Srimad Bhagavatam
HADAPSAR 25-31-2023 D5
25-12-2023
ISKCON Pune

“बहीर नरसिंह हृदये नरसिंह 

यतो यतो यामि ततो नरसिंह”..

मेरे अंदर हृदय प्रांगण में भगवान, पीछे भगवान, आगे भगवान, सर्वत्र भगवान। हरि बोल! मानो लग रहा मैं पहुंच गया वैकुंठ, आपके साथ वैकुंठ से वार्तालाप करेंगे। भू वैकुंठ की जय! और पंढरपुर भी है।

 

“मधुराधिपते अखिलम मधुरम”

भगवान अखिल या समस्त माधुर्य के पति है। उनसे संबंधित हर बात मधुर है। कौन – कौन सी बातें मधुर है? इस गीत में जो वल्लभाचार्य जी की रचना है,वैसे वल्लभाचार्य जी का भी आगमन पंढरपुर में हुआ था। उनकी जो 84 भागवत कथाएं हैं, भारतवर्ष में उन्होंने 84 जगह भागवत कथा की उसमें से एक कथा पंढरपुर में भी हुई। जहां पर अब मठ/ मंदिर, उनके विजिट या भेंट या उस कथा की स्मृति प्रीत्यर्थ चंद्रभागा के तट पर है और वह स्थान इस्कॉन का भू वैकुंठ प्रकल्प भी बन रहा है। बिल्कुल पास में ही है, करीब १०० मीटर्स अवे, कुछ सौ गज दूर हो सकता है। हरि हरि! ये भी अनन्य भक्त रहे विट्ठल के और विट्ठल ही है कृष्ण तो वे अनन्य भक्त कृष्ण के भी है। उनको जब पुत्र रत्न प्राप्त हुआ तो अपने पुत्र का नाम रखे विट्ठलनाथ। 

वल्लभाचार्य एक मधुर गीत की रचना किए हैं और अपने साक्षात्कार सुना रहे हैं।

‘मधुराधिपते अखिलम मधुरम

अधरम मधुरम वदनम मधुरम”….. (कीर्तन)

 

भगवान की वेणु मधुर है और भगवान की रेणु मतलब चरणों की धूल भी मधुर है। धेनु भी मधुर है और 

“पाणी मधुरा पादों मधुरा” ध्यान दीजिए और सोचिए कि क्या क्या मधुर है? पाणी मधुर मतलब हाथ मधुर है, पादों मधुरा याने उनके चरण कमल मधुर है।

“नृत्यम मधुरम सख्यम मधुरम”…

नृत्य मधुर है और भक्त भी मधुर है। भुक्तं याने भगवान को भोजन करते हैं वो भी मधुर है और भोजन के उपरांत सुप्तम मधुरम याने भगवान विश्राम करते हैं, सोते हैं तो वह भी मधुर है।

“रूपम मधुरम तिलकम मधुरम”

करणम मधुरम तरणम मधुरम”….

यमुना मैया की जय! वृंदावन की या कृष्ण की यमुना मैया मधुर है। यमुना की जो लहरे-तरंगे उसको विंची कहा है, वो भी मधुर है।

“सलिलम मधुरम कमलम मधुरम”…

सलिलम मतलब जलम, यमुना का जल भी मधुर है और उस यमुना मैया में खिले हुए कमल भी मधुर है।

“गोपी मधुर लीला मधुरा 

युक्तं मधुरम मुक्तं मधुरम”…

 

“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे – हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे “

 

गोविंद जय जय! गोपाल जय जय!

राधा रमन हरि गोविंद जय जय!

जय जय विठ्ठल जय हरी विठ्ठल!

विट्ठल विट्ठल विट्ठल विट्ठल विट्ठल विट्ठल विट्ठल!

श्री श्री विट्ठल रुक्मिणी की जय!

राधा पंढरीनाथ की जय! राधा कुंज बिहारी की जय!

राधा वृंदावन चंद्र की जय! पंढरपुर धाम की जय!

निताई गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल!

(मंगलाचरण)…....

 

“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे”

“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय!”

“विट्ठू माझा लेकुरवाडा सांघे गोपालांच मेढ़ा” 

आप पुनः पुनः आ रहे हो विट्ठोबा की ओर,हरि हरि! जो सभी के बाप है। 

म्हसोबा खंडोबा भैरोंबा ज्योतिबा, या सर्वांचा बाप कोण ? विट्ठोबा-रुक्माई। हरि हरि!

“ईश्वर परम: कृष्ण” 

विट्ठल श्रीकृष्ण परमेश्वर, ईश्वरों के भी ईश्वर हैं। हरि हरि!

विट्ठोबा को या कृष्ण को या पांडुरंग को पांडुरंगा! पांडुरंगा! 

