
Srimad Bhagavatam HADAPSAR-25-31-Day-7
31-12-2023
ISKCON Pune
“ॐ अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥”
हरि हरि! मैं भी आप सभी का, हरि हरि! पुनः पुनः आज भी स्वागत करना चाहता हूं,मेरे स्वागत को स्वीकार कीजिए। यू आर मोस्ट वेलकम, हरि हरि! या फिर यह भी विचार आता है कि जैसे हम यहां आज स्वागत कर रहे हैं आपका, एक दिन निकट के भविष्य में वैकुंठ में या वृंदावन में आपका स्वागत हो। हम सबको भी,
“अमि ज़ातो अमचा गांवा”, हरि हरि!
जैसे तुकाराम महाराज अपने गांव लौटे, अपने गांव तो उनका गांव तो वैसे हम सभी का भी गांव है क्योंकि वैकुंठ या वृंदावन या पंढरपुर को भी कहते हैं “माहेर घर”,फिर वह वैकुंठ या भूवैकुंठ अभिन्न भी है। तो भी हमें जो वैकुंठ जो धरातल पर है, भूवैकुंठ जाते हुए, वहां साधना करते हुए, विट्ठल का दर्शन करते हुए, हमें अधिकारी बनना है, भगवत धाम प्राप्ति का।
‘“विठू माझा लेकुरवाला संगे गोपालांचा मेला”
तो हम सभी विट्ठल की संताने है/ लेकरा होत अपन।
“आणि तो कर कटावरी ठेउनिया”
कमर पर हाथ रखते हुए भगवान हम सब की प्रतीक्षा करते हुए दिखते तो है, दिखते ही हैं। जैसे ये दृश्य देख रहे हो वैसे ही वैकुंठ में,गोलोक में, वृंदावन में भी भगवान हम सबकी प्रतीक्षा में है। तो आइए, चलिए हम लौटते हैं। राजनेता वगैरह तो कहते,”चलो दिल्ली या चलो मुंबई, वही तक हमको पहुंचाते हैं। किंतु संत महात्मा/ तुकाराम महाराज जैसे या श्रील प्रभुपाद की जय! श्रील प्रभुपाद जैसे और सभी आचार्य वैसे उनका अभियान, उनका कैंपेन क्या होता है? चलो वैकुंठ। आप स्वागत कर रहे हैं?आप तैयार हो? आर यू रेडी? इनफ इज इनफ, कहते हैं, बहुत हो गया हरि हरि! वैकुंठ ही हम सभी का गांव है, अमि ज़ातो अमचा काय?” अमचा गांवा। वैकुंठ हमारा मदरलैंड है, फादरलैंड है क्योंकि हमारे मदर-फादर तो विठोबा, विठोबा माने फादर।
“त्वमेव माता पिता त्वमेव”, वह माता भी है, पिता भी है, धाता भी है, पितामह भी है। “मम सर्व देवदेव:” और वह सब कुछ है। “वासुदेव सर्वमिति, वासुदेव सर्वमिति, ही इज़ ऑल इन ऑल”। कृष्ण / पांडुरंग इज़ ऑल इन ऑल। हम सभी के लिए वे सब कुछ है तो, वे जहां सदैव रहते हैं अपने धाम में, उनका धाम ही हमारा भी धाम है, हमारा भी गांव है। हरि हरि! जब गोकर्ण भी धुंधकारी के लिए कथा कर रहे थे, उस कथा के अंत में कई सारे विमान आ गए, वैकुंठ विमान आए और उन विमानों में वैमानिक थे या एयर होस्ट थे। एयर होस्टेस नहीं थी,ऐसा उल्लेख नहीं है तो एयर होस्ट थे। उन सभी ने, जिसने भी ध्यानपूर्वक, श्रद्धापूर्वक और मनन पूर्वक कथा का श्रवण किए थे या धारण किए थे। कथा करते-करते फिर ध्यान और समाधिस्थ भी हुए थे हरि हरि! तो उन सबको आमंत्रित किए और उन विमानों में वैसे स्वयं भगवान भी आए थे, उन्होंने तो गोकर्ण को भी आमंत्रित किया, भगवान आमंत्रित किए गोकर्ण वक्ता को और श्रोताओं को भी वैमानिकों ने या एयर होस्टेस / एयर होस्ट ने उन्हें निमंत्रित किया और सभी के सभी दे बोर्डेड द प्लेन / वैकुंठ प्लेनस, वैकुंठ से आए हुए विमान। दे फस्टेड देयर बेल्ट्स कहो, इंजन स्टार्टेड एंड दे टुक ऑफ वैकुंठ। वैकुंठ धाम की जय! ऐसा ही दृश्य वैसे 375 वर्ष पूर्व हुआ, 375 वर्ष पूर्व यहाँ पंढरपुर या देहू में विमान आया। तुकाराम महाराज आरूढ़ हुए और फिर जाते जाते वे कहे थे-
“आमी जातो अमचा गांवा आमचा राम-राम घ्यावा
राम कृष्ण मुखे बोला तुका ज़ातो वैकुंठाला॥”
इसका डेमोंस्ट्रेशन, ऐसी भगवान ने व्यवस्था की है यही पर नेक्स्ट डोर, पुणे के बगल में ही है। अभी तो पुणे में ही आ गया यह देहू गांव। जब और कोई एयरलाइंस नहीं थी, नो एयर इंडिया और चाइना एयरवेज और दिस वन दैट वन या ब्रिटिश एयरवेज, तब यहाँ लैंडिंग हुआ एक विमान, इसमें तुकाराम महाराज बैठकर / विराजमान होकर वैकुंठ लौटे और वे हम सबको कहे आप भी आ जाना, आप भी आ जाना। उसके लिए क्या करें?
“राम कृष्ण मुखे बोला
जय जय राम कृष्ण हरि”
हरि हरि! बोला
“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे,
हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे”
रेडी नाउ?
