
Srimad Bhagavatam
HADAPSAR 25-31-2023 D4
28-12-2023
ISKCON Pune
श्री श्री विट्ठल रुक्मिणी की जय!
आपने कहा, कुछ कहा? विट्ठल रुक्मिणी की जय!
पंढरपुर धाम की जय!
श्रील प्रभुपाद की जय!
संत तुकाराम महाराज की जय!
निताई गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल!
जिनकी कथा होनी है आज उनके गुण गाते हैं या उनका एक गीत गाते हैं।
“सुंदर ते ध्यान उभे विटेवरी….”
ये वो गीत है जिससे आप परिचित हो। यहां बगल वाले गांव देहू में ही संभावना है, वहीं पर तुकाराम महाराज इसकी रचना किए होंगे, ये अभंग उनके हृदय प्रांगण में प्रकाशित हुआ होगा। वैसे तो 4,000 अभंग लिखे हैं तुकाराम महाराज ने, कितने? चार हज़ार और उनमें भी यह अभंग विशेष है। महाराष्ट्र के कीर्तनकार/ कीर्तन मंडलियां जो हर गांव में है, हर नगर में, हर ग्राम में हैं, कीर्तन मंडली मेरे गांव में भी है। मैं भी जब बालक था तो मैं भी बैठा करता था उस कीर्तन मंडली के साथ, हर कीर्तन में इस अभंग का जरूर गान होता है-
“सुंदर ते ध्यान उभे विटेवरी।
कर कटावरी ठेवूनियां ॥
तुळसी हार गळां कासे पीतांबर।
आवडे निरंतर हेचि ध्यान ॥
मकरकुंडले तळपती श्रवणी।
कंठी कौस्तुभमणि विराजित ॥
तुका म्हणे माझे हेचि सर्व सुख।
पाहीन श्रीमुख आवडीनें ॥”
हरि हरि!
तुकाराम महाराज विट्ठल रुक्मिणी का दर्शन करते-करते, करते हुए ही इस अभंग की रचना किए हैं, मानो वे विट्ठल को देख रहे हैं, उनका दर्शन कर रहे हैं और साथ में लिख भी रहे हैं,
“सुंदर ते ध्यान”, ध्यान कैसा है दर्शन का? “सुंदर ते ध्यान उभे विटेवरी” और ईट पर खड़े हैं। यह सारा वर्णन है,” कर कटावरी” और कैसे खड़े हैं भगवान? और गले में क्या पहने हैं? “तुलसी हार गड़ा” गले में तुलसी की माला और पीतांबर वस्त्र पहने हुए और कानों में कुंडल पहने हैं मकर कुंडल, जैसे मकर की आकृति कुंडल हैं और गले में कंठी कौस्तुभमणि विराजित है। “तुका मने माझे हेचि सर्व सुख” बस इसी दर्शन में ही मुझे सुख है, हरि हरि! “पाहीन श्रीमुख आवडीनें” उन्होंने दर्शन करते- करते अभंग की रचना की है तो इस अभंग को गाते-गाते श्रवण करते-करते हमें विट्ठल का दर्शन करना है। तुकाराम महाराज हमें विट्ठल का दर्शन करा रहे हैं, दिखा रहे हैं, पश्य /देखो तो सही। क्या देखना है? “सुंदर ते ध्यान” आइए हम सब गाएंगे मतलब मैं भी गाऊंगा और फिर आप भी पीछे-पीछे गा सकते हो। आप तैयार हो? इस प्रकार हम प्रारंभ में कीर्तन करते हैं, अंत में भी कीर्तन होता है और मध्य में कथा होती है। कीर्तन- कथा-कीर्तन इसलिए कहा सैंडविच। लोफ ऑफ़ ब्रेड ऑन द टॉप एंड वन ऑन द बॉटम और बीच में बहुत कुछ आप भर देते हो, चीज एंड दिस वन, दैट वन। कथा और कीर्तन/ कीर्तन- कथा- कीर्तन,
“सुंदर ते ध्यान उभे विटेवरी।
कर कटावरी ठेवूनियां ॥
तुळसी हार गळां कासे पीतांबर।
आवडे निरंतर हेचि ध्यान ॥
मकरकुंडले तळपती श्रवणी।
कंठी कौस्तुभमणि विराजित ॥
तुका म्हणे माझे हेचि सर्व सुख।
पाहीन श्रीमुख आवडीनें ॥”
“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे”………(हरिनाम संकीर्तन)
“विट्ठल विट्ठल विट्ठल विट्ठल विट्ठल विट्ठल विट्ठल”…. (कीर्तन)
“निताई गौर हरिबोल हरिबोल हरिबोल हरिबोल!”….(कीर्तन)
जय प्रभुपाद प्रभुपाद प्रभुपाद
श्रील प्रभुपाद प्रभुपाद……(कीर्तन)
गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल!
गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल?
हरि हरि बोल!
धन्यवाद?
“ॐ अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः।।
श्री चैतन्यमनोऽभीष्टं स्थापितं येन भूतले।
स्वयं रूपः कदा मह्यं ददाति स्वपदान्तिकम्।।”
“वन्देऽहं श्रीगुरोः श्रीयुतपद-कमलं श्रीगुरुन् वैष्णवांश्च
श्री रूपं साग्रजातं सहगण-रघुनाथान्वितं तं सजीवं।
साद्वैतं सावधूतं परिजन सहितं कृष्ण-चैतन्य-देवम्
श्रीराधा-कृष्ण-पादान्सहगण-ललिता-श्रीविशाखान्विताश्च”।।
“हे कृष्ण करुणासिन्धो दीनबन्धो जगत्पते
गोपेश गोपिकाकान्त राधाकान्त नमोऽस्तु ते।।
तप्त कांचन गौरांगी राधे वृन्दावनेश्वरी।
वृषभानु सुते देवी प्रणमामि हरिप्रिये।।
वाञ्छा-कल्पतरुभ्यश्च कृपासिन्धुभ्य एव च।
पतितानां पावनेभ्यो वैष्णवेभ्यो नमो नमः”।
“हरेर नाम हरेर नाम हरेर नामेव केवलम
कलौ नास्तेव नास्तेव नास्तेव गतिरन्यथा।”
“नमो महावदान्याय कृष्ण प्रेम प्रदायते
कृष्णाय कृष्ण चैतन्य नाम्ने गौरत्विषे नमः ॥”
“वंदे श्रीकृष्ण चैतन्य नित्यानंद सहोदितो
गौड़ौदय पुष्पवंदो चित्रों शमदो तमोनुदो।
“कदा रक्षामि नंदस्य बालकं नीपमालकम
लसत तिलक भालकम बालकम सर्व सत्वान्नम।।”
“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे”
“ओम नमो भगवते वासुदेवाय!”……. (कीर्तन)
धन्यवाद! हम या मैं भी आपकी उपस्थिति के लिए आपका आभारी हूं। हरि हरि! आपकी उपस्थिति से केवल आप शोभा ही नहीं बढ़ा रहे हो इस कथा महोत्सव की शोभा। किंतु हरि हरि! आप सहभागी हो रहे हो, आप नाच रहे हो, गा रहे हो। यह देखकर मुझे प्रसन्नता होती है/ हो रही है। चार कुमार कथा कर रहे थे वो भी हरिद्वार में गंगा के तट पर तब ज्ञान और वैराग्य, (जो भक्ति देवी के पुत्र थे और है भी)वहां उपस्थित थी। हरि हरि! एक समय। अब पूरा इतिहास नहीं सुनाएंगे। किंतु वे मरणासन्न हुए थे, लगभग उनकी जान जाने की तैयारी में थी तो उनको कैसे पुनर्जीवित/ प्रोत्साहित किया जाए/ क्या उपाय है? वैसे नारद मुनि ही उपाय ढूंढे कि यदि ये भागवत की कथा का श्रवण करते हैं तो ये स्वस्थ हो जाएंगे। तब भक्ति देवी अपने पुत्रों को जो उस समय वृंदावन में थे, वृंदावन से हरिद्वार ले जाती है। हरि हरि ! इज़ थिस म्यूजिक और ट्रेन?
