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The Mystery Morning in Krsna’s Palace in hindi
**परीक्षित महाराज ने कहा—**
और वे किससे कह रहे हैं? वे किससे बात कर रहे हैं? उत्तरा… उत्तरा। माता उत्तरा, अर्थात् परीक्षित महाराज की माता।
**”तत् कृष्ट्वा महा-प्रेम-रसावेश्यानन्दिता महाविष्णु-प्रिया वीणाहस्तो विस्मितः किल।”**
वे अपनी माता को संबोधित करते हुए कहते हैं—**”हे आर्ये! हे पुण्यशालिनी माता!”**
जब नारद मुनि ने हस्तिनापुर में उस महान भक्त उद्धव के विषय में सुना, तो वे तुरंत द्वारका की ओर दौड़ पड़े।
**”महा-प्रेम-आवेशेन यन्त्रितः।”**
जब उन्होंने उद्धव के विषय में सुना, तब पाण्डवों ने उद्धव की अत्यन्त महिमा का वर्णन किया था। उद्धव के गुण, उनकी भक्ति, उनका भगवान के प्रति प्रेम—इन सबका श्रवण करते ही नारद मुनि महा-प्रेम-रस से पूर्णतः अभिभूत हो गए।
**”महा-प्रेम-रस-आवेशेन।”**
अनुवाद की आवश्यकता नहीं है। वास्तव में “महा-प्रेम-रस” कहना अधिक उपयुक्त है। महा-प्रेम-रस। “आवेशेन” अर्थात् आवेश से।
वे महा-प्रेम-रस से पूर्ण रूप से भर गए थे। अब वही महा-प्रेम-रस, जिसका स्रोत उद्धव थे, उन्हें नियंत्रित कर रहा था। वे उसी महा-प्रेम-रस के अधीन हो गए थे। उनकी अपनी कोई स्वतंत्रता नहीं रह गई थी।
उन्हें कौन संचालित कर रहा था?
**महा-प्रेम-रस।**
वही उन्हें नचा रहा था, बुलवा रहा था, जो चाहे करा रहा था। उनकी अपनी कोई स्वतंत्र इच्छा नहीं थी। वे केवल **”महा-प्रेम-रस-आवेशेन यन्त्रितः”** थे।
**”महाविष्णु-प्रियः।”**
यहाँ नारद मुनि का वर्णन **महाविष्णु-प्रिय** के रूप में किया गया है। वे महाविष्णु के प्रिय हैं, बद्रीनारायण के भी प्रिय हैं। वे उस स्तर के भक्त हैं।
उनके हाथ में वीणा थी, किन्तु भक्तिभाव की तीव्र भावनाओं और आध्यात्मिक परमानन्द से वे इतने अभिभूत थे कि हाथ में वीणा होते हुए भी उसे बजा नहीं पा रहे थे। वे अत्यन्त उत्साहित थे। दौड़ते हुए, उछलते हुए और शीघ्रता से द्वारका की ओर बढ़ रहे थे।
**”सदात् द्वारवती-वासाभ्यासात्।”**
वे द्वारका पहुँच गए। सीधे चले जा रहे हैं। किसी ने उन्हें रास्ता नहीं बताया। कोई यह नहीं कह रहा था कि, **”इधर जाइए।”**
वे सीधे चले, फिर बाएँ मुड़े, फिर दाएँ, और सीधे श्रीकृष्ण के राजमहल के सामने पहुँच गए।
उन्होंने ऐसा कैसे कर लिया?
उन्होंने किसी से यह नहीं पूछा—**”कृपया बताइए, श्रीकृष्ण के महल तक कैसे पहुँचना है?”**
उन्होंने किसी से मार्ग नहीं पूछा, फिर भी वे सीधे भगवान के महल के सामने पहुँच गए। कारण यह था कि वे पूर्व में अनेक बार द्वारका आ चुके थे। इसलिए उन्हें मार्ग भली-भाँति ज्ञात था।
**”अभ्यस्त।”**
अर्थात् वहाँ जाने का उन्हें अभ्यास था।
भागवत में हम पढ़ते हैं कि नारद मुनि अनेक बार द्वारका जाते थे। एक बार तो वे घर-घर जाकर भगवान की रानियों का हालचाल जान रहे थे—वे प्रसन्न हैं या नहीं, उनके यहाँ सब कुछ ठीक चल रहा है या नहीं।
इसी प्रकार द्वारका के बार-बार के दर्शन और वहाँ आने-जाने के अभ्यास के कारण वे बिना किसी कठिनाई के अपने अंतिम लक्ष्य तक पहुँच गए।
उनका अंतिम लक्ष्य क्या था?