एक प्रस्तुतीकरण / प्रेजेंटेशन जिसका नाम “वसुधैव कुटुंबकम” हमने दिया है, हमारी संस्कृति या भागवत धर्म भी कहो सिखाता है। सिंपल लिविंग एंड क्या कहते हैं? हाई थिंकिंग; सादा जीवन उच्च विचार। ऐसे ही कुछ उच्च विचार भी प्रस्तुत हम करना चाहते हैं सादी याने सिंपल लिविंग या
“सर्वे सुखिनः भवंतु सर्वे संतु निरामया,
सर्वे भद्राणि पश्यंतु न कश्चित् दुख भाग भवेत”
यह भी जो विचार है यह उच्च विचार है। सभी सुखी हों, सभी निरोगी हो, हरि हरि! इत्यादि संबंधित
“एकम शास्त्रं देवकी पुत्र गीतम”, एक शास्त्र गीता,
“गीता भागवत करिती श्रवण अखंड चिंतन विट्ठोबाचे”
ये गीता भागवत ग्रंथों का माहात्म्य कहो, इसके संबंध में भी जो विचार है इत्यादि-इत्यादि विचार को प्रस्तुत हम करना चाहते हैं इस प्रेजेंटेशन में। कुटुंबकम, सो लेटस स्टार्ट, डोंट हैव मच टाइम, वसुधैव कुटुंबकम कहिए या हम लोग महाराष्ट्र में कहते, “ये विश्वची काहे? माझे घर है, विश्वची माझे घर”, वन वर्ल्ड वन फैमिली / एक विश्व एक परिवार। वैदिक विश्व दृष्टिकोण, यह भी इस प्रस्तुतिकरण का थीम या विषय है कहिए। प्रभुपाद को पूछा था, श्रील प्रभुपाद की जय! इस्कॉन फाउंडर आचार्य। आप विदेश क्यों आए हो? तो प्रभुपाद कहते” आई वांट टू चेंज द वे वर्ड थिंक”। जिस प्रकार से दुनिया सोचती है, उनके सोच में मैं परिवर्तन देखना चाहता हूं और वोह परिवर्तन कैसा हो? वैदिक दृष्टिकोण वाला/ वैदिक व्यू वाले विचार वाले लोग बने, इसलिए मैं आया हूं। वसुधैव कुटुंबकम ये वेद की वाणी ही है,
“अयम निज परोवेत्ती गणना लघु चेतसाम
“उदार चरितानाम तु वसुधैव कुटुंबकम”।
यह लोग मेरे हैं किंतु यह पराये।
“अयम निज: परा वेति गणना लघु चेतसाम” इस प्रकार की सोच या विचार जिनका होता है, उस विचार को / चेतना को/भावना को लघु चेतसाम। इस तरह का लघु मतलब संकीर्ण या लो थिंकिंग वाले इस प्रकार सोचते हैं। यह अपने है यह पराए है, यह द्वंद है। किंतु उदार चरितानानाम, जो उदार दिल के, उच्च विचार के, विशाल दृष्टि के जो जन है उनकी सोच क्या होती है? वसुधैव कुटुंबकम, वसुधा मतलब पृथ्वी को वसुधा कहते। वसुधा वसुधा इस पृथ्वी पर जितने भी लोग है वे मेरे परिवार के है, दैट इज़ वन फैमिली क्यों?
“विठु माझा लेकुरवाला संगे गोपालनसा मेला”
हम सभी एक ही भगवान की संताने हैं, हेड ऑफ द फैमिली भगवान है और हम उनके परिवार के सदस्य है और पृथ्वी पर जितने भी है, वे सभी हमारे भाई-बहन हैं हरि हरि! ये उच्च विचार है और भगवान का भी ऐसा ही विचार है, द कॉमन ब्रदरहुड। ओके! जब ऐसा विचार नहीं होता तो सब झगड़े-रगड़े, गाली-गलौज / फाइटिंग वार्स, इसीके कारण होते रहते हैं और यह कलयुग का लक्षण है। एक युद्ध एनीवे 1914 में हुआ वर्ल्ड वॉर, वैसे तो वार कहो / लड़ाइयां कहो / मारामारी, दिस दैट, यह तो डेली अफेयर है, नॉट डेली लेकिन हर क्षण इस पृथ्वी पर होते ही रहता है। ईर्ष्या-द्वेष / अपना-पराया / मी टू मी टू / हे माझा हे तुझा, गेट आउट ऑफ हियर। फिर दूसरा विश्व युद्ध 1939 से 45 तक होता रहा। ओके, यह तो एक बात है। यह कलयुग में
“अयं निजः परो वेति गन लाभ लघु चेतसाम”,
जो लो थिंकिंग है, नीच विचार या जो तमोगुण से प्रभावित या रजोगुण से प्रभावित जो भाव / विचार / क्रिया है, उससे ये युद्ध और झगड़े / डिफरेंसेस होते ही रहते हैं। अब दूसरा एक प्रश्न उठा महाभारत में,
“धर्म क्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सव”
यह विश्व युद्ध था कि नहीं? विश्व युद्ध था कि नहीं महाभारत का? महाभारत में तो 18 अक्षौहिणी सेना / डिवीजन सेना, पूरे पृथ्वी के राजा, कुछ पांडवों के पक्ष में दूसरे कौरवों के पक्ष में लेकिन सारा विश्व उसमें जुड़ा हुआ था। निश्चित ही वह विश्व युद्ध था और कब हुआ? 3067 वर्ष पूर्व बिफोर क्राइस्ट, 3067 इयर्स बी.सी. बिफोर क्राइस्ट, मतलब लगभग 5000 वर्ष पूर्व, तो ये भी युद्ध हुआ। विश्व युद्ध 20वीं शताब्दी में दो युद्ध हुए। एक को कहते हैं पहला-फर्स्ट वर्ल्ड वॉर, दूसरे को सेकंड वर्ल्ड वॉर कहते हैं। लेकिन व्हाट अबाउट यह जो महाभारत का युद्ध हुआ? यह पहला होना चाहिए था ना? फिर जिसको आप पहला कहते हो वह दूसरा, और जिसको दूसरा कहते हो तीसरे क्रमांक का हुआ। हरि हरि! सो दिस इज़ द बिग प्रॉब्लम, यह बहुत बड़ी समस्या है। महाभारत के बारे में अब क्या कहना? महाभारत इतिहास है। इस संसार के दो इतिहास प्रसिद्ध है- एक रामायण इतिहास है जिसके रचयिता वाल्मीकि है और दूसरा इतिहास है महाभारत जिसके रचयिता श्रील व्यास देव है। यह इतिहास / इति ह आस ऐसे, सो इट हैपन्ड ऐसे हुआ, यह घटित घटनाएँ है। किंतु क्या संभावना है ब्रिटिशर्स आए, क्रिश्चन आए?
