Vsudev Kutum 6.71
11-04-2023
ISKCON Ahmedabad

हरे कृष्ण! कहिए, हरे कृष्ण। इस प्रकार हम एक दूसरे का अभिवादन करते हैं। स्वागत है आप सभी उपस्थित, वैसे भक्तों का कहने से काम बन जाएगा। सभी भक्त हैं किंतु वरिष्ठ भक्त भी हैं यहाँ। महामन प्रभु का हृदय पूर्वक स्वागत। साक्षात् या स्वयं जीबीसी अध्यक्ष रेवती रमण प्रभु की जय! और अन्य वरिष्ठ भक्तवृन्द, मात्रिवृन्द, फ़ुलटाइम भक्त, कांग्रेगेशन भक्त, आदि सभी उपस्थित जीवों का स्वागत। किनका स्वागत? स्वागत तो जीव का ही होता है, हमारे शरीर का स्वागत तो नहीं हो सकता। और अगर शरीर का स्वागत किया भी तो शरीर को पता चलेगा क्या है? हमारे बालों को पता चलेगा क्या? या हमारे हाथ, हमारे पैर को ? तो स्वागत या धन्यवाद इत्यादि जब हम कहते हैं तो उस आत्मा का ही धन्यवाद होता है, आत्मा का ही स्वागत होता है।

आत्मा ही मतलब की चीज है, वस्तु या व्यक्तित्व है। यशोमती नंदन प्रभु की जय ! हरि हरि! उनका भी हमें सदैव स्मरण करना चाहिए। हम सभी और आप सभी वैसे यशोमती नंदन प्रभु के सदा के लिए ऋणी रहेंगे, जिन्होंने “श्रील प्रभुपाद की जय!” श्रील प्रभुपाद के आदेश अनुसार कृष्णभावनामृत को गुजरात में ले आए और पूरे गुजरात भर में उसकी स्थापना की। यही तो है “ धर्मसंस्थानार्थाय”, धर्म की स्थापना उन्होंने की, सिर्फ गुजरात में ही नहीं। बल्कि उनकी गतिविधियां अमेरिका से शुरू हुई फिर मुंबई में ,हम मुंबई में साथ में थे बहुत समय के लिए, श्रील प्रभुपाद के शुरुआती दिनों में। पहले जब-जब मैं यहां आता था तो यशोमती नंदन प्रभु यहाँ हुआ करते ही थे।

अब वे हमको पीछे छोड़कर भगवत धाम लौटे या प्रभुपाद के पास पहुंचे। यदि अब हमें उनको मिलना है तो हमको भी वहाँ जाना होगर। वहाँ जाने के लिए “न हाथी है ना घोड़ा है, वहाँ पैदल ही जाना है” या पदयात्रा करते हुए। “सजन रे झूठ मत बोलो” यह सब बातें आपको पता नहीं हैं। बाकी स्थानों में जब यह बात कही जाती है तो उनको यह बात समझ में भी आती है और यह सब सुनकर फिर भक्त अपना हर्ष और उल्लास भी व्यक्त करते हैं। “सजन रे झूठ मत बोलो” यह बात जब विशेष करके सुनते हैं। शायद आप समझ चुके ही होंगे कि भागवत की कक्षा हम करने नहीं जा रहे हैं, वैसे मैने “ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” कह तो दिया है। खैर! जो भी कथा होगी वह वासुदेव की ही कथा होगी या गुरु और गौरांग की कथा होगी या भागवत कथा होगी।

भागवत भी दो हैं –ग्रंथ भागवत और व्यक्ति भागवत। श्रील प्रभुपाद की जय! श्रील प्रभुपाद के जैसे व्यक्तित्व महाभागवत थे। उनके विचार भी भगवद गीता व भागवत के विचार हैं। श्रील प्रभुपाद के जैसे महाभागवत के विचार ही प्रकट किए जाएंगे, व्यक्त किए जाएंगे। मैं आशा करता हूं कि मैं इसमें कुछ जुआ ना खेलूं ,जिसको मानसिक अटकलें कहते हैं। “मुझे लगता है, मेरा विचार है, मेरे हिसाब से” वैसे यह सब जुआ ही हुआ। शायद आपने यह सोचा होगा या नहीं सोचा। हम कहते तो रहते हैं कि जुआ नहीं खेलना, परंतु यह भी एक तरह का जुआ ही है जब हम अपनी बात को घुसाड़ते रहते हैं। ‘ मेरा विचार’ कहते हुए हम दुनिया को ठगते रहते हैं, गुमराह करते रहते है। वैसे बकासुर की बातें तो चल ही रही है, परन्तु बकासुर उनको भी कहते हैं जो क्या करते हैं ? बक बक बक बक बक बक। तो ये बकबक बंद करो। संसार भर में कई सारे बकासुर बकबक कर रहे है। इसके कारण संसार का बड़ा बुरा हाल हो रहा है, ये गंभीर विषय है। पृथ्वी माता की जय! पृथ्वी माता का क्या हाल हो रहा है? ग्लोबल वार्मिंग चल रहा है, मौसम बदल रहे हैं, क्या नहीं हो रहा है? “कलेर्दोषनिधे राजन्न”, कई सारे कलि के दोष अभी स्पष्ट हो रहे है।

इसके लिए कारणी भूत कौन है? क्या कारण है? थोड़ा विचार करेंगे तो पता चलेगा। वैसे हम ही, हम भी उसके कारण हैं। ज्यादा या कम, कोई अधिक कारण होगा, कोई कुछ कम कारण होगा लेकिन हम सभी जिम्मेदार है। मैं एक प्रेजेंटेशन प्रस्तुत करने जा रहा हूं। मायापुर में जब जीबीसी मीटिंग हो रही थी तो उसी समय आई. एल. एस. (इस्कॉन लीडर संघ) में मैंने यह प्रस्तुत किया था प्रेजेंटेशन। यहाँ भी अब आई.बी.ई.ए.सी और ब्यूरो मीटिंग्स हो रही है अहमदाबाद में, तो सोचा की चलो हम वही प्रेजेंटेशन प्रस्तुत करते है, जो हमने मायापुर में मैंने उन मीटिंग्स के समय किया था। मंदिर के अध्यक्ष की अनुमति से, उन्होंने हां कह दिया है। इसका शीर्षक का तो कुछ मैंने उल्लेख कर ही दिया। यह शीर्षक कुछ दिख रहा है आपको? “वसुधैव कुटुम्बकम” इसमें केवल आपको सुनना ही नहीं है, साथ ही साथ वीडियो भी होगा। ठीक है तो मैं आगे बढ़ता हूं सभी भक्तो की अनुमति से। ठीक है आपको? मैंने आपका स्वागत किया और आप भी मेरा ही नहीं, मेरे प्रेजेंटेशन का भी स्वागत कर रहे हो, धन्यवाद! “वसुधैव कुटुंबकम- एक दुनिया, एक परिवार” ।

