधारते है, शुकदेव गोस्वामी जी की जय! जैसे ही पता चलता है शुकदेव गोस्वामी वहां पधार चुके है तो वह उपस्थित सभी जन, इंक्लूडिंग ऑफ कोर्स राजा परीक्षित, शुकदेव गोस्वामी की अगवानी करने हेतु खड़े होते है। उनको आसन दिया जाता हैं और अब ये जो कई सारे प्रस्ताव रखे जा रहे थे कि इनको ये करना चाहिए आदि, यह सब बातें ठप्प हो जाती हैं। अब शुकदेव गोस्वामी आए हैं तो वह क्या होगा? “शुक मुखादमृत द्रव संयुतम” शुकदेव गोस्वामी मुखारविंद से निकलने वाले वचन, कथामृत का अब पान राजा परीक्षित करेंगे। यह भी विचार हो रहा है कि लक्ष्य क्या है? सातवें दिन तक क्या होना चाहिए? या अंतिम क्षण क्या होना चाहिए? “अंते नारायण:स्मृति”, अंत में नारायण की स्मृति हो।
“यम यम वापी स्मरण भावं त्यजंते कलेवरम” गीता में कृष्ण कहे जीवन के अंत में जिसका हम स्मरण करेंगे, “तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भव भाविता” , हम वैसे ही बन जायेंगे। राजा भरत ने हिरण का स्मरण किया हुआ था मृत्यु के समय,तो कौन बन गए? अगले जीवन में हिरण बन गए। लाइक दैट कई सारे उद्धरण हैं।
“इतना तो करना स्वामी जब प्राण तन से निकले”, प्रार्थना होती हैं/ होनी चाहिए, क्या प्रार्थना? इतना तो करना हे स्वामी!जगन्नाथ स्वामी! “गोविंद नाम लेकर तब प्राण तन से निकले” गोविंद का नाम लेकर यदि प्राण तन से निकले, मतलब क्या? अंते नारायण स्मृति:, तो यह उद्देश्य सफल हो, कैसे होगा? “श्रवणं कीर्तनं विष्णो स्मरणं” श्रवण कीर्तन यदि नारायण का, कृष्ण का या राम का, या पांडुरंग पांडुरंग पांडुरंग! का करेंगे, तो क्या स्मरण होगा? पांडुरंग का स्मरण, राम का स्मरण, कन्हैया लाल की जय! हरि हरि! एक व्यक्ति की अब जान लगभग जा रही थी, तो उसके परिवार के सदस्य वहां उपस्थित थे। वैसे यह परिवार थोड़े भोलेनाथ या भोला के पुजारी/उपासक थे। बच्चों ने कहा डैडी बस आपकी एक-दो सांस ही बची हैं, आप भोला! भोला! तो कहो। लेकिन पता है डैडी ने क्या कहा? कोका कोला! कोला! फिर वे गए कोका कोला लोक, जैसे अमेरिका। दिस इज द ट्रबल, जिसका जीवन भर हम स्मरण या चिंतन करते रहेंगे फिर वही बात याद आयेगी। यहां कई सारे ज्वेलर्स हैं हैंडस्पर में,पुणे में। मैं देखता रहता हूं, दिस ज्वैलर दैट ज्वेलर को। एक सोना-चांदी का व्यापारी अब व्यापार करते-करते बूढ़ा हो गया, बुखार हुआ था और डॉक्टर भी आए और टेंप्रेचर देख लिया और कहां 105 है। यह बात जब वो बूढ़े मरीज ने सुनी तो कहा, बेच दो! बेच दो! बेच दो! उसने यह सोचा कि मैंने जब सोना खरीदा था तो एक तोले का भाव तो 80 रुपए था और अब उसका भाव क्या हुआ? 105 हुआ है। इसलिए बेच दो! बेच दो! हरि हरि! इसलिए सावधान रहें। शुकदेव गोस्वामी ने कथा राजा परीक्षित को सुनाई है। गीता सुनाई थी कृष्ण ने अर्जुन को। अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु और अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित। जब वो महाभारत का युद्ध हो रहा था तो ये परीक्षित महाराज उत्तरा के गर्भ में थे और अब तो उन्होंने जन्म भी लिया है, सम्राट भी बने हैं और अब तो प्रस्थान का समय है जब उन्हें भगवत कथा का श्रवण करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, उसी परिवार में। अर्जुन की प्रपौत्र रहे, पुत्र फिर प्रपौत्र।गीता के अंत में कृष्ण एक बात जरूर कहे हैं,
“सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकम् शरणम् ब्रज”
मेरी शरण में आओ।
“मन्मना भव मद्भक्तो मध्याची मां नमस्कुरु”
मुझे नमस्कार करो, मेरी शरण में आयो, यह गीता के अंत में कहा है। और वैसे जब हम भागवत खोलते हैं, भागवत के प्रारंभ में ही क्या कहा है? “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय!” या नमस्कार भी हो रहा हैं और वासुदेव को नमस्कार हो रहा है। भागवत का अध्ययन या अध्ययन भी कहो या श्रवण करने वाले को यह ज्ञात होता है या ऐसे प्रारंभ होता है। “वासुदेव सर्वमिति” गीता में कृष्ण कहे है।
“बहुनाम जन्मनामन्ते ज्ञानवान माम् प्रपद्यते” बहुत जन्म जन्मांतर के उपरांत व्यक्ति को पता चलता है, वासुदेव इज़ ऑल इन ऑल, वासुदेव ही सब कुछ है। “वासुदेव हरि” ये पंढरपुर में विट्ठल मंदिर में यह कहने की प्रथा भी है। “वासुदेव हरि हरि! वासुदेव हरि हरि!” सब समय चलता है,वासुदेव हरि हरि! जो करने के लिए कहा है गीता के अंत में, कृष्ण कहे है शरण में आओ,“सर्वधर्मान् परित्यज्य” और “माम् नमस्कुरू” तो भागवत खोलते ही,” ॐ नमो भगवते वासुदेवाय!”और साथ ही साथ क्या है?
“धर्म प्रोजझित कैतवोत्र निर्मात्सराणाम सत्ताम”अन्य जो धर्म या गौण धर्म है या फिर ऑफ कोर्स जो अधर्म भी है उसको परित्याज्य, उसको त्यागो। भागवत में जो कैतव धर्म हैं, झूठ-मूठ का हो या पाखंड या जिसमें गौण बातें हो,उनको त्यागो । और करो क्या? “मां एकम शरणम् व्रज” मेरी शरण में आओ। और ऐसा तुम करोगे तो,
“मोक्षयिष्यामि मा शुच:” कृष्ण कह रहे हैं मैं तुम्हे मुक्त करूंगा।तुम क्या करोगे?
“सर्वधर्मान् परित्यज्य माम् एकम् शरणम् व्रज” मेरे अकेले की शरण में आओ या जाओ,
“अहम त्वं सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:” फिर डरो नहीं, मेरी शरण में आयो।
डू नोट फियर, ई ऐम हीयर, ओ डियर, कम हीयर। ऐसा ही कुछ कृष्ण कह रहे हैं गीता के अंत में मेरे पास आयो, डू नॉट फियर,आई ऐम हीयर। मेरी शरण में आयो, मेरे अकेले की शरण में आयो और यही हम भागवत में देखते है, जो करने के लिए कहा है। भगवान गीता में करने के लिए कहे है या अंत में भी जो करने के लिए कहे है, वह सारी बातों का वर्णन विस्तृत वर्णन भागवत में हमको पढ़ने को मिलता है या सीखने को मिलता है। उस पर अमल करने का अवसर और प्रेरणा भी भागवत हम को देता है। या गीता में तो कृष्ण कहते हैं अपने धाम के बारे में
“न तद् भासयते सूर्यो न शशांको न पावकः
यदगत्वा न निवर्तन्ते तद धाम परमं मम”