श्रील नारद मुनि को ये चार कुमार बद्रिकाश्रम में मिले थे तो उनको निवेदन किए नारद मुनि और उनको ले आए हरिद्वार। भक्ति देवी भी ज्ञान और वैराग्य के साथ वृंदावन से हरिद्वार जाती है और वहां कथा का आयोजन होता है।
“ओम नमो भगवते वासुदेवाय!”… कथा प्रारंभ हुई तो अब हम ज्यादा नहीं कहेंगे लेकिन उसका परिणाम यह निकला कि लगभग उन दोनों को पहले उठा के वहां ले गए थे किन्तु जब वे कथा का श्रवण करने लगे /करते रहे-करते रहे तो कथा का समापन होते-होते वे जैसे कूदने लगे, कीर्तन हो रहा था तो उसमें नृत्य करने लगे।
“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे”
वैसे उसके पहले कथा भी हो रही थी, कथा के श्रवण से और साथ में कीर्तन के श्रवण से भी, वे पुनः पुनर्जीवित हुए और बड़े उत्साह, निश्चय और धैर्य के साथ कीर्तन और नृत्य करने लगे। मतलब कि उनको भागवत कथा के श्रवण का फल प्राप्त हुआ। कीर्तन के श्रवण का भी /कथा का भी। कथा भी अपने आपमें कीर्तन ही है, कीर्ति का गान ही कीर्तन है। भगवान की कीर्ति का गान फिर वह कथा के रूप में हो या फिर कीर्तन के रूप में। कीर्तन या कीर्ति को हम गाते हैं या उसका श्रवण करते हैं। हरि हरि! उस कथा के मध्य में या कथा का समापन होते-होते वहां भगवान पधार चुके, हरि बोल! भगवान आ गए/ साक्षात भगवान प्रकट हुए और वैसे उस समय भी कीर्तन हो रहा था। भगवान के स्वागत के लिए कीर्तन और फिर जो श्रोता उपस्थित थे वे भी कीर्तन करने लगे और फिर ज्ञान-वैराग्य भी कीर्तन करने लगे। भगवान के साथ वैसे प्रहलाद महाराज भी थे, वे करताल बजा रहे थे ऐसा वर्णन आता है पद्म पुराण में भागवत महात्म्य में। इंद्र आए थे मृदंग बजा रहे थे। शुकदेव गोस्वामी उस कथा में या उस कीर्तन में थे और अपने भाव व्यक्त कर रहे थे, “हरे…कृष्ण…! उनका गला वैसे गदगद हो रहा था कीर्तन करते समय शुकदेव गोस्वामी का।।तो वहां भगवान उपस्थित हुए,
“यत्र मद गायन्ति तत्र तिष्ठामी नारद”
भगवान ने ही कहा था नारद जी को,क्या कहा था ?
”नाहं वसामि वैकुंठे” कभी-कभी शायद मैं बैकुंठ में भी नहीं मिलूंगा,
“न च योगिनां हृदये”, योगी जो
“ध्यानावस्थित तद गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिन:” ध्यान अवस्था में योगी भगवान का ध्यान करना चाहते हैं, हृदय प्रांगण में उनका दर्शन करना चाहते हैं। शायद मैं वहां भी उनको दर्शन नहीं दूंगा। तो आप कहां मिलोगे? कहां होंगे आप? कहां रहते हो आप? “मद्भक्ता यत्र गायन्ति” जहां मेरे भक्त एकत्रित होकर मेरा गान करते हैं ,कीर्तन करते हैं या
“बोधयन्तः परस्परम् कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च”
एक दूसरे को बोध कराते हैं, भगवान के संबंधित बोध के वचन कहते हैं /सुनते- सुनाते हैं और “कथयन्तश्च मां नित्यं” और मेरी कथा करते हैं उसी में संतुष्ट रहते हैं, प्रसन्न रहते हैं। भगवान कहते तत्र, देयर, “तत्र तिष्ठामि नारद” हे नारद! मैं वहां मिलूंगा। उस कथा में भगवान ने यह अपना वचन सिद्ध करके दिखाया, वहां कथा-कीर्तन हो रहा था, वहां के उपस्थित भक्त तल्लीन थे श्रवण में, “ श्रवण कीर्तनं विष्णो स्मरणं” तो भगवान प्रकट हुए और फिर कीर्तन हो रहा था तो ज्ञान और वैराग्य भी कीर्तन और नृत्य करने लगे। एक बात और होती है उसी समय, इस कथा के प्रसंग के समय कहो, हो सकता है चार कुमारों ने भी यह निवेदन किया होगा सभी की ओर से और यह निवेदन था कि, “प्रभु! प्रभु !जैसे आप आज यहां पधार गए, आप प्रकट हुए इस कथा महोत्सव में। तो वैसे भविष्य में जब-जब आपकी कथा होगी/ कथा का अनुष्ठान होगा / या हड़पसर में कथा होगी भोसले गार्डन में तब वहां पर भी आप आ जाना। आप आओगे? विल यू कम? लार्ड कहे तथास्तु! वैसे ही होगा, मैं वहां पर भी आ जाऊंगा या हर कथा में मैं उपस्थित रहूंगा। भगवान अपने वचन के पक्के हैं, प्रॉमिस इज प्रॉमिस फॉर द लॉर्ड। इन भगवान की उपस्थिति का हम सब अनुभव करें। चलो हम कथा करते / चलो कीर्तन करते हैं क्योंकि फिर वहां भगवान प्रकट होते हैं। फिर हमें उनका दर्शन या स्मरण होगा। इस उद्देश्य से हम इस कथा का आयोजन भी करते हैं और आपको भी बुलाते हैं। आप भी आ रहे हो और इस कथा-कीर्तन में आप भी उस ज्ञान और वैराग्य की तरह, नृत्य भी कर रहे हो। हरि बोल! धन्यवाद!