द्वारका में श्रीकृष्ण का दर्शन।
मुझे एक घटना याद आ गई। लगभग चालीस वर्ष पहले लंदन में मैंने यह सुना था। कुछ भक्त किसी दिवंगत व्यक्ति के अंतिम संस्कार के लिए श्मशान जा रहे थे। वे जी.पी.एस. की सहायता से मार्ग खोज रहे थे।
जी.पी.एस. कह रहा था—**”पाँच किलोमीटर आगे जाइए… यहाँ मुड़िए…”**
और जब वे श्मशान पहुँचे, तो जी.पी.एस. ने कहा—
**”You have reached your final destination.”**
(सभी भक्त हँसने लगे।)
भक्तों ने यह वाक्य पहले भी अनेक बार सुना था, किन्तु उस दिन उन्होंने सचमुच इस वाक्य का अर्थ अनुभव किया—**”आप अपने अंतिम गन्तव्य पर पहुँच चुके हैं।”**
वास्तव में जीवन का अंतिम गन्तव्य यही है।
किन्तु नारद मुनि का अंतिम गन्तव्य क्या था?
**श्रीकृष्ण के चरणकमल।**
और वे वहाँ पहुँच गए।
**”प्रभु-प्रासादात्।”**
यहाँ “प्रासाद” का अर्थ महल है। यह सचमुच आश्चर्यजनक है कि वे सीधे वहाँ पहुँच गए, क्योंकि वे अतीत में अनेक बार वहाँ जा चुके थे।
**”भूत-विष्टः महोन्माद-गृहीतश्च यथेतरः।”**
जब वे वहाँ पहुँचे, तो ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो किसी प्रेत ने उन्हें अपने वश में कर लिया हो। उनका आचरण, उनकी चाल, उनकी गतिविधियाँ—सब कुछ अत्यन्त असाधारण था।
वहाँ उपस्थित सभी लोग आश्चर्यचकित हो गए। वे सोचने लगे—**”यह हमारे नारद मुनि को क्या हो गया?”**
उन्होंने क्या देखा?
**”भूमौ क्वापि स्खलति।”**
महल की ओर आते हुए वे बार-बार लड़खड़ा रहे थे।
**”पतति।”**
वे गिर पड़ते थे।
**”तिष्ठत्यचेष्टः।”**
फिर उठते, किन्तु उठकर एक स्तम्भ की भाँति निश्चल खड़े हो जाते।
अगले ही क्षण—
**”क्वाप्यनुकम्पं भजति।”**
उनका सम्पूर्ण शरीर काँपने लगता।
फिर—
**”लुटति।”**
वे भूमि पर गिरकर लोटने लगते।
फिर—
**”क्वापि रोदत्यार्तः।”**
वे अत्यन्त करुण भाव से रोने लगते।
और अगले ही क्षण—
**”क्वाप्याक्रोशं कीर्तिभिः।”**
वे ऊँचे स्वर से पुकारने लगते।
क्षण-क्षण में दृश्य बदल रहा था। अभी वे वीणा लेकर मधुर स्वर में गा रहे हैं, वीणा बजा रहे हैं, नृत्य कर रहे हैं, और अगले ही क्षण किसी अन्य भाव में प्रवेश कर जाते हैं।
यह सब किस कारण हो रहा था?
**”प्रेम-सम्पद्-विकारम्।”**
अर्थात् प्रेम-सम्पत्ति के प्रभाव से उत्पन्न दिव्य भाव-परिवर्तन।
क्योंकि उन्होंने कौन-सी सम्पत्ति प्राप्त की थी?
किस प्रकार की सम्पत्ति?