प्रेजेंटेशन तो वैसे वीडियो में या स्लाइड में कहो, यह अंग्रेजी में है। लेकिन आप समझ पाओगे। मैं बोलने तो हिंदी में ही जा रहा हूं। चलेगा आपको, हिंदी चलेगा? दक्षिण भारतीय हमेशा इस बात से खुश नहीं होते हैं। लेकिन हम लोग अब उत्तर, दक्षिण, पूरब, पश्चिम नहीं है, हम आध्यात्मिक हैं। भगवान सभी भाषाएं बोलते हैं, भगवान बहुभाषी है। कृष्ण सभी भाषा जानते हैं, सभी भाषा बोलते है। हिंदी भी बोलते हैं, बंगाली भी बोलते हैं संस्कृत भी। आज यहाँ प्रस्तुत करेंगे हम कुछ बातें या कुछ विचार, “वैदिक वर्ल्ड विज़न”, वेदों के दृष्टि से। इसको “शास्त्र चक्षुष:” कहते हैं, शास्त्रों की आंखों से देखो या शास्त्र का चश्मा पहनो तो फिर आपको दिखाई देगा ,यथारूप। यह वैदिक विजन आचार्यों की देन होती है या साधु/शास्त्र/आचार्य इन तीनों की विज़न है।

श्रील प्रभुपाद का भी विज़न है। मेरे पास बहुत सारे स्लाइड्स है इसलिए मुझे जल्दी से करना होगा। श्रील प्रभुपाद से एक बार विदेश में पूछा गया, “आप क्यों आए हो पाश्चात्य जगत में?” तो प्रभुपाद कहे,” मुझे वह तरीका बदलना है जिस प्रकार यह संसार सोचता है”। मैं बदलाव देखना चाहता हूं, किस में? जिस प्रकार से लोग सोचते हैं। लोगों की सोच में मैं परिवर्तन देखना चाहता हूं, संसार भर के लोगों की सोच में। कल हमारे रसराज प्रभु कह रहे थे “ जिस प्रकार से लोग सोचते हैं और कहते हैं” ऐसा भी कल हमारी मीटिंग में थोड़ी चर्चा हो रही थी। वैसे शुरुआत तो सोच से होती है और फिर वही सोच वचन से मुख से निकलती है। सोचते हैं फिर कहते हैं।

“अयं निजः परो वेति गणना लघु चेतसाम्
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्” ।।|

आप में से किसने किसने यह वचन पहले सुना या पढ़ा है? या आप इससे परिचित हो? पूरा नहीं तो अंतिम शब्द “वसुधैव कुटुंबकम” तो सबको पता है। सुना तो होता ही है, हम समझते नहीं समझते वह दूसरी बात है। लेकिन सुनते पढ़ते तो रहते ही है। यह उच्च विचार भी है जिसको “ सिंपल लिविंग हाई थिंकिंग” कहते हैं। साधारण जीवन हो परन्तु सोच कैसी होनी चाहिए? उच्च विचार होने चाहिए। “अयं निजः” यह लोग मेरे, किंतु वे लोग पराए हैं। यह जो विचार है अपना- पराया ऐसी जिनकी सोच है, उनकी “गणना लघु चेतसाम्” है। लघु मतलब हल्का, हल्की सोच या नीच सोच या हलकट। हलकट से परिचित हो आप? चलता है गुजरात में हलकट? यह हलकट हुआ मतलब लो थिंकिंग। अपना- पराया, देसी- विदेशी, हिंदू- मुसलमान, गरीब-श्रीमान, पुरुष- स्त्री, आदि। इन सभी को वैसे द्वंद भी कहते हैं। द्वंद मतलब ड्युअलिटी। “द्वन्द्वातीतो विमत्सर:” ऐसा कृष्ण तो कहे हैं कि भक्तों को इन द्वंद्वों से अतीत पहुंचना चाहिए और मत्सर रहित होना चाहिए। वैसे जिनमें मात्सर्य है उन्हीं की सोच होती है यह अपने है, यह पराये हैं। “ उदार चरितनाम तु” लेकिन जो उदार दिल के या विचार के, जिनकी दूरदृष्टि भी है, उनकी सोच कैसी होती है? वसुधैव कुटुंबकम, वसुधा+ एव+ कुटुंबकम। वसुधा मतलब पृथ्वी, इस पृथ्वी पर जितने लोग हैं उन सब को मिलाकर कितने कुटुंब? एक परिवार।

आजकल वह भी चलता है हम दो और हमारे क्या? इसका प्रचार नहीं है क्या यहां? हम दो हमारे दो, ऐसे चलता था या परंतु अभी इसमें परिवर्तन कर दिया,” हम दो हमारा एक या हमारी एक”।अधिकतर लोग तो ऐसे हैं कि यही हमारा संसार है। ये जो दो-चार है, हम दो हमारे दो, इसके अलावा जो है वे पराए हैं उनपे कौन ध्यान देता है। इतना नीच विचार हो जाता है। लेकिन हम लोग इस हरेकृष्ण आंदोलन में वसुधैव कुटुंबकम का अनुभव करते रहते हैं। इस चित्र में देखिए यह फंक्शन कोलकाता में हो रहा था २०१५ में। जब श्रील प्रभुपाद अमेरिका के लिए प्रस्थान किए थे जलदूत बोट से तो उनके प्रस्थान की 50वीं सालगिरह चल रही थी। उस समय विश्वभर के हजारों भक्त (भारतीय भी) कोलकाता के नेताजी इंडोर स्टेडियम में एकत्रित हुए थे और वहाँ हम अनुभव कर रहे थे वसुधैव कुटुंबकम।

यह एक सामान्य भाईचारा, आप ऐसे चित्र देखते रहते हो? अभी आप क्या देख रहे हो? “अयं निजः परो वेति”। ये यूक्रेन के हमारे देश के लोग हैं और वे दूसरे देश रशिया के लोग हैं,वे आपस में क्या करते हैं? लड़ते हैं। पहले तो वे लोग गाली देते थे, फिर धीरे-धीरे गोली खिलाने लगे और अभी तो काफी प्रगति किए हुए हैं, मिसाइल्स टकरा रही हैं आसमान में। “अयं निजः परो वेति गणना लघु चेतसाम्” का यही दुष्परिणाम है। लेकिन यहाँ पर मैं आपका ध्यान एक और बात की ओर आकर्षित करना चाहता हूं। कैप्शन में देखो ऊपर लिखा हुआ है वर्ल्ड वॉर १ कब हुआ था? १९१४ से १९१८ तक वर्ल्ड वॉर १ चला रहा। फिर वर्ल्ड वॉर २ आ गया, १९३९ से १९४५। उस समय कोई थे आप में से? मैं भी नहीं था और मैं अभी ७३- ७४ वर्ष का हो चुका हूँ।