ओके वो हैव लॉट ऑफ ग्राउंड टू कवर। हमें द्वारका से पंढरपुर धाम की जय! पंढरपुर जाना है तो सो लॉन्ग डिस्टेंस। वैसे हम नहीं जाएंगे, भगवान जाएंगे तो हम भी पीछे-पीछे जाएंगे और वहां जाकर भगवान पंढरपुर में क्या क्या करेंगे? कौनसी लीला संपन्न होगी? वहां के भक्त कैसे स्वागत करेंगे भगवान का और क्यों जाएंगे? क्यों गए भगवान द्वारका से पंढरपुर? इत्यादि की चर्चा हम यथासंभव /यथा शक्ति/ यथा मति करेंगें ओके इज़ इट ऑन नाउ? कृष्ण, यहां पर उनको द्वारकाधीश कह रहे हैं हम, वृंदावन के कृष्ण अब द्वारकाधीश बने हैं या रुक्मिणी-द्वारकाधीश / सत्यभामा-द्वारकाधीश/ जामवंती- द्वारकाधीश लाइक दैट। 16,108 रानियां और फिर द्वारकाधीश। वसुदेव-देवकी भी वहां है और कृष्ण के साथ बलराम भी है, कृष्ण और बलराम सदैव साथ में रहते हैं। एक समय की बात है वृंदावन में भगवान ने कहा तो था, जब अक्रूर ले जा रहे थे कृष्ण और बलराम को, गोपियों उनको रोकने का हर प्रयास तो की किंतु असफल रही, कृष्ण और बलराम तो गए ही।
“सोडुनीया गोपीनाथ कृष्ण मथुरेसी गेला” लेकिन जाते-जाते उन्होंने कहा तो था “आया से, आऊंगा आऊंगा आऊंगा” लेकिन भगवान नहीं आए। “उद्धव मोही ब्रज विसरत नाही” ऐसा मथुरा में भगवान कहते तो रहे कि “हे उद्धव! ब्रज को मैं भूल नहीं सकता”। यह मथुरा कंचन की नगरी है, यहाँ तो बहुत व्यापार या सोना-चांदी के व्यापार भी होते हैं किंतु वृंदावन में तो प्रेम का व्यापार होता है, प्रेम का विनिमय होता है। यहां मथुरा में नो या कुछ कम प्रेम कहो, गोपियां तो वहां या सभी ब्रजवासी, स्पेशली गोपियां विरह की व्यथा से उनकी जान जाने जा रही थी। एक समय जब अब द्वारकाधीश द्वारका में ही है और वे लौटने का नाम नहीं ले रहे थे। कहा तो था,” आया से, अभी- अभी आता हूं”, किंतु नहीं आए। तो एक समय वृंदावन की गोपियां और गोपियों की शिरोमणि राधा महाभावा ठाकुरानी भी द्वारका की ओर जाती हैं और द्वारका से कुछ ही दूरी पर एक स्थान है। कुछ 30 किलोमीटर उत्तर दिशा में द्वारका के या नॉर्थ ईस्ट में कहो, द्वारका के नॉर्थ ईस्ट में एक गोपी तालाब करके स्थान है। गोपी तलाव, तलाव तो आप जानते ही हैं तालाब, तलाव वैसे मराठी में चलता है। यहां गोपीयां आती है, राधा रानी आती है और द्वारिकाधीश से मिलती है, जो इस स्लाइड में आप दर्शन कर रहे हो।
“दिव्या-वृन्दारण्यं-कल्पद्रुमः श्रीमद्-रत्नागार-सिंहासन-स्थौ
श्रीमद्-राधा-श्रील-गोविन्द-देवौ प्रेष्ठलिभिः सेव्यमानौ स्मरामि”
ऐसा वहां दृश्य बन जाता है, वृंदावन जैसा ही एक कल्पवृक्ष के तले, एक सिंहासन पर विराजमान है राधा और कृष्ण या राधा और गोविंद और
“प्रेष्ठलिभिः सेव्यमानौ स्मरामि” और अष्ट सखियां और अन्य गोपियां सेवा कर रही है किशोर-किशोरी की।
“राधा कृष्ण-प्रणय-विकृति ह्लादिनी शक्तिर अस्माद”
आह्लाद और आनंद की चरम सीमा होती है जब और कृष्ण एकत्रित होते हैं या गोपी और कृष्ण साथ में रहते हैं। इतना घनिष्ठ संबंध कृष्ण का जितना राधा के साथ है और गोपियों के साथ है, ऐसा घनिष्ठ संबंध और ऐसे उच्च प्रेम का विनिमय /व्यापार कहो, लेन-देन किसी संबंध में होता ही नहीं और यह भी आपको कल या परसों बता रहे थे वृंदावन में परकीय भाव है। “परकीय भावे यहां ब्रजेते प्रचार” वृंदावन में परकीय भाव/ उच्च भाव / प्रेम का उच्च-सर्वोच्च मनस्थिति और
“इति दृक्ष लीलाभिरानंद कुंडे”
वहां तो आनंद के कुंड भर जाते हैं जिसमें सारे ब्रजवासी और ये गोपियां तथा राधारानी गोते लगाते हैं। यह जब हो रहा था, यह मिलन राधा+कृष्ण या गोपी-कृष्ण मिलन गोपी तालाब में तो वहां कई सारी लीलाएं संपन्न हो रही है/ कुंज-विहार हो रहे हैं। ये गोपी तालाब का भी आप दर्शन कर रहे हो, वहां गोपीनाथ मंदिर भी है और वह लिखा है गुजराती में 5,000 साल पुराना तीर्थ गोपीतला /गोपीकुंज भी। तो जो भी वहां हो रहा था जो भी दृश्य राधा-कृष्ण/ गोपी-कृष्ण के मध्य का प्रेम के विनिमय, इसको जब रुक्मिणी ने देखा। हरि हरि! उसको अचरज लगा और सरप्राइजिंगली शी इज़ डिस्प्लीज्ड, हमारे साथ तो ऐसा व्यवहार नहीं करते, हमसे इतना प्रेम नहीं करते। यह कौन है स्त्रियां जिनके साथ हमारे प्रभु एकांत में मिल रहे हैं और सब प्रेम के व्यापार और घनिष्ट अंग-संग भी हो रहा है। तो यह सब देखके जो पहले कभी अनुभव नहीं किया था, ना कभी सोचा भी था कि ऐसा भी कभी होगा,ऐसा भी होता है, कृष्ण के ऐसे संबंध है हमारे द्वारकाधीश प्रभु के…….