इस नाम से बहुत प्रसिद्ध है विट्ठोबा पांडुरंग। वैसे पांडुरंग कहते है तो और भी वृंदावन के कृष्ण का स्मरण होता है, यह पांडुरंग नाम वृंदावन के कृष्ण का स्मरण दिलाता है। ऐसे भी समझ है कि यह जो पांडुरंग नाम है, भगवान जब वृंदावन में गाय चराते हैं इसलिए वे गोपाल भी कहलाते हैं। तो गाय चराने के लिए जब जाते हैं कृष्ण और एक-दो गायें नहीं होती है उनकी 9 लाख गायें होती है। वे जब चरती है/ घूमती है /फिरती है/ चलती है तो वहां की हल्की-फुल्की जो रज है, ब्रज की रज हवा में उड़ती है और पुनः धीरे-धीरे बैठ जाती है/ छा जाती है वृक्षों पर या तालाब के जल में,वहां के लोगों पर,।गायों के ऊपर और कृष्ण के ऊपर भी। उस ब्रज की रज जिसका रंग वैसे पांडू/धवल/ पीला हल्का- सा पांडु रंग उस ब्रज की रज का/ ब्रज की रेणु का होता है। वहां की धेनु जब चलती है और वह तभी चलती है जब कृष्ण वेणु बजाते हैं। वेणु बजाते हैं तो धेनु चलती है तो फिर रेणु आकाश में उड़ती है, फिर कृष्ण के ऊपर बैठ जाती है तो जिस रंग के या जैसे वे कृष्ण दिखते हैं, उनको देखके फिर कहना पड़ता है पांडुरंग! पांडुरंग! यह कौन है? कैसे हैं? ये पांडुरंग पांडुरंग है। यह कृष्ण कनेक्शन या विट्ठल कनेक्शन पांडुरंग नाम से ही है। हरि हरि ! वही कृष्ण जब वृंदावन से मथुरा आए फिर मथुरा के कृष्ण हुए। वहां से आगे बढ़े तो द्वारका आए फिर द्वारका के कृष्ण द्वारकाधीश हुए। वही फिर आगे बढ़े पंढरपुर आए तो वहां पंढरपुर के कृष्ण वे बन गए विट्ठोबा और ईंट के ऊपर खड़े हुए हैं

 हरि हरि! वह ईंट भी वैसे साधारण नहीं थी, वृत्रासुर का जब वध हो रहा था, इंद्र और वृत्रासुर और के मध्य में युद्ध हो रहा था उसे समय इंद्र को श्राप दिया जाता है कि तुम ईंट बनो। तो इंद्र ईट बने, पंढरपुर की ईंट बने और वे प्रतीक्षा कर रहे थे कि कब आएंगे भगवान? कब आते हैं भगवान? क्योंकि भगवान के चरणों के स्पर्श से इंद्र जो उस ईंट के रूप में वहां विराजमान थे, उनकी मुक्ति होने वाली थी। जैसे भगवान आए पुंडलिक ने जो ईंट भगवान को खड़े होने के लिए दे दी, वह ईट कोई वहां की ब्रिक फैक्ट्री की नहीं थी, यह विशेष इंद्र को मिले श्राप से बनी थी। भगवान ने जैसे ही स्पर्श किया वैसे उसी के साथ वहां से इंद्र निकलते हैं। जैसे राम के चरणों के स्पर्श से अहिल्या का उद्धार हुआ, वैसे ही विट्ठल भगवान के चरणों के स्पर्श से ईंट में जो इंद्र दे उनका उद्धार होता है, वे पुनः इंद्र बन गए ईट से। ऐसे उद्धार करना प्रारंभ किये भगवान पंढरपुर में l वहां कई संतों का/भक्तों का/ आचार्यों का आगमन होता है, धीरे-धीरे हम यह भी बताने वाले हैं वहां श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु की जय! और नित्यानंद प्रभु की और विश्वरूप, इनका भी आगमन होना है। ये स्वयं भगवान है नित्यानंद प्रभु और चैतन्य महाप्रभु। विश्वरूप ये विष्णु तत्व है, हम जीव तत्व हैं। कई प्रकार के तत्व है, हम जीत तत्व हैं तोकोई शक्ति तत्व है, कोई यह तत्व है कोई वह तत्व है। तो भगवान का जो तत्व है उसको विष्णु तत्व कहते हैं, भगवान विष्णु तत्व है। तो विष्णु तत्व का भी वहां पंढरपुर में आगमन होता है तो कई सारे आचार्य/संतो/भक्तों के साथ शंकराचार्य भी वहां आ जाते हैं। परिभ्रमण करते-करते ऐसे शंकराचार्य तो प्रचार कर रहे थे, उनका आदेश हुआ था मायावद का प्रचार करो। मायावद या जिसको अद्वैतवाद/ निराकारवाद/ निर्गुणवाद का तुम प्रचार करो। 

“अहम् ब्रह्मास्मि” मैं ही हूं ब्रह्म, “तत्त्वं असी” ये चार महावाक्य भी है। शंकराचार्य ऐसे मत का प्रचार करने वाले जो अद्वैतवादी निराकारवाद है, भगवान का आकार नहीं है,वे निर्गुण है। ऐसा प्रचार सही नहीं है या यह प्रचार अधूरा है। भगवान का रूप है और भगवान का रूप नहीं है, मतलब भगवान के स्वरूप से जो कांति-ज्योति उत्पन्न होती है उसका नाम ब्रह्मज्योति है।

“ब्रह्मणों हि प्रतिष्ठा अहम” 

भगवान कहते हैं जो ब्रह्म ज्योति है, उसमें लीन होने का जो प्रयास होता है, अद्वैतवादियों का या निर्गुण/  निराकारवादियों का उस ब्रह्म ज्योति के स्रोत स्वयं भगवान हैं। भगवान का स्वरूप होता है तो भगवान का रूप भी है और यह ब्रह्म ज्योति के रूप में कहो या स्वरूप में, वैसे इनका रूप है भी नहीं। शंकराचार्य इस प्रकार का प्रचार करने वाले जब पंढरपुर धाम आते हैं तो विट्ठल भगवान का दर्शन करते हैं, पंढरपुर में निवास करते हैं। उनकी जो भाषा है जिसमें वे प्रचार कर रहे थे, उसमें बिल्कुल परिवर्तन हो जाता है पंढरपुर में और पंढरपुर में ही उन्होंने “पांडुरंग अष्टक” की रचना को। 