और उन्होंने इन इतिहासों की जिन घटनाओं का वर्णन हुआ है उसको मिथ या माइथॉलजी कहना शुरू कर दिया, हिंदू माइथॉलजी। मिथ मतलब काल्पनिक/ इमेजिनरी और फिर धीरे-धीरे हमारा ब्रेनवाशिंग हुआ भारतीयों का और हम भी, हां यस!यस! यह माइथॉलजी है, हम लोग भी मुंडी हिलाने लगे नंदी बैल जैसे,यस यस यह माइथॉलजी है। ये अभी आजतक चल रहा है, दिस हैज़ टू बी स्टॉप्ड। हरे कृष्ण! अब क्या कहा जाए ये विदेश के लोग और कुछ हमारे भारतीय भी कुछ कम नहीं है माइथॉलजी-माइथॉलजी कहने वाले। इनको प्रभुपाद कहे डॉक्टर फ्रॉग, यह तो मेंढक है। कूप-मंडूक वृत्ति, कुएं में रहने वाला मेंढक के पास पेसिफिक महासागर में रहने वाला एक मेंढक आया। कुएं वाले मेंढक ने पूछा,” तुम्हारा पेसिफिक महासागर कितना बड़ा है?” बहुत बड़ा है। यह कुएं वाला मेंढक अपना पेट फुला करके बोला इतना बड़ा है क्या? तो उसने कहा नहीं नहीं, और भी बड़ा है। तो उसने फिर से पेट फुला करके कहा इतना है क्या? तो दूसरा बोला,नहीं नहीं और बड़ा है। ऐसा करते करते उस कुएं वाले मेंढक का पेट ही फट गया। कैसे समझेगा कुएं में रहने वाला मेंढक, पेसिफिक महासागर के आकार को, गहराई को? तो इस कलयुग के कुछ जन है, फिर कुछ पश्चात देश के भी जन है और उनकी नकल करने वाले इस देश के भी लोग है। सो दे आर लाइक डॉक्टर फ्रॉग, कूप मंडूक वृत्ति।
जब मैं लॉस एंजेलिस में था, कैलिफोर्निया में तो वहां लॉस एंजिल्स के शहर की एनिवर्सरी मना रहे थे l तो मैं किसी व्यक्ति से पूछा कि कितना पुराना है तुम्हारा लॉस एंजेलिस? उसने कहा,आर लॉस एंजेलिस इज़ वेरी ओल्ड सिटी। उसने ऐसे खींच के ओल्ड बोला,शायद मुझ पे प्रभाव डालना है चाहता था कि ये सच में बहुत पुराना है। तो मैं भी खींचकर बोला कि हाऊ ओल्ड इज़ योर लॉस एंजेलिस? कितना पुराना है? तो उन्होंने कहा 200 वर्ष। उनकी समझ में 200 वर्ष मतलब बहुत पुराना हो गया। जय श्री राम! तो हमारे राम अभी-अभी आए थे लेकिन कितने वर्ष पूर्व? लगभग 10 लाख वर्ष पूर्व श्रीराम, “संभवमी युगे युगे”। फिर अयोध्या कितनी पुरानी है? लगभग 10 लाख वर्ष पुरानी है। अयोध्या धाम की जय! यह हिस्ट्री को, इतिहास को फिक्स करना होगा। यह जो काल की गणना है उसकी सही जानकारी नहीं उनको। क्रिश्चियन थियोलॉजी इसको कहते हैं ,उनके अनुसार इस संसार की सृष्टि, बिफोर क्राइस्ट याने ईसा मसीह के 4000 वर्ष पूर्व ही और भगवान ने 7 दिनों में सृष्टि की और सातवें दिन सृष्टि पूरी हुई तो भगवान ने विश्राम किया। उसी के साथ सारा पाश्चात्य जगत भी संडे को रेस्ट करता है क्योंकि गॉड टुक रेस्ट। भगवान ने विश्राम किया सातवें दिन तो चलो हम भी रेस्ट करते हैं, तो छुट्टी का दिन बना लिया। उनको कोई क्ल्यु नहीं है यह सृष्टि कितनी पुरानी है? और किसने, कौन है क्रिएटर? कौन है ऑपरेटर? कौन है डिस्ट्रॉयर? बिग बैंग हुआ ऐसी कई सारी बातें हैं। प्रारंभ में एक सेल का जीव था जिसको आमीबा कहते हैं, फिर उसमें विकास होता गया। उनको पता नहीं है कि पहले तो विठोबा थे, नोट अमीबा। विठोबा ने ब्रह्मा को जन्म दिया, ब्रह्मा सृष्टि का कार्य संभालते हैं। ब्रह्मा की लाइफ एक सौ वर्षो की होती है। हरि हरि! और ब्रह्मा का एक दिन… यह सब नहीं कर सकता मैं।
“सहस्त्र युग पर्यंतम”
हजार महायुगों से ब्रह्मा के 12 घंटे होते हैं और हजार फिर रात और दिन हुआ। कलयुग ही 4,32,000 वर्षों का होता है,उसका दुगना होता है द्वापर, त्रिगुणा होता है त्रेता युग और चौगुना होता है सतयुग। ऐसे चार युगों को मिलाके महायुग कहते हैं। ऐसे 2,000 महायुगों से ब्रह्मा का एक दिन और एक रात हुई, मल्टीप्लाई बाय 7 याने सात से गुना करे तो ये एक सप्ताह हुआ। मल्टीप्लाई बाय 4 करें तो एक महीना हुआ। मल्टीप्लाई बाय 12 तो वो वर्ष हुआ। मल्टीप्लाई बाय 100 तो ब्रह्मा का एक लाइफ टाइम हुआ और ये जो लाइफ टाइम है ब्रह्मा की, वह महाविष्णु के एक श्वास के साथ बराबर है। महाविष्णु के उच्च-श्वास के साथ कई ब्रह्मांड या अनंत कोटि ब्रह्मांड नायक कृष्ण कन्हैया लाल की जय! और भगवान जब श्वास और उच्च-श्वास या भगवान जब सांस लेते हैं तो सारे ब्रह्मांड पुनः उनमें प्रवेश करते हैं। और भगवान कितनी बार सांस लेते हैं? लेते ही रहते हैं। ये सृष्टि कई बार होती है, यह जो काल की गणना है और काल का जो समय है, इसको “कालोऽस्मि” कहते हैं। भगवान कहते हैं,” मैं काल हूं”। ये भगवान में हो दी ही है इसकी समझ इसकी शिक्षा, जो वेदों में/पुराणों में /गीता में उल्लेख है। भागवत महापुराण में इसकी चर्चा हुई है और इस ज्ञान का स्रोत तो गीता, भागवत और अन्य पुराण विधि है। इसको राजविद्या कहते ,
“राज विद्या राज गृह्यम पवित्रतम इदम उत्तमम”
कृष्ण कहे दिस इज़ की किंग ऑफ नॉलेज। परा विद्या और अपरा विद्या होती है। दुनिया तो अपरा विद्या या जड़ विद्या में तल्लीन है। हरि हरि! और चेतन की विद्या, स्टडी ऑफ द कॉन्शसनेस यह तो गीता-भागवत से ही हम सीख सकते हैं समझ सकते हैं।
“वेदेषु सर्वेशु अहम एव विद्या”
कृष्ण कहे भी है कि मुझे जानने के लिए वेद है। तो अन्य-अन्य जो धर्म उत्पन्न हुए हैं, उनकी सृष्टि हुई है, उनके अपने-अपने धर्म ग्रंथ है और उन धर्मों का बस एक या दो, अधिकतर एक ही ग्रंथ होता है, शास्त्र होता है जैसे द बाइबल, द कुरान और अंग्रेज इसको पाश्चात्य देश में कहते “द बुक ऑफ रिलीजन”, हमारे रिलिजन/धर्म की बुक या ग्रंथ। तो उनका द बुक है, एक बुक है, लेकिन हमारा क्या है?लाइब्रेरी ऑफ़ द रिलिजन। हमारा तो ग्रंथालय है, ग्रंथ का भंडार है। फिर आ गए 13वीं शताब्दी में, 1202 ए.ड. में, जिनका चेहरा भी नहीं देखना चाहिए, इनका चित्र तो हम दिखा रहे हैं। ये बख्तियार खिलजी, मिडिल ईस्ट मुस्लिम जगत के, इन्होंने आकर के नालंदा विश्वविद्यालय को आग लगा दी। उनकी सोच है कि जब हमारे द बुक और कुरान है तो अन्य ग्रंथों की क्या आवश्यकता है?