तो इससे वो दुखी होती हैं, नाराज होती हैं,मानिनी बनती हैं, रूठ जाती हैं। “रुस्ते रूसली रुक्मिणी” रुसली शब्द से आप परिचित हो। हरि हरि! फिर इसी के साथ क्या हुआ? रुक्मिणी वहां से प्रस्थान करती हैं, द्वारका को छोड़के जंगल या कई नगरों और ग्रामों में से होती हुई चंद्रभागा के तट पर, डिंडीरवन नामक वन में पहुंच जाती है, जो वन आज भी वहां है। वन तो नहीं लेकिन स्थान तो है और वहां जाकर रुक्मिणी रहने लगती हैं एक प्रकार से तपस्विनी बनके वहां समय बिता रही है। भगवान से नाराज़ है, रूष्ट है। फिर पीछे से भगवान भी रुक्मिणी के खोज में निकलते है, जैसे राम खोज रहे थे,” सीते! सीते!” द्वारकाधीश भी रुक्मिणी का नाम पुकारते हुए, कई छिपी हो या कहीं हो , यही पर मुझे सुनती है तो शायद मुझे मिलेगी/ मिलने आएगी। किन्तु वन में रास्ते में तो कही नहीं मिली और अंततोगत्वा भगवान चंद्रभागा मैया की जय! चंद्रभागा के तट पर पहुंचते है जो चंद्रभागा गंगा ही है।
“भीमा आणि चंद्रभागा तुज चरणी च गंगा”
चंद्रभागा मैया की जय! इस परम पवित्र चंद्रभागा के तट डिंडीर वन में द्वारकाधीश को रुक्मिणी मिली। हरि हरि! उसकी समझा- बुझाने का खूब प्रयास तो किया और कुछ सफल तो हुए, किन्तु पूरे सफल नहीं हुए भगवान। तब उस समय उनको याद आती हैं कि पुंडलिक भी तो यही रहता है, मैं उसे मिलने जाऊंगा, मैने वचन दिया था कि तुम्हारे अगले जन्म में मैं तुम्हें मिलूंगा/ दर्शन दूंगा। भगवान पुंडलिक के स्थान की और प्रस्थान करते हैं।
ओके! यही थोड़ा पॉज देके हम थोड़ा द्वारका लौटने वाले है। हमने कहा था,हम जो भी कहते है सत्य ही कहते है और वह यह था कि भगवान को जब द्वारका का निर्माण करना था, भगवान ने समुद्र से, द्वारका धाम की स्थापना के लिए, जमीन को उधार लिया था कहो और तब तक उसका उपयोग करेंगे भगवान जब तक वे इस धरातल पर है। जिस दिन वे, “स्वधामोपगते” अपने धाम लौटेंगे तब उस भूमि को समुद्र पुनः वापिस ले लेगा, समुद्र का अंग बन जायेगी भूमि और सारा धाम/ महल आदि सब डूबेंगे और वैसे ही हुआ, यह सारा इतिहास है। वैसे हम जब यह सुनते हैं या पढ़ते हैं,क्योंकि शास्त्र प्रमाण है। व्हाट इज ऑथोरिटी? क्या क्या सबूत हैं कि ऐसे ही हुआ, जमीन उधार ली थी और फिर वह सारी द्वारका डूब गई समुद्र में, भगवान के स्वधाम लौटने के उपरांत? तो शास्त्र प्रमाण है। शुकदेव गोस्वामी प्रमाण हैं, ही इज़ द ऑथोरिटी, श्रुति प्रमाण है। ”श्रुति स्मृति पुराण आदि”। यह भागवत पुराण प्रमाण है किंतु संसार के लोग जो भौतिकवादी हैं या प्रत्यक्षवादी है वे कहते,” हमको दिखाओ, सींइंग इज़ बिलीविंग, आप दिखाओ, इवेन शो अस गॉड,अगर नहीं दिखा सकते तो वो है नहीं, तो सींइंग इज़ बिलीविंग। बाप दाख नहीं तर कर श्रद्धा कर बाप दाख श्रद्धा कर बात तो सत्य तो यह है यह होना चाहिए हियरिंग इज बिलीविंग सुनो और विश्वास करो हियरिंग इज बिलीविंग करो न कि सींग बिलीविंग, “बाप दाखों नई तो श्राद्ध कर”। बात तो ये सत्य है और होना चाहिए कि, “ हियरिंग इज़ बिलीविंग” सुनो, साधु-शास्त्र-आचार्य के वचन सुनो और विश्वास करो। “हियरिंग इज़ बिलीविंग” नॉट “सींइंग इज़ बिलीविंग”। शास्त्रचक्षुषा, हमें देखना है तो इन आंखों का क्या भरोसा? आंखें बड़ी सीमित है,उनकी देखने की जो क्षमता है उस क्षमता को हम बढ़ाते है माइक्रोस्कोप का उपयोग करके। माइक्रोस्कोपिक ऑर्गेनिजम को देखना है तो माइक्रोस्कोप से और दूर के कोई स्थान है या लोक है तो टेलिस्कोप से देखें। दूरदर्शक यंत्र से दूर का दर्शन होता है और सूक्ष्म वस्तुओं का दर्शन सूक्ष्म-दर्शन, माइक्रोस्कोप और टेलीस्कोप। ऐसी हमारी देखने की या आंखों की क्षमता बढ़ाते तो है सही, किंतु ऐसी कुछ वस्तुयें या व्यक्ति है या स्थान है, जो अतिसूक्ष्म है। वैसे वे जड़ नहीं है, चेतन है इसलिए भी अतिसूक्ष्म है। तो उसको देखने के लिए वैसे ये आँखें बेकार हैं। केवल आंख ही नहीं, हमारी सारी इंद्रिया बेकार है।
“अतः श्रीकृष्ण नामादि न भवेत् ग्राह्यं इंद्रिये”