यह महाभारत कब हुआ? वहाँ लिखा भी है, ३०६७ बी.सी. (बिफोर क्राइस्ट)। आप 2023 ऐड करेंगे तो जो ग्रैंड टोटल मिलेगी, उतने वर्ष पूर्व महाभारत का युद्ध हुआ। तो वर्ल्ड वार- १ कौन सा होना चाहिए था? बोलो झट से… महाभारत। और ये लोग लेकर बैठे हैं कि 19वी शताब्दी में २ वर्ल्ड वॉर हुए,जिसमें एक को नाम वर्ल्ड वॉर- १ दिया, दूसरे को वर्ल्ड वॉर – २ दिया। तो फिर उसका क्या जो ५००० ईयर पहले युद्ध हुआ था? उसको नंबर १ कहना चाहिए था। यह है दुर्देव इस संसार का। इसे अज्ञान कहो संसार का या कूपमण्डूक वृत्ति कहो। ‘कूप’ मतलब कुआ, ‘ मंडूक’ मतलब मेंढक। इसको श्रील प्रभुपाद डॉक्टर फ्रोग कहते थे। पाश्चात्य जगत की हमारे ही भाई, ब्रदर्स एंड सिस्टर्स, या अन्य धर्मी ये जो हैं उनको यह ज्ञान नहीं हैं। डिस्टेंट पास्ट की बातें वे नहीं जानते और अगर उनको हम सुनाएंगे तो वे कहेंगे,”ओ दैट्स मैथोंलोजी”। फ्रॉम मिथ कम्स मैथोलोजी, जिसका मतलब यह काल्पनिक है। वैसे उनकी कल्पना या चिंतन के परे की बात है। ये अचिन्त्य है, नॉट इमैजिनरी। जो यह टाइमलाइन हैं, टाइम फैक्टर एंड टाइमलाइन, डार्विन थ्योरी ऑफ इवोल्यूशन या कुछ साइंटिस्ट के द्वारा या बाइबल के अनुसार ,जब हम 5000 वर्ष पूर्व की बात करते हैं,तो उस समय तो वे कहते,” हम केवमैन थे। मनुष्य उस समय गुफा में रहते थे, जब उनको लड़ना होता था तो पत्थर फेंकते थे,और आप कह रहे हो कि इतने एडवांस्ड वेपन का यूज़ हुआ”। ऑफ कोर्स उस समय हस्तिनापुर था, द्वारका नगरी थी, और ऐसे कई स्थान थे। हरि हरि! हम लोग तो युगों की बात करते हैं,कलयुग और उसके पहले द्वापर, त्रेता और सतयुग।

कलयुग अकेला ही कितने वर्ष का होता है? 4,32,000 वर्ष का। इसका दुगना होता है द्वापर, तिगुना होता है त्रेता और चौगुना होता है सतयुग। इन चारों को मिलाके बनता है महायुग। ऐसे “सहस्त्र युग पर्यन्त”, ऐसे 1000 महायुगों से ब्रह्मा का एक दिन बनता है,और रात के लिए फिर दोबारा 1000 महायुग। ये तो रात और दिन ब्रह्मा का हुआ, फिर एक हफ्ता,फिर एक महीना, और फिर 12 महीने का एक साल हुआ। ब्रह्मा जितने साल जीते हैं? 100 साल। शायद आपके कंप्यूटर में भी ऐसा कैलकुलेशन संभव नहीं है, इतनी अधिक संख्या को गिनना। हरि हरि!

मैं लॉस एंजेलिस में था कुछ वर्ष पूर्व,वहां उस शहर की एनिवर्सरी मना रहे थे। जब से स्थापना हुई तब से कितने वर्ष बीत गए उसकी एनिवर्सरी मनाई जा रही थी। मैने उनसे पूछा कितना पुराना है आपका लॉस एंजेलिस? उस व्यक्ति ने कहा लॉस एंजेलिस इस वेरी ओल्ड सिटी। इस’ ओल्ड’ शब्द को वो और लम्बा खींचकर क्या करने का प्रयास कर रहा था? वो बताना चाह रहा था कि उनका शहर सचमें बहुत पुराना है। फिर मैने पूछा आखिर।

कितना ओल्ड है आपका शहर ? वो कहे 200 इयर्स ओल्ड। उन लोगों के लिए दो सौ साल बहुत ओल्ड है। जबकि हमारी द्वारका नगरी तो 5000 पुरानी है,या कहो इंटर्नल है क्योंकि हम उसकी उमर की गिनती नहीं कर सकते हैं। राम जी अयोध्या में 12 लाख वर्ष पूर्व प्रकट हुए,तो फिर अयोध्या नगरी इतनी पुरानी हुई, जबकि राम तो ऐसे पुनः पुनः आते रहते हैं। वर्ल्ड हेज नो क्लू,काल की गणना का। महाविष्णु का दर्शन करो, उनके रोम रोम से ब्रह्मांड उत्पन्न होना,सारी सृष्टि का कितना विस्तृत वर्णन है भागवत तथा अन्य पुराणों में। लेकिन ऐसा ज्ञान हमारे विदेशी बंधुओं को नहीं है। क्रिस्टियन मानते हैं कि गॉड इज़ क्रियेटर। इस दुनिया की रचना गॉड ने कितने दिनों में की? इन 6 डेज़ और सातवें दिन गॉड टुक रेस्ट और वो संडे था। इसलिए सारा संसार भी संडे को रेस्ट करते रहता है, फॉलोइंग द फुट स्टेप्स ऑफ गॉड। ऐसी विदेश की समझ है। एविडेंस ऑफ द वैदिक कल्चर – हम लोग जो वैदिक संस्कृति की बात करते हैं वो अत्यंत प्राचीन है। एक समय पूरी पृथ्वी पर भारतवर्ष फैला हुआ था। मेरे एक गुरु भाई हैं,नन्दनंदन प्रभु करके प्रभुपाद के डिसाइपल, उन्होंने बताया है तथा कई सारे ग्रंथ में भी उपलब्ध है वैसे ये वैदिक कल्चर का एविडेंस। उन्होंने प्रस्तुत करते हुए कहा है,” नो मैटर व्हाट वी मे बी (इन रिगार्ड टू आर प्रेजेंट रिलीज़न,सोसाइटी और कंट्री) वी आर ऑल डीसैनडेंट ऑफ दैट एंसिएंट ग्लोबल सिविलाइजेशन।” अभी हम जो भी हैं,हम को ये समझना चाहिए कि हम सभी उस प्राचीन संस्कृति के वंशज हैं। ‘वैदिक ट्रेडिशन ऑफ इंडिया इज़ द पेरेंट ह्यूमैनिटी एंड ओरिजिनल एन्सेस्टर ऑफ होल रिलीज़नस’,ऐसा एक स्टेटमेंट इस ग्रंथ में प्रभुजी लिखे हैं। सनातन धर्म के अलावा और जो धर्म है उनका अपना सिर्फ एक – एक ग्रंथ है,और उसको बड़े गर्व के साथ वे कहते हैं,” द बुक ऑफ रिलीज़न”। लेकिन हमारा क्या है? द लाइब्रेरी ऑफ रिलीज़न। उनका कोई ग्रंथ,लेकिन हमारे पास ग्रन्थालय है।