“परब्रह्म लिंगम भजे पांडुरंग” 

मैं भेजता हूं, किनको भजता हूं? पांडुरंग को भजता हूं। कैसे हैं पांडुरंग? परब्रह्म लिंगम, लिंगम मतलब रूप / आकर/ रूप वाले। ऐसे रूपवाले परम सुंदर भगवान पांडुरंग का मैं भजन करता हूं। ऐसे उन्होंने अष्टक की रचना की, भगवान के सौंदर्य का/लीला का/ नाम का / धाम का उल्लेख किया, उसका प्रकाशन किया। प्रकाशित करते हैं शंकराचार्य, 

“महायोगपीठे तटे भीम रथ्या 

वरम पुंडलिकाय दातुम मुनिद्रे” 

एक तो पंढरपुर धाम को वे कह रहे है कि यह महायोगी पीठ है। भगवान का धाम और जहां भगवान के विग्रह की स्थापना होती है /आराधना होती है /अर्चना होती है उसको योगपीठ कहते हैं,हर धाम में। पंढरपुर को तो वे कह रहे है कि यह तो महायोगपीठ है और कहां है? तटे भीमरथ्या। चंद्रभागा के कई नाम है : भीमा भी है।

“भीमा आणि चंद्रभागा तुझा चरणी च गंगा” तो उसी गंगा का, चंद्रभागा का, भीमा का एक और नाम है भागवत में, इसका कई स्थानों पर उल्लेख है भीमरथी। 

“भीम रथ्या तटे” भगवान वहां आए ऐसा शंकराचार्य लिख रहे हैं कि भगवान वहां आए। क्यों आए?

“वरम पुंडलिकाय दातम “ पुंडलिक को वरदान देने हेतु भगवान वहां आए, द्वारका से आए, वहां रहे और वहां विट्ठल बने। वे वहां स्थित हुए। ऐसे हैं 

“आनंद कंदम” 

“परम लिंगम भजे पांडुरंगम” 

तुकामणे, तुकाराम महाराज ने कहा 

“अद्वैताची वाणी”, अद्वैत में ‘अ’ मँजे नहीं और द्वैत मतलब दो। मतलब कि वो दो नहीं है “ याने भगवान एक और हम दूसरे नहीं हैं, हम ही भगवान हैं, भगवान ही हम हैं। ऐसी समझ और ऐसी बातें अद्वैतवाद की बातें,

“नको माजा कानी” मैं सुनना नहीं चाहता हूँ आपके अद्वैत की वाणी। चैतन्य महाप्रभु तो कहे,

“मायावाद भाष्य सुनिले होईलो सर्वनाश”

मायावाद मतलब अद्वैतवाद को मायावाद भी कहा है। भगवान का जो विग्रह हैं वह शाश्वत नहीं है, सदा के लिए नहीं है, सनातन नही है, कुछ समय के लिए हैं। यह ब्रह्म कुछ समय के लिए रूप धारण करते हैं और पुनः उनका रुप नहीं रहता, पुनः वे भी ब्रह्म में लीन होते है, ब्रह्म बनते हैं तो ये मायावाद भाष्य सुनिले होईलो सर्वनाश। 

भक्ति करने के लिए, जीव का धर्म हैं भक्ति करना तो भक्ति में भक्त होना चाहिए और भगवान होने चाहिए और फिर भक्ति जो भक्त और भगवान को जोड़ती है। भक्तियोग, योग मतलब युज-धातु से योग शब्द बनता है जिसका मतलब है जोड़ना/ संबंध स्थापित करना। जीव का और भगवान का संबंध स्थापित करने वाली भक्ति होती है। मायावाद में / अद्वैतवाद में कौन किसकी भक्ति/सेवा/ध्यान/स्मरण/अर्चना करेगा? हम ही भगवान हैं। इस बात का सर्वत्र खंडन हुआ है, ये सारे मध्वाचार्य, रामानुजाचार्य, विष्णु स्वामी आदि जो महान आचार्य हुये हमारे सनातन धर्म के, इन सभी ने इस अद्वैतवाद का खंडन/ मंडन/मुंडन किया हुआ है। ऐसी अद्वैतवाद/ निराकारवाद का पंढरपुर में स्थान नहीं है, कहीं भी नहीं होना चाहिए। पंढरपुर में तो

“विट्ठू माझा लेकुरवाडा सांघे गोपालांच मेढ़ा”

हरि हरि! ये कैसे संभव है? यह आदान- प्रदान, भगवान और भक्त और बस। अद्वैतवाद/ निराकारवाद/ सर्वब्रह्म, ये सब ऐंड ऑफ वैकुंठ नहीं है और

“अमि ज़ातो आमचा गांवा” नहीं हैं। नथिंग, बस लीन हो जाओ, फ़िनिश।

“नमस्ते सरस्वते देवे ग़ौरवाणी प्रचारिणे

निर्विशेष शून्यवादी पाश्चात्य देशतारिणे”

श्रील प्रभुपाद की जय!