हमारी इंद्रियां बड़ी कलुषित है, कमजोर है, अधूरी है, सीमित है उनकी क्षमता, ज्ञानअर्जन करने की। हमारा विश्वास होना चाहिए शास्त्रों में/ ग्रंथों में/ आचार्यों में और ऐसी अवस्था ही भगवान ने की हुई है। लेकिन जो लोग साधु-संत-शास्त्र (जो भगवान के वचन है जैसे गीता भगवान के वचन हैं)
“या स्वयं पदमनाभष्च मुख पद्मात विनिश्रितः “
भागवत इत्यादि वांगमय मूर्ति है भगवान की, तो इस पर विश्वास न करते हुए वे लोग देखना चाहते है,” शो अस” ओके! देखना चाहते हो तो देख लो। द्वारका में कुछ वर्ष पूर्व आर्कियोलॉजिकल डिपार्टमेंट ने, बाय स्पेंडिंग ई डोंट नो हाओ मैंनी, हंड्रेडस/ करोड़स खर्च करके, डू वी हैव दैट क्लिप? यू कैन शो। वहां कई सारी दीवारें, स्तंभ, अर्धगोलाकार जैसे आप देख ही रहे थे, विजय-ध्वज स्तंभ, शिलालेख, मिट्टी के बर्तन, पत्थरों की मूर्तियां, तांबे-लोहे की वस्तुएं, टेराकोटा मोती, ऐसे कई सारे अवशेष प्राप्त हुए है। सो बियोंड डाउट यहां भी आप देख रहे हो, द लॉस्ट सिटी ऑफ द्वारका, ऐसा टाइटल है स्लाइड में। यह अब तो मानना पड़ेगा। हरि बोल! द्वारका धाम की जय! अब थिस इज़ इंडिया गवर्मेंट और ई डोंट नो गुजरात स्टेट गवर्नमेंट का है, इनीशिएटिव ऑफ गुजरात गवर्नमेंट “द्वारका सबमरीन टूरिज्म” वे प्रारंभ कर रहे है तो उस सबमरीन को आप देख रहे हो वहां,वे आपको 300 फिट इनसाइड डीप अरेबियन सी जो वहां है वहां तक ले जाएंगे और घुमा-फिराके आपको सारा दर्शन कराएंगे। जो-जो सबूत आइटम, पत्थर, थिस दैट जो उनका मिला है। तो गेट रेडी भविष्य में आप स्वयं जा के उनका दर्शन भी कर सकते हैं। ओके गो बैक टू पंढरपुर धाम की जय! भगवान रुक्मिणी को वैसे डिंडीर वन में ही छोड़कर क्योंकि अभी तक पूरा समाधान नहीं हुआ/ पूरी संतुष्टि नहीं हुई है। कुछ तो सांत्वना हुई है किंतु भगवान आगे बढ़ते हैं। वन में जो वह मंदिर है लखुबाईच मंदिर, लख़ु मतलब लक्ष्मी/ रुक्मिणी का मंदिर। वैसे ये इस्कॉन की प्रॉपर्टी है या इस्कॉन का राधा-पंढरीनाथ की जय! राधा-पंढरीनाथ मंदिर है और प्रभुपाद घाट भी है। आप गए हो? प्रभुपाद घाट वगैरह देखे हो? इस्कॉन टेंपल देखा है आपने? अधिकतर भक्तों ने देखा है, गुड! वही से दूसरे तट पर हम लोग ऑन द ईस्टर्न बैंक पर है, वेस्टर्न बैंक जहां शहर है तो वहां पर यह मंदिर आज भी है, जहां रुक्मिणी और द्वारकाधीश मिले या रुक्मिणी तपस्या कर रही थी। तो वहां से भगवान पुंडलीक के आश्रम में जाते है पर पुंडलीक व्यस्त थे,वैष्णव माता- पिता की सेवा में थे। तो उन्होंने भगवान का स्वागत तो किया है किंतु अब वार्तालाप नहीं होगा। उनको एक ईट दी है खड़े होने के लिए, कोई आसन या कुर्सी या पलंग ऐसा सिंहासन नहीं दिया है, केवल ईट ही दी है। हरि बोल! हरे कृष्ण! कृष्णा ईट पर खड़े हुए भगवान, ईट को मराठी में काय महण्तत? वीट। विट आला का तुम्हाला? वो भी वीट है। तो वीट पर खड़े हुए भगवान, इसलिए उनका नाम हुआ, विट्ठल! विट्ठल! विट्ठल! विट्ठल ! तो ये पुंडलीक, वैसे ईट का थोड़ा पुन: स्मरण करेंगे। पुंडरीक का जब विवाह हुआ तो माता-पिता की तरह उसका मूड ही चेंज हुआ और माता-पिता की ओर उसका ध्यान नहीं था। एक समय वे तीर्थयात्रा में जा रहे है, काशी जाना है / वाराणसी जाना है। माता पिता भी जा रहे है और धर्म पत्नी भी जा रही हैं। लेकिन देखिए बूढ़े माता-पिता हरि हरि! उनकी सेवा, उनकी सहायता करनी चाहिए, यथासंभव उनको उठाके ले जाना चाहिए। श्रवण कुमार ने अपने माता-पिता को बिठाया था आगे और पीछे टोकरी में या कावड़ में। तो वैसा करना चाहिए था लेकिन देखिए कैसे व्यवहार चल रहा हैं? उनके गले में डोरी बांधकर उनको खींच रहा है,ए आओ आओ! जल्दी आओ” और पत्नी जब रास्ते में थक गई है तो उसको उठा लिया है। हरि हरि! तो प्रवास करते-करते एक कुकुट मुनि या स्वामी के आश्रम पर पहुंचते है और उनसे पूछताछ करते हैं कि वाराणसी कितनी दूर है? मुझे ज्ञान नहीं है, ज्ञात नहीं है इस बात का, तो उससे भी क्रोध किया है उन्होंने।
“अमानिना मानदेंन कीर्तनीय सदा हरि:”