“अहम निज: परम वेत्ती”
यह पर आए हैं हिंदू, इनको खत्म करो, ऐसे नीचे विचार आए और उन्होंने जलाया। चार महीनों तक यह नालंदा विश्वविद्यालय जल रहा था। हरि हरि! वैदिक वांग्मय में कि कई सारी शाखा या उपशाखा हैं। वेद/पुराण/ उपनिषदों श्रुति/स्मृति पुराण आदि इसका कोई अंत ही नहीं। यह सब जलने का प्रयास रहा। यह विश्व का सबसे महान विश्वविद्यालय रहा, इसकी स्थापना 700 साल पहले/ बिफोर क्राइस्ट हुई थी। यहां 1100 विद्यार्थी फ्रॉम ऑल ओवर द वर्ल्ड, अलग-अलग साठ विषय पढ़ा करते थे। एक समय ऐसी समझ थी कि यह भारत है विश्व का गुरु, विश्व गुरु, भारत माता की जय! सारे संसार भर के जन, लोग, विद्वान हायर स्टडी के लिए भारत आया करते थे। ऐसे ही यूनिवर्सिटीज में पढ़ा करते थे, दुर्दैव से हम अभी अपने पुत्र-पुत्री को विदेश भेज रहे हैं,लेकिन वहां हायर एजुकेशन नहीं है,बल्कि लोअर एजुकेशन है। हायर एजुकेशन तो गीता-भागवत वेद-पुराण है यह परा विद्या है लेकिन कलयुग में सब उल्टा-सुलटा, ऊपर-नीचे है। ये कलि का लक्षण भी है,
“तमसो मा ज्योतिर्गमय”
हम अंधेरे में हैं, कलि मतलब अंधेरा, अज्ञान का अंधेरा।
“कृष्ण सूर्यसम माया है अंधकार
जहां कृष्ण तहाँ नाही मायेर अधिकार”
जहां कृष्ण हैं वहां माया टिक नहीं सकती, जैसे जहां सूर्य है वहां अंधेरा नहीं रह सकता। एक समय यह विश्वगुरु भारत और इस भारत के ‘भ’ का मतलब है प्रकाश, ‘रत’ मतलब तल्लीन। भारत इस नाम से भी समझना चाहिए, भास्कर याने सूर्य, सूर्य को भास्कर भी कहते हैं, ‘भ’ मतलब प्रकाश देनेवाला,जिससे किरणें उत्पन्न होती हैं वो भास्कर। कृष्ण ही वैसे ओरिजिनल भास्कर है,
“कोटि सूर्य समप्रभा”
भगवान से ही कोटि सूर्य समप्रभा,
“बहु कोटि चंद्राजिनी बदन उज्जवल”
चैतन्य महाप्रभु के मुखारविंद से बहुकोटी चंद्र की आभा उत्पन्न होती है और वह ज्योति शास्त्रों से भी हम प्राप्त करते हैं, ज्ञान की ज्योति। हमारे शास्त्रों में वैसे हमारे तुम्हारे का प्रश्न होता नहीं है, हम यहां पुनः द्वंद्व की बात कर रहे हैं कि हम भारतीय हैं, यू आर वेस्टर्न, हम देसी है तुम परदेसी हो, यह सोच भी ठीक नहीं है, लेकिन खूब चलता रहता है इस कलयुग में, इसलिए हम भी यही भाषा बोलने लगते हैं। यहां जो ज्ञान भगवान ने उपलब्ध कराया, वैसे भारत मतलब इंडिया नहीं है। आजकल की जो इंडिया जिसको हम कहते हैं दैट इज़ नॉट भारत। भारत मतलब सारी पृथ्वी को भारत कहा गया है, हमारे राजा परीक्षित और युधिष्ठिर महाराज की राजधानी हस्तिनापुर थी पर उनको शास्त्रों में पृथ्वीपति कहा गया है। हे भारत! तो अर्जुन को भी भारत कहा है। मतलब सारी पृथ्वी पर के जो जन या लोग हैं वे सभी भारतीय हुआ करते थे। दिस इस द प्रॉब्लम, कलयुग में कलि टुकड़े कर देता है, विभाजन कर देता है। गीता-भागवत हिंदू के लिए नहीं है, भगवान गीता कहते-कहते ये नहीं कहते इट्स फॉर हिंदूज़ ऑनली।
“सर्वस्य चाहम ह्रदि सन्निविष्टो”
मैं सभी के हृदय प्रांगण में विराजमान हूं, यहां भगवान ने ये नहीं कहा कि दिस अप्लाइज़ टू हिंदूज़ ओनली। सभी जीवों को संबोधित करके भगवान कह रहे हैं। ये हिंदू, मुसलमान, ईसाई,दिस वन दैट वन, ये अभी अभी की बात है, ये भाषा अभी पिछले ढाई हजार वर्षों से बोली जा रही है। पहले सारा संसार एक ही था, भारत और ये सारे शास्त्र गीता,भागवत, पुराण,वेद ये सभी मनुष्य के लिए थे, फॉर एवरी हुमन बीइंग। शास्त्र भी तो सभी के लिए एक ही होता है, जैसे केमिस्ट्री है H2O में टू पार्ट्स ऑफ़ हाइड्रोजन एंड वन पार्ट ऑफ़ ऑक्सीजन, साथ में कैटलिस्ट हो KLMO4, फिर क्या बनेगा? वाटर प्रोडक्शन होगा। ये जो फॉर्मूला है या सूत्र है उसको शास्त्र कहते हैं, सो दिस इज़ सेम। यह साइंस, अमेरिकन साइंस, इंडियन साइंस ऐसा नहीं है, साइंस तो साइंस है। समस्या तो ये है कि गीता भागवत को हम,
“इदम शास्त्रं प्रमाणम ते”
कृष्ण कहे गीता को शास्त्र कहे। ओरिजिनल साइंस तो गीता, भागवत, वेद, पुराण, आदि ये शास्त्र हैं। शास्त्र हैं मतलब साइंस है और साइंस सभी के लिए है, साइंस केवल हिंदुओं के लिए नहीं। उन लोगों के पास भी कोई साइंस है, कुरान में या बाइबल में भी।
यह ग्रंथ भी सभी संसार के जीवों के लिए है और संसार भर में इन्हीं गीता-भागवत का वितरण, एनी वे क्या कहा जाए? यह अंतरराष्ट्रीय श्रीकृष्ण भावनामृत संघ, भक्तिवेदांत स्वामी श्रील प्रभुपाद जिसके संस्थापक आचार्य है, हम लोग गीता-भागवत इन ग्रंथों का भाषांतर लगभग 100 भाषाओं में किए हैं और उन-उन देशों के लोग इन ग्रंथों का अध्ययन कर रहे हैं और वितरण भी कर रहे हैं। करोड़ों की संख्या में, मिलियंस ऑफ बुक्स / गीता-भागवत का वितरण सारे पृथ्वी पर हो रहा है। राइट नाउ, ये जो गीता जयंती अभी-अभी हुई पिछले मोक्षदा एकादशी या वैकुंठ एकादशी के दिन, तो इस्कॉन के फॉलोअर्स जिनकी संख्या करोड़ों में है, संसार-भर में वे सब, जैसे तुकाराम महाराज ने भी कहा है बारंबार और हम भी कहे-