बस एक श्लोक में संक्षिप्त में भगवान ने अपने धाम का वर्णन किया, अब विस्तृत वर्णन करने का समय भी तो कहां था, “सेनयो उभयो मध्ये” दोनों सेना के मध्य में रथ खड़ा है और वही पर संवाद हो रहा है युद्ध के, महायुद्ध के, बिग बैटल वर्ल्ड वार के बीच में संवाद हो रहा है। तो वहां विस्तार से बाते कहां होगी? लेख जो जो संक्षिप्त में कहा या
जो सिद्धांत कहे हैं गीता में, उसके दृष्टांत हमें भागवत में मिलेंगे। तो यहां तो थोड़ा ही उल्लेख हुआ धाम का, श्रीमद भागवत में अध्यायों के उपरांत अध्याय हैं। वैसे गीता में, कुल ७०० श्लोक ही हैं भगवद गीता में। वैसे कई बार हम सभी को, हम सभी में से कइयों को पता नहीं होता कि गीता और भागवत दो ग्रन्थ है क्या? अलग-अलग है क्या? कुछ लोग सोचते गीता ही भागवत है, भागवत ही गीता है। ये दो अलग- अलग ग्रन्थ हैं,वैसे अलग-अलग ग्रन्थ हैं भी और नहीं भी हैं। ये एक दूसरे के पूरक भी हैं,दे कॉम्प्लीमेंट इच अदर। जहां एक का समापन होता है,पूर्णाहुति होती है दूसरे का वहां आरम्भ भी होता है। हरि हरि! गीता का सार है भक्ति कहो। सभी योगियों में,
”योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना ।
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मत:” ॥
भक्तियोग याने स्ट्रांगली रिकमेंड किया की भक्ति करो, मेरे भक्त बनो और भागवत केवल भक्ति ही भक्ति है,भक्तिमय ग्रन्थ हैं और कई सारे असंख्य भक्तों के जीवन चरित्र जैसे ध्रुव महाराज, प्रहलाद महाराज,युधिष्ठिर महाराज,दिस महाराज,दैट महाराज,ये भक्त, वो भक्त । क्योंकि भगवान वैसे तो अकेले है नहीं,न तो भगवान अकेले लीला भी खेल सकते है। तो उन सारों भक्तों के चरित्र के और उनकी की हुई भक्ति भी-
“श्रवणं कीर्तनं विष्णो: स्मरणं पादसेवनम् ।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्” ॥
तो गीता में भक्ति करो, भक्ति करो कहा,भागवत में प्रहलाद महाराज यूँ कह रहे है, नवविधा भक्ति,भक्ति के नौ प्रकार हैं और उसका विस्तृत वर्णन है। शायद मैने बताया कि नहीं कि भगवान के धाम का विस्तृत वर्णन है,अध्याय के ऊपर अध्याय भागवत में मिलेंगे , भगवत धाम का वर्णन ऐज़ इट इज़, जैसा भी है वर्णन या जैसा धाम है उसका वर्णन भागवत में है। इस प्रकार भगवान से,भगवान के धाम से, भगवान के भक्तों से,भगवान की लीलाओं से हम परिचित होते हैं। भागवत के श्रवण कीर्तन से और स्मरण से और फिर गीता में..हरि हरि! भगवान वैसे हम सभी को आमंत्रित करते बारंबार,”यद्गत्वा न निवर्तन्ते” मेरे पास जो आता है,मतलब मेरे पास आओ और एक बार आओगे तो मेरे साथ ही रहोगे।
”जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः”
गीता में तो कहा मेरा जन्म,मेरे कर्म को जो जनता है,तो कैसे जानेंगे हम भगवान के जन्म को? भागवतम पढ़ना होगा। मेरे कर्म को जानो,भगवान के कर्म को कर्म नहीं कहते, भगवान के कर्म को लीला कहते हैं। भागवत में भगवान का जन्म,लीला का खूब वर्णन पढ़ो और ऐसा पढ़ोगे तो सुनोगे समझोगे.. हरि हरि,तो क्या होगा?