चैतन्य महाप्रभु ने कहा कि ये सदाचार की बातें है। हमें सभी का सम्मान करना चाहिए और हमारे खुद के सम्मान की अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए। औरों का सम्मान करना चाहिए, माता-पिता का सम्मान करना चाहिए।
“मातृ देवोभव पितृदेवो भव”
फिर “आचार्य देवो भव” तो सभी के साथ, माता पिता के साथ भी वैसे ही व्यवहार करना चाहिए। ये आचार्य कुकुट मुनि के साथ भी कुछ दुर्व्यवहार ही चल रहा हैं, सायंकाल का समय हुआ था तो उसी आश्रम में वे रह जाते है और दूसरे दिन प्रातःकाल को एक विशेष दृश्य देखते है, आप देख रहे हैं ना? कुछ कुछ या थोड़ा तिरछी नजर से देख पाएंगे। वैसे हमें स्क्रीन को थोड़ा आगे इंस्टॉल करना चाहिए था किंतु थोड़ा दूर हो गया। अपने सोफे थोड़े तिरछे कर सकते हो आप। तो उसको आश्चर्य लगा कि कौन है ये स्त्रियां? उन्होंने कहा कि मैं गंगा हूं, मैं जमुना हूं, मैं सरस्वती हूं और वे वहां पर झाड़ू लगा रही है,सफाई कर रही है मानो नौकरानी बनी है, सेविका बनी है उस आश्रम की या कुकुट मुनि की सेवा में। तो वे कहती हैं कि हम याने जमुना- गंगा-सरस्वती कुकुट मुनि का/ संतो का/ साधुओं का बहुत सम्मान और सेवा करती रहती हैं। वैसे हम टीम है, हम जो नदियां पवित्र नदियां और संत महात्मा हम दोनों की टीम है। हमारे टीम एफर्ट से जो तीर्थयात्री धाम में आते है या पापी भी आते है,कामी-क्रोधी आते है तो वे पवित्र होते है। केवल पवित्र नदी में स्नान करने से वे पवित्र नहीं होते हैं, उनको उसी धाम में या उन नदियों के तट पर, आश्रम में रहने वाले संतो / महात्माओं की मदद से भी तीर्थयात्री पवित्र होते हैं, जनेश अभिज्ञेषु
“यत तीर्थ बुद्धि सलिलेन कर्हिचित
जनेशु अभिज्ञेषु स एव गोखर:।”
यह वचन वैसे श्रीमद् भागवत का है,दसवें स्कंध का। ऐनीवे..हरे कृष्ण! हर बात एक कथा हो सकती हैं। तो भगवान स्वयं जब गए थे तीर्थ यात्रा में तीर्थयात्री बनके,द्वारका से कुरुक्षेत्र गए, सूर्य ग्रहण के समय गए। वहां एक प्रसिद्ध सूर्यकुण्ड है कुरुक्षेत्र में तो भगवान अपने परिवार के साथ स्नान के लिए जब वहां गए थे और अपने टेंट में तंबू में भगवान जहां रह रहे थे द्वारका वासियों के साथ, वहां आ जाते हैं कई संत-महात्मा- मुनिजन और भगवान उनका स्वागत करते हैं। उसी समय यह वचन जो है भगवान ने कहा, “यत तीर्थबुद्धि सलिले न” सलिल मतलब जल, आओ तीर्थ और वहां के पवित्र नदी में डुबकी लगाओ या कुंड में स्नान करो, हर हर गंगे! कहो और हो गई हमारी यात्रा पूरी। केवल स्नान करना नदी में, नहीं!नहीं! इससे यात्रा पूरी सफल नहीं होती ऐसा भगवान कह रहे,
“जनेशु अभिज्ञेषु” वहां के जो अभिज्ञ जन है, अभिज्ञ मतलब ज्ञानवान/ जो भक्त है / संत-साधु हैं उनसे जरूर मिलना चाहिए और उनसे कुछ आदेश-उपदेश विधि-निषेध को सीखना- समझना चाहिए। तो स्नान और साथ में ऐसे संत-महात्मा जो कथा उपदेश अमृत कहते है उसमें भी स्नान करना चाहिए। इन दोनों से फिर होगा,
“चेतोदर्पण मार्जनम” हमारी चेतना की सफाई-स्वच्छता होगी, तो ये बातें गंगा-जमुना-सरस्वती बता रही है।
कि ये संत-महात्मा, तीर्थ के सन्त, धाम के गुरु जैसे भी अपनी भूमिका निभाते हैं और हम नदियां पवित्र नदियां,हम दोनों की मदद से ही यहाँ पहुँचने वाली जो तीर्थयात्री हैं वे पवित्र होते हैं, उनका कल्याण होता है, उनकी यात्रा सफल होती है। हम यहाँ इन संत-महात्मा की सेवा करती रहती है और उन्होंने यह भी कहा कि ये कुक्कुट मुनि जो महात्मा है उनका यह भी वैशिष्ट्य है कि ये सभी का सम्मान-सत्कार करते है, इन्क्लूडिंग पेरेंट्स। उनके माता पिता की भी खूब वे सेवा- सत्कार-सम्मान करते रहते है, इसलिए हम उनकी सेवा करती है, कुकुट मुनि की सेवा करते है। तो यह सबक सीखे उस आश्रम में, इन तीन पवित्र नदियों के मुखारविंदो से जो वचन निकले उससे ही उनकी खोपड़ी में प्रकाश हुआ। फिर उन्होंने सभी को सम्मान-सत्कार करना और माता पिता की सेवा, उनका सम्मान-सत्कार करना भी प्रारंभ किया। भगवान जब वहाँ पहुँचे थे तो वे व्यस्त थे माता-पिता किसी की सेवा में, वैष्णव माता-पिता की सेवा में व्यस्त थे। यह वचन भी है ब्रह्म वैवर्त पुराण में गंगा कहती है कि हे नाथ!