**प्रेम-सम्पत्ति।**
उसी प्रेम-सम्पत्ति के कारण उनके शरीर और भावों में ये समस्त दिव्य परिवर्तन प्रकट हो रहे थे।
**प्रेम-सम्पत्ति।**
प्रेम-सम्पत्ति के परिणामस्वरूप उनके व्यक्तित्व में ये सभी दिव्य विकार प्रकट हो रहे थे।
**”तस्मिन्नहनि केनापि वैमानक्षेण, हे मातरिदानीं त्वं सावधानतरा भव।”**
छठे अध्याय का वर्णन प्रारम्भ करने से पहले राजा परीक्षित अपनी माता से कहते हैं, **”हे माता! अब आप विशेष रूप से सावधान हो जाइए।”**
**”स्थिरतां प्रापयन्ती मां सधैर्यं शृण्विदं स्वयम्।”**
अर्थात् स्थिर हो जाइए, एकाग्र हो जाइए और पूर्ण ध्यान से बैठिए। **सधैर्यम्** अर्थात् अत्यन्त धैर्यपूर्वक। **”शृण्विदम्”**—अब जो मैं कहने जा रहा हूँ, उसे कृपया ध्यानपूर्वक सुनिए। यह केवल माता उत्तरा के लिए ही नहीं, बल्कि हम सभी श्रोताओं के लिए भी एक स्मरण है—**सावधान। साधु सावधान। वैष्णव सावधान।**
याद आता है कि जप की रिकॉर्डिंग में श्रील प्रभुपाद भी कहते हैं—**”Sit properly… Savadhan.”**
जैसे सेना या पुलिस के जवान परेड से पहले एकत्र होते हैं। वे आपस में बातें कर रहे होते हैं, उनका ध्यान इधर-उधर होता है। तभी उनका कमाण्डर आता है और सबसे पहले आदेश देता है—**”सावधान!”** बस उसी क्षण सब कुछ बन्द हो जाता है। सभी सीधे खड़े हो जाते हैं और अगले आदेश की प्रतीक्षा करते हैं। फिर आदेश आता है—**”Left… Left… Left… Right… Left…”** और सभी उसी आदेश का पालन करते हैं।
उसी प्रकार राजा परीक्षित भी अपनी माता से कहते हैं, **”माता! सावधान हो जाइए और अब जो मैं कहूँ, उसे ध्यानपूर्वक सुनिए।”**
जिस दिन नारद मुनि द्वारका पहुँचे, उस दिन की प्रातःकालीन बेला अत्यन्त विशेष थी। द्वारका में उस दिन कुछ असामान्य घट रहा था। विशेषकर श्रीकृष्ण के महल में वातावरण सामान्य नहीं था।
**”तस्मिन्नहनि केनापि वैमानक्षेण वैष्मणोऽन्तःप्रकोष्ठे सुप्तश्च प्रभोः पार्श्वं विहावसः।”**
उस प्रातःकाल भगवान श्रीकृष्ण किसी प्रकार की व्यथा में थे। वे जाग चुके थे, किन्तु अभी भी शय्या पर लेटे हुए थे। उन्होंने अपना मुख वस्त्र अथवा तकिये से ढक रखा था। वे अपनी प्रातःकालीन दिनचर्या भी प्रारम्भ नहीं कर रहे थे। जो लोग प्रतिदिन उनके दर्शन करने आते थे, उनका अभिवादन करते थे तथा राजमहल के कार्यों में सम्मिलित होते थे, वे सभी उस दिन भी आ चुके थे और प्रतीक्षा कर रहे थे।
उद्धव भीतर उस कक्ष तक गए जहाँ श्रीकृष्ण विश्राम कर रहे थे। उन्होंने समझ लिया कि इस समय भगवान एकान्त चाहते हैं और किसी से मिलना नहीं चाहते। इसलिए उद्धव बाहर लौट आए और महल के प्रवेशद्वार पर बने एक ऊँचे चबूतरे पर बैठ गए।
उनके चारों ओर अनेक महान व्यक्तित्व उपस्थित थे—**”बलदेव, देवकी च, रोहिणी, रुक्मिणी तथा।”** बलरामजी, माता देवकी, माता रोहिणी और रुक्मिणी देवी भी वहीं बैठी थीं। **”सत्यभामा आद्या अन्याश्च दिव्याः।”** सत्यभामा सहित भगवान की अनेक रानियाँ भी वहाँ उपस्थित थीं।
मानो उस प्रातःकाल का एक जीवंत चित्र हमारे सामने उपस्थित हो रहा हो। द्वारका… राजमहल… भगवान श्रीकृष्ण अभी भी शय्या पर हैं… उद्धव प्रवेशद्वार पर बैठे हैं… और उनके चारों ओर बलराम, देवकी, रोहिणी, रुक्मिणी, सत्यभामा तथा अन्य सभी रानियाँ उपस्थित हैं।
**”पद्मवती च सह।”**
वहाँ पद्मावती नाम की एक स्त्री भी उपस्थित थी। यह अधिकांश लोगों के लिए एक नया पात्र है। **”कंस-माता।”** वह कंस की माता थी। उसका नाम था—**पद्मावती।**
वह किस बात के लिए प्रसिद्ध थी?