“गीता भागवत करिती श्रवण अखंड चिंतन विठोबाचे”
सारा संसार पढ़ रहा है गीता-भागवत को, ऐसी व्यवस्था (इस्कॉन) अंतरराष्ट्रीय श्रीकृष्ण भावनामृत संघ कर रहा है। दिस इज़ द बिगिनिंग, बहुत कुछ होना है। आपके जानकारी के लिए इंडिया की ही बात है, हम इस महीने में 60 लाख भगवद गीता का वितरण करने वाले हैं, दिस इज़ जस्ट इन इंडिया। वैसी संख्या, वैसा ही नंबर इन यूरोप, इन अमेरिका, इन ऑस्ट्रेलिया, इन रशिया में भी है। ये इंटरनेशनल सोसाइटी है तो हमारे फॉलोअर्स जो सभी वैष्णव है या गौड़ीय वैष्णव है, ये सब धर्म प्रचारक बने हुए हैं और हरिनाम का वितरण कर रहे हैं सर्वत्र।
“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे”
हम सर्वत्र कीर्तन करते हैं इस महामंत्र का मृदंग और करताल के साथ, इसलिए हम लोगों को संसार में कहा जाता है हरेकृष्ण पीपल/ यह हरेकृष्ण लोग है। यह हरे कृष्ण कीर्तन इतना प्रसिद्ध हुआ है संसार भर में और इसी वेशभूषा के साथ धोती-कुर्ता फॉर जेंटलमैन एंड साड़ी फॉर लेडीज और तिलक, कंठी माला शिखा, एवरीथिंग। हमको शर्म आती है ये तिलक ,लगाने आदि में या फिर जब भगवान को नमस्कार करने का समय आता है तो हम देखते हैं मुझे कोई देख तो नहीं रहा है,फिर झट से हम लोग माथा ठोकते या टेकते और आगे बढ़ते हैं ताकि हमें कोई देखे नहीं ताकि लोग ये न कहे, “देखो अंधश्रद्धाळू /नाट ए साइंटिफिक माइंड/ ओल्ड फैशंड”।
हमारे वैदिक ग्रंथों में यह भी हमको पता नहीं है कि क्या-क्या है? केवल पूजा-पाठ के मंत्र, आरती के कुछ श्लोक ही नहीं है हमारे वैदिक ग्रंथों में स्पेस साइंस/ एस्ट्रोनॉमी/खगोल विद्या एग्रीकल्चर/ मैकेनिक्स/ टेक्सटाइल/ आर्किटेक्ट/ स्थापत्य शास्त्र/ धनुर्विद्या/ आयुर्विज्ञान/ यू नेम इट, ज्योग्राफी/ सोलर एनर्जी/ कम्युनिकेशन/ विमान विद्या/ लॉजिस्टिक्स,आई एम जस्ट रीडिंग फ्रॉम स्माल लिस्ट हियर। ये सब सब्जेक्ट मैटर हमारे वेदों में, पुराणों में उपलब्ध है। साइंटिस्ट अभी-अभी जन्मे है और कुछ पिछले 500 वर्षों से, उसके पहले सारा शास्त्र/ सारा साइंस संस्कृत भाषा में इसकी रचना भगवान ने की। भगवान के वैसे सांस के साथ ये सारी विद्या निश्रित होती रहती है, हुई है। इसलिए इसको अपौरुषेय कहा है, मतलब इस संसार के किसी पुरुष ने इसको नहीं कहा या नहीं लिखा।
टाइम टू गो फॉरवर्ड, मूव फास्टर, हिंदी+चीनी भाई-भाई। ये 1962 की बात है, आप थे क्या 1962 में? कौन कौन थे? क्या हुआ आपके हाथ नहीं है क्या? या आप थे नहीं? कि हाथ नहीं? ओके, कुछ तो थे। उस समय हिंदुस्तान और चाइना के बीच में युद्ध हो रहा था तो हम छोटे बच्चों से/ स्कूल चिल्ड्रन से यह नारे लगवाए जा रहे थे हिंदी-चीनी भाई-भाई,क्योंकि हिंदुस्तान/ इंडिया फ्रेंडली कंट्री है तो यह सद्भावना जागृत हो कि हम भाई-भाई है, ताकि यह युद्ध का विचार हम छोड़ दे और वे लोग भी छोड़ दे। फिर वसुधैव कुटुंबकम है,ये उच्च विचार है, हम भाई-भाई है। तो ऐसे स्लोगन हम भी कहते जा रहे थे लेकिन हम छोटे थे और फिर गांव के भी थे, गांव-वाले भी थे, हमको पता नहीं चल रहा था,बस कहते तो थे कि हिंदी-चीनी भाई-भाई लेकिन हिंदी मतलब भाषा और चीनी मतलब खाने की चीनी और भाई-भाई, यह कैसे संभव है? द लैंग्वेज एंड शुगर, वो क्या है भाई भाई? हमको समझ में नहीं आ रहा था हिंदी-चीनी भाई-भाई मतलब कह क्या रहे हैं? थोड़े और बड़े हुए तो पता चला कि हिंदी मतलब हिंदुस्तान के लोग और चीनी मतलब चाइनी/ चाइना के लोग, तो भी वे भाई-भाई कैसे है? यह भी समझ में नहीं आ रहा था? दो व्यक्ति भाई-भाई मतलब उनका पिता कॉमन हो/ एक ही पिता हो दो लोगों का, तो फिर वे भाई-भाई हुए। तो वह पिता/ कॉमन फादर कौन है? जैसे मोदी या वहां के राष्ट्रपति? इज़ ही कॉमन फादर चाइना और हिंदुस्तान/ इंडिया के? सो स्टिल नॉट मेकिंग एनी सेंस। जब हम और भी बड़े हुए और भक्तिवेदांत स्वामी श्रील प्रभुपाद की जय! उनके चरणों में पहुंचे और जब भगवद गीता उनसे सुनी तब हम समझ रहे थे- “अहम बीजप्रदः पिता”, आई एम द सीड गिविंग फादर ऑफ ऑल लिविंग एंटिटी/ मैं सभी जीवों का पिता/ फादर हूं, आई एम द कॉमन फादर, दो दैट मेड द सेंस। फिर केवल हिंदी-चीनी ही भाई-भाई नहीं है, रशियन एंड यूक्रेनियन भी क्या है? भाई-भाई है एंड रशियंस एंड अमेरिकंस भी भाई-भाई है। दिस इज अ फैक्ट, यह सत्य है। तो इस सत्य पर आधारित हम विश्व बंधुत्व की स्थापना कर सकते हैं, फिर वसुधैव कुटुंबकम संभव है, फिर शांति संभव है। ओके तो इज़ इट रेडी नाउ? जो कुछ कॉपी कर रहे थे। न्यूयॉर्क में यू.एन.ओ का हेड क्वार्टर है तो हुआ प्रभुपाद वहां से आया-जाया करते थे जब वे न्यूयॉर्क में रहते थे ये 1965-66 की बात है। तो वे देखते कि झंडों की संख्या तो हर समय बढ़ रही है , अनदर फ्लैग, अनदर फ्लैग और एक झंडा फिर और एक देश का झंडा।