बख्तियार खिलजी का चित्र है यहाँ, वैसे उसका मुखड़ा नहीं देखना चाहिए। इसने करीब 800 वर्ष पूर्व आक्रमण बनके, बिहार की नालंदा यूनिवर्सिटी को नष्ट किया। उसने सोचा जब हमारे पास द बुक ऑफ रिलीज़न है तो फिर किसी और ग्रंथ की क्या आवश्यकता है। ऐसा सोचके उसने इस यूनिवर्सिटी को आग लगाई, जो 4-5 महीने जलती रही। उसका इतना विशाल कैंपस था, ग्रंथों का भंडार भी था। ऐसा नॉलेज ऐसी विद्या एक ही है जो राजविद्या, गीता या भागवत है। इसमें श्रुति और स्मृति ऐसे विभाजन हैं। स्मृति में फिर इतिहास है, पुराण हैं, षड् दर्शन हैं, इत्यादि। ये तक्षशिला 700बी सी (बिफोर क्राइस्ट) से है। क्राइस्ट का आना , बाइबल की रचना होना, आदि से बहुत पहले से है। उस समय से ही यूनिवर्सिटी चलती आ रही है, इवन जीसस क्राइस्ट भारत आए ,उनकी सारी शिक्षा इत्यादि भारत में ही हुई। अलग अलग सिद्धियों को वे सीखे और वहां जाके उन्होंने वो चमत्कार/ मीरैकल्स दिखाए। आपकी जानकारी केलिए जब वे 10-12 साल के थे,तब वे गायब होगये। परिवार ने उनको तब खो दिया, और फिर जब वे 30 साल के थे ,तो पुनः वे लौटे जेरूसलम। ये जो लगभग 20 वर्षों की कालावधि है, उसकी कोई हिस्ट्री नहीं है। क्या हुआ कहां दे,किसी को नहीं पता। फिर उनके पास 4 वर्ष थे, करीब 34 साल की उम्र तक। तो उन्होंने जो भी चमत्कार किया, वो इन 4 सालों में किया। जब होता है चमत्कार तब होता है

नमस्कार। सभी ने नमस्कार किया, क्राइस्ट में लोगों को प्रभावित किया। लेकिन वे भी स्टूडेंट यहां भारतवर्ष में ही रहे। लिस्ट ऑफ सब्जेक्ट्स टॉट एट एनसीएंट यूनिवर्सिटी की छोटी सी सूची आपके समझ प्रस्तुत की जा रही है: अन्तरिक्ष विद्या/स्पेस साइंस/एस्ट्रोनिमी, कॉमर्स, एग्रीकल्चर, मैकेनिक्स, टेक्सटाइल, मेटलर्जी, मेडिसिन, ज्योग्राफी, आदि। ज्योग्राफी को भूगोल कहते है। करीब 100- 200वर्ष पूर्व पाश्चात्य जगत में इनकुडिंग साइंटिस्ट,उनकी ऐसी समझ थी कि पृथ्वी फ्लैट है,लकड़ी के प्लैंक की तरह। वो सोचते थे हम चलते जाएंगे,चलते जाएंगे तो ओह हम गिर जाएंगे, जैसे ही ये लकड़ी के प्लैंक का आखिरी छोर आयेगा। लेकिन यहां देखिए पृथ्वी का नाम ही वैदिक वांग्मय में क्या दिया है?भूगोल। भू मतलब पृथ्वी,और वो कैसी है? गोल है। जब से पृथ्वी बनी उसको नाम दिया भूगोल, तबसे संसार जनता है कि पृथ्वी गोल है। लेकिन पाश्चात्य देश के अनाड़ी सो कॉल्ड साइंटिस्ट, उनको पता ही नहीं था कि गोल है कि फ्लैट है। विमान विद्या, लॉजिस्टिक्स, हिस्ट्री, वाटर मैनेजमेंट,आदि। वैसे मनुष्यों को जानने योग्य जो जो ज्ञान हैं सब भगवान ने प्रस्तुत किया शास्त्रों में।

शास्त्र जिनसे हम ज्ञान प्राप्त करते हैं, वो कितने पुराने है? गीता कितनी पुरानी है? 5000 वर्ष पुरानी नहीं है, उस समय भी कहा था भगवान ने की, “इमम विवस्वते योगम प्रोक्तवान अहम अव्ययंम”, लाखों वर्ष पूर्व विवस्वान देवता को ये गीता सुनाई थी। और वो भी फर्स्ट टाइम नहीं था। ज्ञान मतलब किसके संबंध का का ज्ञान ? भगवान के सम्बन्ध का ज्ञान कब से निर्माण हुआ? जब भगवान खुद निर्माण हुए। भगवान जबसे है तबसे उनसे संबंधित ज्ञान भी है। भगवान तो सदैव रहते,”गोविंदम आदि पुरुषम”। तो ये ज्ञान शाश्वत है। अलग अलग यूनिवर्सिटी का यहां लिखा है, 1962 की बात है,आप में से कौन कौन 1962 की पैदाइश के हैं? कुछ हाथ उठे हैं। उस समय इंडिया और चाइना के बीच युद्ध हों रहा था ,भारत बीइंग फ्रेंडली कंट्री, तो सभी नगरों ग्रामों में स्कूल के बच्चों को रास्ते में घुमाया जा रहा था और हम नारे लगा रहे थे,” हिंदी चीनी भाई भाई” ।