“त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन”
तुम मेरे धाम लौटोगे ,मैं जहां रहता हूँ वहाँ तुम आओगे,ऐसा कृष्ण कहते हैं और अंत में भी कहे यदि तुम मेरा स्मरण करोगे,
“मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु मामेवैष्यसि…”
मुझे ही प्राप्त होंगे ,मैं जहां रहता हूं वहां तुम लौटोगे। भगवान का इस संसार में आने का और फिर गीता का उपदेश सुनाने का उद्देश्य ये है कि भगवान हमें आमंत्रित कर रहे हैं, प्लीज़ कम बैक होम, बैक टू होम,बैक टू गोड हैड । इसी का प्रचार भक्तिवेदांत श्रील प्रभुपाद की जय! इतना ज़ोर दिए प्रभुपाद कि भगवद धाम लौटो,भगवद धाम लौटो और वहीं हुआ।
तुकाराम महाराज भी कहे – “अमि ज़ातो अमचा गांवा …(कीर्तन)…
तो तुकाराम महाराज जा रहे थे,जाते जाते उन्होंने ऐसा कहा। फिर ऐसे कई प्रश्न थे लोगों के कि वैकुण्ठ होता है क्या? हू हैज़ सीन? किसने देखा है? तो विमान कहां से आया? दिल्ली से फ्लाइट नहीं आयी थी न न्यूयॉर्क से और जिस समय एक भी एयरपोर्ट,एक भी विमानतल इस पृथ्वी पर नहीं था, उस समय देहु बन गया एयरपोर्ट और द शटल सर्विस, देहु और वैकुण्ठ से डायरेक्ट सर्विस नॉनस्टॉप, बीच में स्वर्ग वगैरह में कहीं रुके नहीं तुकाराम महाराज, सीधे बैक टू होम। आमी जातो आमचा गांवा। तो गांव, कौन सा गांव? तुकाराम महाराज जब बैठे थे वैकुण्ठ विमान में बैठे तो वहां के लोगों ने शायद पूछा होगा क्या? आमी जातो आमचा गांवा … महाराज बसुन आपला गांव तो इथा है कि विमान बैस्ने की का आवश्यकता? आपन चला जाऊ के? किंतु तुकाराम महाराज जिसको मेरा गांव,आमचा गांव मानते थे वो गांव है देवाचा गांव। भगवान जहां सदा के लिए रहते हैं, वैकुंठ धाम या गोलोकधाम,वृंदावनधाम,मथुराधाम, द्वारकाधाम। “परतस्मातो” इस जगत के परे भागवत धाम है, तो वहां से विमान आया था, तुकाराम महाराज उस विमान में बैठ कर भगवदधाम लौटे, अपने गांव। जो गांव भगवान का गांव तो वही गांव हमारा, हमारा मदर लैंड – फादर लैंड है। अमेरिका इज़ माई मदर लैंड, रशिया माई मदर लैंड,इंडिया माई मदर लैंड, अरे बाबा! हम मदर कौन है?फादर कौन है? ये ही नहीं पहचानते..
“विट्ठू मा लेकुरवाडा .. (कीर्तन)।
“त्वमेव माता त्वमेव पिता त्वमेव बंधु सखा त्वमेव,मम सर्व देवदेवा:।”
“माता धाता पितामह:”, मदर लैंड कौन सा हुआ? फादर लैंड कौन सा हुआ? जहां हमारी मदर रहती है, फादर रहते है,कृष्ण / पांडुरंग / विठोबा, वही तो हमारा भी लैंड है। भगवान यहां आकर हमें आमंत्रित करते हैं। यह भागवत कथा का श्रवण, अध्ययन और स्मरण का उद्देश्य,
“कृष्ण प्राप्ति होय जहां होईते” … कृष्ण प्राप्ति/ भगवत प्राप्ति, यह जीवन का लक्ष्य है।
(हरे कृष्ण महामंत्र कीर्तन)…
भागवत के अंत में, गीता के अंत में क्या कहा है अभी जो आपको बताया। फिर भागवत के प्रारंभ में क्या उल्लेख हुए हैं यह भी आप सुने। भागवत का जो अंतिम श्लोक है। 12 वां स्कंध, 13 वां अध्याय और श्लोक संख्या 23 में याने 18,000th मतलब 18,000वाँ जो श्लोक है, वचन है उसमें कहा है,
”नामसङ्कीर्तनं यस्य सर्वपापप्रणाशनम्”
नाम संकीर्तन हम करेंगे, नाम संकीर्तन से क्या होगा? सर्व पाप प्रणाशनम।
“प्रणामो दु:खशमनस्तं नमामि हरिं परम्”
तो वैसे गीता के अंत में जो बात कहे कृष्ण,
“मामेकं शरणं व्रज” मेरी शरण में आओ, मेरी शरण में आओ। ओके आ गए, तो अब आप क्या करोगे?
“अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:’ मैं तुम्हें मुक्त करूंगा, मोक्ष दूंगा मैं क्योंकि मोक्षदाता तो मैं ही हूं। आई एम इन कमांड। भागवत के अंत में नाम की शरण में आओ,
“नामसङ्कीर्तनं यस्य सर्वपापप्रणाशनम्” जो नाम का उच्चारण करता है, नाम की शरण लेता है तो क्या होगा? सर्वपापप्रणाशनम्, सेम थिंग।। वहां कह रहे है गीता में “मेरी शरण में आओ, मेरी शरण में आओ, मैं तुमको मोक्ष दूंगा” । भागवत के अंत में भगवान कह रहे है नाम की,मेरे नाम की शरण में जाओ,मेरे नाम की शरण में जाओ।
“नामसङ्कीर्तनं यस्य सर्वपापप्रणाशनम्” भगवान का नाम और भगवान, दो नहीं है या अलग नहीं है, एक ही है, वन एंड द सेम।
“अभिनत्वात नाम नामिनो” ऐसा कहा है?
“नाम चिंतामणि चैतन्य रस विग्रह:,
पूर्ण शुद्ध नित्य मुक्त, अभिनत्त्वां नाम नामिनो”
मेरा नाम और मैं एक ही हूं। वहां कह रहे हैं मेरी शरण में आओ गीता में कह रहे हैं। भागवत के अंत में कह रहे हैं कि नाम की शरण में जाओ। हरि हरि! तो भागवत के बाद और एक ग्रंथ आता है, उसका नाम है चैतन्य चरितामृत कहो या चैतन्य भागवत कहो या चैतन्य मंगल नामक एक ग्रंथ है। इसमें बस केवल कीर्तन ही कीर्तन की महिमा है और उन ग्रंथों में श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु की जय! जब कलियुग में भगवान प्रकट हुए चैतन्य महाप्रभु के रूप में, उनकी सारी लीलाओं में मुख्य लीला तो कीर्तन लीला ही होती थी।
“प्रेमे ढल-ढल सोनार अंग चरण नूपुर बाजे”
वृंदावन में रास क्रीडा में नृत्य करने वाले श्रीकृष्ण कलयुग के प्रारंभ में चैतन्य महाप्रभु के रूप में प्रकट होकर नृत्य किया करते थे।
“सुंदर लाला शची दुलाला नाचत श्रीहरि कीर्तन में” और
“चैतन्य महाप्रभुर कीर्तन नृत्य गीत”, कीर्तन ,नृत्य और
“वादित्र माध्यान मनसौ रसेन” वाद्य बजते थे “तथाई तथाई बाजेल खोल ,घन घन झांझेरे रोल.. “
चैतन्य महाप्रभु के संकीर्तन में तथाई-तथाई बाजेल खोल याने मृदंग या पखावज चलता है। महाराष्ट्र में वारकरी पखावज बजाते हैं। हमारे गौड़ीय वैष्णव का जो कीर्तन उसमें मृदंग..नो! नो! दोनों ही बज रहे हैं यहां तो,पखावज और मृदंग। मृदंग को ही खोल कहते हैं, तो खोल बजता और चैतन्य महाप्रभु नृत्य करते।
“प्रेमे ढल-ढल सोनार अंग चरने नूपुर बाजे…” गीता प्राइमरी स्टडी है/ प्रीलिमिनरी स्टडी/ प्राथमिक अध्ययन ऐसा श्रील प्रभुपाद समझाते थे। भागवतम मतलब ग्रेजुएशन कोर्स और चैतन्य चरितामृत / चैतन्य भागवत की स्टडी याने पोस्ट ग्रेजुएशन या पी. एच. डी. लेवल का सिलेबस और कोर्स है और उसके केंद्र में वैसे कीर्तन ही है,
“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे”