**”प्रवृत्ति-हारिणी।”**
वह सदैव इधर-उधर की बातें करने वाली, गपशप फैलाने वाली और अफवाहें फैलाने के लिए प्रसिद्ध थी। **”दासीस्तथा पराः।”** अनेक दासियाँ भी वहाँ उपस्थित थीं और भगवान के जागने की प्रतीक्षा कर रही थीं, ताकि वे उनकी सेवा कर सकें।
यहाँ एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बात का उल्लेख करना आवश्यक है। श्रील सनातन गोस्वामी ने केवल **बृहत् भागवतामृत** की रचना ही नहीं की, बल्कि उस पर स्वयं एक विस्तृत टीका भी लिखी, जिसे **दिग्दर्शिनी** कहा जाता है। अर्थात् उन्होंने अपने ही ग्रन्थ पर स्वयं भाष्य लिखा, जिससे पाठकों को विषय का और भी गहरा बोध हो सके। उसमें उन्होंने अनेक अतिरिक्त तथ्य, परिस्थितियाँ तथा छूटे हुए प्रसंगों को भी स्पष्ट किया है।
उसी प्रकार गोपी परानन्द प्रभु ने भी केवल मूल **बृहत् भागवतामृत** और उसका अनुवाद ही नहीं दिया, बल्कि **दिग्दर्शिनी** टीका के अनेक अंशों का भी अनुवाद सम्मिलित किया है। यद्यपि सम्पूर्ण टीका का अनुवाद नहीं हुआ है, फिर भी उसके कुछ महत्त्वपूर्ण भाग उसमें सम्मिलित हैं।
इसी टीका में यह भी बताया गया है कि उस दिन भगवान श्रीकृष्ण इतने व्यथित क्यों थे। राजा परीक्षित अपनी माता को आगे चलकर इसका कारण बताएँगे। अभी उन्होंने केवल इतना कहा कि भगवान श्रीकृष्ण किसी प्रकार की व्यथा में थे। उन्होंने जानबूझकर अधिक कुछ नहीं बताया, मानो वे सोच रहे हों—**”यदि मैं अभी सब कुछ बता दूँ, तो माता उत्तरा अत्यधिक व्याकुल हो जाएँगी। अभी समय नहीं आया है। आगे चलकर उचित अवसर पर मैं इसका कारण बताऊँगा।”**
इसी टीका में सनातन गोस्वामी पद्मावती के विषय में भी लिखते हैं। **पद्म पुराण** में उसका संक्षिप्त उल्लेख मिलता है। वह उग्रसेन की पत्नी थी और उसके पिता का नाम सत्यकेतु था। विवाह के कुछ समय बाद एक अवसर पर पद्मावती अपने पिता के घर गई हुई थी। उसी समय कुबेर का एक दैत्य-दूत, जिसका नाम **दुमिल** था, वहाँ आया। उसने उग्रसेन का रूप धारण कर लिया। उसने स्वयं को पूर्णतः उग्रसेन के समान बना लिया। पद्मावती ने समझा कि उसके पति उग्रसेन आए हैं, किन्तु वास्तव में वह कुबेर का दैत्य-दूत था। उसने पद्मावती को मोहित किया और उस अवैध सम्बन्ध से जो पुत्र उत्पन्न हुआ, वही कंस था। अब आप समझ सकते हैं कि कंस का स्वभाव वैसा क्यों था।
**”तूष्णीं-भूताश्च ते सर्वे वर्तमानाः स-विस्मयम्। तत्र श्री-नारदं प्राप्तमैक्षन्तापूर्व-चेष्टि
उधर सभी लोग पहले से ही राजमहल में उस असामान्य परिस्थिति से चिन्तित बैठे थे। भगवान श्रीकृष्ण जाग चुके थे, किन्तु शय्या से उठ नहीं रहे थे। तभी नारद मुनि वहाँ पहुँचे। उनके आचरण को देखकर सभी अत्यन्त आश्चर्यचकित हो गए। उन्होंने नारद मुनि को पहले कभी इस प्रकार व्यवहार करते हुए नहीं देखा था। सभी को स्पष्ट प्रतीत हो रहा था कि कुछ न कुछ अत्यन्त असामान्य अवश्य है।