यहां जो मूर्ति देख रहे हो, ये इस्कॉन के फ़ाउंडर आचार्य संस्थापक आचार्य है। उनके प्रणाम मंत्र में हम कहते हैं, नमस्ते, नमस्कार करते हैं, सारस्वते देवे, जिन्होंने गौर वाणी का प्रचार किया। गौरंग! गौरवाणी मतलब गौरांग महाप्रभु की वाणी, गौरांग! गौरांग! स्वयं भगवान जो गौरांग महाप्रभु के रूप में प्रकट हुए, उनकी वाणी का उनके संदेश उपदेश का जो कृष्ण का ही उपदेश है क्योंकि गोरांग कृष्ण ही है। श्रील प्रभुपाद ने संसार भर में ये ग़ौर वाणी का प्रचार करके क्या किया? और एक नाम हुआ अद्वैतवाद का, इसका दूसरा नाम है निर्विशेषवाद याने कोई वैशिष्ट्य नहीं है भगवान में, बस एक ज्योति है, प्रकाश है, सर्वत्र है, फ़िनिश। भगवान का जो वैविध्य हैं/ विविधता है, कई प्रकार की विविधता/ वैराइटी जो है उसको समाप्त कर देती है यह ब्रह्मज्योति या ये तथाकथित ब्रह्मज्ञान। कथा आगे बढ़ते हैं, तो उसी पंढरपुर में रुक्मिणी तो है ही,आगे विठ्ठल पांडुरंग विराजमान है, फिर हम पीछे आते हैं, रुक्मिणी का दर्शन करते हैं। और भी दर्शन वहाँ है सत्यभामा की जय! द्वारका की जो आठ रानियां है उन्हीं का प्रतिनिधित्व सत्यभामा करती है, रुक्मिणी तो करतो ही है। द्वारका में तो सभी आठों रानियों के दर्शन हैं/ विग्रह हैं और साथ-ही-साथ इसे नोट कीजिए विट्ठल मंदिर में राधा रानी भी है।

“जय श्री राधे!” ये और भी स्पष्ट हुआ है कि विट्ठल कृष्ण है/ द्वारकाधीश है। विट्ठल बृंदावन के कृष्ण हैं/ पांडुरंग हैं। हर रोज़ विट्ठल भगवान की आरती होती है,

“रुकमाई च वल्लभ” ऐसी हर रोज आरती होती है और आरती महोत्सव जो है वो “ऐसा सोढ़ा स्वर्गी नाहीं” ,ये कैसे संभव है कि भगवान स्वर्ग में नहीं रहते? स्वर्ग में तो देवता रहते हैं, ३३ करोड़ देवता जो है वो स्वर्ग में रहते हैं। भगवान स्वर्ग में नहीं रहते, हमको इतना भी भेद पता नहीं, स्वर्ग में और वैकुण्ठ में। स्वर्ग तो इसी संसार में इसी ब्रह्मांड में है, किंतु इस ब्रह्माण्ड के परे जो भगवान का दिव्य/अलौकिक धाम है, वो है वैकुण्ठ।

“गोलोक नामनि निज धामनी तले च तस्या

देवी महेश हरिधाम सुतेशु तेशू “

इसमें विविधता भी है। भगवान कृष्ण जहाँ रहते हैं, गोलोक में भगवान कृष्ण रहते हैं और उसके तले / उसके नीचे है यह देवी धाम। यह ब्रह्माण्ड जिसमें हम हैं और ऐसे “अनंत कोटि ब्रह्माण्ड नायक” भगवान हैं। कितने ब्रह्मांड है? अनंत कोटि ब्रह्माण्ड के नायक, तो इनमें ब्रह्मांडों के ऊपर है महेश धाम, जो आधा इस भौतिक जगत में है आधा वैकुण्ठ जगत में है और उसके ऊपर है वैंकुठ जगत जिसमें कई सारे वैकुण्ठ लोक हैं। भगवान के अलग-अलग अवतार उन्हीं लोकों तो निवास करते हैं, जिसे भगवान, “संभवामि युगे युगे” मैं प्रकट होता हूँ, अलग-अलग वैकुंठ जगतों से भगवान यहाँ उतरते हैं और इन वैकुंठ धामों के ऊपर है साकेत धाम, अयोध्या धाम की जय! उसको साकेत कहा है। वैकुंठ से ऊपर है अयोध्या और अयोध्या के ऊपर है गोलोक। इस गोलोक में है द्वारका, इसी गोलोक में है मथुरा, इसी गोलोक में हैं वृन्दावन धाम। चित्र में यह गोलोक है,यह द्वारका है, यह वृन्दावन भी है इसलिए वहाँ द्वारका की सत्यभामा-रुक्मणी भी है और वृंदावन की राधा रानी का भी दर्शन है। इतना ही नहीं मैं कल कह ही रहा था कि कृष्ण और बलराम सदैव साथ में रहते हैं। तो पंढरपुर में भी विट्ठल जो कृष्ण है तो वहां बलराम भी है मंदिर के प्रांगण में ही। बड़ी दादा, बाड़ी दादा च मंदिर है, बड़ी दादा। अभी धीरे-धीरे उसको बालाजी,बालाजी ऐसा भी लोग कहने लगे हैं लेकिन वो बड़ी दादा कौन? वो है बलराम दादा, कृष्ण के बड़े भैया। तो वहाँ कृष्ण के साथ बलराम भी है पंढरपुर में और पंढरपुर में एक तो है पंढरपुर और एक पुर है वहाँ, कौन-सा पुर? एक पंढरपुर और दूसरा पुर कौनसा ? 

जय गोपालपुर धाम की जय!