“अस्माकं का गतिश्च भविष्यंति कलौ युगे”
कलियुग में जब लोग काफ़ी पापी होंगे और वे आएँगे तीर्थ में, स्नान करेंगे और अपना सारा जो पाप वह हम पे धोएंगे तो उससे हम मुक्त कैसे हो सकते है? भगवान उवाच: भगवान ने गंगा से कहा,
“मनमन्त्रोपासकस्पर्शा भस्मिभूतानी तत्क्षणात्
भविष्यंति दर्शनाच्च स्नानादेव हि जाह्नवी “
हे जाह्नवी! हे गंगे माता! उस धाम में जो मन्त्र उपासक है, जो मन्त्रों को उच्चारण करते हैं, जो उपदेश सुनाते हैं तीर्थ यात्रियों को, उस श्रवण के उपदेशामृत से दो बातें हैं: संतों का दर्शन और संतों के मुखारविंद से आदेश उपदेश विधि-निषेध सीखेंगे-समझेंगे तीर्थयात्री और फिर स्नान भी करेंगे तो कोई समस्या तुम्हारे लिए नहीं रहेगी। मेरी क्या गति होगी भविष्य में? तो भगवान ने उपाय बताया है। भगवान जब आते हैं,
“आगतो अहम वरानदातुम प्रीत्या ते मुनिसत्तम”
हे मुनि सत्तम! पुंडलीक को मुनि सत्तम कह रहे है याने
उत्तम मुनि।
“पित्रो आराधनात तस्मात प्रसन्नो अस्मि न संशय”
मैं भी प्रसन्न हूं तुम जो माता- पिता की सेवा कर रहे हो इससे मैं प्रसन्न हूँ। मैं तुम्हे वरदान देने के लिए भी तैयार हूँ, वर माँगो। तब पुंडलीक ने कहा,
“यदि प्रसन्नो भगवन” यदि आप मुझसे प्रसन्न हो ही तो,
“ब्रह्मा अर्चित पदाम्बुज” हे भगवान! आपके चरणों की अर्चना तो ब्रह्मा, वैसे शिव भी करते है।
“यम ब्रह्मा वरुणेंद्र रुद्र मारुतस श्रृंवती दिव्ये सवै” ऐसे आप भगवान,
“अनेन चारूरुपेन त्वयास्स्थेयम इह प्रभो”
हे प्रभु! आप आये ही तो, इह/ यहाँ मतलब कहाँ? पंढरपुर में। स्थेय मतलब यहीं रहिये। अनेन चारु रुपेन,
“सुंदरते ध्यान उभे विटेवरी” चारुदर्शन ,चारु रूप या सुंदर रूप वाले प्रभु, आप यहीं रहिये।
ये स्कंद पुराण के अंतर्गत वचन है। स्कंद पुराण मतलब सत्य,शास्त्रोक्त बात है, शास्त्रों में उक्त बात या मनोधर्म नहीं। आई थिंक,अकॉडिग टू मी, मुझे लगता है, मेरा विचार हैं, ये सत्य नहीं ये तो जुगाड़ हुआ, ठगाई हुई। मुझे लगता है, हु आर यु? तुम्हे लगता है, तुम्हें जो लगता है तो अपने घर में रखो। शास्त्र प्रमाण है, स्कंद पुराण में भगवान कह रहे हैं पुंडलीक से कहा,
“देवानाम अपि सर्वेशाम सर्वेषाम उत्तमोंं अहम स्वतंत्रत:”
मैं तो पुरुषोत्तम हूँ, उत्तम हूँ और वैसे हूं तो स्वतंत्र, कह तो रहे है स्वतंत्र किंतु वे स्वतंत्र है भी नहीं।
“अहम् भक्तों पराधीन:” मै भक्तों के अधीन हूँ, मैं स्वतंत्र नहीं हूँ। ये दोनों भी है, स्वतंत्र है तथा स्वतंत्र है भी नहीं।
“वत्स्यामि सर्वदा ब्रह्मन् क्षेत्रे त्वन्नाम् संज्ञके” तथास्तु! तुम चाहते हो मैं यहाँ रहूँ तो मैं पंढरपुर में रहूंगा और फिर भगवान रह गये और आज तक हैं। पुन्डलीक ने यह सोचा होगा कि आपने मुझे तो दर्शन दिया, मुझे आपने कृतार्थ किया। “अनुग्रहितो अस्मि” थैंक यू लॉर्ड! मैं आपका किन-किन शब्दों में आभार मान सकता हूँ। यदि आप रहोगे यहाँ तो भविष्य में आनेवाले जो भी जन हैं, यात्री हैं, उन सबको आपका दर्शन होगा और आपके दर्शन मात्र से वे पवित्र होंगे, उनका उद्धार होगा।
“सुन्दर ते ध्याना उभे विटेवरी करकटा वरी ठेवुनिया”
भगवान ऐसे कमर पर हाथ रखे तो थे, हम कब कमर पर हाथ रखकर खड़े होते? जब हम किसी की प्रतीक्षा करते रहते। वाय इज़ ही नॉट कमिंग? हम जब किसी की राह देखते रहते है, किसी की प्रतीक्षा में है तो हम कई बार,आप करते हो कि नहीं ऐसा? तो शायद हम भी भगवान से सीखे है, भगवान भी प्रतीक्षा कर रहे थे। यह बिज़ी है माता पिता की सेवा में, देखता हूँ अब कब फ़्री होता है और मेरे साथ वार्तालाप करेंगा, संवाद होगा हमारा। भगवान जो कमर पर हाथ रखे थे तो वैसे ही आज तक कमर पर हाथ रखकर ही खड़े हैं। तो कमर पर हाथ रखकर भगवान दर्शन देते है, तीर्थ यात्रियों को दर्शन देते है। पंढरपुर जो यात्रा में जाते है डिंन्डी में जाते हैं बस एक उद्देश्य होता है, वो कौन सा? विट्ठल दर्शन। 18 दिन देहू से डिंन्डी, आरांदि से और कई स्थानों से वैसे, हर नगर हर ग्राम से वारी, वारकरी पंढरपुर जाते हैं। रास्ते में कितनी असुविधा होती है, यह जब मैं कह रहा हूँ तो हमारे एक भक्त डॉक्यूमेंट्री बना रहे थे डिंन्डी की, तो एक यात्री/ वारकरी से मुलाकात कर रहे थे तो हमारे भक्त ने पूछा डिंन्डी में सुख-सुविधा कैसी है? तो उस यात्री ने कहा महाराज (जो हमारे ब्रह्मचारी थे उनको) डिंन्डी में सुविधा तो नहीं है लेकिन सुख हैं। पुणे में तो सुविधा ही सुविधा थी लेकिन वहाँ सुख नहीं है। लेकिन यहां सुविधा नहीं होने पे भी हम बहुत सुखी हैं। सुख किस बात का? या यात्रियों को सुख कौन देते हैं? भगवान देते हैं। भगवान सुखी रखते हैं उनको, भगवान उनके सुख का स्रोत हैं। उनके सोर्स ऑफ़ हैप्पीनेस या जॉय कहो
स्वयं भगवान हैं। क्योंकि रास्ते में कीर्तन-नृत्य भी हो रहा है,
“जय जय राम कृष्ण हरि!
जय जय राम कृष्ण हरि!”
यह सुख का कारण है, आनंद का कारण है।
“नाम चिंतामणि चैतन्य रसविग्रह”
नाम चिंतामणि चैतन्य रस विग्रह, रस की खान है यह नाम।
“पूर्ण शुद्ध नित्यमुक्त अभिन्नत त्वां नाम नामिनो”
हरि हरि!