महल में उपस्थित उद्धव, बलराम, रुक्मिणी तथा अन्य सभी सोच रहे थे—**”आज अवश्य कोई गंभीर बात है।”** किन्तु कोई भी यह समझ नहीं पा रहा था कि वास्तव में हुआ क्या है। वे समझ नहीं पा रहे थे कि आज भगवान हमसे मिल क्यों नहीं रहे, बाहर क्यों नहीं आ रहे।
इसी बीच उन्हें नारद मुनि के आगमन का भी सामना करना पड़ा। वे पहले से ही एक कठिन परिस्थिति में थे और अब नारद मुनि भी अत्यन्त असामान्य अवस्था में वहाँ पहुँच गए।
**”उत्थाय यत्नादानीय स्वास्थ्यं नीत्वा क्षणेन तम्।”**
नारद मुनि को देखते ही सभी उठकर उनके स्वागत के लिए आगे बढ़े। उन्होंने कहा, **”आइए… आइए… कृपया इधर पधारिए।”** वे उन्हें आदरपूर्वक महल के प्रवेशद्वार तक ले आए। फिर उन्होंने बड़े प्रयत्न से उन्हें शान्त करने का प्रयास किया। उनकी स्थिति सामान्य करने का प्रयास किया। उन्होंने उनके मुख पर बह रहे आँसुओं को वस्त्र से धीरे-धीरे पोंछा। और जब वे कुछ शान्त हुए, तब अत्यन्त कोमलता और विनम्रता के साथ उनसे बातचीत प्रारम्भ की।
**”शनैल्लघु…”**
अर्थात् उन्होंने अत्यन्त धीरे, कोमलता और प्रेमपूर्वक उनसे बात की।
उन्होंने क्या कहा?
**”अदृष्टपूर्वमस्माभिः कीदृशं तेऽद्य चेष्टितम्।”**
सभी ने नारद मुनि से कहा, **”आज आपका यह व्यवहार कैसा है? हमने आपको पहले कभी इस प्रकार नहीं देखा। आपका आचरण आज इतना असामान्य क्यों है? अचानक ऐसा क्या हो गया? आज आप जिस प्रकार व्यवहार कर रहे हैं, वैसा हमने अपने जीवन में कभी नहीं देखा।”**
**”तूष्णीमुपविशाक्षणम्।”** उन्होंने अत्यन्त विनम्रता से कहा, **”कृपया यहाँ बैठ जाइए। पहले शांत हो जाइए… शांत हो जाइए।”** इस प्रकार वे नारद मुनि को बैठाते हैं।
**”सद्गद्गदमुवाच अश्रुधारा-मिलितालोचने यज्ञादुन्मील्य नत्वा सकम्पं पुलकाचितः।”**
तब नारद मुनि गद्गद कण्ठ से उत्तर देने लगे। कुछ क्षणों के लिए उनके शरीर में जो प्रेम के लक्षण शांत हो गए थे या मानो भीतर दब गए थे, वे जैसे ही उनसे पूछते हैं—**”क्या बात है? आप इस प्रकार क्यों व्यवहार कर रहे हैं?”**—वैसे ही वे पुनः उसी प्रेमावस्था में प्रवेश कर जाते हैं। उनका शरीर फिर से काँपने लगता है, आँखों से अश्रुधारा बहने लगती है और उनके शरीर पर रोमांच प्रकट हो जाता है।
**”नारद उवाच।”**
अब नारद मुनि अपने इस विचित्र व्यवहार का कारण बताने लगते हैं। वे कहते हैं, **”देखिए, मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। ऐसा नहीं है कि मैंने जानबूझकर कुछ किया हो और इसलिए मेरी यह अवस्था हुई हो। मैं आपको बताता हूँ कि मेरी इस दशा का वास्तविक कारण क्या है।”**
समय कितनी शीघ्रता से बीत जाता है, विशेषकर जब भगवान की कथा का आनन्द मिल रहा हो। नारद मुनि को हस्तिनापुर में सुनी हुई बातें स्मरण आने लगती हैं। उन्हें पाण्डवों द्वारा उद्धव की की गई महिमा याद आने लगती है। उन्होंने उद्धव के विषय में कहा था कि वे **”कृपा-भाजनम्, सौभाग्य-एक-भाजनम्”** हैं—अर्थात् वे भगवान की कृपा के वास्तविक पात्र हैं, भगवान के सबसे अधिक सौभाग्यशाली और अत्यन्त प्रिय भक्त हैं।