हम इतने छोटे थे कि हमको उस समय कुछ पता नहीं चल रहा था। मैं सोच रहा था कि हिंदी तो भाषा होती है, चीनी तो शक्कर खाने की चीज़ होती है, तो यह भाई-भाई कैसे? एक भाषा और एक खाने की चीनी ,यह भाई-भाई कैसे? फिर हम थोड़े और बड़े हो गए तो पता चला कि हिंदी मतलब हिंदुस्तान के लोग और चीनी मतलब चीन के लोग। लेकिन फिर भी ये भाई-भाई कैसे हो गए? दो व्यक्ति भाई-भाई तभी हो सकते हैं जब उनके पिता कॉमन फादर हों। एक ही पिता हो तभी तो दोनों भाई-भाई होंगे। हम सोचते थे कि वह कॉमन फादर कौन है? मिस्टर मोदी हैं या कोई और व्यक्ति हैं उस देश के ? लेकिन जब मैं इस्कॉन को ज्वाइन किया, श्रील प्रभुपाद के चरणों में पहुंचा, उनसे भागवत गीता के वचन सुने जिसमें भगवान कहे हैं, “आई एम द सीड गिविंग फादर ऑल द लिविंग एंटिटीज”, मैं ही सभी जीवों का बीज-प्रदाता पिता हूं। तो फिर समझ में आया मुझे कॉमन फादर कौन है? कृष्ण कन्हैया लाल की जय! डाकोर मा कौन छे? कन्हैया। तो फिर आप गुजराती हो क्योंकि उत्तर दे पा रहे हो। सेंट फ्रांसिस करके इटली के रहे, उनका भी ऐसे ही कुछ साक्षात्कार था, जिसको भी वो देखते उसे भाई या बहन कहते, “सिस्टर मून, ब्रदर सन”।

प्रभुपाद कहते थे कि उन्हें कुछ साक्षात्कार था, “पंडित समदर्शिन:”। न्यूयॉर्क में यूएनओ (UNO) का हेड क्वार्टर है और प्रभुपाद तो न्यूयॉर्क में रहते ही थे। जब भी इस बिल्डिंग के सामने से प्रभुपाद आते-जाते थे तो देखते थे कि, “अरे! झंडो की संख्या तो पहले से कुछ बढ़ चुकी है। अनदर फ्लैग, फिर अनदर फ्लैग, फिर एक और झंडा। तो इस। पे प्रभुपाद का फेमस कमेंट है, “ यह कैसा यूनाइटेड नेशन है? ये तो डिस-यूनाइटेड नेशन है। इट्स नॉट यूएनओ, इट्स डि-यूएनओ। ओके इसकी बात थोड़ा और आगे भी करेंगे। “कॉज एंड इफेक्ट” भगवान ने बनाई सृष्टि, गॉड मेड द कंट्री। कंट्री साइड कैसी है? आपको अच्छी लग रही है? यू आर हैप्पी? इज़ इट प्लीजिंग? यस ओर नो? कितनी अच्छी सृष्टि है भगवान की, लेकिन पिछले पांच हजार वर्षों में हमने सृष्टि का नाश कर दिया। गॉड मेड द कंट्री, बट व्हाट डिड मैन डू? मैन मेड द मैस। मैस समझते हो? सब उल्टा पुल्टा करके सब कुछ बिगाड़ दिया। द फेस ऑफ़ द अर्थ ही नहीं,तापमान भी बिगाड़ा। पृथ्वी माता की जय ! वंदे मातरम! सात माताएं हैं, जिनमें एक माता है पृथ्वी माता। माता वो भी होती जो हमको खिलाती-पिलाती, हमारा लालन-पालन करती है। “अन्नाद भवंति भूतानी” अन्न खाएंगे हम तो जियेंगे। खिलाने पिलाने वाली तो धरती माता ही है, उनकी गोद में हमें पलना है। लेकिन इसी धरती माता का बहुत बुरा हाल हम लोगों ने करके रखा है।

प्रभुपाद की लास्ट लेक्चर सीरीज जो मुंबई में हुई इन मंथ ऑफ अप्रैल, रामनवमी के समय। तब उन्होंने सीरीज ऑफ लेक्चरर्स दिए जिनका टाइटल था “मॉडर्न सिविलाइजेशन इस अ टोटल फैलियर”, आधुनिक सभ्यता फेलियर है, विनाशकारी है। इसमें अगर आप बैनर को पढ़ सकते हो तो लास्ट लाइन में क्या लिखा है?“ सॉल्यूशन इस कृष्ण कॉन्शसनेस”। इसी टॉपिक पर फॉर 7 डेज प्रभुपाद वास टॉकिंग, रोरिंग कहो। चीफ मिनिस्टर इनॉग्रेटेड दैट फंक्शन; मैं भी था उस फंक्शन में। श्रील प्रभुपाद की जय! अब इसका साउंड सुनाई देगा क्या? इकोनॉमी जो अर्थव्यवस्था है, इस संसार में दो प्रकार की इकोनॉमी चलती है- एक का नाम है एग्रेरियन (एग्रीकल्चर) इकोनॉमी।’ काऊ एंड द लैंड’ पर निर्भर रहकर जो अर्थव्यवस्था होती है वह एग्रेरियन इकोनॉमी है। दूसरी है इंडस्ट्रियल इकोनॉमी जिसका चित्र तो आपके समक्ष है ही, देखिए इससे क्या क्या हो रहा है? इतना सारा धुंआ और पॉल्यूशन। इसी को हमने एक डॉक्यूमेंट्री “ द लॉस्ट विलेज” में दिखाया है, आपने शायद देखी होगी। उस समय की जीबीसी भक्तिवैभव स्वामी महाराज 15 साल पहले मेरे गांव में आए जहां मेरा जन्म हुआ था। उन्होंने एक डॉक्यूमेंट्री बनाई जिसका नाम है “लॉस्ट विलेज” ,गांव को हम कैसे खो रहे हैं। आपने दोनों का अभी दर्शन किया, तो कौनसी इकोनॉमी बेहतर है? रेज़ योर हैंड। कुछ इंडस्ट्रीयलिस्ट भी बैठे होंगे यहाँ। क्या हो रहा है संसार भर में?