व्हाव्ट काइंड ऑफ यूनाइटेड नेशन इज़ दिस? दिस इज़ डिसयूनाइटेड नेशन, नॉट यूनाइटेड। यूनाइटेड मतलब वन फ्लैग। गोड मेड द कंट्री, भगवान ने सृष्टि को बनाया, बट मैन मेड द टाउन, गोड मेड द कंट्री, मैन मेड द टाउन, मैन मेड द कंक्रीट जंगल। देखिए कितनी सुंदर सृष्टि है भगवान की, फ्रेश ऐअर, जल, प्रक्षावली और पियोर। हमने नीचे प्रश्न पूछा है कि व्हाट डिड मेंन डू? भगवान ने तो सृष्टि बनायी बट व्हाट डिड मैंन डू? मैंन मैड द मैस। जो संसार में सारा बिगाड़, सारा प्रदूषण, जल का प्रदूषण, हवा का प्रदूषण, दिस प्रदूषण, दैट प्रदूषण, फूड पोल्यूशन। वैसे सबसे खतरनाक पोलूशन तो विचारों का प्रदूषण है इसीलिए श्रील प्रभुपाद का 1977 में बंबई में लास्ट पब्लिक लेक्चर हुआ। उसके बाद प्रभुपाद का वैकुंठ गमन हुआ उसी साल में। उस लास्ट लेक्चर सीरीज का टॉपिक (मैं भी वहां था, ऐसे विशाल पंडाल में) “मॉडर्न सिविलाइजेशन इज़ ए टोटल फेलियर”, ऐसा टॉपिक बनाए थे। आधुनिक सभ्यता पूर्ण पराजय है या विनाशकारी या अपयशी है। हरे कृष्ण! वैसे इसको सिविलाइजेशन कह भी नही सकते। सिविलाइज्ड मतलब सभ्य, हमारा केवल नाम ही है जेंटलमन लेकिन वी आर वेरी रफ/ रफियंस। हरि हरि! टोटल फेल्योर, मोर्डनाइज़ेशन इज़ अ टोटल फेलियर। प्रभुपाद इसको सब-टाइटल दिए थे कृष्ण कॉन्शसनेस इ डी ओनली सोल्यूशन। कृष्णभावना गीता-भागवत का प्रचार-प्रसार यही पर्याय बचा हुआ है, अदर वाइज एवरीथिंग इज फेलियर, कृष्ण कॉन्शसनेस इज ओनली सॉल्यूशन। तो उस समय के चीफ मिनिस्टर एस. बी. चवन ने उस सेशन का उद्घाटन किया था, आजाद मैदान नाम के मैदान में, क्रॉस मैदान के पास यह हुआ था।
प्रभुपाद प्रवचन करते हुए कहे कि इस संसार में दो प्रकार की अर्थव्यवस्थाये होती है, आपने शायद कभी सोचा होगा, दो वो कौनसे प्रकार है? एक अंग्रेजी में एग्रेरियन इकोनॉमी और दूसरी इंडस्ट्री इकोनॉमी। अर्थव्यवस्था जो खेती पर, कृषि- गोरक्ष्य- वाणिज्य पर आधारित जो इकोनॉमी अर्थव्यवस्था है, लैंड एंड द काउ, जमीन और गाय-बैल वाली और दूसरी है वही औद्योगिक विकास, उद्योग और अर्थव्यवस्था/इंडस्ट्रियल इकोनॉमी। तो वैदिक संस्कृति के अनुसार ये एग्रेरियन इकोनॉमी इज़ द राइट इकॉनमी। लेकिन पाश्चात्य जगत ने एक प्रयोग किया इंडस्ट्रियल इकॉनमी उद्योग का और इसके दुष्परिणाम संसार देख रहा है, भोग रहा है। अब जागने का समय आ चुका है, आपको थोड़ा-सा सैंपल दिखाते हैं दोनों में भेद का। (डाउमेंट्री दिखाई जा रही है) . कहां गए बैल? अब मैं जाता हूं और गांव में भी और अरावडे गांव भी जाता हूं तो वहां पहले बैला सा पोड़ा, बेंदूर या बैल पोड़ा मनाते थे। सारे किसान अपना-अपना बैल को सजा-धजा के लाते थे और स्पर्धा भी होती थी, कंपटीशन। बड़े रुबाब के साथ कहते कि हमारे बैलों की जोड़ी है। हर घर में बैल, गाय, दूध होता था। अब कहां गए बैल? देयर आर ट्रैक्टर्स। बैलों का पता नहीं, में भी दे आर किल्ड। क्या कहा जाए? सेंडिंग देम टू द स्लाटर हाउस, हरि हरि! गोमाता की जय! अग्रेरीयन इकॉनमी के केंद्र में है जमीन, भूमि और गाय, बैल, हरि हरि! लोग फ्रेश एयर, फ्रेश एवरीथिंग, सारा ताजा, फ्रेश एयर, फ्रेश वाटर, फ्रेश वेजिटेबल्स, सेंद्रीय खत आदि। पर अभी क्या? केमिकल फर्टिलाइजर्स, दिस वन एंड डैट वन। हमारे गांव में और इस देश में लगभग 7,000 गांव थे और है भी ,उन सभी गांव में अधिकतर लोग सब समय स्वस्थ रहा करते थे। मेरे गांव में, आप भी गांव वाले हो? आप में से भी कोई गांव के हो, गांव में जन्म लिया अपने? अच्छा आधे से अधिक, 70 प्रतिशत…….