नारद मुनि विनती करते हुए कहते हैं, **”कृपया… कृपया मेरी उद्धव से भेंट करा दीजिए।”**
किन्तु उनकी स्थिति ऐसी थी कि वे स्वयं आँसुओं से इतने अभिभूत थे और उनका शरीर इतना काँप रहा था कि उद्धव उनके ठीक सामने उपस्थित होने पर भी वे उन्हें पहचान नहीं सके। इसलिए वे बार-बार निवेदन करने लगे, **”मैं उद्धव से मिलना चाहता हूँ। क्या आप कृपया मेरी उनसे भेंट करा सकते हैं?”**
फिर उनके मन में दूसरा विचार आया। उन्होंने कहा, **”यदि यह सम्भव न हो, अथवा मैं उनके दर्शन के योग्य न हूँ, तो कम-से-कम…”**
**”तदीय-पादैक-रजोऽथवा भवेत्।”**
**”उस महान भक्त उद्धव के चरणों की थोड़ी-सी धूल ही मुझे मिल जाए। क्या आप कृपया उनके चरणों की कुछ धूल ला सकते हैं?”**
फिर वे कहते हैं—
**”तदैव शान्तिर्वत मे अन्तरात्मनः।”**
**”यदि मुझे उनके दर्शन मिल जाएँ, और यदि दर्शन भी न मिलें तो कम-से-कम उनके चरणों की धूल ही प्राप्त हो जाए, तो मेरा अन्तःकरण पूर्णतः शांत हो जाएगा। मैं तृप्त हो जाऊँगा, संतुष्ट हो जाऊँगा और मेरे हृदय को शांति मिल जाएगी। कृपया… कृपया किसी प्रकार मेरी उनसे भेंट करा दीजिए।”**
इस प्रकार नारद मुनि अपने इस विलक्षण व्यवहार का कारण बताना प्रारम्भ करते हैं। वे विस्तार से समझाने लगते हैं कि ऐसा क्या हुआ जिसके परिणामस्वरूप उनकी यह असाधारण अवस्था हुई। आगे वे उस सम्पूर्ण घटना का वर्णन करेंगे—हस्तिनापुर में क्या हुआ, उन्होंने क्या सुना और किस प्रकार वही सब उनके हृदय में महा-प्रेम का ज्वार बनकर उमड़ पड़ा।
जैसा कि इससे पहले जिन-जिन भक्तों से भेंट हुई, प्रत्येक ने यही कहा था—**”नहीं… नहीं… मैं नहीं। मुझसे भी श्रेष्ठ कोई और है।”**
उसी प्रकार अब उद्धव भी यही कहेंगे—**”नहीं… नहीं… नहीं… मैं नहीं। व्रजवासी, वे ग्वालबाल, भगवान के माता-पिता, गोपियाँ और विशेष रूप से श्रीमती राधारानी ही भगवान के सर्वाधिक प्रिय हैं। वही समस्त भक्तों में सर्वोच्च हैं।”**
इसके बाद अन्य भक्त भी अपने-अपने विचार प्रकट करेंगे। बलरामजी बोलेंगे। माता रोहिणी भी अपनी बात रखेंगी। पद्मावती भी इस वार्तालाप में अपना योगदान देंगी।
और जब यह सम्पूर्ण चर्चा चल रही होगी, तब एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बात घट रही होगी।
यह सब कौन सुन रहा होगा?
भगवान श्रीकृष्ण।
वे वहाँ से दूर नहीं हैं। वे भीतर ही यह सम्पूर्ण वार्तालाप सुन रहे हैं।
फिर उनके भीतर क्या घटित होगा? उनके हृदय में कौन-कौन से भाव जाग्रत होंगे? उनके शरीर में किस प्रकार के दिव्य परिवर्तन प्रकट होंगे? और अन्ततः जब वे शय्या से उठेंगे, तब वे क्या कहेंगे? वे क्या करेंगे?
हमारे सामने अभी अत्यन्त अद्भुत, गहन और भावपूर्ण लीला का एक विलक्षण नाट्य आगे प्रकट होने वाला है।