क्राइसिस मैनेजमेंट एंड इंडस्ट्रियल इकोनॉमी के प्रभाव यहाँ बताए है। इट्स बूमरैंग इफेक्ट। इल इफेक्ट्स ऑफ इकोनॉमी आर वेल नोन जैसे एयर पॉल्यूशन, वाटर पोल्यूशन, सॉयल पोल्यूशन। हमें भूमि, रेती, जमीन का हेल्थ ही बिगाड़ दिया। लाइट पॉल्यूशन, नॉइज़ पॉल्यूशन, बेसिकली माइंड पॉल्यूशन। माइंड्स आर बीइंग पोल्यूटेड। अब तो इंटरनेट और सोशल मीडिया, ब्रेकिंग द न्यूज़ के साथ, अच्छे दिन आएंगे? नो। हमारे देश या संसार का फ्यूचर इस नॉट एट ऑल ब्राइट, इट्स ब्लीक/ब्लैक। ऐसा हम लोग करते रहेंगे और कुछ सुधार नहीं करेंगे, कुछ रिवोलुशनरी चेंज हम नहीं लायेंगे अपनी लाइफ स्टाइल में, या हमारे विचारधारा में, तो मुश्किल होगी। पृथ्वी के साथ हम ऐसा एक्सप्लोइटेशन कर रहे हैं, यह सारे जो प्रयास है इसमें कुछ परिवर्तन नहीं करेंगे, तो हमारा मानव जाति का भविष्य “वी हैव नो फ्यूचर”। इसलिए साइंटिस्ट तब कह रहे हैं कि’ फाइंड अदर प्लेनेट’ । इनके भरोसे तो सारा संसार आगे बढ़ रहा था, इतना सारा उन्होंने ब्रेन वॉशिंग किया सारे संसार का, इनके भरोसे चल रहे थे हम लोग, लेकिन अब वे क्या कह रहे हैं? “सॉरी फोक्स, हम अब आपकी मदद नहीं कर सकते, हमने जो भी आविष्कार/ डिस्कवरीज/ इंवेंशंस की और टेक्नोलॉजी में जो भी प्रोग्रेस वगैरह की वो प्रोग्रेस नहीं बल्कि रिग्रेस हुई।” हेल्थवाइज़ क्या सारे मानव जाति ने प्रोग्रेस की है? मैं जब छोटा था तो मेरे गांव में की कहानी जो की सारे गांव की हकीकत भी है।

पृथ्वी के जितने गांव हैं या भारत के 7 लाख गांव की कहानी मैं सुनाता हूं कुछ शब्दों में हेल्थ की दृष्टि से। मेरे गांव में एक डॉक्टर आता था, वह भी पड़ोस के गांव से आता था बाइसिकल पर। वह हर बुधवार को आता था ताकि कोई पेशेंट या रोगी हों तो है उनको दवा देने के उद्देश्य से। लेकिन कभी-कभी उनको एक ग्राहक भी नहीं मिलता था, नो कस्टमर ,नो सिक पर्सन। उसी गांव में फिर कुछ वर्षों के बाद एक छोटा सा अस्पताल कहो या डिस्पेंसरी खोली गई। मेडिकल ऑफिसर आए गवर्नमेंट के, रिबन कटिंग की, लोगों ने ताली पीटी कि अब हमारे गांव में भी अस्पताल होगया। तो ज़्यादा अस्पताल होना यह प्रोग्रेस हुई या रिग्रेस? अब तो क्या फाइव स्टार अस्पताल होते हैं, लोग फाइव स्टार होटल से सीधा ट्रांसफर हो जाते हैं। पहले फाइव स्टार होटल में भोग भोगते हैं, फिर भोग से होते हैं रोग और अंत में फाइव स्टार हॉस्पिटल में ट्रांसफर हो जाते हैं। मारेंगे तो कैसे? स्टाइल से मारेंगे। मॉडर्न सिविलाइजेशन की…!( किसी ने तो जय की,कोई तो मिला हमको) सॉइल इनफर्टिलिटी, ग्लोबल वार्मिंग, ये सब जो नतीजा है उसका कारण हैं हम जो-जो कर रहे हैं संसार भर के लोग मिलकर।

लीडिंग साइंटिस्ट आर लीडिंग द होल शो। पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, आपने सुना है न ग्लोबल वार्मिंग? यह सब हो रहा है डिफोरेस्टेशन के कारण, सारे वन या जंगल काटे जा रहे हैं इंक्लूडिंग अमेजॉन फॉरेस्ट। सबसे बड़ा फॉरेस्ट ब्राजील में है जिसको अमेजॉन कहते हैं। ऐसी समझ है कि हम मनुष्य को जितनी भी ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है वह टोटल प्राणवायु का 25% ऑक्सीजन का ओरिजिनल स्रोत है अमेजॉन फॉरेस्ट। आप इमेजिन कर सकते हैं कि इसको काटते रहेंगे तो क्या होगा? वी विल फील चौक्ड अप, नो ऑक्सीजन। इसके कई सारे इल इफेक्ट्स हैं। एनिमल स्लॉटरिंग- “मैं कौन हूं? आई एम नॉट ए पीस ऑफ़ मीट।” लगभग 40 वर्ष पूर्व की बात है, मैं यहां अहमदाबाद में था, हम लोग कुछ फंड रेजिंग कर रहे थे, लाइफ मेंबर बना रहे। तो एक जेंटलमैन, आई डोंट नो कि उनको जेंटलमैन कहे या रफियन? उन्होंने हमको यह तो कहा कि,” आई एम ब्राह्मण”। उन्होंने अपना जनेऊ भी दिखाया। इतना कहने के उपरांत उन्होंने ये भी कहा, जो बात सुनके हम हैरान हो गए। वह बात हमारे लिए अविस्मरणीय है, कभी नहीं भूल सकते। उन्होंने कहा, “आई एम ब्राह्मण बट आई रैलिश बीफ।” उन्होंने खाता हूं भी नहीं कहा बल्कि रैलिश करता हूं कहा। मैं आश्वादन करता हूं,किसका? बीफ का, मतलब मुर्गी, भेड़ या बकरी भी नहीं। मैं कहूंगा भी नहीं कि उसने क्या कहा। एक्सप्लोइटेशन ऑफ़ नेचुरल रिसोर्सेस