दो-दो पुर हैं, दो नगर हैं, दो पुरियां हैं। जगन्नाथपुरी या पुर मंजे नदी लै नारे पुरनावे “ तो पंढरपुर है और गोपालपुर है। तो वहाँ गोपालपुर वहां कैसे स्थापित हुआ? इसका भी पुराणों में उल्लेख है। तो कहा गया है कि भगवान द्वारकाधीश जब रुक्मिणी की खोज के लिए निकले तो खोजते-खोजते वे वृंदावन की ओर जाते है। रुक्मिणी तो कहीं नहीं मिलती पर वृंदावन से जब कृष्ण प्रस्थान करते हैं तो साथ में अपने कई सारे ग्वाल-बालों को भी और गायों को लेकर भगवान आगे बढ़ते हैं तो गाये और पेंदे-मंडली ग्वालबाल भी साथ में आते हैं और वे आते-आते चंद्रभागा के तट पर पहुँच जाते हैं। गोपालपुर में ही विष्णुपद नाम का स्थान है बिल्कुल चंद्रभागा के तट पर। आप यदि गए होंगे तो वहाँ गायों के, बछड़ों के खुर चिन्ह है। यहाँ तक कि भगवान की मुरली भी चिन्हांकित हुई है। ये चिन्ह कैसे बने? तो भगवान के साथ जो आयी हुई थी गाये और बछड़े, उनके कारण ही बने। इतना ही नहीं एक और भी बात है। इसी विष्णु पद में आषाढ़ी एकादशी अनंतर, आषाढ़ी एकादशी के उपरांत जो पूर्णिमा आती है, वारकरि/ तीर्थयात्री पूर्णिमा तक रुके रहते हैं फिर पूर्णिमा के दिन वो सभी गोपालपुर में जो विष्णुपद है वहाँ जाते हैं। वहाँ क्या होता है? “गोपाल काला” अपने-अपने टिफ़िन या भोजन/ शिदोरी लेकर आते हैं और वहाँ बैठकर भोजन करते हैं मानो वन-भोजन हो रहा है। मानो ही नहीं वैसे मैं कहने जा रहा था कि भगवान जमुना के तट पर अपने मित्रों के साथ भोजन कर रहे हैं। पता नहीं आजकल के वारकरी यह सब चिंतन स्मरण करते हैं या नहीं करते हैं? परम्परा तो चल रही है लेकिन इसके पीछे यह समझ है कि भगवान जैसे अपने मित्रों के साथ भोजन करते थे, तो ऐसे ही वारकरी के लिए वहाँ गोपाल काला चलता है, गोपाल काला महोत्सव की जय! आप कभी गये वहाँ? भोजन किया वहाँ गोपालकाला में? फिर वही पर गोपालपुर है, बीच में से अभी रास्ता है। उस समय और इस समय भी जो ‘दी गोपालपुर है’ जो दिव्य गोपालपुर है वहाँ तो इस संसार के रास्ते वगैरा वहाँ नहीं हैं। वहां पर जो गोपालपुर है वो वृंदावन का गोकुल ही है और वहाँ मुरली भी बजा रहे हैं कृष्ण। “कृष्ण जिनका नाम है गोकुल जिनका धाम है

ऐसे श्री भगवान को मेरा बारंबार प्रणाम है”

तो यहाँ भी जमुना बहती है पंढरपुर में भी और यह जो गोपालपुर एक छोटे से टीला को कहते हैं ,उत्तर भारत में टीला मतलब अ स्मॉल हिल। ऊपर छोटा सा डोंगर है, ऊपर गोपालपुर है तो जो डोगर या जो पर्वत है “गिरीराज गोवर्धन की जय!” ये गिरीराज गोवर्धन हैं, यह सब उल्लेख है शास्त्रों में स्कंद पुराण/ पद्म पुराण में। इसका सब संशोधन इत्यादि करके ही तो भूवैकुंठ नामक 

ग्रन्थ की रचना भी हुई है। तो इसमें सब आपको उल्लेख/ रेफरेंस मिलेगा कि ये गोकुल है और वहाँ 

“यशोदा जिनकी मैया है नंदजी बापैया है

ऐसे श्रीगोपाल को मेरे बारंबार प्रणाम है,” 

“राधा जिनकी जाया है, अद्भुत जिनकी माया है

ऐसे श्री घनश्याम को मेरे बारम्बार प्रणाम है”

कितनी बार? बारम्बार प्रणाम है।

“लूट लूट दधि माखन खायो

ग्वाल बाल संग धेनु चरायो” 

ऐसे लीलाधाम को मेरे बारंबार प्रणाम है। तो वहाँ जब हम जाते हैं तो वहाँ दही मंथन का दर्शन है। बहुत बड़ा घड़ा है, मथानी हैं और आप दही मंथन भी कर सकते हो, ऐट द एंट्रेंस, प्रवेश द्वार पर ही हैं । यही स्मरण दिलाता है कि यह गोकुलधाम है, यह गोपालपुर है। विट्ठल भगवान कई सारे भक्तों के साथ, उनको केवल दर्शन की नहीं दिये, उनके साथ उनका संबंध/ लेनदेन/ मिलना जुलना भी। ऐसे कई सारे विट्ठल भगवान के भक्त हुए हैं, तुकाराम महाराज ये महाराज, वो महाराज। गोरा कुम्भार, नौ एंड। उसमें जना बाई भी थी, जनाबाई आप को देख रहे हो। भगवान चक्की पीस रहे हैं, जनाबाई के साथ कई बार उखल में, भगवान उनकी सहायता कर रहे है। उनके सारे कार्य में जनाबाई को घरेलू कामों में हेल्पिंग हैंड भगवान देते रहे और भगवान देते रहे। यह कुछ ७००-८०० वर्ष पहले की बात है नामदेव के समय की बात है। नामदेव महाराज के आश्रय में ही रहती थी जनाबाई। इस प्रकार बढ़े प्रेममयी और बड़े घनिष्ट संबंध भगवान ने अपने कई सारे भक्तों के साथ स्थापित किये हैं और यह जो धाम है ,हम एक दो बार तो कहे हैं इस भागवत कथा के अंतर्गत। यह है धाम शाश्वत है, सनातन है। “जहां होते चराचर तहा होके पंढरपुर”.यह चर-अचर यह जगत था न ही, प्राकट्य या उसकी उत्पत्ति नई ही हुई थी। तब था पंढरपुर और प्रलय के उपरांत भी रहता है यह पंढरपुर और पंढरपुर ही नहीं, जो भी धाम है।

वृन्दावन धाम की जय! अयोध्या धाम की जय!