10 किलोमीटर दूर अरावड़े गाँव है, जिसकी आबादी तीन चार हजार लोगों की, इस गांव में साइकिल पर बैठके दूसरे गांव से एक डॉक्टर आते थे हर बुधवार के दिन, यह देखने के लिए कि कोई मरीज है तो कुछ इलाज हो। ऐसा होता था कि कई बार कई बार उस बेचारे डॉक्टर को एक भी मरीज नहीं मिलता, आल आर हेल्दी, सब स्वस्थ थे। परिश्रम भी करते, पसीने बहाते, व्यायाम नेचुरली एंड एवरीथिंग फ्रेश, विचार भी सुविचार / अच्छे विचार। फिर समय आया धीरे-धीरे सब बिगाड़ हो गया,ये इंडस्ट्रियल सिविलाइजेशन एंड ट्रैक्टर्स एंड फैक्टरीज़ एंड केमिकल फर्टिलाइजर्स एंड दिस एंड दैट, रेडियो एंड सिनेमा एंड फाइनली इंटरनेट। अब फिर एक डिस्पेंसरी बनाई गई, डॉक्टर आए छोटा-सा अस्पताल खुल गया। लोग आए, मेडिकल ऑफिसर आए, उन्होंने रिबन कटिंग किया तो लोगों ने ताली बजाई कि हमारे गांव, हमारे गांव में भी अब ये अस्पताल है। इट्स अ क्वेश्चन, हम सबको इस पर विचार करना है। वि आर एट द क्रॉस रोड जिसको कहते हैं, आगे बढ़ने से पहले वी शुड बी थिंकिंग ट्वाइस। यह बूमरैंग इफेक्ट देखिये इंडस्ट्रियल इकोनॉमी का, आप देख रहे हो? ये कैसे गिराता है? पुन: कुछ एडजस्टमेंट करता है मॉडर्न मैन,लेकिन फिर भी यह हो रहा है, दिस इज़ व्हाट इज़ गोइंग ऑन डे-एंड-नाइट, वी आर बींग डिफीटेड। हम लोग पुन: कुछ डिफेंस मैकेनिज्म के साथ उसको फाइट करना चाहते हैं। ओके, तो कई सारे पोलूशन आ गए, एयर पोलूशन, वाटर पॉल्यूशन,सोइल पोलूशन, नॉइस पॉल्यूशन, थर्मल पोलूशन, रेडियोएक्टिव पोलूशन, पोलूशन-पोलूशन, माइंड साउंड पॉल्यूशन ऑफ कोर्स और फिर आ गया लेटेस्ट कॉन्सेप्ट। कृष्ण स्पष्ट कहे हैं गीता के द्वितीय अध्याय में, आप जिसका भी ध्यान करोगे,” ध्यायतो विषयान्” विषयों का ध्यान करोगे। इंद्रियों के होते हैं विषय/ सेंस के ऑब्जेक्ट/ सेंस ऑब्जेक्ट होते हैं, उनका ध्यान करने से “ संग: तेशु” उसमें हम लोग आसक्त हो जाते हैं, उस आसक्ति के साथ कामवासना उत्पन्न होती है। काम, काम, काम, काम, काम या पाप, पाप के लिए प्रेरित किया जाता है। तुकाराम महाराज तो कहे,
“पापाचि वासना नको दाऊ डोळा त्यानी आंधळा बराच मी”
पापाचि वासना नको दाऊ डोळा, लेकिन हम पापवासना को/ कामवासना को जागृत करते रहते हैं, इंद्रियों के विषयों का ध्यान करते हुए और
“कामात क्रोधोभिजायते”
काम की तृप्ति जब नहीं होती है/ होती ही नहीं है तो फिर क्या? कामात क्रोधोभिजायते, क्रोध आता है और यह तो क्रोध का प्रदर्शन हम घर में/ गांव में /एक स्टेट या दूसरा स्टेट/ एक कंट्री या अदर कंट्री/ वन रिलीजन अनादर रिलिजन में हम क्रोध का सर्वत्र प्रदर्शन कर रहे हैं।
“क्रोधात भवति सममोह”
क्रोध के साथ हम अधिक सम्मोहित/ मोहित होते हैं, उसी के साथ बुद्धि नाश होता है,
“बुद्धि नाशात प्रणश्यति”
हमारा विनाश होता है, हमारा विकास नहीं हो रहा बल्कि विनाश कर रहे हैं हम लोग। तथाकथित इस मॉडर्न सिविलाइजेशन, टेक्नोलॉजी एंड दिस एंड दैट एंड इंडस्ट्री, वी आर गोइंग टू द मून/ हमारा अध; पतन हो रहा है, चरित्रहीन बन रहे हैं। हरि हरि! किंतु हम विषयों का ध्यान करने के बजाय,
“सुंदर ते ध्यान उभे विटेवरी, कर कटावरी ठेउनिया”
भगवान का ध्यान करेंगे तो क्या होगा? प्रेम उत्पन्न होगा और वह प्रेम हमको क्या देगा?
“ददामि बुद्धि योगं”
प्रेम या प्रेममयी सेवा करेंगे तो भगवान ने वादा किया भगवद्गीता में, ददामि बुद्धि योगं। मैं उसको बुद्धि देता हूं, तो संसार के विषयों का ध्यान करने वालों को भगवान दुर्बुद्धि दे देते हैं।
“विनाश काले विपरीत बुद्धि”, लेकिन जो भगवान का ध्यान करते हैं, भगवान की सेवा में रत है, उनको भगवान ददामि बुद्धि योगं। किसलिए बुद्धि ?
“येन माम् उपयान्ति ते”
ताकि वे मेरी ओर आ जाए, वैकुंठ आ जाए, उस बुद्धि का उपयोग वैकुंठ जाने के लिए और संसार की जो तथाकथित बुद्धि या बुद्धि जब भ्रष्ट होती है तो हम नरक की ओर जाते हैं।
काम क्रोध लोभ ये नरक के तीन द्वार भी भगवान ने बताए हैं। हमें जाना है वैकुंठ,
वैकुंठ धाम की जय! भुवैकुंठ की जय! पंढरपुर धाम की जय! श्री श्री विठ्ठल रुक्मिणी की जय!
तो ऐसे कई सारी समस्याएं ग्लोबल वार्मिंग हमने कर दिया है, जिसके गोद में हम पलते हैं। यह धरती माता, पृथ्वी माता, भारत माता इसका ग्लोबल वार्मिंग से हम टेंपरेचर बढ़ा रहे हैं। हरि हरि! माँ ही जब अस्वस्थ हुई तो हम उनके अपत्य कैसे स्वस्थ रह सकते हैं? वनों को काट रहे हैं ,डिफॉरेस्टेशन ,डिफॉरेस्टेशन सर्वत्र हो रहा है, टू सेट द फैक्ट्री टू सेट अप दिस इंडस्ट्री। अमेजॉन नाम का साउथ अमेरिका में पृथ्वी का सबसे अधिक बड़ा बन/ फॉरेस्ट है। अमेजॉन फॉरेस्ट में अमेजॉन नदी भी है। ऐसी समझ है कि पृथ्वी पर जो ऑक्सीजन उत्पन्न होता है वृक्षों से, वनस्पतियों से, उसमें से 20 परसेंट ऑफ द ऑक्सीजन तो इस अमेजन फॉरेस्ट से प्राप्त होता है मनुष्यों को, पूरे मानव जाति को। उसको हम काट रहे हैं, उसको काटने से क्या होगा? हमारा गला घुटने वाला है ऑक्सीजन के बिना, प्राणवायु का स्रोत/ सोर्स का ही हम विनाश कर रहे हैं। पशुवध का तो क्या कहना?
हरि हरि!