प्राकृतिक संसाधनों का दोहन रात-दिन चल ही रहा है, इसको को इंद्रिय तृप्ति या फिर भोग कहते हैं और उसी का परिणाम है ये सारे रोग। सारे संसार को ऐसी ही ठोकर खिलाई, किसने ? कोरोना वायरस ने। “बाउ डाउन मिस्टर”, उसने सबको झुकाया, कोई भेद नहीं किया, चाहे कोई शक्तिशाली हो या शक्तिहीन, उसने सबको लिटा दिया, लाखों-करोडो की जानें चली गयी। तो अब समय हो चुका है, जाग जाओ। कोरोना वायरस को एक वेकअप कॉल के रूप में ये संसार अगर लेता है सही है। “रुकें, सोचें, फिर आगे बढ़ें”। आत्मनिरीक्षण / सिंहावलोकन की आवश्यकता है सारे संसार भर के लोगों को। यही करने का प्रयास हम यहाँ कर रहे हैं। कोरोना के आने से रोल रिवर्स होगये थे। कोरोना से पहले पशु-पक्षियों को हम पिंजरे में, प्राणी संग्रहालय में बंद करके रखते थे। फिर ज़ू या चिड़िया घर में हम उनको देखने जाते थे। लेकिन कोरोना जब आया तो हम ही पिंजरे में कैद हो गए और सारे पक्षी आज़ाद हो गए, उनके रास्ते में कोई नहीं होता था, ऐसे फोटो दिखाए गए थे। ये तो सब जिव्हा के भोग के कारण था जिसकी पुष्टि भक्तिविनोद ठाकुर भी करते है। हर एक इन्द्रिय का आहार होता है। इन्द्रिय पांच हैं जिन्हें ज्ञानेंद्रियां कहते हैं। इन पांचो का आहार है- आँखों का आहार है , कान का आहार है, नासिक का आहार है , त्वचा का आहार है।

अर्हनिश हर मनुष्य भोगने का प्रयास कर रहा है और भोग से हो रहे है रोग। पहले पेट में दर्द है, सर में दर्द है, ऐसे दो चार बीमारियों को नाम हम सुना करते थे लेकिन अब कितनी बीमारियां हो गयी हैं। अधिक अस्पताल हो गए, अधिक डॉक्टर हो गए, अधिक दवाइयां हो गयी; ये कोई समाधान है क्या किसी चीज का ? अधिक दवाइयां वैसे अधिक बीमारियों को उत्पन्न करती है, कभी सोचा है आपने? हरि हरि! ग्लोबल सर्वे हुआ तो यह पता लगाया कि कौन सा देश बीमार है? तब यह पता लगा कि अमेरिका नंबर एक पर है, पूरी दुनिया की सबसे ज्यादा बीमारी अमेरिका में है। अमेरिकन वैसे भी नंबर १ रहना चाहते है। इसमें मुझे कोई आश्चर्य भी नहीं है क्योंकि सबसे अधिक भोगी देश भी अमेरिका ही है।” पॉइजन ऑफ ग्रीड”, पोप फ्रांसिस जब अफ्रीका में थे तब वे यह जो लोभ की वृत्ति है,उसके दुष्परिणाम का उल्लेख कर रहे थे।

महात्मा गांधी भी कहे, “पृथ्वी पर हर प्राणी की ज़रूरत हेतु पर्याप्त साधन है, लेकिन हर किसी के लालच हेतु नहीं” । जरूरत ठीक है पर लालच ठीक नहीं है। हमारी आवश्यकताएं ठीक है पर जब हम लोभी बन जाते है तो उसका कोई अंत ही नहीं है। ऐसा भी एक सर्वे में निष्कर्ष निकला कि हमारे भोग के लिए जितने भी साधन की आवश्यकता आजकल हो रही है, क्यूंकि हम अमेरिकन स्टैण्डर्ड के अनुसार अपनी जीवन शैली बनाने का प्रयास कर रहे है, तो एक पृथ्वी से काम नहीं चलेगा। कितनी पृथ्वियां चाहिए ? पांच पृथ्वियां चाहिए पड़ेंगी मनुष्य को अपनी आवश्यकता पूर्ण करने के लिए। रूस और यूक्रेन के बीच अवश्य ही युद्ध चल रहा है किन्तु रूस और यूक्रेन के जो हरे कृष्ण भक्त हैं, वे क्या कर रहे है?

“वांछा-कल्पतरूभयशच कृपा-सिंधुभय एव च,
पतितानाम पावने भयो वैष्णवे नमो नमः”।

वे तो एक दूसरे को गले लगा रहे है। यह होता जब हम कृष्ण भावनामृत होते है। 151-152 देशों के लीडर्स पेरिस में एकत्रित हुए थे। उनका प्रश्न था कि पृथ्वी को ग्लोबल वार्मिंग से कैसे बचाया जा सकता है? साथ ही साथ इस्कॉन के यूनिटी के प्यास तो जारी ही हैं जब से इस्कॉन की स्थापना हुई है। भक्त जब एकत्रित होते थे तो प्रभुपाद कहा करते थे, ” दिस इज़ यूनाइटेड नेशन “। कोई रशिया का,कोई यूक्रेन,कोई अमेरिका, कोई अफ्रीका, कोई भारत का भक्त है ; यह है सही में यूनाइटेड नेशन ऑफ द स्पिरिचुअल वर्ल्ड। हरि बोल! संसार के हेडक्वार्टर में कितने सारे झंडे हैं लेकिन इस्कॉन का हेडक्वार्टर है : मायापुर धाम की जय! संसार का हेड क्वार्टर है न्यूयॉर्क, वैसे कलियुग की राजधानी को न्यूयॉर्क कहते है। प्रभुपाद जब विदेश गए तो उनका गंतव्य स्थान कौन सा रहा? न्यूयॉर्क। तो हमारा पहला हमला कहां हुआ? न्यूयॉर्क में। प्रभुपाद की बुक्स और हरे कृष्ण महामंत्र टाइम बॉब्स की तरह थे। “युक्रेनियन रशियन भाई भाई”, यहां देखिए यूक्रेन और रशिया के भक्त क्या कर रहे है?ये भाई- भाई एक दूसरे को प्रणाम कर रहे है। “थिंक ग्लोबली ऐक्ट लोकली” , प्रभुपाद की भी सलाह यही है :

“ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्‌।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्‌ ॥”
ये तो तत्व सिद्धांत है इसका प्रयोग बहुत अनिवार्य है।

“वसुधैव कुटुंबकम” टाइम टू रिवाइव द वैदिक कल्चर, वैदिक संस्कृति की जागृति करने का समय आ चुका है। प्रभुपाद को एक पत्रकार ने पूछा आप हमारे देश क्यों आये हो? प्रभुपाद ने कहा कि,” आप भी तो हमारे देश आये थे। आपने आकर क्या किया? आपने जिसको भी मूल्यवान वस्तु समझा आप उसे इंग्लैंड ले आये, आपने लूट लिया हमारे देश को। लेकिन जब आपका ये लूटने का प्रयास चल रहा था तो हमारे देश की जो असली संपत्ति है वह तो आपके वॉयसरॉयज़ भारत में ही छोड़ आये थे। उसी संपत्ति की मैं होम डिलीवरी देने आया हूं आपके पास “जन्म सार्थक करि करो उपकार” ये जो चैतन्य महाप्रभु की सीख है प्रभुपाद इसको दोहराते रहे कि अगर अपने जन्म की सार्थकता चाहते हो तो क्या करो? परोपकार करो। कृष्णभावना का जो कार्य है यह सब परोपकार का कार्य है। प्रभुपाद स्वयं परोपकार करते हुए 14 बार विश्व भ्रमण किये। जैसे गाय अपना दूध स्वयं नहीं पीती, औरों को पिलाती है; नदियाँ बहती है पर जल औरों को देती हैं; वृक्ष अपने फलों को स्वयं नहीं खाते, औरों को खिलाते है वैसे ही “परोपकाराय इदं शरीरम”, यह शरीर किसके लिए है? परोपकार के लिए है।