मायापुर धाम की जय! जगन्नाथ पुरी धाम की जय!

तिरुपति बालाजी धाम की जय।

श्रीरंगम धाम की जय! 

यह सारे धाम शाश्वत है, दे आर ईटरनल,सनातन। सनातन मंजे काय? सनातन मतलब जिसकी शुरुआत नहीं है इसलिए भी उसका अंत नहीं होता। जिसकी शुरुआत होती है उसका अंत भी होता है।

“जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु” – ऐसा नियम है, 

“जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु”- जिसका जन्म होता है उसका मरण निश्चित है। जिसकी शुरुआत हुई है उसका अंत होना ही होना है। दिस इज़ द लॉ। तो वैसे जीव का भी,

न जायते न म्रियते वा कदाचिन्” आत्मा के संबंध में भगवान,न जायते न म्रियते, हम जो आत्मा है, शरीर का जन्म हुआ है, जब हम जन्म लेते हैं तो कुछ भक्त कहते हैं हम लोग डेथ सर्टिफिकेट हाथ में लेकर ही जन्म लेते हैं, फॉर स्योर। भगवान ने कहा ध्रुवम, ध्रुवम मतलब निश्चित। जैसे ध्रुव तारा स्थिर रहता है, पक्की बात । जन्म लिया तक मृत्यु निश्चित है शरीर ने जन्म लिया है तो मृत्यु निश्चित है किंतु आत्मा का जन्म नहीं होता इसलिए आत्मा का मरण भी नहीं है।

“ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:”

कृष्ण कहे संसार के सारे जीव, सारे जीव केवल हिंदू जीव नहीं। जीव हिंदू नहीं होता, जीव ईसाई नहीं होता, जीव इस्लाम रंग का नहीं होता। इंडियन जीव, अमेरिकन जीव, ऑस्ट्रेलियन जीव, जीव तो जीव होता है, स्त्री जीव पुरुष जीव ‘नो’। काला जीव, गोरा जीव, गरीब जीव, श्रीमंत जीव, ‘नो’।

“सर्वोपाधि-विनिर्मुक्तं तत्-परत्वेन निर्मलम्

यह सारी उपाधियां/ डेजिग्नेशंस है। मैं काला-गोरा देसी-विदेशी,या धर्म च आ धर्म च। लेकिन आत्मा के साथ इसका कोई संबंध नहीं है और आत्मा का जन्म नहीं है इसलिए आत्मा का मरण भी नहीं है। फिर ऐसे सनातन जीव का धर्म भी सनातन है। सभी जीवो का जैव धर्म, सभी जीवो का धर्म है। काय नाव? धर्म स नाव काय? सनातन धर्म। हिंदू धर्म नहीं तो फिर का? भागवत धर्म। कहीं-कहीं पर वर्णाश्रम धर्म का भी नाम आता है। सभी जीवों का धर्म है सनातन धर्म, सनातन मतलब शाश्वत। ऐसा समय नहीं था तो सनातन धर्म का कोई इतिहास/ कोई हिस्ट्री नहीं है, ओ ऐसे फलाने-फलाने समय इतने हजारों वर्ष पूर्व यह धर्म शुरू हुआ सनातन, नहीं नहीं! वह सनातन नहीं है। किसी का जो धर्म शुरू भी हुए हैं। यदि धर्म शुरू हुआ है, कोई धर्म ५०० वर्ष पुराना है, कोई १४०० वर्ष पुराना है। आप जानते हो कौन सा? टू थाउजेंड ईयर्स एगो, २००० वर्ष पुराना है अभी-अभी हैप्पी क्रिसमस वगैरह चल रहा है, टू थाउजेंड ईयर्स ओल्ड, फिर ढाई हजार वर्ष बौद्ध धर्म । यह इतने वर्ष पुराने, इतने वर्ष पुराने, इतने वर्ष पुराने हैं, इनकी शुरुआत इस समय हुई तो जिसकी शुरुआत हुई है उसका क्या होता है? क्या होता है? उसका अंत होता है। इन धर्मों की शुरुआत हुई है तो फिर क्या होगा? मैं नहीं कहना चाहूंगा। दिस इज़ अ लॉ। हम कोई कर्स या श्राप वगैरह नहीं दे रहे हैं। लेकिन जो होना है प्रकृति के नियमों के अनुसार, लॉज ऑफ़ द लॉर्ड के अनुसार। एक लॉज ऑफ़ द लैंड होता है और फिर लॉज ऑफ द लॉर्ड होते हैं। लॉज ऑफ द लॉर्ड के अनुसार जिसकी शुरुआत उसका अंत। लेकिन सनातन धर्म की शुरुआत नहीं हुई है इसलिए इस धर्म का अंत भी नहीं है।

मैंने सोचा आप सभी ताली पीटोगे लेकिन शायद… तो जीव भी सनातन है एंड ऑफकोर्स भगवान भी सनातन है ही मतलब भगवान का रूप भी सनातन है, शाश्वत है।

“सुंदर ते ध्यान उभे विटेवरी”

यह जो भगवान के सौंदर्य का वर्णन है,

“तुळसी हार गळां कासे पीतांबर”