फिर १८ दिनों तक चलकर जाते हैं, पहुँच तो गए पंढरपुर धाम की जय! क्यों जा रहे? दर्शन के लिए जा रहे है। इतने दिनों तक यात्रा/वारी/डिंन्डी में क्यों? दर्शन के लिये। लेकिन वहाँ गये तो यह नहीं कि वहाँ दर्शन केलिए पाँच मील लम्बी क़तार/ क्यू। देयर इज़ अ क्यू कोम्पलेक्स आलसो। १० घंटे, समटाइम्स २० घंटे, घंटों के बाद विट्ठल का दर्शन और फिर कितने घंटो तक आप दर्शन कर सकते हो? घन्टो को तो भूल जाओ, मिन्टो तक भी नहीं क्योंकि एक दिन में १०-२० लाख यात्री दर्शन करना चाहते है आषाढी एकादशी के दिन। हरेक को जस्ट एक क्षण मिलता है या आधा क्षण ही मिलता है। किंतु जब ये यात्री दर्शन करके पुन दर्शन मंडप में आते हैं, उनका चेहरा देखो, यू कुड टेक अ फ़ोटोग्राफ़, उनके फेसेस/चेहरे पर इतना समाधान और संतुष्टि दिखाई देती है। ‘फेस इज़ ऐन इंडेक्स आफ़ योर माइंड’ आपके मन की जो स्थिति है या मन के जो लक्षण या जो भी हो रहा है उसका दर्शन आप चेहरे पर कर सकते हो। तो मन उनका जो प्रफुल्लित, प्रसन्न आत्मा जो होता है दर्शन करके, तो वो सारे चेहरे खिल जाते है, इतने प्रसन्न कि यात्रा सफल क्षणभर के दर्शन मात्र से। विट्ठल के दर्शन के लिये हम जाते हैं तो भगवान वहाँ पर भी “कर कटावरी ठेऊनिया” खड़े है। तो कमर पर हाथ रखकर भगवान क्या कह रहे है? ये तो अच्छा हुआ, आई एम हैप्पी तुम आए हो। वैसे केवल हम ही नहीं चाहते भगवान को देखना या उनका दर्शन करना, भगवान भी जीव को मिलना चाहते है या उनका भी दर्शन करना चाहते हैं कहो। जीव का ही प्रेम नहीं भगवान से, भगवान का भी हमसे प्रेम है। हरि हरि! जितना रीयल/ जेनुइन/ असली प्रेम हम पर कोई करता है तो वे हैं भगवान। हरि हरि! दर्शनार्थी को भगवान यह भी कहते है अच्छा हुआ आई एम हैप्पी तुम आये हो दर्शन के लिए। इसके साथ क्या हो रहा है? तुम्हारा बेड़ा पार हो रहा है, तुम इस भवसागर में डूब रहे थे, भगवान कहते तुम तो इस संसार में या इस भवसागर में डूबके मर रहे थे, मरके पुनः जी रहे थे और फिर डूब रहे थे, मर रहे थे।
“पुनरपि जननम पुनरपि मरणम्” यह चल रहा था तुम्हारा, येलो और गेलो, तुम आ रहे थे और जा रहे थे, जन्म-मृत्यु के चक्र में फँसे थे। किंतु तुम अब जो आये हो, सागर के तट पर आए हो और यहाँ तो ज़्यादा गहरा नहीं है सागर या पानी ज़्यादा गहरा नहीं है। कितना है? इतना है। इतने पानी में तो कोई डूब के नहीं मरेगा, मतलब वहाँ से छलांग मारके, अभी तो भगवान मानो हेल्पिंग हैंड दे दे रहे है, आ जाओ! आ जाओ! और भगवान उठाने वाले है उसको,
“अई नंदतनुजं किंकरं पतितं मां विषमे भवामबुधो”
कृपया तव पाद पंकजम स्थित धूली सदृशं विचिन्तय”
ये चैतन्य महाप्रभु की प्रार्थना है कि है नन्द तनुज! नन्द महाराज के तनुज, तनु मतलब विग्रह, उससे जन्म जिसका हुआ वो तनूज या अनुज। ऐसे हे नंद तनुज! मैं आपका किंकर, मैं आपका दास हूँ किन्तु दुर्देव से मैं इस भावांबुध में मैं पतित गिरा हूँ, डूबके मर रहा हूं। तो अब क्या कीजिये प्रभु? मुझे उठाइए इस भवसागर से और आपके चरणों का आश्रय दीजिए। आपके चरणों की धूल, आपके चरणों की सेवा दीजिए प्रभु। तो दर्शन के समय ऐसी प्रार्थना भी जीव की या दर्शनार्थी की होनी चाहिये और भगवान तो वहाँ वैसे तैयार हैं ही। पंढरपुर में ही इज़ एैवर रैडी। वैसे अन्य स्थानों पर भी स्पेशली पंढरपुर में भगवान दर्शन देने के लिये सदैव तैयार रहते हैं। पंढरपुर धाम की जय!
व्हाट अबाउट दैट भुवैकुंठ प्रेजेंटेशन, शुड वी क्विकली डू दैट?
यहां आप देख रहें हो, विट्ठल का दर्शन करा दो और शिखर का दर्शन भी,तो प्रीवियस स्लाइड। यहाँ पर आप जो दो शिखर देख रहे हो, सामने वाला जो ऊँचा दिख रहा है ये विट्ठल का शिखर है और पीछेवाला रुक्मिणी का शिखर है। कृष्ण भी यहाँ आके, द्वारकाधीश भी यहाँ आके उसी ईंट पर यहां खड़े हुए और अब रुक्मिणी भी शांत और सन्तुष्ट हुई है। उसकी पूरी सांत्वना हुई है, शी इज़ फुल्ली सेटिस्फाइड/ पैसिफाइड। वो भी आके फिर दूसरे गर्भगृह में रुक्मिणी के गर्भगृह में आकर विराजमान होती है। वे दोनों एक ही आल्टर पर नहीं है, दो अलग-अलग आल्टर हैं। ये चन्द्रभागा के पश्चिमी तट पर विट्ठल मन्दिर है, विट्ठल-रुक्मिणी मंदिर है। नदी के उस पार, ऑन द ईस्टर्न बैंक अब राधा पंढरीनाथ की जय! राधा पंढरीनाथ पधार चुकें है। वही पर प्रभुपाद घाट भी बन चुका है। आपने कहा कि आप गये हो, आपने देखा है। तो अब घाट का निर्माण कार्य पूरा हुआ है तो हम आगे बढ़ने वाले हैं वहां के प्रकल्प के साथ, भू वैकुंठ प्रकल्प। वहाँ पर वैसे राधा पंढरीनाथ और श्रीश्री गौर निताई की जय! हमारे गौड़ीय परम्परा के भगवान। वैसे सभी के हैं वे, गौरांग महाप्रभु नित्यानंद प्रभु के विग्रह भी होंगे और सीता-राम लक्ष्मण हनुमान की जय! वहाँ हम राम मंदिर भी बना रहे हैं और बहुत कुछ और भी बनने वाला है।