एक समाधान के रूप में इन चार नियमों का पालन करना भी इस सारे संसार के लिए अनिवार्य है, अन्यथा बहुत सारी मुसीबतें हमारा इंतज़ार कर रही हैं। ये चार नियम हैं:- अवैध यौन संबंध न बनाना, नशा न करना (शराब, सिगरेट आदि), मांसाहार न करना, और जुआ न खेलना। सफलतापूर्वक इन नियमों का संसार भर में पालन हो रहा है। इसका पालन नहीं करेंगे तो क्या होता है? जो हो रहा है इस संसार में। “धर्मों रक्षति रक्षित:” यदि हम धर्म की रक्षा करेंगे तो वही धर्म हमारी रक्षा करेगा, इसको याद रखिएगा। कृषि अर्थव्यवस्था के सकारात्मक प्रभाव: आर्गेनिक फार्मिंग (जैविक खेती) इसमें कोई रासायनिक उर्वरक नहीं है। गोबर आदि से प्रजनन क्षमता (फर्टिलिटी) बढ़ती है धरती की। “सदा जीवन उच्च विचार” वाला हमको बनाना होगा। कितना बढ़िया यूटिलाइजेशन है ये भूमि का, देखने में कितना सुन्दर है न ? इसके विपरीत मांस के ढेर के साथ आप सेल्फी खींचना चाहेंगे क्या? आपने सुना नहीं। जिस कत्लखाने में पशु काटे जा रहे है क्या आप सेल्फी लेना चाहेंगे? लेकिन जब हम सुंदर प्राकृतिक स्थान पर जाते है तब हमें सेल्फी लेने की इच्छा होती है। ये अंदर की आवाज़ है, कम्युनिटी यूनिटी। “ अंध-पंगु न्याय” प्रभुपाद कहा करते थे कि, सारा विदेश अँधा है जबकि।

ईस्ट इंडिया इत्यादि) थोड़े लंगड़े है। पहले यहां मटेरियल फैसिलिटीज थोड़ी कम हुआ करती थी लेकिन अब हम उसमें भी काफी तरक्की कर रहे है। ये दोनों एक दूसरों की सहायता कर सकते है,जैसे आप देख रहे हो कि अंधे व्यक्ति ने एक लंगड़े को कंधे पर बिठाया है और दोनों साथ में आगे बढ़ रहे है। दोनों अलग अलग होते तो आगे नहीं बढ़ पाते, लेकिन साथ में है तो आगे बढ़ पाएंगे। मै जब विदेश में था तो कुछ लोग मुझे मिले और उन्होंने मुझसे कहा कि,” स्वामीजी स्वामीजी हम एक नया फार्मूला आपनाये है।” तो हमने कहा, “कौन सा फार्मूला?” उन्होंने कहा,” किस फार्मूला”। हमने तो कहा,” हम तो ब्रह्मचारी है, सन्यासी है, हम लोग ये सब नहीं करते।” उन्होंने फिर कहा,” नहीं नहीं स्वामीजी ऐसा नहीं है”। फिर हमने कहा,” तुम्हारा किस कौनसा है?” तो उन्होंने कहा,” कीप इट सिम्पल (KIS) स्टुपिड”। स्टुपिड कौन है? सारी दुनिया ही स्टुपिड है।

‘मैड एंड बैड वर्ल्ड’। एक पार्टी का नाम’आम आदमी पार्टी’,वो शायद गुजरात भी आयी थी। लेकिन हरे कृष्ण वालों कि जो पार्टी है उसका नाम है:आम आत्मा पार्टी। आपने भारत भर में ये बैनर देखा होगा, मोदी सरकार कुछ कर रही है। G20 करके देशों का एक समूह या टीम है। इस वर्ष 2023 में, इंडिया के साथ उसकी प्रेसिडेंटशिप / चेयरमैनशिप है, इसी का लाभ उठाने का प्रयास हो रहा है। “वसुधैव कुटुंबकम” का ये जो विचार है ये सत्य है, इसके साथ जुड़ी हुई जो भावना है, उनको पूरे संसार भर में बढ़ावा देने का सरकार प्रयास कर रही है। सारे संसार के लिए एक शास्त्र :

“एकम शास्त्रं देवकी-पुत्र-गीतम”
एको देव देवकी पुत्र एव ।।

एको मंत्रोडपि एकं तस्य नामानि यानि।
कर्मोडपि एकं तस्य देवस्य सेवाः।।

सारे संसार के लिए एक ही शास्त्र,
सबके लिए एक ही देव आदिदेव देवकी पुत्र कृष्ण,

और सबके लिए एक ही मंत्र…

“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे”।।

सारे संसार के लिए एक ही कर्म,एक ही सेवा…उस भगवान की सेवा, जो देवकी के पुत्र है।

इंटरफेथ वगैरह के माध्यम से इस्कॉन भी सभी को यूनाइट करने का प्रयास कर रहा है। ये पंजाबी बाग वर्ल्ड होली नेम फेस्टिवल का चित्र है। इस फेस्टिवल का नाम सुना है आपने? हरिनाम सप्ताह उत्सव। कुछ वर्ष पूर्व रोहिणी, दिल्ली मंदिर में इंटरफेथ डायलॉग हुआ का और ऐक्य की स्थापना करने का प्रयास उन्होंने किया। कलयुग में कई सारे दोष है लेकिन एक अच्छा गुण है और वो है,

“कलेर दोषे निधि राजन अस्ति हि एको महान गुण
कीर्तनाद एव कृष्णस्य मुक्तसंग परम ब्रजेत”
हम कीर्तन से मुक्त हो सकते हैं।
“परम विजयते श्रीकृष्ण संकीर्तनम”

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे,
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।
वसुधैव कुटुंबकम की जय!
गौर प्रेमानंदे हरि हरि बोल!
श्रील प्रभुपाद की जय!