भगवान पीतांबर वस्त्र पहनते हैं यह बात भी शाश्वत है। “मकरकुंडले तळपती श्रवणी कंठी कौस्तुभमणि

यह सब भगवान के रूप या स्वरूप या वो जो अलंकार पहनते हैं ये भी शाश्वत सदा के लिए है। हरि हरि! कृष्ण अपना कलर वगैरह चेंज नहीं करते, वह शाम घनेव शाम, सदा के लिए श्याम सुंदर ही रहते हैं। तो भगवान का रूप शाश्वत है, भगवान का नाम शाश्वत है, भगवान का काम जिसे हम लीला कहते हैं वह शाश्वत है, भगवान का धाम शाश्वत है और हमारा भगवान के साथ जो संबंध है वह शाश्वत है और धाम भी शाश्वत है। इसीलिए कहा है कि जब यह चराचर नहीं था, यह ब्रह्मांड नहीं थे, यह संसार नहीं था, इसकी सृष्टि नहीं हुई थी उसके पहले पंढरपुर धाम था। एक समय प्रलय भी होगा, भोलेनाथ शंकर अपना डमरू लेकर डिम डिम डिम डिम डिम डिम! तांडव नृत्य शुरू करेंगे और तमोगुण गुण को सक्रिय करेंगे , तमोगुण से डिस्ट्रक्शन होता है। रजोगुण से क्रिएशन होता है और गुडनेस या सतोगुण से मेंटेनेंस होता है, स्थिति होती है। इसीलिए कभी-कभी कहते हैं लोग गॉड जो है, जी.ओ. डी. गॉड, यह भी तीन भगवान के गुण अवतार भी कहलाते हैं- ब्रह्मा,विष्णु,महेश। व्हाट इज जी.ओ. डी.? जी में जनरेटर, जी इज़ जनरेटर। ओ क्या है? ओ इज़ ऑपरेटर। और डी क्या है? डिस्ट्रॉयर। यह ब्रह्मा विष्णु महेश की तीन लीलाएं कहो। डिस्ट्रक्शन के उपरांत भी जब फिर प्रलय होता है,महाप्रलय होता है तब भी यह धाम बने रहते हैं, इंटैक्ट। जहां है और ज्यों के त्यों, सदा के लिए बने रहते हैं। 

मार्कंडेय मुनि, उनको वरदान मिला था कि तुम जीते रहो। सृष्टि का प्रलय भी होगा तो भी तुम जीते रहोगे। तो सृष्टि का प्रलय हुआ और वे जी तो रहे थे लेकिन उनका जीवन बड़ा कठिन हो रहा था। वहां की जो लहरें तरंगें हैं प्रलय जल की,उसमें उनको फेंका जा रहा था यहां से वहां, वहां से यहां। हरि हरि! जैसे आप देख रहे हो। केवल प्रलय का जल और कुछ सृष्टि का कोई दर्शन कोई लक्षण वे देख नहीं रहे थे, सर्वत्र भ्रमण चल रहा था उनका। वह जहां भी जाते बस जल था और कुछ नामोनिशान नहीं था, पृथ्वी का या चंद्र का या सूर्य का या यह सारे जो लोक हैं या आकाशगंगा है या १४ भुवन है। पृथ्वी,स्वर्ग दिस वन एंड डेट वन, तलाताल,सुतल,पाताल इनमें से कोई दृष्टि पथ पर नहीं आ रहे थे। तो उन्होंने अचानक वृक्ष की शाखाएं देखी और शाखा-उपशाखा पर कई पत्ते थे, उसमें से एक पत्ते पर उन्होंने

बालम मुकुंद मनसा स्मरामी” भगवान ने उनको दर्शन दिया। भगवान क्या कर रहे थे? यह उनका अनुभव रहा,

“करारविन्देन पदारविन्दं मुखारविन्दे विनिवेशयन्तम्।

वटस्य पत्रस्य पुटे शयानं बालं मुकुन्दंमनसा स्मरामि।।”

भगवान करअरविंद/ हस्तकमल से क्या कर रहे थे? पदारविंदम अपने चरण कमल और चरण कमल का भी अंगूठा मुखारविन्दे विनिवेशयन्तम, उसको चूस रहे थे और यह दर्शन कहां था? वटस्य, वट ,पत्रस्य पुटे शयानं, में लेटा हुआ बालक बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि। तो धीरे-धीरे वह समझ जाते हैं, यह दर्शन भी भगवान मानो कि ,”हीयर हीयर यहां उतरो, नीचे आओ,काम डाउन”। धीरे-धीरे वह जब उतरते हैं तो वहां जगन्नाथ पुरी धाम की! मैं जगन्नाथ पुरी में था तो वहां जगन्नाथ पुरी के प्रांगण में ही यह वट वृक्ष है और वहां यह बालमुकुंद का दर्शन, वहां मूर्ति भी है ऐसी ही

”करारविन्देन पदारविन्दं” वाली,” मुखारविन्दे विनिवेशयन्तम” तो वहां पर यह सब लीला भी हम सुन रहे थे, पहले भी यह सब जानते थे या पढ़े तो थे शास्त्र मैं यह सब बातें। बातों का उल्लेख है तो वहां सारा धाम इंटैक्ट है। प्रलय है, नहीं है, डज नॉट मैटर। ऐसा अनुभव वैसे यह मार्कंडेय मुनि, मायापुर गए तो मायापुर में उन्होंने दर्शन ऐसा ही किया। यह सारे धाम शाश्वत हैं, बने रहते हैं। पंढरपुर धाम की जय! ऐसा भी है यह पंढरपुर धाम। 