तो आइए थोड़े समय के लिए आज तो, आगे की जो कथा मैंने कहा तो था कि थोड़ी वृंदावन की कथा से प्रारंभ करेंगे फिर कृष्ण मथुरा जायेंगे तो वहां की भी कथा होगी और फिर कृष्ण को द्वारका में पहुंचाएंगे आज ही। लेकिन ये गीता-भागवत का थोड़ा जो संस्मरण या तुलनात्मक दृष्टि से हमने जो अभी इसको समझने-समझाने का प्रयास किया उसीमें समय बीत रहा है। चलो हम कीर्तन करते है थोड़े समय के लिए एंड दैन देयर विल बी अनाउंसमेंटस और आगे की कथा होगी। पुनः मैने आपका स्वागत वैसे तो नहीं अलग से नहीं किया, मन ही मन में किया तो सही। आप सभी का मैं हार्दिक स्वागत, इट्स नेवर टू लेट या बैटर लेट देन नेवर जैसी बात है। अभिनंदन आपकी उपस्थिति के लिए। हरि हरि ! आज यहां पधार कर इस भागवत कथा के प्रथम दिवस पर आप क्या कथाव्रती बन रहे हो? “मैं ये कथा प्रतिदिन, सात दिनों तक श्रवण करूंगा” कोई हाथ नहीं उठा रहें, तो ऐसा संकल्प जो करते हैं उनको कथाव्रती कहते है। अलग-अलग व्रत होते हैं, एकादशी व्रत ,ब्रह्मचर्य व्रत, पतिव्रत और कई सारे व्रत। तो कथाव्रत भी एक व्रत है और जो यह व्रत लेते हैं उनको कथावृती कहते हैं। आप सब कथावृति बन रहे हो आज? सोच कर कहो भी और हाथ भी उठाओ । यस? वंस मोर हम देखना चाहते हैं। ओके गुड! थैंक यू धन्यवाद!
अभी कोई अनाउंसमेंट है या कीर्तन करना है? कीर्तन करने में कभी नहीं थकना, वैसे कथा को सुनने में भी आलस कभी भी नहीं करना चाहिए। यह कथा और कीर्तन को उत्साह के साथ, “उत्साहात निश्चयात धैर्यात” हमें करना चाहिए। इस कीर्तन को भी साथ में आप ले जाओ, यह कीर्तन भी भगवान है, कथा भी भगवान है। गीता भागवत वैसे वांग्मयी मूर्तियां है, स्पेशली यह जो नाम है। जो मंदिर में मूर्तियां होती हैं वे तो मंदिर में ही स्थापित रहती है, हम जाते हैं दर्शन करने के उपरांत विग्रह तो मंदिर में रहते हैं। किंतु यह जो
“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे हरे राम हरे राम राम हरे हरे”
यह भी भगवान की वांग्मयी मूर्ति है,
“अभिनत्त्वात नाम नामिनो” यह भी भगवान है, यह भी सच्चिदानंद विग्रह है। इनको तो हम और आप कहीं पर भी ले जा सकते हैं। आप जहां भी जाओगे आपके साथ भगवान का नाम। इट्स गुड इंडिया? आप चाहोगे भगवान सदा आपके साथ रहे? मे गॉड बी विद यू, में गॉड बी विद यू ऑलवेज,भगवान आप के साथ सदैव रहे, ऐसा लोग कहते हैं। ऐसा मैं कह रहा था चलो मैं भी कह रहा हूं कि भगवान आपके साथ सदैव रहे। डू यू लाइक दिस आइडिया? आपको पसंद है यह बात? आप स्वीकार कर रहे हो? हरि हरि!
“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे”
इसका साथ ना छोड़िए आप। यह नाम भी फिर आपको अकेले नहीं छोड़ेगा।
(“हरे कृष्ण महामंत्र कीर्तन”)