मीट ईटिंग बहुत बड़ी समस्या/ बिग प्रॉब्लम, इंक्लूडिंग भारत आपको पता नहीं होगा। बिग बोट्स/ बड़ी-बड़ी बोट भर-भर के हम मांस मिडिल ईस्ट भेजते हैं और मिडिल ईस्ट से इन एक्सचेंज, वी गेट द पेट्रोल। हमारे यहाँ से मास आप ले लो, आप हमें पेट्रोल दे दो। भारत एक्सपोर्ट करता है मीट, इंक्लूडिंग क्या कहा जाए? कहना भी नहीं चाहिए, बीफ/ गाय का मांस। हम जैसे यहां बात कर रहे हैं तो इसी समय हजारों इफ नॉट लाखों, गायों की/ पशुओं की हत्या हमारे देश में हो रही है और फिर हम शांति चाहते हैं। अब तो नहीं पर 10- 20- 25 वर्ष पूर्व की बात होगी तो पार्लियामेंट में चर्चा हो रही थी कि हमारे जो स्लॉटर हाउसेस/ कतल खाने हैं उसमें जो ब्लेड-ब्लेड हैं काटने के ठीक नहीं है, तीक्ष्ण नहीं है। दे आर नॉट शार्प ब्लेडस इसके कारण पशुओं को काटते-काटते कुछ देर लगती है, तो उसके कारण बहुत कष्ट होता है/ दर्द होता है पशुओं को। तो क्या किया जाए? व्हाट टू डू? ऐसी चर्चा हो रही थी तो पता नहीं, यू विल बी सरप्राइजड, बताएं पार्लियामेंट ने क्या डिसीजन लिया? वी हैव टू मॉडर्नाइज आर स्लॉटर हाउसेस, हमारे स्लॉटर हाउसेस का आधुनिकीकरण करना चाहिए, वी शुड गेट ब्लेड्स फ्रॉम आयरलैंड ताकि छट-छट हम पशु को काट सकते हैं, उनको कष्ट नहीं होगा,दर्द नहीं होगा। ऐसी दया दिखाई उन सांसदों ने, द मेंबर्स ऑफ द पार्लियामेंट वालों को दया आई, क्या यह दया है? ये क्रूरता है। तो भारत के संसद भवन में इस प्रकार बात हुई। वी हैव टु बिकम मॉडर्न, मॉडर्नाइजिंग द स्लॉटर हाउसेस। कृष्ण मैं जीव हूं,मांस नहीं हूं। पशु भी कहेगा मैं भी तो आत्मा हूं, मैं मांस का टुकड़ा नहीं हूं। तो एक्सप्लोइटेशन ऑफ मटेरियल रिसोर्सेस चल रहे हैं और इसी का परिणाम ही कोरोना वायरस और भी कई सारे रोग बढ़ रहे हैं। एनी वे यह हुआ कि जब कोरोना वायरस हुआ तो लॉकडाउन हुआ। लॉकडाउन याद है? वी वर ऑल लॉक्ड डाउन।
कोरोना वायरस के पहले आप देखिए इस इलस्ट्रेशन को, बड़ा मजेदार है। पहले पशु को पिंजरे में या प्राणी संग्रहालय/ जू में हम लोग देखने जाते थे, एंड दे वर लॉक्ड बिहाइंड बिहाइंड द बार्स। और फिर जब करोना वायरस आया तो हमारे रोल चेंज हुए, वी वर लॉकड डाउन बिहाइंड द बार्स और पशु-पक्षी मजा उड़ा रहे थे, उड़ान भर रहे थे, दे वर एंजॉयइंग, दे हैड गुड टाइम। “एवरी एक्शन हैज़ इक्वल एंड अपोजिट रिएक्शन” जिसको कहते हैं। फिर हम अधिक-अधिक भोगी बन रहे हैं, भोगी बन रहे हैं संसार भर में, किंतु यह हम याद नहीं रखते कि “भोग से होते हैं रोग”। “यू एंजॉय एंजॉय देन सफर”, इसे लॉ ऑफ कर्मा भी कहते हैं, भोग का ही परिणाम रोग होता है। एंजॉय… सारे कमर्शियल्स हमको प्रेरित करते ही हैं कि शॉपिंग करो। क्या कहा जाए? जब छोटी-छोटी दुकान हुआ करती थी तो कम से काम हुआ करता था, लेकिन अभी हमने महा-दुकान और अपना-बाजार और धीरे-धीरे सुपर बाजार, अभी हाइपर-बाजार एंड व्हाट नॉट? और उन भोगों से होते हैं रोग। अमेरिका हैज़ बिकम मोस्ट सिक नेशन इन द वर्ल्ड, सारे संसार में सबसे अधिक बीमार देश अमेरिका बन चुका है, क्योंकि “अमेरिका द लैंड ऑफ अपॉर्चुनिटी” सबसे अधिक भोगी देश, नंबर वन भोगी देश अमेरिका है, तो फिर नंबर वन रोगी देश तो अमेरिका ही होना चाहिए। अमेरिकन सब समय नंबर वन होना चाहते हैं, तो जहां तक रोगों की बात है, बीमारियों की बात है, दे आर नंबर वन सिक नेशन इन द वर्ल्ड। हमारे लालच/लोभ/ नीड का अंत नहीं।
महात्मा गांधी भी कहे “नीड ठीक है लेकिन ग्रीड ठीक नहीं है”। आपकी जो जरूरत है वह ठीक है, लेकिन आप जब लोभी बनते हो और अधिक-अधिक जो भी सामग्री है, दिस वन दैट वन/ हम उसको इकट्ठा करना चाहते हैं, उसका कोई अंत ही नहीं है, ये ग्रीड खतरनाक है। लालच का ही परिणाम है एक सर्वे हुआ, तो सर्वे के अनुसार, नेक्स्ट स्लाइड में फाइ अर्थ दिखाई हैं। हम अपने लिविंग स्टैंडर्ड को “हाई लिविंग और लो थिंकिंग” ऐसा चल रहा है आजकल। नॉट “सिंपल लिविंग हाई थिंकिंग” इसका उल्टा हो रहा है। लिविंग कैसा ? हाई लिविंग। थिंकिंग कैसी? लो या नो थिंकिंग। इसलिए लोग आज “थम्स अप ल, थम्स अप” ऐसी टीशर्ट वगैरह पहन के घूमते रहते हैं। थम्स अप मतलब “जस्ट डू इट”, लिखा भी होता है कि जस्ट डू इट। मतलब डू नॉट इवन थिंक/ सोचना भी नहीं, पहले करो बाद में देखा जाए। हू विल सी ?किसने देखा है? जस्ट डू इट, ये लो थिंकिंग है। हाई लिविंग मतलब हम सबका लिविंग स्टैंडर्ड यदि अमेरिका जैसा है, मान लो यूरोप अमेरिका जैसा, सभी पृथ्वी के/ सारे संसार के/ सभी देशों का स्टैंडर्ड यदि अमेरिका जैसा हम बनाना चाहेंगे तो एक पृथ्वी से काम नहीं बनेगा।
एक पृथ्वी से यह रिसोर्सेज है,साधन सामग्री है उसे काम नहीं बनेगा, कितने पृथ्वी की आवश्यकता होगी? फाइव अर्थस, पांच पृथ्वियों की आवश्यकता है। पांच पृथ्वी तो मिलने वाली नहीं है इसलिए हम लोग आपस में झगड़ा करते रहेंगे। रूस- यूक्रेन भाई-भाई। हरि हरि! इस्कॉन मायापुर, मायापुर धाम की जय! यहां हमारा हेड क्वार्टर है। यूनाइटेड नेशन का हेड क्वार्टर अमेरिका है,न्यूयॉर्क है। यह अंतरराष्ट्रीय श्रीकृष्ण भावनामृत संघ चैतन्य महाप्रभु का बर्थ प्लेस, जो वृंदावन जैसा ही है, उसी को हेड क्वार्टर हम लोग बना रहे हैं। यूक्रेन और रशिया में आपस में लड़ाई चल रही है,हरि हरि! किंतु यूक्रेन में जो हरेकृष्ण भक्त है, रशिया में हरेकृष्ण भक्त है वे लड़ते नहीं है जबकि और लोग लड़ रहे हैं। लेकिन जब हम कृष्ण भक्त बनते हैं, राम भक्त बनते हैं, विठोबा भक्त बनते हैं हम लड़ते नहीं क्योंकि हमारा विचार होता है वसुधैव कुटुंबकम। यूक्रेनियन-रशियन भाई-भाई और ऐसा भाईचारा तो सारी पृथ्वी पर संभव है यदि हम भगवान की शरण में आते हैं और भगवान को अपने परम पिता के रूप में स्वीकार करते हैं।
“विठु माजा लेकुरवंडा संगे गोपाला अंसा मेला”
इस गीत और भाव के साथ वैसे यह वसुधैव कुटुंबकम संभव है। हरि हरि! आई विल स्टोप हीअर। धन्यवाद! आप सभी को। आप शांति से सुने, सोए तो नहीं ? झोपला तो नहीं न?
हरे कृष्ण धन्यवाद!