यह सब, इसको भगवान कहते हैं,

जन्म कर्म च मे दिव्यम् एवं यो वेत्ति 

त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन”

भगवान कहते हैं मेरे जन्म, मेरी लीला,मेरे धाम इत्यादि-इत्यादि को तत्वतः समझना चाहिए। तत्वतः मतलब उसका तत्व समझना चाहिए। तो यह हम कुछ तत्व की बात भी कर रहे हैं शास्त्र के आधार पर, इस प्रकार हम धाम को भी समझने का प्रयास कर रहे हैं। और यह धाम

“चिंतामणि-प्रकर-सदमासु कल्प-वृक्ष,

लक्षावृतेषु सुरभिर अभिपालयंतं 

लक्ष्मी-सहस्र-शत-संभ्रम-सेव्यमानं 

गोविंदम आदि-पुरुषम तम अहम् भजामि।”

तो यह सारे धाम चिंतामणि नामक मणि से बने हैं। पृथ्वी, जल,अग्नि, वायु, आकाश, यह जो पंच महाभूत हैं इनसे ये धाम नहीं बनते। यह धाम चिंतामणि या सच्चिदानंद होते हैं। इसलिए धाम में जाते हैं तो हम लोग परिक्रमा करते समय जूते नहीं पहनते, क्योंकि यह भगवान है, बलराम का विस्तार है,लॉर्ड बलराम का विस्तार ही धाम होते हैं और उसमें भगवान कृष्ण अलग-अलग अवतारों में रूपों में लीला खेलते हैं कि चलो हम विश्राम घाट की ओर (मथुरा में) कहां-कहां जा सकते हैं पता नहीं। विश्राम घाट मथुरा में है,मथुरा धाम की जय! और जमुना मैया की जय! यह आप देख रहे हो वराह भगवान और इस घाट को कहते हैं विश्राम घाट जहां वराह भगवान विश्राम किए। कब विश्राम किए? एक समय यह पृथ्वी डूब जाती है प्रलय जल में। एक विशेष परिस्थिति में ऐसा होता है। वराह भगवान, इस कल्प के प्रारंभ की बात है। कल्प मतलब ब्रह्मा का एक दिन, उसको कल्प कहते हैं । इसलिए इस कल्प के प्रारंभ में पहला अवतार जो हुआ वह वराह भगवान थे। “वराह कल्पे”, हम लोग जो संकल्प लेते हैं, वराह कल्पे मतलब इस कल्प के प्रारंभ में। तो भगवान ने हिरण्याक्ष के साथ युद्ध और वध किया क्योंकि वही कारणीभूत या वही कारण बना था पृथ्वी के डूबने का समुद्र में। भगवान पृथ्वी को उठाके ले आए अपने दांत के नोक पर, ऑन द टिप ऑफ़ द टीथ, वहां पृथ्वी को धारण किए हैं। आप देखिए, सुनिए और समझिए, कल्पना कीजिए। भगवान बैठे हैं मथुरा में या मथुरा वृंदावन में भगवान बैठे हैं वराह भगवान का विशाल रूप है। पृथ्वी कहां है? उनके दांत के ऊपर,उसको धारण किया। 

“केशव धृत वराह रूप

जय जगदीश हरे! जय जगदीश हरे! जय जगदीश हरे!”

यह दशावतार का जो गीत है उसमें हर अवतार का नाम है- केशव धृत वामन रूप, केशव धृत कच्छप रूप,केशव धृत राम रूप भी, कल्कि रूप ऐसे दस रूप है। तो ऐसे ही बारह रूप, यहां समझने की बात यह है कि यह धाम पृथ्वी पर नहीं है। वृंदावन,मथुरा,अयोध्या,जगन्नाथ पुरी, द्वारका,पंढरपुर, ये सब इस पृथ्वी पर नहीं है, पृथ्वी का अंग नहीं है। ऐसा कहना अपराध है,धाम अपराध। अलग-अलग १० धाम अपराधों का भी शास्त्रों में उल्लेख है। नाम अपराध, धाम अपराध। यह धाम पंढरपुर धाम महाराष्ट्र में है, गुजरात में द्वारका है, यूपी में अयोध्या है, यह अपराध के वचन है, यह सही समझ नहीं है क्योंकि एक समय यूपी, महाराष्ट्र,गुजरात नहीं रहेगा किंतु पंढरपुर रहेगा। वृंदावन, अयोध्या,जगन्नाथ पुरी, मायापुर धाम की जय! ये सब रहते हैं। आपको हम बता रहे थे  भगवान की दो प्रकार की लीलाएं होती हैं। एक प्रकट लीला और दूसरी अप्रकट लीला या नित्य लीला। या कोई नैमित्तिक या प्रासंगिक लीला और दूसरी नित्य लीला। समय-समय पर भगवान अपनी प्रकट लीला या नैमित्तिक लीला का प्रदर्शन करते हैं। यह बताए थे कि राम ११००० वर्षों तक, श्री कृष्ण १२५ वर्षों तक, श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु ४८ वर्षों तक अपनी लीला को प्रकट किए और उसके पहले और बाद में तो उनकी नित्य लीला चलती ही रहती है सदैव। 

हरि हरि!

कैसा धाम? 

“माझे माहेर पंढरी”, पंढरपुर धाम की जय!

माहे माझेर पंढरी क्योंकि वहां विट्ठू माऊली, विठोबा रहते हैं। एक गीत गाने वाले हैं हमारे भक्त कलाकार जो वृंदावन से और उत्तर भारत से आए हैं। इनकी भाषा मराठी नहीं है, तो भी ये इस अभंग को आपको सुनाने जा रहे हैं।